Tuesday, February 7, 2023

अध्याय – 32 : भारत में समाज सुधार एवं धर्म सुधार आन्दोलन-4

स्वामी दयानन्द सरस्वती और आर्य समाज

यद्यपि ब्रह्म समाज ने धर्म एवं समाज सुधार के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किया तथापि ब्रह्म समाज ने पाश्चात्य सभ्यता और ईसाई धर्म से प्रभावित होकर हिन्दू धर्म और समाज की कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया। उसने ईसाई धर्म को समान स्थान प्रदान किया तथा हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता स्थापित नहीं की। इसलिये बहुत से हिन्दू ब्रह्म समाज के प्रति आकर्षित नहीं हो सके। हिन्दू धर्म एवं समाज को एक ऐसे उग्र आन्दोलन की आवश्यकता थी जो हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता में विश्वास रखे। स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज ने इस आवश्यकता की पूर्ति की। आर्य समाज आन्दोलन कई प्रकार से, ब्रह्म समाज से कई अर्थों में भिन्न था।

दयानन्द सरस्वती का जन्म 1824 ई. में गुजरात के टंकारा परगने के शिवपुर ग्राम में सम्पन्न एवं रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके बचपन का नाम मूलशंकर था। जब वे 14 वर्ष के थे, तब एक बार शिवरात्रि के पर्व पर अपने पिता के साथ शिव मन्दिर गये। वहाँ उन्होंने एक चूहे को शिवलिंग पर चढ़कर प्रसाद खाते देखा तो उनका मूर्तिपूजा से विश्वास उठ गया। जब वे 21 वर्ष के हुए तो उनके पिता ने उनके विवाह का प्रबन्ध किया। इस पर 1845 ई. में वे आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में, घर छोड़कर चल दिये। 15 वर्षों तक वे विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करते रहे तथा अध्ययन करते रहे। 1860 ई. में वे मथुरा पहुँचे जहाँ उन्होंने दण्डी स्वामी विरजानन्द के चरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त किया। स्वामी विरजानन्द वैदिक ज्ञान, भाषा एवं दर्शन के प्रकाण्ड पण्डित थे। उन्होंने दयानन्द को वेदों में निहित ज्ञान की व्याख्या समझाई। इस अध्ययन से दयानन्द को विश्वास हो गया कि वेद ही समस्त ज्ञान के स्त्रोत हैं। स्वामी विरजानन्द ने उन्हें पौराणिक हिन्दू धर्म की कुरीतियों तथा अन्धविश्वासों का खण्डन कर देश में वैदिक धर्म व संस्कृति की पुनः स्थापना करने का आदेश दिया। स्वामी दयानन्द जीवन भर यह कार्य करते रहे। वे पाश्चात्य सभ्यता व ईसाई धर्म से अप्रभावित थे। उनका उद्देश्य हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता स्थापित करना तथा हिन्दू धर्म की बुराइयों को दूर करना था। वे अपने उपदेशों में संस्कृत भाषा का प्रयोग करते थे। केशवचन्द्र सेन के परामर्श से उन्होंने हिन्दी भाषा के माध्यम से जन-साधारण को उपदेश देना प्रारम्भ किया। उन्होंने 1863 ई. में आगरा से धर्म-प्रचार का कार्य आरम्भ किया। 1874 ई. में उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश की रचना की। वाराणसी में कर्मकाण्डी पण्डितों से हुए शास्त्रार्थ में उन्होंने प्रमाणित किया कि वेद ही समस्त ज्ञान के आधार हैं तथा मूर्तिपूजा वेदों की शिक्षा के प्रतिकूल है।

 आर्य समाज की स्थापना

महर्षि दयानंद ने हिन्दू धर्म, सभ्यता और भाषा के प्रचार के लिए 10 अप्रेल 1875 को बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की। उसके बाद स्वामीजी दिल्ली गये जहाँ उन्होंने ईसाई, मुसलमान और हिन्दू पण्डितों की एक सभा बुलाई। दो दिन के विचार-विमर्श के बाद भी कोई निष्कर्ष नहीं निकला। दिल्ली से स्वामीजी पंजाब गये। यहाँ जन-साधारण में उनके प्रति बड़ा उत्साह जागृत हुआ। जून 1877 में लाहौर में आर्य समाज की एक शाखा खोली गई तथा इस आन्दोलन का प्रमुख कार्यालय लाहौर ही बन गया। इसके पश्चात् स्वामीजी भारत के विभिन्न प्रान्तों में अपने विचारों का प्रचार करते रहे तथा आर्य समाज की शाखाएँ स्थापित करते रहे।

