Monday, May 20, 2024
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76. विचित्र दरबार

– ‘हुजूर! बाहर फरियादियों का हुजूम इकट्ठा हो गया है। कुछ लोग तो सुबह से आस लगाये बैठे हैं। शाम होने को आई।’

– ‘तो लोगों को मालूम हो गया कि रहीम आगरे में है?’

– ‘हाँ हुजूर! अब तो दूर-दूर से लोग आ रहे हैं।’

– ‘अच्छा उन सबको दरबार में बैठा।

थोड़ी ही देर में रहीम ने जिस दरबार में प्रवेश किया उस विशाल दरबार की शोभा देखते ही बनती थी। दरबार का शामियाना सोने और चांदी की चोबों पर खड़ा था जो दिन-रात मोतियों की झालरों से झिलमिलाता था। दरबार के फर्श पर महंगे कालीन बिछे थे। एक ओर एक विशाल चबूतरा बना हुआ था जिस पर अत्यंत भव्य और विशाल तख्त पड़ा था। तख्त की बारीक कारीगरी बरबस ही देखने वाले का ध्यान खींचती थी। तख्त पर चीन देश से आयी रेशम की महंगी चद्दरें और तकिये करीने से सजे हुए थे। समूचे आगरे में यदि कोई और दरबार किसी भी लिहाज से रहीम के दरबार से प्रतिस्पर्धा कर सकता था तो वह था स्वयं शहंशाह अकबर का दरबार।

जितना भव्य दरबार था, उतना ही भव्य खानखाना स्वयं था। आज तो खानखाना की शोभा विशेष रूप से देखने योग्य थी। वह बादशाहों की भांति समस्त राजकीय चिह्न धारण किये हुए था। खानखाना के सिर का मुकुट महंगे और दुर्लभ हीरे जवाहरों से जगमगा रहा था। कलंगी के स्थान पर हुमा पक्षी का पंख हवा में फहराता था। इस पंख को केवल शहजादे ही धारण कर सकते थे। उसके तलवार की मूठ पर बड़े-बड़े याकूत, नीलम, पन्ने तथा वैदूर्य जड़े हुए थे।

खानखाना के सेवकों ने सिंह की तरह गर्दन उठा कर चल रहे खानखाना के सिर पर हीरे-मातियों से जड़े सोने के छत्र की छाया कर रखी थी और वे दोनों दिशाओं से चंवर ढुलाते हुए चल रहे थे। जैसे ही खानखाना दरबार में दिखायी दिया, सैंकड़ों कण्ठ उसकी जय-जयकार करने लगे।

आज के इस विशेष दरबार का आयोजन खानखाना के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में किया गया था। खानखाना ने एक भरपूर निगाह दरबार में उपस्थित सेवकों और आगंतुकों पर डाली और मुंशी को दरबार की कार्यवाही आरंभ करने का संकेत किया।

सबसे पहले जो आदमी उसकी सेवा में प्रस्तुत किया गया उसने सैनिकों के से कपड़े पहन रखे थे और हाथ में तलवार ले रखी थी। उस आदमी ने सिर पर जो पगड़ी धारण कर रखी थी, उस पगड़ी पर दो लम्बी-लम्बी कीलें लगी हुई थीं।

– ‘हुजूर! यह गुलाम आपकी सेना में नौकरी पाना चाहता है।’ विचित्र वेशभूषा वाले आदमी ने सिर झुका कर निवेदन किया।

– ‘क्या नौकरी करोगे?’

– ‘हुजूर, सिपाही की।’

– ‘तुमने अपनी पगड़ी पर ये कीलें क्यों लगवा रखी हैं?’

– ‘हुजूर पहली कील तो उस आदमी के लिये है जो नौकरी पर तो रखे किंतु तन्खाह न दे।’

– ‘और दूसरी कील?’

– ‘दूसरी कील उस नौकर के लिये है जो तन्खाह तो ले किंतु काम न करे।’

 – ‘कितनी तन्खाह चाहिये?’

