अलाउद्दीन ने कठोरता से शासन किया तथा अपने राज्य का लगातार विस्तार किया। इस कारण बहुत से लोग उससे नाराज हो गए तथा अल्लाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह लगातार होते रहे।
तुर्की अमीर तो विद्रोही प्रकृति के थे ही, गैर तुर्की अमीर भी कुछ कम नहीं थे। वे सब सुल्तान को अपने-अपने गुट के वश में करने के लिये षड़यंत्र एवं विद्रोह रचते रहते थे। अलाउद्दीन खिलजी की स्वेच्छाचारिता तथा निरंकुशता की नीति से अमीरों में उसके विरुद्ध अत्यधिक असन्तोष रहता था। इस कारण अलाउद्दीन खिलजी को कई विद्रोहों का सामना करना पड़ा।
अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह
(1.) नव-मुसलमानों का विद्रोह
जलालुद्दीन खिलजी के शासन काल में जो मंगोल इस्लाम स्वीकार करके दिल्ली के निकट मंगोलपुरी में बस गये थे, वे नव-मुस्लिम कहलाते थे। ये लोग अब भी अपने को विदेशी समझते थे और सल्तनत के विरुद्ध षड़यन्त्र रचते रहते थे। 1307 ई. में जब नसरत खाँ तथा उलूग खाँ गुजरात से लौट रहे थे, तब नव-मुस्लिम सैनिकों ने उसे मार्ग में लूटने के लिए विद्रोह कर दिया और सुल्तान के भतीजे तथा नसरत खाँ के भाई की हत्या कर दी।
इस विद्रोह को बड़ी नृशंसतापूर्वक दबाया गया। नव-मुस्लिमों की जागीरें छीन ली गई। और उन्हें नौकरियों से वंचित कर दिया गया। इससे नव-मुसलमानों का असन्तोष और बढ़ गया और उन्होंने सुल्तान की हत्या करने का षड्यन्त्र रचा।
अलाउद्दीन खिलजी को इस षड्यन्त्र का पता लग गया। उसने अपनी सेना को आज्ञा दी कि वे नव-मुसलमानों को समूल नष्ट कर दें। बरनी का कहना है कि इस आज्ञा के पाते ही लगभग तीन हजार नव मुस्लिम तलवार के घाट उतार दिये गये और उनकी सम्पत्ति छीन ली गई।
(2.) अकत खाँ का विद्रोह
दूसरा विद्रोह अकत खाँ का था जो अलाउद्दीन खिलजी का भतीजा था। जब अलाउद्दीन रणथम्भौर जा रहा था तब वह तिलपत नामक स्थान पर कुछ दिनों के लिए रुक गया और आखेट में व्यस्त हो गया। इसी समय अकत खाँ ने अपने सैनिकों को सुल्तान पर आक्रमण करने की आज्ञा दी। सुल्तान घायल हो गया परन्तु बच गया।
सुल्तान ने विद्रोहियों का पीछा किया और अकत खाँ तथा उसके साथियों को पकड़ कर उनका वध करवा दिया। अकत खाँ के भाइयों जिनका इस विद्रोह से कोई सम्बन्ध नहीं था, उनकी सम्पत्ति जब्त करके उन्हें बंदी बना लिया गया।
(3.) अमीर उमर तथा मंगू खाँ का विद्रोह
अमीर उमर तथा मंगू खाँ अलाउद्दीन खिलजी की बहिन के पुत्र थे। जिस समय अलाउद्दीन रणथम्भौर का घेरा डाले हुए था, उन्हीं दिनों इन लोगों ने बदायूँ तथा अवध में विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। ये विद्रोह शीघ्र ही दबा दिए गये और अमीर उमर तथा मंगू खाँ को बंदी बनाकर उनकी आँखें निकलवा ली गईं।
(4.) हाजी मौला का विद्रोह
हाजी मौला अलाउद्दीन खिलजी का एक असन्तुष्ट अधिकारी था। वह काजी अलाउलमुल्क की मृत्यु के उपरान्त दिल्ली का कोतवाल बनना चाहता था परन्तु सुल्तान ने तमर्दी को इस पद पर नियुक्त कर दिया। इससे हाजी मौला को बड़ी निराशा हुई और वह षड्यन्त्र रचने लगा। जब सुल्तान रणथम्भौर के घेरे के दौरान सकंटापन्न स्थिति में था, तब हाजी मौला ने दिल्ली के कोतवाल तमर्दी की हत्या करके राजकोष पर अधिकार कर लिया।