स्वामीजी द्वारा लिखित ग्रंथ

अपने विचारों का प्रचार करने के लिए स्वामीजी ने तीन ग्रन्थ लिखे-

(1.) ऋग्वेदादि भाष्य-भूमिका: इस ग्रन्थ में स्वामीजी ने वेदों के सम्बन्ध में अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट किया।

(2.) वेदभाष्य: इस ग्रन्थ में उन्होंने यजुर्वेद और ऋग्वेद की टीकाएं लिखीं।

(3.) सत्यार्थ प्रकाश: स्वामीजी का सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश है। इसमें उन्होंने समस्त धर्मों का आलोचनात्मक विश्लेषण करते हुए यह प्रमाणित किया कि वैदिक धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। उन्होंने इस ग्रन्थ में पौराणिक हिन्दू धर्म की कुरीतियों का खण्डन जिस निर्भयता से किया, उसी ढंग से इस्लाम तथा ईसाइयत के ढोंग, आडम्बर तथा अन्धविश्वासों की तीव्र आलोचना की। इससे हिन्दू जनता को यह जानकर सन्तोष हुआ कि पौराणिकता के मामले में ईसाइयत और इस्लाम भी हिन्दुत्व से अच्छे नहीं हैं। इस कारण हिन्दुओं का ध्यान अपने धर्म के मूल स्वरूप की ओर आकृष्ट हुआ और वे अपनी प्राचीन परम्परा के लिए गौरव का अनुभव करने लगे। ईसाइयत की श्रेष्ठता की जो भावना बल पकड़ रही थी, स्वामीजी ने उस पर रोक लगा दी। स्वामीजी ने सत्यार्थ प्रकाश में अवतारवाद, तीर्थ-यात्रा, श्राद्ध, व्रत, अनुष्ठान आदि पौराणिक बातों का युक्ति पूर्वक खण्डन किया। उन्होंने प्रत्येक आर्य के लिए, वेदों में निर्दिष्ट यज्ञ तथा संध्या करना आश्वश्यक बताया तथा छुआछूत को अवैदिक बताया। स्वामीजी ने सहस्रों अन्त्यजों को यज्ञोपवीत देकर उन्हें आर्य समाज में आदर दिलवाया। स्वामीजी ने बाल-विवाह, बहु विवाह तथा पर्दा-प्रथा का खण्डन किया, स्त्री-शिक्षा पर जोर दिया तथा अन्तर्जातीय विवाह का समर्थन किया।

दयानन्द सरस्वती के अन्तिम वर्ष

स्वामी दयानन्द सरस्वती के अन्तिम वर्ष राजपूताने में व्यतीत हुए। अनेक राजाओं  तथा जागीदारों ने उनकी शिक्षा से प्रभावित होकर अपने राज्यों एवं जागीरों में उनके उपदेश करवाये। उदयपुर के महाराणा सज्जनसिंह ने उनसे मनुस्मृति, राजनीति तथा राजधर्म की शिक्षा ग्रहण की। 1881 ई. में उदयपुर राज्य की बनेड़ा जागीर के जागीदार राजा गोविन्दसिंह के निमन्त्रण पर स्वामीजी बनेड़ा गये जहाँ वे सोलह दिन रहे। इस दौरान स्वामीजी ने राजा गोविन्दसिंह के दोनो पुत्रों- अक्षयसिंह और रामसिंह को सस्वर वेद पाठ करना सिखाया। इसके बाद स्वामीजी चितौड़गढ़ चले गये। अक्टूबर 1883 में स्वामीजी जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री सर प्रतापसिंह के निमंत्रण पर जोधपुर पहुंचे। जोधपुर नरेश जसवंतसिंह ने स्वामीजी का भव्य स्वागत किया। जोधपुर राज्य में स्वामीजी के भाषणों की धूम मच गई। राजा जसवंतसिंह ने राईकाबाग महल में बैठकर स्वामीजी के उपदेश सुने। उनके उपदेशों का राजा से लेकर मन्त्रियों, राज्य कर्मचारियों और प्रजा पर गहरा प्रभाव पड़ा। राजा और मन्त्रियों ने राज्य और प्रजा की वास्तविक उन्नति की ओर ध्यान दिया। शिक्षा के लिये विद्यालय स्थापित किये और राज्य की अदालतों में उर्दू के स्थान पर हिन्दी काम में लाई जाने लगी।

