Wednesday, May 22, 2024
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अध्याय – 51 – भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य प्रभाव

भारतीय राष्ट्रवाद रूपी शिशु को पश्चिमी शिक्षा रूपी माँ ने दूध पिलाया।

भारतीय संस्कृति को वैदिक-काल से लेकर आधुनिक काल तक विदेशियों के बहुत बड़े आघात झेलने पड़े हैं। भारतीय संस्कृति की दो बड़ी विशेषताएं हैं-

(1.) यह बाहर से बहुत सख्त दिखाई देती है

(2.) भीतर से इसमें सहिष्णुता का लचीलापन मौजूद है।

बाहर से सख्त रहकर इसने दूसरी संस्कृतियों की बुराइयों को अपने भीतर प्रवेश करने से रोका है तथा इस प्रकार स्वयं को नष्ट होने से बचाया है तथा भीतर से लचीलापन धारण करके इसने विदेशी संस्कृतियों की अच्छाइयों को ग्रहण किया है तथा इस प्रकार अपना विकास किया है।

भारतीय संस्कृति की इन विशेषताओं ने विदेशी संस्कृतियों को यह सुविधा दी कि वे भारतीय संस्कृति को अपना कर भारतीय संस्कृति में ही रंग जाएं। यदि भारतीय संस्कृति में ये दो गुण नहीं होते तो यह शक, कुषाण, हूण, पह्लव एवं मुस्लिम संस्कृतियों के आक्रमणों के समय या तो लड़कर नष्ट हो गई होती या फिर आत्मसमर्पण करके अपना स्वरूप पूरी तरह खो चुकी होती।

पाश्चात्य संस्कृति का अर्थ

भारत में जिसे पाश्चात्य संस्कृति कहा जाता है, उसका आशय यूरोपीय देशों की संस्कृति से है। इस संस्कृति का विकास यूनान तथा रोम में ईसा से लगभग 1000 साल पहले हुआ। यही संस्कृति निरंतर विकसित एवं संवर्द्धित होती हुई यूरोप की आधुनिक संस्कृति बन गई।

भारतीय संस्कृति का विदेशों से सम्पर्क

भारत का विदेशों से सम्पर्क वैदिक-काल से है। वैदिक-काल के बहुत से साक्ष्य पश्चिम में अफगानिस्तान से लेकर ईरान, ईराक तथा असीरिया आदि तक के एशियाई देशों तथा दक्षिण-पूर्व में लंका, थाईलैण्ड, इण्डोनेशियाई द्वीपों, कम्बोडिया, वियतनाम आदि देशों से प्राप्त होते हैं किंतु उस काल में इन एशियाई देशों में भारतीय संस्कृति ही फैली हुई थी। जबकि यूरोप, अमरीका, अफ्रीका एवं ऑस्ट्रेलिया आदि महाद्वीपों के देशों के लोग आदिम अवस्था में थे तथा उनमें सभ्यता का प्रसार नहीं हुआ था।

भारत में पुर्तगाली संस्कृति का आगमन

पाश्चात्य संस्कृति से भारतीय संस्कृति का सामना 15वीं शताब्दी के अन्तिम दशक से आरम्भ होना मानना चाहिए जब ई.1498 में पहली बार पुर्तगाली व्यापारी वास्कोडिगामा के नेतृत्व में भारत आए। इन व्यापारियों ने भारतीय स्त्रियों से विवाह किए जिनसे उत्पन्न संतानें ‘गोआनी’ कहलाईं।

आरम्भिक पुर्तगालियों ने भारत में कैथोलिक धर्म के प्रसार का कार्य शुरु किया। पुर्तगाली संस्कृति के सम्पर्क से भारतीय भाषाओं में अनेक पुर्तगाली शब्दों का समावेश हुआ, जैसे- कमरा, नीलाम, पादरी, मेज, कमीज आदि। उनके सम्पर्क से गोआ के क्षेत्रों में एक नई भाषा चली जो पुर्तगाली भाषा का विकृत रूप थी।

