Thursday, April 18, 2024
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83. मुख देखे दुःख उपजत

– ‘महाराज! बैरामखाँ को सुअन अब्दुर्रहीम महाराज के श्रीचरनन में कोटि-कोटि प्रणाम निवेदन करि रह्यौ। खानखाना ने अपना मस्तक भूमि पर रखकर कहा।

– ‘बिृंदाबन में तुम्हारौ स्वागत है खानखानाजू।’ संत कुंभनदास ने रहीम को धरती से उठाकर गले लगा लिया।

– ‘भौत दिनन ते इच्छा रही संतन के दरसनन की, सो आज पूरी भईं’ अब्दुर्रहीम ने भरे कण्ठ से कहा।

– ‘चहुं ओर तिहारे नाम की बड़ी चर्चा होय है खानखानाजू!’

खानखाना ने दोनों हाथ जोड़कर माथे से लगाते हुए कहा-

‘रहिमन धोखे भाव ते मुख ते निकसै राम।

पावत पूरन परम गति कामादिक कौ धाम।।’

– ‘ऐसे देव दुर्लभ संस्कार कहाँ ते पाये?’

– ‘बाबा रामदास की हमारे कुल पै बड़ी कृपा हती। उन्हिन के प्रताप ते मो जैसे अधम कूं आप जैसे संतन के दर्शन सुलभ हुयि जायं हैं।’

– ‘बाबा रामदास कौ कुल धन्य भयौ, जो सूरा जैसौ सपूत जन्म्यौ। नेत्र ना हते फिर भी हरि गुन गाय-गाय के तर गयौ।’

– ‘महाराज! एक बिनती हती।’

– ‘तुम आदेस करौ खानखानाजू। हमारे लायक जो कछू काम होयगो हम पूरौ करिंगे।’ संत ने प्रसन्न होकर कहा।

– ‘बादसाह की भौतई इच्छा है कि आप जैसे संत उनन के दरबार में रहैं।’

खानखाना का प्रस्ताव पाकर संत चिंता में डूब गये। बहुत देर तक चुप रहने के बाद बोले- ‘खानखानजू! तुम तौ ठहरे ज्ञानी। जरा तसल्ली ते बिचार कै बताओ कि बादसाह के दरबार में हम भिखारिन कौ कहा काम परौ?’

– ‘बादसाहन के दरबार में यदि गुनी लोग न रहें तो चाण्डाल अपनौ डेरा जमाय लेंगे। जाते बादसाह कौ तौ पतन हौवेगो ही, परजा भी दुख पावेगी।’

– ‘किंतु भैया आग और पानी का कहा मेल? ऊ ठहरौ बादसाह। दिन रात तरवारि चलावै, लोगन कू मारै। हम रहे भिखारी, भीख मांगैं हरि भजन करैं।’

कुंभनदासजी का उत्तर सुनकर दीर्घ साँस छोड़ते हुए खानखाना ने कहा-

 ‘भूप गनत लघु गुनिन को, गुनी गनत लघू भूप।

  रहिमन गिर तें भूमि लौं, लखो तो एकै रूप।।’

खानखाना के मुखमण्डल पर निराशा छा गयी। वह चाहता था कि अकबर के दरबार में कुछ अच्छे संत और विचारवान् लोग रहें किंतु यह एक विचित्र बात थी कि कोई भी संत सत्ता के निकट नहीं जाना चाहता था जिससे अकबर के दरबार में धूर्तों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जाती थी।

– ‘अच्छा एक बात बताऔ, हम अकब्बर के दरबार में चल कै रहैं, ऐसी इच्छा तुम्हारी रही कै अकब्बर की?’

संत के प्रश्न से खानखाना विचार में पड़ गया। बहुत सोच विचार कर

बोला- ‘बादसाह की।’

  – ‘तौ तुम सीकरी जाय कें अकब्बर ते यों कहियौं कि कुंभनदास ने कहलवाई है कि-

भगत कौ कहा सीकरी सों काम!

आवत  जात  पनैहा  टूटी,  बिसरि गयौ हरि  नाम।

जाको मुख देखे दुख उपजत, ताकों करन परी परनाम।

कुंभनदास  लाल  गिरधर  बिन  यह सब झूठौ धाम।

खानखाना संत के चरणों की मिट्ठी सिर से लगाकर उठ गया।

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