– ‘दस रुपया महीना।’

– ‘कितनी उम्र है?’

– ‘पच्चीस साल।’

– ‘कितने साल नौकरी करेंगे?’

– ‘यही कोई पच्चीस साल।’

– ‘एक साल की तन्खाह कितनी हुई?’

– ‘एक सौ बीस रुपया।’

– ‘पच्चीस साल की कितनी हुई?’

– ‘तीन हजार रुपया।’

– ‘ये लीजिये तीन हजार रुपया और अपने सिर से पहली कील का बोझ उतार दीजिये। दूसरी कील का बोझ उठाने का आपको पूरा अधिकार है।’

जीवन भर की कमाई आज ही पाकर युवक प्रसन्नता से कूदने लगा। दरबार में उपस्थित जन समुदाय फिर से खानखाना की जय-जयकार करने लगा।

इसके बाद एक बुढ़िया की बारी थी। वह अपने हाथ में एक तवा लेकर आई थी। उसने कहा- ‘हुजूर मैं आपको छूकर देखना चाहती हूँ।’

– ‘इस बुढ़िया की मुराद पूरी की जाये।’ खानखाना ने आदेश दिया।

बुढ़िया तवा लेकर तख्त पर चढ़ गयी और जैसे ही खानखाना के निकट पहुँची, अपने हाथ का तवा खानखाना की देह से रगड़ने लगी। कुछ देर बाद तख्त से नीचे उतर कर बड़ी हैरानी से तवे को उलट-पलट कर देखने लगी।

बुढ़िया की उल्टी-सीधी चेष्टाएं देखकर अब्दुर्रहीम को हँसी आ गयी। वह बोला- ‘निराश न हो बुढ़िया। तूने अपने लोहे का तवा पारस से ही रगड़ा है। अब यह सचमुच ही सोने का हो गया है। मुंशीजी! इस बुढ़िया को तवे के बराबर सोना तोलकर दे दिया जाये।’

दरबार में फिर से जय-जयकार गूंजने लगी।

अगला फरियादी एक गरीब ब्राह्मण था। उसने खानखाना के सामने आते ही मुसलमानों को गाली देना आरंभ कर दिया। जिनके कारण उसके जजमानों की संख्या घट गयी थी और अब वह भूखों मरने की स्थिति को पहुँच गया था।

– ‘विप्र देवता! इस प्रकार मत कोसो। तुम्हें खाने पीने को बहुत मिलेगा।’

इतना सुनते ही ब्राह्मण देवता ने अपने सिर से मैली-कुचैली और स्थान-स्थान से फटी हुई पगड़ी खानखाना पर दे मारी और कहा- ‘हमारे शास्त्र में लिखा है कि जिसकी बात से प्रसन्न होओ, उसे कुछ न कुछ अवश्य दो। मेरे पास इस पगड़ी के सिवा कुछ नहीं है। यही तुझे देता हूँ।’

खानखाना ने तुरंत ही अपना रत्न जड़ित स्वर्ण ताज उतार कर उस ब्राह्मण को दे दिया और उसकी मैली कुचैली तथा तार-तार हो रही पगड़ी अपने माथे पर बांधते हुए कहा- ‘हमारे शास्त्र में लिखा है कि जिससे कुछ लो, उसे अधिक नहीं तो, उतना तो अवश्य ही दो।’

अगला फरियादी एक नौजवान था। उसे विश्वास न था कि खानखाना उसकी भी मुराद पूरी कर सकता है लेकिन उसने सुन रखा था कि खानखाना कवियों की बड़ी इज्जत करता है। भले ही कितना ही घटिया कवि हो, वह खानखाना के दरवाजे से खाली हाथ नहीं लौटता। इसलिये वह अपनी फरियाद एक कविता में ढाल कर लाया था। उसने कहा- ‘हे उदार खानखाना! एक चन्द्रमुखी प्यारी है। वह जान मांगे तो कुछ सोच नहीं, रुपया मांगती है, यही मुश्किल है।’

खानखाना ने मुस्कुरा कर पूछा- ‘कितना रुपया मांगती है?’