यूरोप के अन्य देशों की संस्कृतियों का आगमन

पुर्तगालियों के बाद हॉलैण्ड (नीदरलैण्ड) से डच, इंग्लैण्ड से अंग्रेज और फ्रांस से फ्रांसीसी व्यापारी भारत आने लगे। डचों की गतिविधियां व्यापार करने तथा व्यापार के लिए कुछ भू-भागों पर अधिकार करने तक सीमित रहीं। जब इंग्लैण्ड की ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने ई.1608 में भारत में प्रवेश किया तब इंग्लैण्ड पर महारानी एलिजाबेथ (प्रथम) का तथा भारत पर मुगल बादशाह जहाँगीर का शासन था।

ई.1615 में अंग्रेजों का दूत सर टामस रो जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ तथा उसने कम्पनी के लिए कुछ व्यापारिक सुविधाएं प्राप्त कीं। ई.1644 में फ्रांसीसी व्यापारी भारत आए। इससे अंग्रेजों एवं फ्रांसिंसियों के बीच भारत में व्यापारिक एवं राजनीतिक प्रतिद्वन्द्विता आरम्भ हो गयी किंतु ई.1760 में वैण्डीवाश के युद्ध के बाद भारत में फ्रैंच शक्ति परास्त हो गई तथा ई.1765 में बक्सर के युद्ध के बाद मुगल बादशाह एवं अंग्रेजों के बीच हुई इलाहाबाद संधि से अंग्रेज भारत के स्वामी बन गए।

उस समय तक भारत के विभिन्न हिस्सों में पुर्तगाली, डच, ब्रिटिश तथा फ्रैंच संस्कृतियों ने थोड़ा-बहुत प्रभाव डाला था किंतु अब यूरोपीय संस्कृति पूरी मजबूती के साथ भारतीय संस्कृति पर अपना शिकंजा कस सकती थी। यद्यपि अंग्रेजों ने धर्म-परिवर्तन के लिए कभी बल-प्रयोग नहीं किया तथा न ही ईसाई धर्म को भारत में अपना राज-धर्म बनाया तथापि अंग्रेजों के खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा, शादी-विवाह के ढंग, त्यौहार आदि परम्पराओं ने भारतीयों को प्रभावित किया।

पाश्चात्य संस्कृति के प्रसार के साधन

(1.) अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार

भारत में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना से पूर्व शिक्षा का प्रसार बहुत ही कम था। फिर भी उच्च-वर्ण-हिन्दू एवं शासक वर्ग से जुड़े मुस्लिम अपने-अपने बच्चों को अपने-अपने धर्म से प्रभावित शिक्षा दिलवाते थे। लॉर्ड विलियम बैंटिक के शासन-काल (ई.1828-35) में भारत में पाश्चात्य शिक्षा का सूत्रपात हुआ।

भारत में पाश्चात्य शिक्षा का जनक लॉर्ड मैकाले था, जिसने भारतीयों के मस्तिष्क में अंग्रेजी भाषा के माध्यम से अंग्रेजी चिंतन प्रविष्ट कराने के सिद्धांत का सहारा लिया ताकि भारतीय लोग अंग्रेजों की श्रेष्ठता में विश्वास रखें। लार्ड हार्डिंग्ज के शासन काल में लार्ड मैकाले ने शिक्षा के नवीन पाठ्यक्रम की व्यवस्था की। अंग्रेजी शिक्षा के प्रचलन से भारत की प्राचीन परम्पराएं एवं संस्थाएं समाप्त होने लगीं तथा भारतीयों में पाश्चात्य व्यक्तिवाद का बीजारोपण हुआ जिससे भारतीय सामाजिक जीवन की विशेषताएं विस्मृत होने लगीं।

 पाश्चात्य शिक्षा से नगरीय एवं ग्रामीण, धनी एवं निर्धन तथा शिक्षित एवं अशिक्षित वर्ग के बीच वैचारिक खाई गहरी हो गई। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त नवयुवकों के खान-पान, वेशभूषा, अभिवादन तथा विचार-विमर्श के ढंग में पाश्चात्य संस्कृति का लेप चढ़ गया। अंग्रेजी भाषा, अंग्रेजी शिक्षा एवं अंग्रेजी चिंतन भारतीयों युवकों पर हावी होने लगा। भारत में मिशनरी स्कूल खोलकर उनमें अंग्रेज पादरी नियुक्त किए गए। इन स्कूलों से शिक्षित युवक भारतीय संस्कृति के आलोचक और ईसाई धर्म के प्रशंसक बन गए।

