Wednesday, February 21, 2024
spot_img

11. साल्हेर-मुल्हेर का युद्ध

ई.1672 के आरंभ में दिलेर खाँ के सेनानायक इखलास खाँ ने साल्हेर गढ़ पर घेरा डाला तथा दिलेर खाँ और बहादुर खाँ ने पूना पर आक्रमण किया। उन्होंने पूना में कत्ले आम करने का आदेश दिया। शिवाजी ने उन्हें पूना से बाहर निकालने के लिए एक चाल चली। उसने अपने सेनापति प्रतापराव गूजर को साल्हेर पर आक्रमण करने भेजा। प्रतापराव, इखलास खाँ में कसकर मार लगाने लगा। ऐसा लगने लगा कि इखलास खाँ की पराजय हो जाएगी। इसलिए दिलेर खाँ और बहादुर खाँ पूना छोड़कर साल्हेर की ओर भागे। उन्होंने साल्हेर के साथ-साथ मुल्हेर दुर्ग को भी घेर लिया। अब शिवाजी ने दिलेर खाँ और बहादुर खाँ की सेनाओं पर बाहर से आक्रमण करने की नीति अपनाई तथा पेशवा मोरोपंत और प्रतापराव गूजर ने इन दोनों के विरुद्ध जी-जान लगा दी। इस कारण यह संघर्ष भयानक हो गया और रक्त की नदियां बह निकलीं। अंत में मराठों ने मुगलों की सेनाओं को बुरी तरह नष्ट कर दिया। कई हजार मुगलों को मार डाला तथा कई हजार मुगलों को बंदी बना लिया। हजारों सैनिक घायल होकर मैदान छोड़ गए। युद्ध स्थल पर ऊँट, हाथी, घोड़े, गधे, खच्चर भी बड़ी संख्या में मारे गए। मुगलों का बड़ा खजाना, युद्ध सामग्री और हजारों हाथी, घोड़े, गधे, खच्चर शिवाजी के हाथ लगे।

इस युद्ध में शिवाजी को भी बहुत क्षति हुई। उसका बचपन का मित्र सूर्यराव कांकड़े काम आया। उसकी सेना भी नष्ट हो गई। इस युद्ध में दोनों पक्षों के लगभग 10 हजार मनुष्य मृत्यु को प्राप्त हुए तथा लगभग 10 हजार मनुष्य घायल हुए। यह पहला युद्ध था जो शिवाजी ने आरपार की लड़ाई में जीता था। सुल्हेर तथा मुल्हेर दोनों ही किलों पर से मुगलों को खदेड़ दिया गया। दिलेर खाँ, युद्ध के मैदान से भागकर बहुत दूर चला गया। शिवाजी द्वारा इस जीत की प्रसन्नता में जनता में मिठाइयां तथा सिपाहियों में इनाम बांटे गए। शिवाजी ने युद्ध के मैदान में घायल पड़े दोनों तरफ के सिपाहियों की मरहम पट्टी करवाई तथा उन्हें घर जाने की छूट दी। बहुत से मुगल सैनिक, शिवाजी का यह व्यवहार देखकर मुगलों की नौकरी छोड़कर शिवाजी की सेना में भर्ती हो गए।

औरंगजेब को झटका

जब साल्हेर और मुल्हेर की पराजय का समाचार औरंगजेब को सुनाया गया तो वह तीन दिन तक दरबार में नहीं गया और कहता रहा कि लगता है कि परवरदिगार मुसलमानों से उनका राज्य छीनकर एक काफिर को देना चाहता है। इस समाचार को सुनने से पहले मैं मर क्यों नहीं गया! औरंगजेब के धायभाई बहादुर खाँ कोका ने औरंगजेब को ढाढ़स बंधाते हुए कहा कि मैं मुगल सम्मान की स्थापना के लिए सदैव तत्पर हूँ। मैं दक्कन में जाकर शिवाजी पर आक्रमण करूंगा और उसका मान-मर्दन करूंगा। औरंगजेब ने धायभाई बहादुर खाँ कोका को दक्षिण का सूबेदार बना दिया।

महावत खाँ की मृत्यु

औरंगजेब ने सुल्हेर की भयानक पराजय के लिए महावत खाँ को जिम्मेदार ठहराते हुए उसे फटकार भरा पत्र लिखा और तुरंत अफगानिस्तान चले जाने के निर्देश दिए। महावत खाँ जहांगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब के समय से मुगलों की सेवा करता आया था। उसके बच्चे बादशाही खानदान के शहजादों को ब्याहे गए थे। वह बड़ा शातिर और दुष्ट दिमाग वाला व्यक्ति था। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह पहाड़ी चूहे कहे जाने वाले शिवाजी के हाथों इतनी बुरी तरह परास्त होगा। इसकी तो वह कल्पना भी नहीं कर सकता था कि औरंगजेब उसका इतना अपमान करेगा। महावत खाँ का दिल टूट गया और वह अफगानिस्तान पहुंचने से पहले ही मर गया।

दिलेर खाँ और बहादुर खाँ द्वारा औरंगजेब को करारा जवाब

औरंगजेब ने दिलेर खाँ तथा बहादुर खाँ को भी कड़े पत्र लिखे कि अपने मुख पर पराजय की कालिख पोतने से पहले तुम्हें युद्ध के मैदान में ही मर जाना चाहिए था किंतु तुम लोगों ने कायरों की तरह युद्ध के मैदान से भागकर अपने प्राण बचाए। अब कभी मुझे अपना मुख मत दिखाना। तुम्हें अंग्रेजों, फ्रांसीसियों, अबीसीनियों और गोलकुंडा तथा बीजापुर की सेनाओं को भी अपने साथ लेना चाहिए था तथा चारों ओर से घेरकर शिवाजी को मारना चाहिए था। इस पर दिलेर खाँ तथा बहादुर खाँ ने औरंगजेब को पत्र लिखा कि यदि बादशाह को स्मरण हो कि यह वही शिवाजी है जो आगरा की कठोर शाही कैद से अपनी चतुराई से भाग चुका है तो आपको हमारा यह अपराध इतना निन्दनीय नहीं दिखेगा। औरंगजेब इस जवाब से और अधिक चिढ़ गया।

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohan Lal Gupta is a renowned historian from India. He has written more than 100 books on various subjects.

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

21,585FansLike
2,651FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles

// disable viewing page source