स्वामी दयानंद का निधन

राजा जसवंतसिंह ने स्वामीजी को दुर्ग में पधारने का निमंत्रण दिया तथा उन्हें अपने महल में लाने के लिये रत्न जड़ित पालकी भेजी। स्वामीजी ने पालकी लौटा दी और एक दिन बिना कोई सूचना दिये पैदल ही दुर्ग पहुंचे। स्वामीजी दुर्ग पहुंचे तो विचित्र दृश्य देखकर आश्चर्य से खड़े रह गये। उन्होंने देखा कि राजा नशे में धुत्त है और राज्य की प्रसिद्ध वेश्या नन्ही बाई की पालकी को कन्धे पर उठाये महल से बाहर आ रहा है। जब राजा की दृष्टि स्वामीजी की आंखों से टकराई तो स्वामीजी ने राजा को कड़ी फटकार लगाई और किले से नीचे उतर गये। स्वामीजी ने राजा को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने राजा की तुलना नारकीय पशु से की। यह पत्र नन्ही बाई के हाथ लग गया। उसने 29 सितम्बर 1883 को स्वामीजी के दूध में पिसा हुआ काँच एवं विष मिला दिया। स्वामीजी को तुरंत अजमेर ले जाया गया जहाँ 30 अक्टूबर को दीपावली के दिन उनका निधन हो गया।

स्वामीजी की मृत्यु पर रूस निवासी मैडम ब्लेवटास्की ने लिखा- ‘यह बिल्कुल सही बात है कि शंकराचार्य के बाद भारत में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं हुआ जो स्वामीजी से बड़ा संस्कृतज्ञ, उनसे बड़ा दार्शनिक, उनसे अधिक तेजस्वी व्यक्ति तथा कुरीतियों पर टूट पड़ने में उनसे अधिक निर्भीक रहा हो।’

स्वामीजी की मृत्यु के बाद थियोसोफिस्ट अखबार ने उनकी सेवाओं की प्रशंसा करते हुए लिखा- ‘उन्होंने जर्जर हिन्दुत्व के गतिहीन जनसमूह पर भारी प्रहार किया और अपने भाषणों से लोगों के हृदय में ऋषियों और वेदों के लिए अपरिमित उत्साह की आग जला दी। सारे भारतवर्ष में उनके समान हिन्दी और संस्कृत का वक्ता दूसरा कोई और नहीं था।’

आर्य समाज के नियम

स्वामी दयानन्द तथा उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज के मौलिक सिद्धान्तों का परिचय उनके महान् ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में मिलता है। इस ग्रन्थ के आधार पर आर्य समाज के निम्नलिखित दस नियम हैं-

(1.) ईश्वर एक है तथा निराकार है। वह सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, निर्विकार, सर्वव्यापक, अजर, अमर, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। अतः उसकी उपासना करने योग्य है।

(2.) वेद ही सच्चे ज्ञान के स्त्रोत हैं। अतः वेदों का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना समस्त आर्यों का परम धर्म है।

(3.) प्रत्येक व्यक्ति को सदा सत्य ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने के लिए तैयार रहना चाहिये।

(4.) समस्त कार्य धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिये।

(5.) संसार का उपकार करना, अर्थात् सबकी शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना मानव समाज का मुख्य कर्त्तव्य है।

(6.) प्रत्येक व्यक्ति को अपनी ही उन्नति में सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिये। अपितु सब लोगों की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये।

(7.) समस्त ज्ञान का निमित्त कारण और उसके माध्यम से समस्त बोध ईश्वर है।

(8.) प्रत्येक व्यक्ति को अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।

(9.) समस्त लोगों से धर्मानुसार, प्रीतिपूर्वक एवं यथायोग्य व्यवहार करना चाहिए।

(10.) व्यक्तिगत हितकारी विषयों में प्रत्येक व्यक्ति को आचरण की स्वतन्त्रता है परन्तु सामाजिक भलाई से सम्बन्धित विषयों में सब मतभेदों को भुला देना चाहिए।