इस पर अलाउद्दीन ने उलूग खाँ को उसका दमन करने के लिये भेजा परन्तु उसके दिल्ली पहुँचने के पूर्व ही हमीदुद्दीन नामक राजभक्त अधिकारी ने हाजी मौला को परास्त करके उसका वध कर दिया। हाजी मौला के समस्त सम्बन्धियों तथा समर्थकों की भी निर्दयता पूर्वक हत्या की गई।
अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह के कारण
यद्यपि अलाउद्दीन विद्रोहों का दमन करने में सफल रहा था परन्तु स्थायी शान्ति स्थापित करने के लिए इन विद्रोहों के वास्तविक कारणों का पता लगाना आवश्यक था जिससे ऐसी व्यवस्था की जाये कि भविष्य में विद्रोहों की सम्भावना नहीं रह जाये। अपने शुभचिन्तकों का परामर्श लेने के उपरान्त सुल्तान इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि विद्रोह के पाँच कारण हैं-
(1.) गुप्तचर विभाग की अयोग्यता
अलाउद्दीन ने अनुभव किया कि उसका गुप्तचर विभाग ढंग से कार्य नहीं कर रहा है। इस कारण सुल्तान को समय रहते षड़यंत्रों तथा साम्राज्य के विभिन्न भागों में घटने वाली घटनाओं की जानकारी नहीं मिल पाती।
(2.) मद्यपान गोष्ठियाँ
अलाउद्दीन ने विद्रोह का दूसरा कारण अमीरों की मद्यपान गोष्ठियों को ठहराया। इन गोष्ठियों में सुल्तान तथा अन्य अमीरों के विरुद्ध षड्यन्त्र रचे जाते थे। अतः मद्यपान को रोकना आवश्यक समझा गया।
(3.) अमीरों की सामाजिक गोष्ठियाँ तथा वैवाहिक सम्बन्ध
अमीरों के परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध एवं उनकी सामाजिक गोष्ठियाँ भी विद्रोहों का कारण समझी गईं। इनके माध्यमों से अमीरों को धड़ेबंदी करने एवं सुल्तान के विरुद्ध संगठित होने का अवसर मिलता था। इस कारण जब कभी किसी एक अमीर के विरुद्ध कार्यवाही की जाती थी तब उसके धड़े के अन्य अमीर भी विद्रोह पर उतर आते थे।
(4.) कुछ अमीरों के पास धन का बाहुल्य
सुल्तानों की कमजोरी एवं उनकी हत्याओं के सिलसिले का लाभ उठाकर कुछ अमीरों ने अत्यधिक धन एकत्रित कर लिया था। इस धन का उपयोग सुल्तान के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने में होता था। धन कमाने की चिंता नहीं होने के कारण अमीरों को विद्रोहों के बारे में सोचने का अवकाश प्राप्त हो जाता था।
(5.) स्थानीय शासकों पर नियंत्रण का अभाव
प्रांतीय एवं स्थानीय शासकों पर सुल्तान का प्रत्यक्ष नियन्त्रण नहीं होने से, उन्हें भी दिल्ली के अमीरों की भांति धन एकत्रित करने तथा उसकी सहायता से विद्रोह करने का अवसर प्राप्त हो जाता था।
(6.) सुल्तान तथा जनता में प्रत्यक्ष सम्पर्क का अभाव
अब तक की शासन पद्धति में सुल्तान का जनता से प्रत्यक्ष सम्पर्क नहीं था। इसके कारण जनता सुल्तान की ओर से उदासीन बनी रहती थी और स्थानीय लोगों के भड़कावे में आकर सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा कर देती थी।
इस प्रकार अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह लगातार होते रहे तथा अल्लाउदीन उन विद्रोहों का लगातार दमन करने में सफल रहा।
यह भी देखें-
सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का संस्थापक
अलाउद्दीन खिलजी – खिलजी वंश का चरमोत्कर्ष
अलाउद्दीन खिलजी : साम्राज्य विस्तार
अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह