Monday, May 20, 2024
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130. फिर से दक्खिन

नूरजहाँ ने जहाँगीर को आया देखकर सिर पीट लिया किंतु बाहर से उसने बड़ी प्रसन्नता जाहिर की और बादशाह का स्वागत किया। अगली रात नूरजहाँ के डेरों में बड़ा भारी जलसा किया गया। जलसे में ईरान से आयी हुई उन खूबसूरत रक्कासाओं के ऊपर अशर्फियाँ उछाली गयीं किंतु बादशाही आदेश से इस जलसे में किसी को शराब नहीं परोसी गयी।

जहाँगीर अब फिर बादशाह था। अपनी मर्जी का मालिक था, अपने नौकरों को फिर से हुक्म देने का अधिकारी था। फिर भी वह महावतखाँ से सीधे-सीधे लड़ने की स्थिति में नहीं था। उसने महावतखाँ से कहलवाया कि यदि अपनी सलामती चाहता है तो आसिफखाँ को छोड़ दे और ठठ्ठे में जाकर खुर्रम पर चढ़ाई करे। महावतखाँ हुक्म न मानने में अपनी भलाई न देखकर अपना सिर पीटता हुआ ठठ्ठे को चल दिया।

लाहौर पहुँच कर जहाँगीर ने बड़े दरबार का आयोजन किया। तख्त के आधे हिस्से पर जहाँगीर बैठा और आधे हिस्से पर मलिका ए आलम नूरजहाँ आसीन हुई। इस दरबार में खानखाना फिर से उसी स्थान पर खड़ा हुआ जिस स्थान पर वह अकबर के जमाने में खड़ा होता था। खानखाना के पीछे उसके विश्वस्त सेवक खड़े हुए। खानखाना को विशाल लश्कर के साथ फिर से अपने सामने देखकर जहाँगीर को रुलाई आ गयी। वह भरे दरबार में बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोया।

– ‘बादशाह सलामत! अपने गुलामों के होते हुए अपना जी छोटा न करें।’ खानखाना ने तसल्ली देते हुए कहा।

– ‘मैं अपने गुलामों में तेरे जैसे नमक हलाल और महावतखाँ जैसे नमक हराम को देखकर रो रहा हूँ। तू मुझे रोने दे खानखाना! मैं इसी योग्य हूँ।’

बहुत देर रो लेने के बाद जब जहाँगीर सामान्य हुआ तो उसने खानखाना के सामने झोली फैलाकर कहा- ‘जा, मेरे अतालीक जा। महावतखाँ का सिर ले आ। जा मेेरे खानखाना जा, मेरे दुश्मनों का सिर ले आ। जा मेरे बाप जा, नूरजहाँ का दिल दुखाने वालों का सिर ले आ।’

खानखाना को अपने ऊपर चढ़कर आया देखकर महावतखाँ की हालत पतली हो गयी। वह खुर्रम की तरह ईरान भागने की नहीं सोच सकता था। खुर्रम की जड़ें तो फिर भी ईरान में अपने लिये मिट्टी तलाश सकती थीं किंतु महावतखाँ को तो हिन्दुस्थान की मिट्टी के अलावा कहीं भी आसरा नहीं था।

पहले तो महावतखाँ ने खानखाना का सामना करने का विचार किया किंतु वह जानता था कि इस बार जो खानखाना उस पर चढ़कर आया है, वह बादशाह की नजरों से गिरा हुआ, भगोड़ा, विद्रोही घोषित किया गया खानखाना नहीं है। उसकी म्यान में बादशाह की तलवार है। उसकी आँखों में अपने बेटों और पोतों के कत्ल का खून है। उसके दिल में अपने अपमान की ज्वाला भड़क रही है। अब वह निरा निरीह खानखाना नहीं है जिसके आगे अकेला फहीम खड़ा हो। इस बार वह मुगलों की समस्त ताकत समेट कर आया है। भले ही एक दिन महावतखाँ नूरजहाँ के जबड़ों में से बादशाह को उड़ा ले जाने का हौंसला रखता था किंतु खानखाना की ताकत का सामना करने का साहस महावतखाँ में नहीं था

मौका पाते ही खानखाना ने महावतखाँ को घेर लिया। महावतखाँ बड़े बेमन से खानखाना का सामना करने को तैयार हुआ किंतु खानखाना ने उसमें कसकर मार लगाई। जबर्दस्त शिकस्त खाकर महावतखाँ ने सिंध से गुजरात की ओर उतरना आरंभ किया। खानखाना उसे दबाता चला गया और महावतखाँ निरतंर नीचे की ओर खिसकता गया। महावतखाँ की योजना थी कि यदि वह किसी तरह खुर्रम के पास पहुँच जाये तो उसे भी युद्ध का नैतिक आधार प्राप्त हो जाये।

यही कारण था कि महावतखाँ निरंतर दक्षिण की ओर भाग रहा था। जब वह गुजरात से भी नीचे उतरने लगा तो उसकी योजना खानखाना की समझ में आ गयी। अब उसका प्रयास था कि किसी तरह दक्खिन में प्रवेश करने से पहले ही वह महावतखाँ को घेर ले ताकि उसे खुर्रम और महावतखाँ की सम्मिलित ताकत का सामना न करना पड़े।

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