Wednesday, February 21, 2024
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124. सब भाड़ में

रीवां नरेश की आँखें फटी की फटी रह गयीं। उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि जो दृश्य वे अपनी आँखों से देख रहे हैं वह सत्य भी हो सकता है! उन्होंने देखा कि ठीक अब्दुर्रहीम के जैसा दिखने वाला एक खान भाड़ झौंक रहा था। क्या यह सचमुच अब्दुर्रहीम ही है!

रीवां नरेश आज ही चित्रकूट आये थे और इस समय अपने आदमियों के साथ मंदाकिनी के किनारों की हरियाली देखने के लिये निकले थे। उन्होंने सुना तो था कि इन दिनों अब्दुर्रहीम चित्रकूट में है किंतु वह इस दशा में होगा, इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

एक दिन रीवां नरेश ने जिस अब्दुर्रहीम के संकेत मात्र पर हजारों योद्धओं को प्राण न्यौछावर करते देखा था, आज वही अब्दुर्रहीम नितांत एकाकी हो इस तरह जीवन यापन कर रहा था! एक दिन हिन्दुस्थान का बड़े से बड़ा आदमी जिसकी जय-जयकार से आकाश गंुजा देता था, आज वही अब्दुर्रहीम अपना समस्त वैभव खोकर नीच आदमी का दास हो गया था! एक दिन जिस अब्दुर्रहीम को दोनों हाथों में तलवार लेकर रण में बिजली गिराते हुए देखा था, वही अब्दुर्रहीम आज अपने दोनों हाथों से भाड़ झौंक रहा था!

बहुत से पुराने चित्र स्मृतियों के आगार से निकल कर रीवां नरेश की आँखों के समक्ष जीवति हो उठे। कहाँ वह वैभव और कहाँ यह दैन्य? नहीं! यह अब्दुर्रहीम नहीं हो सकता! किंतु अपनी आंखों का वे क्या करें? दिखने में तो यह अब्दुर्रहीम जैसा ही है।

रीवां नरेश घोड़े से उतर गये। मन की बेचैनी बढ़ गयी। कैसे पूछा जाये? कहीं सचमुख अब्दुर्रहीम ही हुआ तो! और यदि नहीं हुआ तो! दोनों ही स्थितियों में पूछना उचित नहीं। काफी देर सोच विचार के बाद रीवां नरेश को एक उपाय सूझ गया। वे भाड़ झौंकने वाले खान के ठीक पास जाकर खड़े हो गये। खान अपने काम में लगा रहा। जैसे कि उसने किसी को अपने पास आकर खड़े होते हुए देखा ही नहीं। रीवां नरेश की बेचैनी और भी बढ़ गयी। जब किसी तरह भी रहा न गया तो अवसर पाकर धीरे से बोले-

‘जाके सिर अस भार, सो कस झौंकत भार अस?’[1]

रीवां नरेश की आशा के विपरीत खान ने भाड़ में सूखी घास झौंकते हुए उत्तर दिया-

‘रहिमन उतरे पार, भार झौंकि सब भार में।’[2]

  – ‘अब्दुर्रहीम! मेरे मित्र!’ रीवां नरेश ने लपक कर खान को गले लगा लिया।

खान ने धीरे से अपने आप को छुड़ाते हुए कहा-

‘ये रहीम दर दर फिरैं मांगि मधुकरी खाहिं,

यारों यारी छांड़ दो वे रहीम  अब  नाहिं।’[3]

  – ‘किंतु अब्दुर्रहीम! आप यहाँ! इस दशा में?’ रीवां नरेश ने उसे फिर से गले लगाते हुए कहा।

खानखाना ने मुस्कुराकर कहा-

‘चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध नरेस।

जा पर विपदा परत है, सो आवत एहि देस।’[4]

  – ‘ऐसी भी कहीं विपदा होती है खानखाना? आपके मित्र हैं, हितैषी हैं, शुभचिंतक हैं, आप पर प्राण न्यौछावर करने वाले हैं। देश-कोष सब लुटाने वाले हैं। वे सब किस लिये हैं?’