आर्य समाज के सामाजिक सुधार

(1.) जाति प्रथा का विरोध: भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था से प्रसूत जाति प्रथा, शताब्दियों से प्रचलित थी। इस प्रथा ने सदियों तक हिन्दू धर्म की रक्षा की किंतु मुसलमानों के आने के बाद इसने जो संकुचित स्वरूप ग्रहण किया उससे हिन्दू समाज संकीर्ण होता चला गया। इस कारण हिन्दुओं की सामाजिक एकता भंग हो गई। स्वामी दयानन्द ने जाति प्रथा की कटु आलोचना की। उनके अनुसार समाज में किसी व्यक्ति को जन्म के आधार पर उच्च स्थान पर पहुंचने से वंचित नहीं किया जाना चाहिये। उन्होंने छुआछूत तथा समुद्र-यात्रा-निषेध के विरुद्ध आवाज उठाई तथा प्राचीन वर्ण-व्यवस्था को उचित ठहराते हुए जाति-प्रथा का विरोध किया।

(2.) स्त्रियों की दशा में सुधार: बहु-विवाह, बाल-विवाह, पर्दा प्रथा, अशिक्षा, सती प्रथा तथा कन्या-वध जैसी कुरीतियों के कारण हिन्दू समाज में स्त्रियों की दशा अत्यन्त ही शोचनीय थी। आर्य समाज ने स्त्रियों को समाज में उच्च स्थान दिलाने तथा स्त्री-शिक्षा की ओर विशेष ध्यान दिया। आर्य समाज ने बाल-विवाह, बहु-विवाह तथा पर्दा-प्रथा का घोर विरोध किया तथा विधवा-विवाह एवं स्त्री-शिक्षा का समर्थन किया। ऋषि दयानंद ने 16 वर्ष से कम आयु की लड़कियों का विवाह बन्द करने का आह्वान किया, सती-प्रथा को पाप बताया और स्त्री-पुरुष की समानता पर बल दिया। स्वामी दयानन्द ने कहा कि स्त्रियों को वेदों का अध्ययन करने तथा यज्ञोपवीत धारण का उतना ही अधिकार है जितना पुरुषों को।

(3.) शुद्धि आंदोलन: आर्य समाज ने शुद्धि आन्दोलन को जन्म दिया। हिन्दू धर्म छोड़कर ईसाई एवं मुसलमान हो चुके लोगों को शुद्धि संस्कार के द्वारा पुनः हिन्दू धर्म में स्वीकार किया जाने लगा। आर्य समाज के प्रयत्नों से लाखों हिन्दुओं को जो मुसलमान और ईसाई बन गये थे, शुद्ध करके पुनः हिन्दू धर्म में बुला लिया गया। वे आज भी हिन्दू समाज में सम्मान पूर्वक जीवन यापन कर रहे हैं। आर्य समाज ने हिन्दू समाज के सुप्त आत्म गौरव, संगठन की भावना एवं शुद्ध धार्मिक संस्कारों को फिर से जगाया।

आर्य समाज के धार्मिक सुधार

(1.) अंधविश्वासों का विरोध: स्वामी दयानन्द ने पौराणिक रूढ़ियों एवं मान्यताओं की निन्दा की। उन्होंने मूर्ति-पूजा, कर्मकाण्ड, अनेकेश्वरवाद, अवतारवाद, बलि-प्रथा, स्वर्ग और नरक तथा भाग्य के सर्वोपरि होने में विश्वास रखने का विरोध किया।

(2.) श्राद्ध एवं पाखण्ड का विरोध: आर्य समाज ने मृतकों के श्राद्ध का विरोध किया। उसका कहना था कि ब्राह्मणों अथवा अन्य लोगों को भोजन खिलाकर अथवा दान देकर मृतक व्यक्तियों को परलोक में सब कुछ पहुँचाने की कल्पना मूर्खतापूर्ण है। स्वामी दयानन्द किसी धर्म से घृणा नहीं करते थे किन्तु पाखण्ड, ढोंग, असत्य, दम्भ और आडम्बर का जमकर विरोध करते थे।