– ‘एक लाख।’

– ‘तो तू एक लाख छः हजार ले जा।’

– ‘एक लाख तो ठीक, पर छः हजार क्यों?’

– ‘तेरे सजने-धजने के लिये। यदि इसी हाल में गया तो रुपया लेकर भी नहीं मानेगी।’

जब युवक वहाँ से हटा तो एक बहुत ही कंगाल आदमी अपने स्थान से उठकर खड़ा हुआ और बोला- ‘खानखाना! कैसे सम्बंधी हो तुम! अपने साढ़ू को नहीं पहचानते?’

खानखाना ने कहा- ‘आओ साढ़ूजी, मैं तो आपकी ही प्रतीक्षा कर रहा था। आओ यहाँ बैठो मेरे पास।’

जब कंगाल खानखाना के बराबर तख्त पर बैठ गया तो खानखाना ने अपने मुंशी से कहा- ‘मुंशीजी! साढ़ूजी को एक लाख रुपया देकर विदा किया जाये।’

मुंशी बहुत देर से चुपचाप बैठा हुआ दरबार की कार्यवाही देख रहा था। इस बार उससे रहा न गया। उसने कंगले को व्यंग्य पूर्वक देखते हुए पूछा- ‘गुस्ताखी मुआफ हुजूर! ये आपके साढ़ू हैं, पहले कभी इन्हें देखा नहीं?’

– ‘मुंशीजी! आप इन्हें नहीं पहचानते! देखिये, सम्पत्ति और विपत्ति दो बहिनें हैं। एक हमारे घर में है और एक इनके। इसी नाते से ये हमारे साढ़ू हैं।’

कंगला अपनी ढीठता त्याग कर खानखाना के पैरों में गिर पड़ा।

इस बार एक युवा पण्डित खानखाना के समक्ष था।

– ‘पाँय लागूं पण्डितजी। कहिये क्या सेवा करूँ?’

युवा पण्डित खानखाना के सामने आकर कातर दृष्टि से देखने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सका। उसके हाथ-पाँव काँपने लगे और उसका कण्ठ सूख गया।

– ‘आपके अंगोछे में क्या लिपटा हुआ है?’ खानखाना ने पूछा।

युवा पण्डित ने अपने अंगोछे में लिपटी हुई एक खाली शीशी निकाली और खानखाना की ओर बढ़ा दी। खानखाना के सेवक ने शीशी खानखाना को ले जाकर दी।

खानखाना ने देखा, शीशी में पानी की केवल एक बूंद है। उन्होंने पण्डित की ओर देखकर कहा- ‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून। पानी गये न ऊबरे। मोती मानस चून।’

पण्डित ने आँखों में आँसू भर कर कहा- ‘हाँ, यही तो मैं भी कह रहा हूँ ।’

– ‘मुंशीजी! हमारे पास आईये।’ खानखाना ने मुंशी को आदेश दिया।

जब मुंशी खानखाना के ठीक पास जाकर खड़ा हो गया तो खानखाना ने उसके कान में कहा- ‘इस पण्डित के घर का पता मालूम कर लो और आज रात को वहाँ एक लाख रुपया पहुँचाओ।’

मुंशी फिर चक्कर में पड़ गया। उसकी आँखों में उभरे सवाल को देखकर खानखाना ने उसके कान में फुसफुसाकर कहा- ‘अरे भाई आप देखते नहीं हैं! पण्डितजी किसी प्रतिष्ठित खानदान के हैं इसलिये मुँह से कुछ मांग नहीं सकते किंतु संकेत से बता रहे हैं कि बिना धन के पानी बचे तो कैसे बचे। जैसे शीशी में एक बूंद ही है वैसे घर भी खाली होने को है।’

