Monday, September 20, 2021

अध्याय – 1 : भारत में यूरोपीय जातियों का आगमन

सिकंदर के भारत में आने (523 ई.पू.) से भी बहुत पहले, रोम के एक शासक ने कहा था- ‘भारतीयों के बागों में मोर, उनके खाने की मेज पर काली मिर्च तथा उनके बदन का रेशम, हमें पागल बना देता है। हम इन चीजों के लिये बर्बाद हुए जा रहे हैं।’

यह कथन इस बात का प्रमाण है कि यूरोप तथा भारत के बीच ईसा के जन्म के सैंकड़ों साल पहले भी व्यापारिक सम्बन्ध थे तथा व्यापारिक संतुलन भारत के पक्ष में था।

भारतवासी ईसा से भी कई हजार साल पहले अर्थात् सैंधव सभ्यता के समय से ही स्वर्ण धातु के गुणों तथा उसके उपयोग से परिचित थे। दक्षिण भारत में भी ईसा से लगभग 1000 साल पहले स्वर्ण उत्पादन होता था किंतु भारत में स्वर्ण बहुत ही कम मात्रा में उपलब्ध था। इस कारण भारतवासी विदेशी व्यापार में मुद्रा के रूप में केवल सोना-चांदी ही स्वीकार करते थे। यही कारण है कि भारत के मसालों, सुगंधित काष्ठों, अनाज तथा कपड़ों को प्राप्त करने के लिये विश्व भर के देशों ने भारतीय व्यापारियों के समक्ष सोने-चांदी के ढेर लगा दिये।

स्विस लेखक लैण्डर्स्टोन ने लिखा है– ‘समुद्र में जाने के अनेक रास्ते एवं माध्यम हैं पर उद्देश्य केवल एक ही था- चमत्कारिक देश भारत पहुँचना, जो देश धन से लबालब भरा है।’

अँग्रेजी लेखक शेक्सपीयर (1564-1616 ई.) ने भारत भूमि को विश्व के लिये महान अवसरों की चरम सीमा कहा है। अँग्रेजी कवि मिल्टन (1608-1674 ई.) ने विभिन्न देशों की विशेषता बताते हुए भारत के धन की चर्चा की है। जर्मन दार्शनिक हेगेल (1770-1831 ई.) ने भारत को मनोकामना की भूमि बताया है। यही कारण है कि प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक यूरोपीय जातियाँ भारत आने के लिये सदैव लालायित रहती थीं।

यूरोपियन जातियों के आगमन के उद्देश्य

कतिपय ब्रिटिश इतिहासकारों ने लिखा है कि भारत में यूरोपीय जातियों के प्रवेश का कारण भारत के लोगों को सभ्य बनाना था। जबकि वास्तव में भारत में यूरोपीय जातियों के आगमन के दो उद्देश्य जान पड़ते हैं- (1.) भारत में व्यापार करके धन अर्जित करना तथा (2.) भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करना। इन दोनों उद्देश्यों की पूर्ति के लिये यूरोपीय जातियों को भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने की आवश्यकता हुई। यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि यूरोपीय जातियाँ इस देश में व्यापारिक उद्देश्यों को लेकर प्रविष्ट हुईं किंतु उन्होंने अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये एक हाथ में धर्म का झण्डा और दूसरे हाथ में तलवार थाम रखी थी।

पुर्तगालियों का भारत में प्रवेश

15वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में यूरोप में सुदूर देशों की ओर के समुद्री मार्गों का पता लगाने का जो अभियान चला, उसमें यूरोप का एक छोटा देश पुर्तगाल सबसे आगे रहा। 1497 ई. में वास्कोडिगामा नामक पुर्तगाली नाविक अपने साथियों सहित सामान और हथियारों से भरा जहाजी बेड़ा लेकर पूर्वी द्वीपों की खोज में निकल पड़ा। अगस्त 1498 में वह भारत के विख्यात बन्दरगाह कालीकट पहुँचा। उसने कालीकट के राजा जमेरिन से कालीकट में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त की। इस समय तक समुद्री व्यापार पर अरब व्यापारियों का एकाधिकार था किंतु कुछ ही वर्षों में पुर्तगालियों ने अरब व्यापारियों पर विजय प्राप्त करके समस्त व्यापार पर एवं भारत तथा यूरोप के मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थानों पर नियंत्रण कर लिया।