(3.) वेदों के महत्त्व की पुनर्स्थापना: दयानंद ने वेदों की व्याख्या इस प्रकार की जिससे वेद वैज्ञानिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक सिद्धान्तों के स्रोत माने जा सकें। आर्य समाज का दृढ़ विश्वास था कि कोई भी ऐसा ज्ञान नहीं है, जो वेदों से नहीं लिया जा सकता। हमें इस्लाम, ईसाई धर्म तथा पाश्चात्य सभ्यता की ओर देखने की आवश्यकता नहीं है। वेदोें की श्रेष्ठता के आधार पर आर्य समाज ने हिन्दू धर्म को इस्लाम और ईसाई धर्म के आक्रमणों से बचाने में सफलता प्राप्त की।

(4.) वैदिक कर्मों का प्रचार: आर्य समाज ने वेदों के आधार पर यज्ञ-हवन, मन्त्रोच्चारण, कर्म आदि पर बल दिया। उनका मानना था कि ईश्वर निराकार है, अतः मूर्ति-पूजा निरर्थक है। उन्होंने हिन्दुओं की मोक्ष सम्बन्धी अवधारणा का समर्थन करते हुए कहा कि ईश्वर की उपासना, अच्छे कर्म और ब्रह्मचर्य व्रत के पालन से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।

आर्य समाज के साहित्यिक एवं शैक्षणिक सुधार

स्वामी दयानन्द तथा उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज ने साहित्यिक एवं शैक्षणिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किये। स्वामी दयानन्द ने अपने ग्रन्थ हिन्दी में लिखकर राष्ट्र-भाषा के विकास में योगदान दिया। उन्होंने संस्कृत के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए उसके अध्ययन और अध्यापन पर बल दिया। आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य अज्ञानता को दूर करके ज्ञान का प्रसार करना था। अतः उसने प्राचीन आश्रम व्यवस्था को पुनः स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उसने शिक्षा की प्राचीन गुरुकुल प्रणाली को प्रचलित किया, जहाँ विद्यार्थी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए विद्या-अध्ययन कर सकें। सर्वप्रथम आर्य समाज ने ही भारतीयों को मैकाले की शिक्षा पद्धति के दोषों से अवगत कराया। स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देकर उन्होंने सही अर्थों में देश के शैक्षिक विकास की नींव रखी।

स्वामी दयानन्द की मृत्यु के बाद आर्य समाजियों में कुछ विषयों पर मतभेद हो जाने के कारण 1892 ई. में इसमें दो दल बन गये। यह मतभेद इस मौलिक सिद्धान्त को लेकर आरम्भ हुआ कि क्या एक आर्य समाजी के लिए केवल दस नियमों का पालन करना ही आवश्यक है। आर्य समाज के इन दो दलों में एक दल के नेता लाला हंसराज थे जो पाश्चात्य शिक्षा के समर्थक थे। उनके प्रयत्नों से स्थान-स्थान पर डी.ए.वी. स्कूल एवं कॉलेज स्थापित किये गए। ये शिक्षण-संस्थाएँ सरकारी पद्धति से सम्बद्ध थीं। दूसरे दल के नेता महात्मा मुन्शीराम थे जो भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति को पुनः प्रचलित करना चाहते थे। अतः दूसरे दल ने गुरुकुल संस्थाएँ स्थापित कीं। ये शिक्षण संस्थाएँ हिन्दू धर्म और संस्कृति तथा आर्य समाज के सिद्धान्तों के प्रचार में सहायक सिद्ध हुईं। भारतीय ज्ञान के विस्तार में इनका बहुत बड़ा योगदान है। शैक्षणिक क्षेत्र में आर्य समाज के योगदान का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि पंजाब एवं संयुक्त प्रदेश (अब उत्तर प्रदेश) में सरकार के अतिरिक्त अन्य किसी भी संस्था ने शिक्षा के लिए वैसे प्रयत्न नहीं किये जैसे आर्य समाज ने किये।

आर्य समाज के राष्ट्रीय सुधार

भारत में राजनीतिक जागृति उत्पन्न करने में आर्य समाज का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। आर्य समाज द्वारा किये गये सामाजिक और धार्मिक सुधारों से भारतीयों में आत्मविश्वास और स्वाभिमान का विकास हुआ। आर्य समाज ने भारत के प्राचीन गौरव की चर्चा करते हुए स्वावलम्बन के विकास को प्रोत्साहन दिया। इससे स्वराष्ट्र प्रेम की भावना को बल मिला। स्वामी दयानन्द के जीवनी लेखक ने लिखा है- ‘दयानन्द का एक मुख्य लक्ष्य राजनीतिक स्वतन्त्रता था। वास्तव में वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने स्वराज्य शब्द का प्रयोग किया। वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना तथा स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करना सिखाया। वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा स्वीकार किया।’