अत्यंत शांत स्वर में अब्दुर्रहीम ने कहा-

‘रहिमन  विपदा  हू  भली,  जो  थोरे  दिन  होय।

हित अनहित या जगत में , जानि परत सब कोय।।’[5]

  – ‘किंतु क्यों? विपदा क्यों?’ रीवां नरेश का मन चीत्कार कर उठा।

खानखाना ने कहा-

‘अन्तर दाव लगी रहै, धुआँ न प्रगटै सोइ।

कै जिय आपन जानहीं, कै जिहि बीती होई।’[6]

  – ‘किंतु इस तरह जीवन से उदासीन हो जाना, इस तरह की विरक्ति को पहुँच जाना? क्यों आखिर क्यों?’ रीवां नरेश प्रश्नों पर प्रश्न किये जा रहे थे और खानखाना बड़ी चतुराई से उन्हें टालता जा रहा था-

‘तैं रहीम मन आपुनो, कीन्हों चारु चकोर।

निसि बासर लागो रहै कृष्ण चंद्र की ओर।।’ [7]

रीवां नरेश समझ गये। यह इस तरह अपने मन रूपी कवच से बाहर नहीं आयेगा। अतः वे बहुत अनुनय विनय करके खानखाना को अपने डेरे पर ले गये। बहुत दिनों के बाद उन्हें अकस्मात् पाकर रीवा नरेश को अपार हर्ष हुआ था किंतु उसकी दुर्दशा को देखकर वे बहुत दुखी थे। खानखाना के स्वभाव से वे बहुत अच्छी तरह परिचित थे इसलिये इतना साहस न हुआ कि रहीम को अपने साथ रीवां चलने के लिये कह सकें। देर रात तक रीवां नरेश इधर उधर की बातें करते रहे और भोजन आदि के उपरांत उसे विदा किया।

पूरी रात रीवां नरेश बेचैन रहे। कोई मार्ग नहीं सूझता था कि कैसे वे अपने अत्यंत स्वाभिमानी मित्र का हित साधन करें। अगले दिन बहुत जल्दी ही वे अपने घोड़े पर सवार होकर फिर से चित्रकूट दर्शन के लिये निकल गये।

मार्ग में एक जगह उन्हें भीड़ दिखायी दी। इतनी सुबह किस बात की भीड़ हो गयी, यह देखने के लिये जब वे आगे बढ़े तो उनके आश्चर्य का पार न रहा। उन्होंने देखा कि अब्दुर्रहीम भिखारियों को चने बांट रहा है। रीवां नरेश को अत्यंत उत्सुकता पूर्ण निगाहों से अपनी ओर ताकता देखकर रहीम ने कहा-

‘रहिमन दानि दरिद्रतर तऊ जांचिबे जोग,

ज्यों सरितन सूखा परे कुआँ खनावत लोग।’[8] 

डेरे पर पहुँच कर रीवां नरेश ने एक लाख रुपया अब्दुर्रहीम को भिजवाया। बेटों और पोतों की मृत्यु के बाद अब्दुर्रहीम का मन अब संसार से उचाट हो गया था। उसे धन की आवश्यकता नहीं थी और जिस चीज की आवश्यकता थी, वह कोई दे नहीं सकता था। फिर भी उसने जाने क्या सोच कर एक लाख रुपया रख लिया।


[1] जिसके सिर पर पूरे साम्राज्य का भार था, वह इस तरह भाड़ क्यों झौंक रहा है?

[2] अपने सिर का सारा भार भाड़ में झौंक कर रहीमदास पार उतर गये हैं।

[3] ये रहीम अब दर-दर फिरते हैं और भीख मांगकर खाते हैं। मित्रो! अब मित्रता त्याग दो। अब वे रहीम नहीं रहे।

[4] चित्रकूट में अवध नरेश श्रीरामजी ने निवास किया। जिन पर विपदा आती है, वे इसी देश चले आते हैं।

[5] विपदा अच्छी है जो थोड़े दिन ही रहती है किंतु संसार में हितैषी अथवा अपकारी की पहचान करवा देती है।

[6] हृदय में अग्नि लगी रहती है, उसका धुआँ दिखाई नहीं देता। इसे या तो वह जानता है जिसके हृदय में अग्नि लगी हुई है, या फिर वह जिसके ऊपर कभी ऐसी विपदा आई है।

[7]  हे रहीम! तूने अपना मन सुंदर चकोर पक्षी के समान कर लिया है जो सदैव ही कृष्ण रूपी चंद्र की ओर लगा रहता है।

[8]  यदि दानी निर्धन हो जाये तो भी उसे जांचा जाना चाहिये जिस प्रकार नदी के सूख जाने पर लोग उसके तल में कुआँ खोदकर पानी निकालते हैं।

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohan Lal Gupta is a renowned historian from India. He has written more than 100 books on various subjects.

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