पुर्तगालियों ने कालीकट के राजा जमेरिन को उसके शत्रु राज्यों, मुख्यतः कोचीन राज्य के विरुद्ध सैनिक सहायता दी और भारत की राजनीति में प्रवेश किया। अल्मीडा (1505-1509 ई.) भारत में पहला पुर्तगाली गवर्नर था। उसने भारत में पुर्तगाली राज्य स्थापित करने का प्रयत्न किया। अल्मीडा का उत्तराधिकारी अल्बुकर्क (1509-1515 ई.) अत्यंत महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था जिसके नेतृत्व में भारत में पुर्तगाली शक्ति का निर्माण हुआ। उसने 1510 ई. में गोआ पर अधिकार किया। धीरे-धीरे पश्चिमी तट पर ड्यू, सालसेट, बसीन, चौल तथा पूर्वी तट पर (बंगाल में) हुगली और दक्षिण में मद्रास तट पर सानथोम पुर्तगालियों के अधिकार में चले गये।

पुर्तगालियों ने फारस की खाड़ी में होरमुज से लेकर मलाया में मलक्का और इण्डोनेशिया में मसालों के द्वीप तक समस्त समुद्र तट पर अधिकार कर लिया। अपना व्यापारिक दबदबा बनाये रखने के लिये वे अन्य यूरोपीय जातियों से जबर्दस्त युद्ध करते रहे। वे समुद्र में डाका डालने तथा लूटपाट करने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते थे।

उन्नीसवीं सदी के एक प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार ने लिखा है- ‘पुर्तगालियों ने अपनी सौदागरी को ही अपना मुख्य पेशा बना लिया किंतु अँग्रेजों और डचों की तरह उन्हें भी अवसर मिलते ही लूटपाट करने में कोई आपत्ति नहीं हुई।’

पुर्तगाल अत्यंत छोटा देश था। सोलहवीं शताब्दी में उसकी जनसंख्या केवल 10 लाख थी। इसलिये पुर्तगाल लम्बे समय तक फारस की खाड़ी से लेकर पूर्वी मसाला द्वीपों पर अपना व्यापारिक दबदबा बनाये रखने में असमर्थ रहा। सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इंग्लैण्ड, नीदरलैण्ड एवं फ्रांस ने स्पेन तथा पुर्तगाल के एकाधिकार के विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया। इस संघर्ष में स्पेन तथा पुर्तगाल को बर्बाद होना पड़ा। पुर्तगाल तथा स्पेन आपस में भी लड़ते रहे। 1580 ई. में पुर्तगाल पर स्पेन का अधिकार हो गया। 1588 ई. में अँग्रेजों ने आर्मेडा नामक स्पेनिश जहाजी बेड़े को हरा कर स्पेनिश नौसैनिक श्रेष्ठता को भंग कर दिया। इस विजय ने अँग्रेजों और डच सौदागरों (नीदरलैण्ड वासियों) को भारत आने के लिये उत्तमाशा अंतरीप के मार्ग का प्रयोग करने तथा पूर्व में साम्राज्य की स्थापना के लिये प्रतियोगिता में भाग लेने में समर्थ बना दिया। अंत में डचों ने इण्डोनेशिया पर और अँग्रेजों ने भारत, श्रीलंका तथा मलाया पर अधिकार कर लिया। भारत में पुर्तगालियों के अधिकार में गोआ, दमन और ड्यू के अतिरिक्त कुछ नहीं रहा। 1629 ई. में शाहजहाँ ने पुर्तगालियों से हुगली छीन लिया। 1639 ई. में मराठों ने उनसे सालसेट और बसीन छीन लिये। 1661 ई. में पुर्तगालियों ने अपनी राजकुमारी का विवाह अँग्रेजों के राजा चार्ल्स (द्वितीय) के साथ किया तथा मुम्बई अँग्रेजों को दहेज में दे दिया।

डचों का भारत में प्रवेश

नीदरलैण्ड के निवासियों को डच कहा जाता है। ये लोग लम्बे समय से पूर्वी द्वीपों के मसालों का व्यापार करते थे। डचों को पूर्वी देशों के मसाले, पुर्तगाल में खरीदने पड़ते थे जिन्हें वे उत्तरी यूरोप में बेचते थे। जब स्पेन ने नीदरलैण्ड तथा पुर्तगाल पर अधिकार कर लिया तब डचों को पूर्वी द्वीपों के मसालों का व्यापार करने के लिये परम्परागत मार्ग छोड़कर, नये मार्ग खोजने की आवश्यकता हुई। 1595 ई. में चार डच जहाज उत्तमाशा अंतरीप होकर भारत के लिये रवाना हुए। 1602 ई. में डचों ने भारत से व्यापार करने के उद्देश्य से डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी का गठन किया। 1604 ई. में डच जहाजी बेड़ा कालीकट पहुँचा। डचों के पास पर्याप्त नाविक शक्ति थी। उन्होंने मछलीपट्टम, पेटापोली, पुलीकट आदि स्थानों से व्यापार करना आरम्भ किया। धीरे-धीरे उन्होंने पूर्वी द्वीपों से पुर्तगाली शक्ति को समाप्त कर दिया।

डचों का मुख्य लक्ष्य दक्षिणी-पूर्वी एशियाई द्वीपों- इण्डोनेशिया, जावा, सुमात्रा एवं अन्य मसाला द्वीपों पर व्यापारिक आधिपत्य स्थापित करना था। भारत उनके व्यापारिक मार्ग की एक कड़ी मात्र था। अतः भारत में उन्होंने अपना राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने का प्रयत्न नहीं किया। फिर भी उन्होंने भारतीय व्यापार को पूरी तरह नहीं छोड़ा। उन्होंने पश्चिमी भारत में गुजरात के सूरत, भड़ौंच, कैम्बे और अहमदाबाद, केरल के कोचीन, तमिलनाडु के नागपत्तम्, आंध्र प्रदेश के मच्छलीपत्तम्, बंगाल के चिनसुरा, बिहार के पटना और उत्तर प्रदेश के आगरा में अपने व्यापारिक गोदाम बनाये। उन्होंने 1658 ई. में लंका को पुर्तगालियों से जीत लिया। डच व्यापारी, भारत से नील, रेशमी कपड़े, सूती कपड़े, शोरा और अफीम खरीदते थे। पुर्तगालियों की तरह वे भी भारतीय उत्पादकों एवं भारतीय नौकरों के साथ क्रूर व्यवहार करते थे तथा उनका भयानक शोषण करते थे।

स्पेन, पुर्तगाल, फ्रांस, नीदरलैण्ड एवं इंग्लैण्ड के व्यापारी, शताब्दियों से अफ्रीका के लोगों को पकड़कर उन्हें विश्व के बाजारों में गुलाम के रूप में बेचने तथा खानों एवं बागानों में बलपूर्वक काम लेने के लिये उन पर भयानक अत्याचार करने के अभ्यस्त थे। इसलिये उन्हें भारत के स्थानीय लोगों का शोषण करने एवं उन पर अत्याचार करने में कोई हिचक नहीं होती थी।

1718 ई. में अँग्रेजों ने डचों को हुगली तथा नागपत्तम् आदि स्थानों से खदेड़ दिया। व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में भी अँग्रेजों ने डचों को पछाड़ दिया। 1759 ई. में अँग्रेजों और डचों के मध्य बेदरा नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें डच परास्त हो गये और उन्हें अँग्रेजों से समझौता करना पड़ा। इस समझौते के अनुसार डचों ने भविष्य में युद्ध नहीं करने, नई सैनिक भर्ती नहीं करने और किलेबन्दी नहीं करने का वचन दिया। इस प्रकार भारत में डचों का प्रभाव पूर्णतः समाप्त हो गया।

अँग्रेजों का भारत में आगमन

पुर्तगालियों की सफलता ने अँग्रेज व्यापारियों को भारत आने के लिये उत्तेजित किया। पुर्तगालियों द्वारा यूरोप के बाजारों में भारतीय मसालों, कालीमिर्च, रेशमी कपड़ों, सूती कपड़ों तथा विभिन्न औषधियों को बेचकर कमाये जा रहे मुनाफे को देखकर ब्रिटिश वासियों के खून में उबाल आता था। वे इस लाभप्रद व्यापार में हिस्सा लेने के लिये अधीर हो उठे किंतु सोलहवीं शताब्दी के अंत तक वे पुर्तगाल तथा स्पेन की नौसैनिक शक्ति को टक्कर देने में समर्थ नहीं थे। उन्होंने पचास से भी अधिक वर्षों तक इंग्लैण्ड से भारत के बीच वैकल्पिक समुद्री मार्ग खोजने के प्रयास किये किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। इस बीच उन्होंने समुद्री शक्ति जुटा ली। 1579 ई. में ड्रेक ने समुद्र के मार्ग से विश्व की परिक्रमा की। 1588 ई. में उन्होंने स्पेनिश आर्मेडा को परास्त करके पूरब की ओर जाने का समुद्री मार्ग खोल लिया।

ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना

 1599 ई. में मर्चेण्ट एडवेंचर्स नामक सौदागरों के एक समूह के तत्त्वावधान में पूरब के साथ व्यापार करने के लिये एक ब्रिटिश संस्था की स्थापना की गई। 31 दिसम्बर 1600 को इंग्लैण्ड की महारानी एलिजाबेथ (1558-1603 ई.) ने लन्दन के इन व्यापारियों को पूरब के साथ व्यापार करने का अधिकार-पत्र प्रदान किया। इसी अधिकार-पत्र द्वारा इंग्लैण्ड की ईस्ट इंडिया कम्पनी स्थापित हुई। महारानी स्वयं इस कम्पनी की हिस्सेदार बन गई। 1601 ई. में इस कम्पनी के पहले जहाज ने इण्डोनेशिया के लिये व्यापारिक यात्रा आरम्भ की।

हॉकिन्स की जहाँगीर से भेंट

24 अगस्त 1608 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी का पहला जहाज हैक्टर सूरत के मामूली से बन्दरगाह पर आकर लगा। इस जहाज का कप्तान विलियम हॉकिन्स नाविक कम, लुटेरा अधिक था। हॉकिन्स, मुगल बादशाह जहाँगीर से भेंट करने आगरा पहुँचा। मुगल दरबार में पुर्तगालियों का प्रभाव था। उन्होंने हॉकिन्स का प्रबल विरोध किया। इस कारण हॉकिन्स मुगल दरबार से विशेष व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करने में असफल रहा किंतु जहाँगीर यूरोप के विभिन्न देशों से आ रहे गोरे व्यापारियों को भारत में बने रहने देना चाहता था ताकि भारत में व्यापारिक गतिविधियाँ चलती रहें। इसलिये जहाँगीर ने हॉकिन्स को 400 का मनसब तथा एक जागीर प्रदान की। बाद में पुर्तगाली षड़यंत्र के कारण हॉकिन्स को आगरा से निकाल दिया गया। हॉकिन्स की दृष्टि में बादशाह जहाँगीर इतना धनवान और सामर्थ्यवान था कि उसकी अपेक्षा इंग्लैण्ड की रानी अत्यंत साधारण सूबेदारिन से अधिक नहीं ठहरती थी।

पुर्तगालियों से झगड़ा

1612 ई. में पाल केनिंग, इंग्लैण्ड के राजा जेम्स (प्रथम) का पत्र लेकर मुगल दरबार में उपस्थित हुआ परन्तु उसे भी पुर्तगालियों के विरोध के कारण मुगल दरबार में सफलता नहीं मिली। इस पर अँग्रेजों ने पुर्तगालियों से निबटने का निश्चय किया। उन्होंने पहले 1612 ई. में और बाद में 1614 ई. में पुर्तगालियों को युद्ध में परास्त किया तथा सूरत के समुद्री क्षेत्र से पुर्तगाली जहाजों को मार भगाया। इससे बादशाह जहाँगीर को ईस्ट इण्डिया कम्पनी की नौ-सैनिक शक्ति का अनुमान हो गया। जहाँगीर स्वयं भी पुर्तगालियों पर अंकुश रखने के लिये एक मजबूत नौसेना का गठन करना चाहता था। जहाँगीर को लगा कि आवश्यकता हुई तो निकट भविष्य में अँग्रेजी नौसेना को मुगलों की सहायता के लिये काम में लिया जा सकेगा। इसलिये जब 1615 ई. के प्रारम्भ में विलियम एडवर्ड, राजा जेम्स (प्रथम) का पत्र लेकर मुगल दरबार में उपस्थित हुआ तो जहाँगीर ने अन्य विदेशी व्यापारियों की भाँति ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भी भारत में बस्तियाँ बसाने तथा व्यापार करने की अनुमति दे दी।