अगला आदमी एक बूढ़ा मुसलमान था। उसकी निर्धनता उसके बुरे हाल का परिचय दूर से दे रही थी। वह हाथ जोड़कर खानखाना के ठीक सामने खड़ा हो गया।

– ‘बोलो बाबा।’

– ‘हुजूर! गुस्ताखी मुआफ हो। गुलाम आप पर पत्थर फैंक कर देखना चाहता है।’ बूढ़े को हिन्दुस्तानी में बात करनी नहीं आती थी। वह ईरानी भाषा बोल रहा था।

– ‘ठीक है, जैसा जी में आये करो। मैं तैयार हूँ।’ खानखाना ने ईरानी भाषा में ही जवाब दिया और अपनी ढाल संभाल कर बैठ गया।

बूढ़े ने अपने कांपते हाथों में थामा हुआ पत्थर खानखाना पर दे मारा। पत्थर खानखाना की ढाल से जाकर टकराया।

– ‘मुंशी जी! बाबा को एक हजार रुपया दिया जाये।’

– ‘गुस्ताखी मुआफ हुजूर। क्या यह पत्थर फैंकने का पारिश्रमिक है?’ मुंशी ने हाथ जोड़ कर पूछा।

– ‘नहीं मुंशीजी। बूढ़े बाबा ने यह पत्थर हम पर यह जांचने के लिये फैंका था। जब फलदार वृक्षों पर पत्थर देकर मारते हैं तो फल मिलते हैं, खानखाना क्या उनसे भी गया बीता है!’

– ‘खानखाना तेरी जय हो। युगों तक इस धरती पर तेरा इकबाल बुलंद रहे। मैं सचमुच ही ईरान से यहाँ तक चलकर तुझे जांचने के लिये ही आया हूँ। मेरा नाम शकेबी अस्फहानी है। मैं ईरान का रहने वाला हूँ। पार साल जब मैं मक्का जाते समय अदन में पहुँचा तो मैंने वहाँ कुछ बच्चों को एक गीत गाते हुए सुना कि- खानखाना आया। जिसके प्रताप से कुंआरी कन्याओं ने पति पाये। व्यापारियों ने माल बेचे, बादल बरसे और जल-थल भर गये। मैं उस गीत की वास्तविकता को अपनी आँखों से देखने के लिये यहाँ तक चला आया हूँ। मुझे इन रुपयों की आवश्यकता नहीं है। इन्हें किसी जरूरतमंद इंसान को दे दिया जाये।’

उपस्थित जनसमुदाय फिर से जय-जयकार करने लगा।

इसके बाद मंडन कवि[1]  उठ कर खड़ा हुआ। उसने दोनों हाथ खानखाना की ओर फैला कर कहा-

‘तेरे गुन  खानखानां  परत  दुनी  के कान,

तेरे  काज  ये  गुन   आपनो   धरत  हैं।

तू तो खग्ग खोलि-खोलि खलन पै  कर लेत

यह   तो   पै  कर  नेक  न   डरत  हैं।

मंडन   सुकवि   तू   चढ़त  नवखंडन  पै,

ये   भुजदण्ड   तेरे   चढ़िए   रहत   हैं।

ओहती   अटल   खान  साहब  तुरक मान,

तेरी  या  कमान  तोसों  तेहुँसों   करत है।’

मण्डन की कविता पूरी होते ही खानखाना पर फूल बरसने लगे। सैंकड़ों कण्ठों से निकली जयजयकार, उनसे दुगुनी हथेलियों से निकली तालियों की गड़गड़ाहट, ढोल, नगारों और तुरहियों की तुमुल ध्वनि से आकाश व्याप्त हो गया।

दरबार बर्खास्तगी की घोषणा के साथ ही खानखाना दस्तरख्वान पर जा बैठा। आज उसके दस्तरख्वान का प्रबंध दरबार में ही किया गया था। उसके साथ-साथ सैंकड़ों आदमियों के भोजन का प्रबंध किया गया था।


[1] ये बुंदेलखण्डी कवि थे।

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