स्वामीजी ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि अच्छे-से-अच्छा विदेशी राज्य, स्वदेश की तुलना नहीं कर सकता। दयानन्द ने वेद कालीन भारत को इसलिए गौरवमय बताया क्योंकि उस समय भारत में स्वराज्य था। बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपतराय, गोपालकृष्ण गोखले आदि जिन नेताओं ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व किया, वे आर्य समाज से प्रभावित थे। काँग्रेस में उग्रवाद की भावना का विकास होने का कारण हिन्दू धर्म की भावना थी। आर्य समाज ने इस भावना के निर्माण में योगदान दिया। डॉ. आर. सी. मजूमदार ने लिखा है- ‘आर्य समाज प्रारम्भ से ही उग्रवादी सम्प्रदाय था।’

आर्य समाज ने भारतीयों के समक्ष प्राचीन भारत के बारे में एक निश्चित विचारधारा प्रस्तुत की। आर्य समाज ने ही परस्पर अभिवादन करने हेतु विख्यात नमस्ते शब्द का प्रचलन किया, जो आज न केवल भारत में अपितु विदेशों में भी लोकप्रिय है। आर्य समाज ने हिन्दी भाषा और साहित्य को प्रोत्साहित करके अँग्रेजी भाषा पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया। 

कुछ आधुनिक विद्वानों की धारणा है कि आर्य समाज का कार्य हिन्दू धर्म की पुनर्स्थापना तक सीमित था। इसलिये इसने राष्ट्रीयता का विकास नहीं किया। इन विद्वानों का आरोप है कि आर्य समाज ने हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान करके साम्प्रदायिक भावना को पुष्ट किया। कुछ अँग्रेज लेखकों, अधिकारियों एवं ईसाई धर्म-प्रचारकों ने आर्य समाज के सम्बन्ध में इसी प्रकार के उल्टे-सीधे प्रचार किये। वेलेण्टाइन शिरोल ने लिखा है- ‘आर्य समाज का उद्देश्य समाज सुधार की अपेक्षा हिन्दू धर्म को विदेशी प्रभाव से मुक्त करना था।

शिरोल के इन आरोपों का प्रत्युत्तर लाला लाजपतराय ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ द आर्य समाज में बड़े प्रभावशाली ढंग से दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आर्य समाज के चिंतन का आधार हजारों साल पुराने वेद हैं जिनसे प्रेरणा प्राप्त करना भारतीय समाज की मुख्य धारा को फिर से जीवित करना है इसलिये आर्य समाज को साम्प्रदायिक आन्दोलन की संज्ञा किसी भी प्रकार नहीं दी जा सकती। अपितु जो लोग आर्य समाज पर साम्प्रदायिक होने का आरोप लगाते हैं, वस्तुतः वे स्वयं साम्प्रदायिक सोच रखते हैं तथा भारत की मूल सांस्कृतिक धारा के प्रवाह को निरुद्ध करना चाहते हैं। आर्य समाज वास्तव में एक ऐसा शक्तिशाली आन्दोलन था, जिसके फलस्वरूप हिन्दू समाज में नव-चेतना एवं आत्म-सम्मान के भाव जागृत हुए तथा हिन्दू यह अनुभव करने लगे कि हिन्दू धर्म और संस्कृति, विश्व के अन्य समस्त धर्मों एवं संस्कृतियों से श्रेष्ठ है। आर्य समाज ने भारतीयों में स्वाभिमान और राष्ट्र प्रेम की एक अद्भुत लहर उत्पन्न की तथा धर्म, समाज और शिक्षा के क्षेत्र में महान् योगदान दिया।

स्वामी दयानन्द की मृत्यु के बाद इस आन्दोलन को कुछ धक्का अवश्य लगा, क्योंकि कुछ विषयों पर मतभेद हो जाने के कारण 1892 ई. में आर्य समाजियों के दो दल हो गये किन्तु प्रत्येक दल ने अपनी पद्धति एवं विचारधारा के आधार पर इस आन्दोलन को शक्तिशाली बनाया। लाला हसंराज के नेतृत्व में वैदिक सिद्धान्तों के साथ पाश्चात्य शिक्षा का प्रचार किया गया। महात्मा मुन्शीराम ने हरिद्वार के पास गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना की। यह देश का पहला विश्वविद्यालय था जहाँ राष्ट्र भाषा हिन्दी के माध्यम से उच्च शिक्षा दी गई। महात्मा मुन्शीराम ही आगे चलकर स्वामी श्रद्धानन्द के नाम से विख्यात हुए और उन्होंने आर्य समाज के शुद्धि आन्दोलन को लोकप्रिय बनाने का अथक प्रयास किया। इसीलिए एक मुस्लिम हत्यारे ने उनकी हत्या कर दी। आर्य समाज के अथक प्रयासों से भारत में कई स्थानों पर अनाथालयों, विधवा-आश्रमों तथा गौ-शालाओं आदि की स्थापना हुई। इस प्रकार धार्मिक, सामाजिक, शैक्षणिक और राजनैतिक क्षेत्र में आर्य समाज ने जो कार्य किये उनकी तुलना किसी भी अन्य सुधार आन्दोलन से नहीं की जा सकती।

आर्य समाज का हिन्दू धर्म को योगदान

आर्य समाज ने हिन्दू धर्म को दृढ़ता प्रदान करने के लिये महत्त्वपूर्ण कार्य किये। स्वामी दयानन्द ने अपना सम्पूर्ण जीवन हिन्दू धर्म के अंधविश्वासों तथा कुरीतियों के खण्डन और वैदिक सिद्धान्तों के प्रचार में लगाया। दयानन्द ने वेदों के एकेश्वरवाद के सिद्धांत को प्रमुख माना तथा वेदों में वर्णित यज्ञों और संस्कारों की नयी व्याख्या की। हवन का मुख्य उद्देश्य वायुमण्डल को शुद्ध करना बताया। उन्होंने बताया कि हिन्दू धर्म सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक दृष्टि से उदार रहा है। स्वयं वेद भी अपनी श्रेष्ठता का दावा नहीं करते। इसलिए हिन्दू धर्म ने समस्त धर्मों के प्रति सहिष्णुता का व्यवहार किया, जबकि इस्लाम और ईसाई धर्म क्रमशः कुरान और बाइबिल को ही एकमात्र सत्य ग्रन्थ मानते हैं और उसी धर्म का पालन करना स्वर्ग जाने का मार्ग बताते हैं। हिन्दू धर्म की उदारता, उसकी निर्बलता सिद्ध हुई क्योंकि वह इस्लाम और ईसाई धर्म की कट्टरता का मुकाबला करने में असमर्थ रही। स्वामीजी ने हिन्दू धर्म को कट्टरता प्रदान की। इसीलिए आर्य समाज सैनिक हिन्दुत्व कहलाया। आर्य समाज ने वेदों के आधार पर हिन्दू धर्म को पुनः स्थापित करने का प्रयत्न किया, इसीलिए इसे पुनरुत्थानवादी आन्दोलन कहा जाता है। आर्य समाज आन्दोलन बाहरी तत्त्वों से प्रेरित न होकर अपने ही मूल सिद्धान्तों से प्रेरित था। स्वामीजी ने समस्त वर्णों के लोगों को वेदों के अध्ययन तथा उसकी व्याख्या करने के अधिकार का समर्थन किया।

धार्मिक क्रांति का आरम्भ: स्वामी दयानन्द ने देश में एक व्यापक धार्मिक क्रान्ति का सूत्रपात किया जिसने हिन्दुओं के चिंतन को झकझोरा। महर्षि अरविन्द ने स्वामी दयानंद के योगदान का उल्लेख करते हुए लिखा है- ‘राजा राममोहन राय उपनिषदों पर ही ठहर गये किन्तु दयानन्द ने उपनिषदों से भी आगे देखा और यह जान लिया कि हमारी संस्कृति का वास्तविक मूल वेद ही हैं।’

स्वामी दयानन्द ने अपने उपदेश केवल वेदों तक ही सीमित रखे तथा उपनिषदों एवं गीता के प्रमाणों को स्वीकार नहीं किया। इसलिए कहा जा सकता है कि उन्होंने उपनिषदों तथा गीता के महत्त्व का उचित मूल्यांकन नहीं किया।

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