(2.) यातायात के साधनों का विकास

ई.1857 की प्रथम सैनिक क्रांति के बाद भारत में रेलों एवं सड़कों का तेजी से विस्तार किया गया ताकि युद्ध, विद्रोह एवं दंगों की स्थिति में सेनाओं एवं सैन्य-संसाधनों को तेजी से गंतव्य तक पहुँचाया जा सके। जल-परिवहन को भी तेजी से बढ़ाया गया और समय के साथ वायु-परिवहन भी आरम्भ हुआ।

परिवहन सुविधाओं के विस्तार से भारत का कच्चा माल तेजी से इंग्लैण्ड जाने लगा और वहाँ से विलासिता की सामग्री भारत आने लगी। इस कारण भारतीय जन-जीवन में भौतिकवादी प्रवृत्ति का प्रसार हुआ। बहुत से भारतीय सामाजिक वर्जनाएं त्यागकर यूरोप जाने लगे और वहाँ की विलासितापूर्ण जीवन शैली के अभ्यस्त होने लगे।

अब उन्हें नैतिकता और धार्मिकता के स्थान पर सुख-सुविधाएं जुटाने की अधिक चिंता होने लगी। भारत के सम्पन्न और पाश्चात्य-शिक्षा प्राप्त नवयुवकों में यूरोपीय युवतियों के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा तथा वे यूरोपीय युवतियों से विवाह करने लगे। यूरोपीय स्त्रियों ने भारतीयों के रहन-सहन, वेशभूषा एवं खान-पान को तेजी से बदला।

(3.) ईसाई धर्म का प्रचार

अंग्रेज शिक्षक एवं पादरी हिन्दू-धर्म एवं संस्कृति को पिछड़ा हुआ बताते थे एवं ईसाई धर्म एवं ईसाइयत को श्रेष्ठ सिद्ध करते थे। इस कारण शासकों के रहन-सहन एवं तौर तरीके भारतीयों को लुभाने लगे। बहुत से भारतीय ईसाई बन गए और अंग्रेजों की तरह रहने का प्रयास करने लगे। भारत सरकार ने ईसाई धर्म प्रचारकों को अनेक सुविधाएं प्रदान कीं तथा पानी के जहाजों एवं सैनिक छावनियों में ईसाई धर्म प्रचारकों को नियुक्त किया गया।

सेनाओं में ‘पादरी लेफ्टिनेण्ट’ एवं ‘मिशनरी कर्नल’ नियुक्त किए गए। इनका काम भारतीय सैनिकों को ईसाई बनाना था। ईसाई बनने वाले भारतीय सैनिकों को पदोन्नति और अधिक वेतन दिए जाते थे। सरकारी स्कूलों में बाईबिल की शिक्षा अनिवार्य कर दी गई।

 मिशनरी स्कूलों में ईसाई धर्म की शिक्षा दी जाती थी। अनेक मिशनरियों ने अस्पताल खेलकर भारतीयों को विश्वास जीता। बेरोजगारों, अकाल पीड़ितों, कैदियों, अनाथ बच्चों आदि को तरह-तरह के प्रलोभन देकर ईसाई बनाया गया। इस प्रकार भारत में अंग्रेजी सभ्यता और संस्कृति का तेजी से प्रसार होने लगा और भारतीय संस्कृति अपमानित एवं बदनाम की जाने लगी।

(4.) सरकार नौकरियों का प्रलोभन

अंग्रेज सरकार ने ईसाई धर्म ग्रहण करने वालों एवं अंग्रेजी पढ़ने वालों के लिए सरकारी नौकरियों का प्रलोभन भी दिया। अंग्रेजी को राजकीय भाषा घोषित कर दिया गया। इस कारण अंग्रेजी पढ़े-लिखे युवकों को ही नौकरी मिलना संभव रह गया। इस कारण शिक्षण संस्थाओं में अंग्रेजी भाषा का प्रचलन बढ़ गया।

सरकारी नौकरी के दौरान भारतीय युवक अपने अंग्रेज अधिकारियों के सम्पर्क में रहते थे जिससे भारतीय युवकों पर उनकी जीवन शैली का रंग चढ़ने लगा। पेन्ट, कोट, टाई और हैट सरकारी पोशाक बन गई तथा मेज-कुर्सी पर भोजन करना जीवन-शैली का हिस्सा बन गया।

