राजतरंगिणी कल्हण द्वारा रचित संस्कृत ग्रंथ है जो कश्मीर का प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत करता है। जानिए इसकी रचना, महत्व और साहित्यिक विशेषताएँ।
परिचय
भारतीय इतिहास में अनेक ग्रंथ अतीत की वास्तविक झलक दिखाते हैं। उनमें से ‘राजतरंगिणी’ (Rajatarangini) विशेष महत्व रखता है। इस आलेख में हम राजतरंगिणी के महत्व, कल्हण की लेखन शैली और इसके ऐतिहासिक साक्ष्यों का विस्तार से विश्लेषण करेंगे।
‘राजतरंगिणी’ का शाब्दिक अर्थ है— ‘राजाओं की नदी’। जिस प्रकार एक नदी अपनी धाराओं के साथ निरंतर बहती है, उसी प्रकार कल्हण ने कश्मीर के राजाओं के उत्थान और पतन के इतिहास को एक प्रवाह में पिरोया है। इसकी रचना 1148-1150 ईस्वी के आसपास की गई थी।
राजतरंगिणी (Rajatarangini) भारतीय इतिहास लेखन की उस परंपरा का ग्रंथ है जहाँ ‘तथ्य’ और ‘तर्क’ को प्रधानता दी गई। संस्कृत भाषा में कल्हण द्वारा रचित यह ग्रंथ कश्मीर के गौरवशाली इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण है। राजतरंगिणी को भारतीय इतिहास में पहला व्यवस्थित ऐतिहासिक ग्रंथ माना जाता है, जिसमें कश्मीर के राजाओं का क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत किया गया है।
कल्हण: भारत के प्रथम वास्तविक इतिहासकार
कल्हण (kalhana) एक निष्पक्ष लेखक थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि इतिहासकार को ‘राग-द्वेष’ (पक्षपात) से मुक्त होना चाहिए। उन्होंने अपनी रचना में राजाओं की प्रशंसा तो की, किंतु उनकी गलतियों और अत्याचारों की आलोचना करने से भी वे पीछे नहीं हटे।
राजतरंगिणी: रचना काल और लेखक
- लेखक: कल्हण, एक विद्वान कवि और इतिहासकार।
- रचना काल: 1148 से 1150 ईस्वी के बीच।
- भाषा: संस्कृत।
- शैली: महाकाव्य (काव्यात्मक इतिहास)
- संदर्भ सामग्री: कल्हण ने अपने ग्रंथ की रचना करते समय ग्यारह अन्य ग्रंथों का सहारा लिया, जिनमें से आज केवल नीलमत पुराण (Neelmat Puran) उपलब्ध है।
- समय काल: महाभारत काल से लेकर 12वीं शताब्दी तक का इतिहास।
राजतरंगिणी की संरचना
- यह ग्रंथ काव्य शैली में लिखा गया है।
- इसमें कुल आठ तरंग (अध्याय) हैं।
- प्रत्येक तरंग में कश्मीर के विभिन्न शासकों का विवरण क्रमबद्ध रूप से मिलता है।
- राजतरंगिणी में कुल 7,826 श्लोक हैं।
ऐतिहासिक स्रोत
कल्हण ने इतिहास लिखने के लिए वैज्ञानिक पद्धति का उपयोग किया, जो आज के आधुनिक इतिहासकारों जैसी है:
- अभिलेख (Inscriptions): उन्होंने मंदिरों और ताम्रपत्रों पर खुदे लेखों का अध्ययन किया।
- सिक्के (Numismatics): तत्कालीन मुद्राओं के माध्यम से आर्थिक स्थिति का आकलन किया।
- पुराने दस्तावेज़: उनसे पहले के इतिहासकारों (जैसे नीलमत पुराण) के कार्यों की समीक्षा की।
- मौखिक परंपराएँ: लोककथाओं को तथ्यों की कसौटी पर परखा।
राजतरंगिणी के अध्याय
राजतरंगिणी के आठ अध्याय हैं जिन्हें तरंग कहा गया है। इन तरंगों की मुख्य विषय-वस्तु इस प्रकार से है-
- प्रथम तरंग: महाभारत काल से कश्मीर के इतिहास का आरंभ। इसमें पांडव वंश के राजकुमारसहदेव द्वारा राज्य स्थापना का उल्लेख है।
- द्वितीय तरंग: इसमें मुख्य रूप से गोनन्द वंश के पतन के बाद के राजाओं और एक नए राजवंश के उदय का वर्णन है।
- तृतीय तरंग : इसमें कलहण ने गोनन्द वंश (द्वितीय) को सिंहासन की पुनर्प्राप्ति और कुछ ऐसे राजाओं का वर्णन किया है जिनका चरित्र बहुत उदार और महान है। तृतीय तरंग की शुरुआत राजा मेघवाहन (Raja Megh Vahan)के शासनकाल से होती है।
- चतुर्थ तरंग: इस ग्रंथ का सबसे गौरवशाली और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसमें कश्मीर के सबसे शक्तिशाली राजवंश, कर्कोट वंश (Karkota Dynasty) का उदय और विस्तार वर्णित है। इस तरंग का मुख्य आकर्षण सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड़ (Lalitaditya Muktapida ) का शासनकाल है, जिन्हें “कश्मीर का सिकंदर” भी कहा जाता है।
- पंचम तरंग : इसमें कर्कोट वंश के पतन के बाद उत्पल वंश (Utpala Dynasty) का उदय और राजा अवंतीवर्मन (Avantivarman ) के कल्याणकारी शासन का वर्णन है। यह अध्याय युद्धों के बजाय प्रशासनिक सुधारों और इंजीनियरिंग (अभियांत्रिकी) के चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है।
- षष्ठ तरंग: राजतरंगिणी की छठी तरंग इतिहास की दृष्टि से उतार-चढ़ाव भरी है। इस अध्याय का केंद्र बिंदु एक महिला का प्रभाव है—रानी दिद्दा (Rani Didda)। यह तरंग दिखाती है कि कैसे राजनीति में कूटनीति, क्रूरता और महत्वाकांक्षा का खेल चलता है।
- सप्तम तरंग: राजतरंगिणी की सप्तम तरंग (सातवीं तरंग) बहुत लंबी है और यह कश्मीर के इतिहास के एक बहुत ही उथल-पुथल भरे दौर को दर्शाती है। इसमें लोहार वंश (Lohar Dynasty) का विस्तार से वर्णन है, और इसका सबसे प्रमुख और विवादित पात्र है—राजा हर्ष।
- अष्टम तरंग: कलहण अपनी इस महान कृति को राजा जयसिंह (Raja Jaisingh) के शासनकाल के 22वें वर्ष (लगभग 1149-50 ईस्वी) में समाप्त करते हैं।
ऐतिहासिक महत्व
- राजतरंगिणी को भारतीय इतिहास का प्रथम प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।
- इसमें पौराणिक तत्वों के साथ-साथ तथ्यात्मक विवरण भी मिलता है।
- कल्हण ने निष्पक्षता से घटनाओं का वर्णन किया है।
- यह ग्रंथ न केवल कश्मीर अपितु समग्र भारतीय इतिहास के लिए महत्वपूर्ण स्रोत है।
साहित्यिक विशेषताएँ
- काव्यात्मक शैली: संस्कृत श्लोकों में रचना।
- नैतिक दृष्टिकोण: राजाओं के गुण-दोषों का निष्पक्ष वर्णन।
- इतिहास और साहित्य का संगम: तथ्यात्मकता और काव्य सौंदर्य दोनों का समावेश।
राजतरंगिणी और आधुनिक इतिहासकार
- आधुनिक इतिहासकारों ने राजतरंगिणी को कश्मीर का प्रामाणिक इतिहास माना है।
- अनेक शोधकर्ताओं ने इसमें वर्णित घटनाओं का उपयोग किया है।
- यह ग्रंथ आज भी कश्मीर अध्ययन (Kashmir Studies) का आधार है।
कश्मीर का ‘स्वर्ण युग’ और ललितादित्य मुक्तापीड़
- राजतरंगिणी में ललितादित्य मुक्तापीड़ का वर्णन सबसे प्रभावशाली है। उसे कश्मीर का ‘सिकंदर’ कहा जाता है। उसने कन्नौज के राजा यशोवर्मन को पराजित किया और मध्य एशिया तक अपनी धाक जमाई। उसके द्वारा निर्मित मार्तंड सूर्य मंदिर आज भी उनके वैभव का साक्षी है।
राजतरंगिणी की प्रासंगिकता
राजतरंगिणी केवल राजाओं की वंशावली नहीं है, बल्कि यह उस समय के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढाँचे का दर्पण है।
- भ्रष्टाचार पर प्रहार: कल्हण ने ‘कायस्थों’ (नौकरशाहों) द्वारा जनता के शोषण का कड़ा विरोध किया है।
- नारी शक्ति: इसमें सुगंधा और दिद्दा जैसी शक्तिशाली रानियों का वर्णन है, जो दिखाती हैं कि मध्यकालीन भारत में महिलाओं की राजनीतिक भूमिका कितनी महत्वपूर्ण थी।
- भौगोलिक ज्ञान: वितस्ता (झेलम) नदी और कश्मीर की घाटियों का सटीक वर्णन इसे एक भौगोलिक ग्रंथ भी बनाता है।
निष्कर्ष
राजतरंगिणी भारतीय साहित्य की वह अनमोल धरोहर है जिसने इतिहास को ‘पुराण’ से अलग कर एक ‘विज्ञान’ के रूप में स्थापित किया। कल्हण की यह कृति हमें सिखाती है कि इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का संग्रह नहीं है, अपितु यह वर्तमान के लिए एक सबक है। यदि आप कश्मीर के वास्तविक स्वरूप और भारतीय इतिहास की जड़ों को समझना चाहते हैं, तो राजतरंगिणी का अध्ययन अनिवार्य है। यह ग्रंथ आज भी इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए मार्गदर्शक है।