(5.) पश्चिमी देशों से सम्पर्क

अनेक भारतीय राजा एवं उनके परिवार यूरोप घूमने के लिए जाने लगे। इसी प्रकार धनी युवक उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैंण्ड की यात्रा एवं दीर्घ प्रवास करने लगे। बहुत से व्यापारियों का भी इंग्लैण्ड आना-जाना आरम्भ हो गया। इस कारण भारत का सम्पन्न एवं शिक्षित वर्ग अंग्रेजियत को बहुत करीबी से देखने लगा और उनके ही रहन-सहन का अभ्यस्त होने लगा। भारतीय भाषा, कपड़े, भोजन, पूजा-पद्धति हेय दृष्टि से देखे जाने लगे।

(6.) औद्योगिक विकास

औद्योगिक विकास के कारण भारत में पूँजीपति वर्ग का उदय हुआ। यह वर्ग शिक्षित एवं धनी था जिसने अंग्रेजों के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए पाश्चात्य जीवन-शैली को अपनाया। उद्योग-मालिकों ने अपने कार्यालयों में पाश्चात्य ढंग के महंगे फर्नीचर, सोफासैट, पर्दे एवं फूलदान लगवाए। वे अपना व्यापार बढ़ाने के लिए अंग्रेज अधिकारियों की स्त्रियों को महंगे उपहार देने लगे जिससे भारत में रिश्वत देकर काम करवाने की संस्कृति का विकास हुआ।

उद्योगों में काम करने के लिए गांवों के लोग तेजी से शहरों को पलायन करने लगे। ये मजदूर भी अपने मालिकों की पाश्चात्य जीवन शैली से प्रभावित हुए। उनकी वेश-भूषा भी बदलने लगी। वे भी अब केंटीन में जाकर मेज-कुर्सी पर बैठकर चाय, कॉफी, सिगरेट, मदिरा आदि का सेवन करने लगे। ये मजदूर जब अपने गांव जाते थे तो अपनी समृद्धि का ढिंढोरा पीटने के लिए गांवों में भी इन चीजों का प्रदर्शन करते थे।

इस कारण गांवों में भी नगरों की नकल आरम्भ हुई। इस प्रकार पाश्चात्य संस्कृति ने हमारे जीवन के समस्त पक्षों को प्रभावित किया तथा भारतीय समाज में बड़ी क्रांति उत्पन्न कर दी।

सामाजिक प्रभाव

जाति प्रथा पर प्रभाव

अंग्रेजों ने कभी भी जाति-प्रथा समाप्त करने के लिए प्रत्यक्ष रूप से कोई प्रहार नहीं किया किंतु जब लोग नौकरी, व्यापार शिक्षा आदि के लिए अपने घर एवं गांव से बाहर जाकर रहने लगे तो जाति-प्रथा में स्वतः शिथिलता आने लगी। पश्चिमी चिंतन ने समस्त भारतीयों को एक स्तर पर ला दिया। अंग्रेजी शिक्षा के कारण भी लोग मनुष्य का आकलन उसकी जाति की बजाय उसकी मेधा, क्षमता, ज्ञान एवं धन-सम्पत्ति के आधार पर करने लगे।

छुआ-छूत पर प्रभाव

उच्च जातियों के भारतीय लोग अपने खान-पान को शुद्ध रखने के लिए किसी अन्य जाति के व्यक्ति के हाथ का छुआ हुआ नहीं खाते थे किंतु बाद में होटलों में दूसरों के हाथ की बनी हुई चाय, बिस्कुट, सोड़ा आदि का सेवन करने लगे तथा शराब से बनी औषधियों का प्रयोग भी निःसंकोच करने लगे। यहाँ तक कि होटलों में किसी भी जाति के व्यक्ति के हाथों से बना भोजन खाने लगे।

होटलों में बैरे का काम प्रायः निम्न जाति के लोग करते थे। रेलों, ट्रामों और बसों में सभी जातियों के लोग साथ-साथ यात्रा करने लगे। अंग्रेजों के आने से पहले, प्रत्येक जाति के अपने अलग कुएं एवं तालाब होते थे किंतु अंग्रेजों के आने के बाद, घरों में आने वाले नल के पानी की आपूर्ति का काम हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, हरिजन आदि समस्त जातियों के लोग करते थे।

उच्च समझी जाने वाली सभी जातियों के लोग उसी जल का प्रयोग करने लगे। हिन्दुओं के देवी-देवताओं को भी उसी जल से स्नान कराया जाने लगा। इन सब बातों से छुआछूत की भावना शिथिल पड़ने लगी।

खान-पान पर प्रभाव

भारतीय लोग भोजन के मामले में सर्वाधिक दकियानूसी माने जाते थे। वे अपने परम्परागत भोजन को ही श्रेष्ठ समझते थे। शुरू-शुरू में ब्राह्मण, यूरोपियनों द्वारा भारत में लाये गए आलू-टमाटर आदि का सेवन नहीं करते थे तथा बाजार में भोजन नहीं करते थे किंतु अंग्रेजों के सम्पर्क में आने के बाद वे होटलों में बैठकर चाय-कॉफी, बिस्किट, ब्रेड (डबल रोटी), का प्रयोग धड़ल्ले से करने लगे। शहरी मध्यम वर्ग में आमलेट का भी खूब प्रचलन हो गया।

वैवाहिक सम्बन्धों पर प्रभाव

20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारतीय समाज सुधारकों ने अंतर्जातीय एवं अंतर्धार्मिक विवाहों को बढ़ावा दिया किंतु इस कार्य में उस समय अधिक सफलता नहीं मिली। विद्वानों की मान्यता है कि आधुनिक युग में होने वाले अन्तर्जातीय विवाह, पाश्चात्य सभ्यता के ही प्रभाव का परिणाम है। सहशिक्षा प्राप्त करने वाले, एक साथ खेलने वाले एवं कार्यालयों में सहकर्मी के रूप में काम करने वाले युवक एवं युवतियां प्रायः अंतर्जातीय विवाह करते हैं।

पर्दा-प्रथा पर प्रभाव

अंग्रेजों के आगमन से पहले भारत में पर्दा प्रथा का प्रचलन अपने चरम पर था किंतु अंग्रेज स्त्रियां अपनी इच्छानुसार कपड़े पहनने की अभ्यस्त थीं। भारतीय युवतियों पर भी उनकी इन आदतों का प्रभाव पड़ा तथा भारतीय लड़कियों ने भी यूरोपीय महिलाओं के वस्त्र अपना लिए। गांवों की बजाय शहरों में यह प्रक्रिया अधिक तेजी से हुई। शहरों में पर्दा-प्रथा लगभग समाप्त हो गई।

संयुक्त परिवार प्रथा का विघटन

प्राचीन आर्यों ने संयुक्त परिवार प्रथा का निर्माण किया था। कृषि एवं कुटीर उद्योगों के कारण संयुक्त परिवार प्रथा ही व्यावहारिक थी किंतु जब अंग्रेजों के शासन में शिक्षित युवक सरकारी विभागों एवं निजी कम्पनियों में काम करने के लिए अपने घरों, गांवों एवं नगरों से बाहर जाकर रहने लगे तो वे अपने परिवारों को भी ले गए। इस कारण संयुक्त परिवार प्रथा का विघटन आरम्भ हो गया। भारतीय लोगों में भी सामुदायिक भावना के स्थान पर पाश्चात्य संस्कृति की वैयक्तिक भावना का विकास हुआ।

धार्मिक प्रभाव

पाश्चात्य शिक्षा के कारण हमारे धार्मिक विश्वासों में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। ईसाई शिक्षकों एवं धर्म प्रचारकों ने भारतीय धर्म की जमकर खिल्ली उड़ाई तथा हिन्दू-धर्म में उपेक्षित चल रही निम्न जातियों के बहुत से परिवारों को बराबरी का लालच देकर ईसाई बना लिया। बहुत से शिक्षित एवं सम्पन्न लोग भी अंग्रेजों में अपनी उठ-बैठ बढ़ाने के लिए ईसाई बन गए।

पाश्चात्य संस्कृति के खुलेपन से प्रभावित होकर बहुत से हिन्दुओं ने हिन्दू-धर्म की धार्मिक-प्रथाओं का विरोध किया। बंगाल के कुछ प्रसिद्ध व्यक्तियों ने अपना धर्म बदल लिया। धीरे-धीरे हजारों भारतीयों ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया जिससे भारतीय धर्म और संस्कृति के अस्तित्त्व को चुनौती मिलने लगी।

इसलिए भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग ने मोर्चा संभाला तथा राजा राममोहनराय, केशवचन्द्र सेन, स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द आदि विचारकों ने हिन्दू-धर्म के भीतर सुधार की प्रक्रिया आरम्भ की और भारतीयों में अपनी धार्मिक एवं आध्यात्मिक विरासत के प्रति विश्वास, उत्साह एवं गौरव उत्पन्न किया। उनके द्वारा चलाए गए सुधारवादी आन्दोलनों के फलस्वरूप शिक्षित हिन्दू समाज में अन्ध-विश्वास एवं जादृ-टोने जैसी बातों का स्थान तर्क और ज्ञान लेने लगा।

जब धर्म पर छाया हुआ पाखण्ड और बाह्य आडम्बरों का आवरण हटने लगा तो लोगों में धर्म के वास्तविक रूप को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। भारतीयों में अपने धर्म के प्रति विश्वास एवं श्रद्धा उत्पन्न हुई।

आर्थिक प्रभाव

पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति का भारत के आर्थिक जन-जीवन पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ा। अंग्रेजों के आगमन से पूर्व भारत के कुटीर उद्योग समृद्ध एवं आत्म-निर्भर स्थिति में थे तथा कुटीर उद्योगों से उत्पादित माल न केवल स्थानीय लोगों की आवश्यकताएं पूरी करता था अपितु विदेशों को भी निर्यात किया जाता था जिसके बदले में भारत को विदेशों से सोना और चांदी प्राप्त होते थे किन्तु अंग्रेजों ने भारतीयों के उद्योग-धंधे नष्ट करके उन्हें बल-पूर्वक बंधुआ मजदूर बनाया तथा नील की खेती जैसे कार्यों में झौंक दिया।

कम्पनी के ‘गुमाश्तों’ की बेईमानी और भारतीयों पर किए जाने वाले अमानवीय अत्याचार के प्रमाण तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों की रिर्पोटों एवं डायरियों में मिलते हैं। अंग्रेजों ने अपने लाभ के लिए भारतीयों का अमानवीय आर्थिक शोषण किया। अंग्रेजों ने भारत से कच्चा माल इंग्लैण्ड ले जाने एवं वहाँ की मिलों से तैयार माल भारत लाने की नीति अपनाई। मिलों में निर्मित माल, हाथ से बने माल की तुलना में सस्ता होता था इसलिए आम-भारतीय मिलों का माल ही खरीदता था।

इस कारण कुटीर-उद्योगों की विशेषकर वस्त्र-उद्योग की कमर टूट गई। जॉन सुलिवन ने भारत में ब्रिटिश आर्थिक नीति एवं उसके प्रभाव को दर्शाते हुए लिखा है- ‘हमारी प्रणाली एक ऐसे स्पंज के रूप में काम करती है, जो गंगा के किनारों से प्रत्येक अच्छी वस्तु ले लेती है और टेम्स के किनारों पर निचोड़ देती है।’

उद्योग धंधे नष्ट हो जाने से बेरोजगार हुए लोग भी खेती के काम में जुट गए। इस कारण कृषि पर जनसंख्या का भार अधिक हो गया और प्रति-व्यक्ति आय घट गई। अंग्रेजों ने कृषि का वाणिज्यीकरण किया जिसके कारण किसानों को स्थानीय मांग की आपूर्ति के स्थान पर अंग्रेजी कम्पनी की मांग की आपूर्ति के लिए फसलें बोनी पड़ती थीं और दूसरी ओर स्थानीय आवश्यकताओं के लिए अन्न आदि नहीं मिलने से महंगाई बढ़ने लगी।

कुछ क्षेत्रों में केवल गन्ना, कपास और नील की खेती की जाने लगी जिससे उन क्षेत्रों में अकाल और भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई। ई.1876-78 में दक्षिण भारत में भयंकर अकाल पड़ा, फिर भी इस समय 69 लाख पौंड मूल्य का अनाज भारत से इंग्लैण्ड को निर्यात किया गया और भारत के श्रमिक, कृषक एवं निर्धन लोग भूख से तड़प-तड़प कर मर गए।

अंग्रेजों ने भारत पर शासन करते हुए दो विश्व-युद्ध लड़े। इस दौरान सैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भारत से बड़े-बड़े जहाज भरकर चावल एवं खाद्यान्न भेजा गया। इस कारण बंगाल में भयानक दुर्भिक्ष पड़ गया। भुखमरी, दुर्भिक्ष एवं उसके बाद फैलने वाली महामारियों से भारतीय संस्कृति की महानताएं लुप्त हो गईं। लोग उदारता, सहिष्णुता, दान-दक्षिणा जैसी महान बातें भूलकर एक-दूसरे को लूटकर खाने लगे।

एक वक्त पेट भरने के लिए बहू-बेटियों की लाज बेची गई। इंसानों ने पेड़ के पत्तों एवं छालों को उबालकर पेट भरने का प्रयास किया किंतु जब इससे भी पेट नहीं भरा तो कुछ स्थानों पर भूखे लोग मनुष्यों को मारकर खा गए। जानवर तो पहले ही घास एवं चारे की कमी के कारण काल के गाल में समा चुके थे। हैवानियत का ऐसा नंगा नाच पहले कभी नहीं देखा गया जब सभ्यता के दौर में भी मुनष्य ने मनुष्य को मारकर खाया हो।

शिक्षा पर प्रभाव

भारत में पारम्परिक शिक्षा धर्म, अध्यात्म एवं दर्शन पर केन्द्रित थी। ब्राह्मण वर्ग के लोग वर्षों तक वेदों, उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रंथों, स्मृतियों, नीतिग्रंथों, काव्यशास्त्रों, ज्योतिष एवं आयुर्वेद आदि का अध्ययन करते थे।  वाणिज्य कर्म में संलग्न वैश्य परिवारों के लोग सामान्य लिखना-पढ़ना, बही लिखना एवं हिसाब लगाना आदि सीखते थे। क्षत्रिय भी लिखने-पढ़ने की सामान्य शिक्षा ग्रहण करने के साथ शस्त्र संचालन, अश्व संचालन एवं सैन्य संचालन आदि का प्रशिक्षण लेते थे।

शिल्पियों एवं शूद्रों के लिए सामान्यतः शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी। मुसलमानों के शासनकाल में भारत की परम्परागत शिक्षा व्यवस्था लगभग तहस-नहस हो गई थी फिर भी मंदिरों, चटशालाओं एवं ब्राह्मण गुरुओं के घरों पर बालकों की शिक्षा चलती रही थी।

अंग्रेजों ने प्रारम्भ में भारतीय विषयों को ही पढ़ाए जाने की नीति जारी रखी तथा भाषा का माध्यम भी वही रखा किंतु साथ ही नवीन गणित, प्राकृतिक दर्शन, रसायन शास्त्र, एनोटोमी तथा अन्य लाभदायक विज्ञान की शिक्षा भी विद्यालयी पाठ्यक्रमों में शामिल की गई।

ई.1835 में लॉर्ड विलियम बैंटिक ने लार्ड मैकाले को शिक्षा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया जिसने फरवरी 1835 में भारतीय शिक्षा प्रणाली पर एक लेख प्रकाशित किया जिसमें मैकाले ने कहा- ‘भारत में पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार होना चाहिए, क्योंकि हमें एक ऐसा वर्ग तैयार करने का प्रयत्न करना चाहिए जो हमारे और शासितों के बीच वार्तालाप का माध्यम बन सके, जो रक्त और रंग से तो भारतीय हो किंतु बुद्धि और विचारों से भारतीय न हो।’

विलियम बैंटिक मैकाले के विचारों से सहमत था। अतः भारत में अंगेजी भाषा एवं अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार आरम्भ किया गया। ई.1835 में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज की नींव रखी गई। इसके बाद ब्रिटिश अधिकारियों और ईसाई मिशनरीज के प्रयत्नों से भारत में पाश्चात्य शिक्षा का विकास हुआ। अंग्रेजों ने भारत में पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार के लिए अंग्रेजी भाषा को माध्यम बनाया।

भारतीयों के लिए यह भाषा अत्यंत कठिन थी तथा मातृभाषा नहीं होने के कारण अधिकतर लोग इसे जल्दी से सीख नहीं पाते थे। इस कारण लाखों लोग अपनी शिक्षा बीच में ही छोड़ने लगे या शिक्षा से पूर्णतः दूर हो गए।

ई.1855 में कम्पनी के बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल के अध्यक्ष चाल्र्स वुड ने भारत में नई शिक्षा नीति लागू की जिसके अनुसार प्रत्येक प्रान्त में एक शिक्षा विभाग खोला गया; कलकत्ता, मद्रास और बम्बई में विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई; निजी शिक्षण संस्थाओं को अनुदान देने की प्रथा आरम्भ हुई; अध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए संस्थाएं स्थापित हुईं तथा कलकत्ता में एक महिला विद्यालय स्थापित कर स्त्री-शिक्षा के आन्दोलन को शक्तिशाली बनाया गया।

भारत में पाश्चात्य साहित्य और विज्ञान के प्रवेश से बहुत से सकारात्मक परिवर्तन भी हुए। भारत में पाश्चात्य ज्ञान, राष्ट्रवाद एवं क्रांतिकारी विचारों का प्रवेश हुआ। पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त भारतीयों ने अनुभव किया कि हमारे देश की भाषाओं में भी उच्च-कोटि के साहित्य का सृजन होना चाहिए। उन्होंने इस प्रकार के साहित्य का सृजन करने के लिए सोसाइटियां, छापाखाने तथा समाचार-पत्र स्थापित किए।

नई शिक्षा का सामाजिक और धार्मिक क्षेत्रों में भी प्रभाव पड़ा। अंग्रेजी पढ़कर लोगों में इच्छा उत्पन्न हुई कि वे भारत में भी समाज-सुधार करें। सुधार की प्रवृत्ति विशेषतः हिन्दुओं में दिखाई देती थी। इस कारण हिन्दुओं में जाति-प्रथा, पर्दा-प्रथा, सती-प्रथा, बाल-विवाह, दहेज-प्रथा आदि के उन्मूलन, विधवा-विवाह के प्रचार, खान-पान के नियंत्रण को हटाने, छुआछूत मिटाने, हरिजनोद्धार करने आदि के प्रयास आरम्भ हुए।

इस प्रकार देश में अंग्रेजी शिक्षा के बाद बुद्धिजीवियों का एक नया वर्ग उत्पन्न हुआ, जिसने लोगों में स्वतंत्रता और प्रजातंत्र के विचारों का प्रचार किया और इसे प्राप्त करने के लिए स्वयं भी संघर्ष किया। चूंकि हिन्दी पूरे देश की सम्पर्क भाषा नहीं थी इसलिए अंग्रेजी ने इस अंतराल को भरना आरम्भ किया। अंग्रेजी सम्पर्क की दूसरी भाषा के रूप में उभरी तथा उसने भारत के हिन्दी एवं अहिन्दी भाषी प्रान्तों के लोगों के बीच वैचारिक आदान-प्रदान का मार्ग खोल दिया तथा उनके बीच में वैचारिक समानता स्थापित हुई।

अंग्रेजी पढ़कर लोगों को यह ज्ञान हुआ कि अंग्रेज पादरी एवं मिशनरी व्यर्थ ही भारत के धर्म, दर्शन एवं संस्कृति की खिल्ली उड़ाते हैं, भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान पाश्चात्य संस्कृति एवं ज्ञान से कहीं अधिक श्रेयस्कर है। ई.1801-1802 में उपनिषदों का फ्रेंच भाषा में अनुवाद हुआ। जब जर्मन दार्शनिक शोपेनहावर ने उसे पढ़ा तो उसे भारतीय दार्शनिक चिंतन की महानता का ज्ञान हुआ।

वहीं से पाश्चात्य दर्शन पर भारतीय प्राच्य दर्शन की श्रेष्ठता का सिद्धांत विकसित होने लगा। विलियम जॉन्स ने ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ का अनुवाद किया, मैक्समूलर ने ‘वेदों’ का अनुवाद किया तथा संस्कृत साहित्य एवं दर्शन को लोकप्रिय बनाया। भारतीय विश्वविद्यालयों में भी संस्कृत का आलोचनात्मक अध्ययन प्रारम्भ हुआ।

बी. जी. भण्डारकर, राजेन्द्रलाल मिश्रा तथा के. टी. तेलंग आदि विद्वानों ने भारतीयों के समक्ष पाश्चात्य ज्ञान की विशेषताओं को और पश्चिम के समक्ष भारतीय ज्ञान की विशेषताओं को रखा। दयानन्द सरस्वती, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, केशवचन्द्र सेन, विवेकानन्द, महादेव गोविन्द रानाडे, दादा भाई नौरोजी आदि बुद्धिजीवी इस नव-जागृत भारत के प्रमुख समाज-सुधारक थे।

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