सर टॉमस रो जहाँगीर के दरबार में

यद्यपि जहांगीर से प्राप्त अनुमति, अँग्रेजों की बड़ी सफलता थी किंतु अँग्रेज इस अनुमति से संतुष्ट नहीं थे। वे अपने लिये दूसरे विदेशियों की तुलना में अधिक रियायतें एवं विशेषाधिकार चाहते थे। 1615 ई. में सर टॉमस रो ने अजमेर में जहाँगीर के समक्ष उपस्थित होकर भारत में व्यापार करने के लिये विशेषाधिकार मांगे। वह तीन वर्ष तक मुगल दरबार में उपस्थित होता रहा। फिर भी, उसे पर्याप्त सफलता नहीं मिली। इस पर अँग्रेजों ने लाल सागर एवं मक्का जाने वाले भारतीय जहाजों को तंग करना आरम्भ किया। अँग्रेजों की समुद्री शक्ति का अनुमान लगाते हुए जहाँगीर ने अँग्रेजों को सम्पूर्ण मुगल राज्य में व्यापार करने की अनुमति प्रदान कर दी। विशेषाधिकारों के सम्बन्ध में जहाँगीर ने टॉमस रो को केवल इतना ही आश्वासन दिया कि जितने विशेषाधिकार और किसी विदेशी को मिलेंगे उतने अँग्रेजों को भी दिये जायेंगे। शीघ्र ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी के दो जहाज प्रति माह भारत आने लगे। वे जो माल इंग्लैण्ड ले जाते थे वह अत्यधिक ऊंचे दामों पर बिकता था।

व्यापार, न कि भूमि

बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि भारत में आने के बाद लगभग 150 वर्षों तक अंग्रेज व्यापारी ही बने रहे। यह सही है कि इस काल में उन्होंने व्यापार, न कि भूमि की नीति अपनाई किंतु यह बात सही नहीं है कि इस काल में वे नितांत व्यापारी बने रहे। वास्तविकता यह है कि कम्पनी अपने व्यापार को तलवार की छाया में बढ़ा रही थी ताकि आवश्यकता होने पर वे देशी शक्तियों पर नियंत्रण स्थापित कर अपना व्यापार निरापद रूप से चला सकें।

1619 ई. में सर टॉमस रो ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को सलाह दी- ‘मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि इन लोगों (अर्थात् भारतीयों) के साथ सबसे अच्छा व्यवहार तभी किया जा सकता है जब एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में संवादवाहक की छड़ी हो।’

पूरे 150 साल तक अँग्रेज शक्ति इस सलाह पर अमल करती रही।

कारखानों एवं बस्तियों की स्थापना

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापारिक केन्द्रों को फैक्ट्री अथवा कारखाना कहा जाता था किंतु इन कारखानों में किसी प्रकार की मशीनें नहीं लगाई गई थीं और न ही इन स्थानों पर किसी प्रकार का उत्पादन होता था। ये कारखाने केवल व्यापारिक गोदाम का काम करते थे। देश के अलग-अलग भागों में कम्पनी ने छोटी-छोटी बस्तियाँ स्थापित कीं जहाँ विदेशों से लाये गये सामान तथा यूरोप को ले जाये जाने वाले सामान का भण्डारण किया जाता था। इन्हीं बस्तियों में अँग्रेज अधिकारी और भारतीय नौकर रहते थे। जैसे-जैसे कम्पनी का व्यापार बढ़ा, अँग्रेजी बस्तियों का आकार भी बढ़ता गया। इन बस्तियों की रक्षा कम्पनी स्वयं करती थी। इस प्रकार, कम्पनी की सेना का संगठन प्रारम्भ हुआ।

ईस्ट इंडिया कम्पनी ने सर्वप्रथम सूरत में अपनी बस्ती स्थापित की। 1631 ई. में मछलीपत्तम् में पहली कोठी स्थापित की गई। पूर्वी भारत में कम्पनी ने अपने पहले कारखाने 1633 ई. में उड़ीसा में खोले। उन्होंने एक कोठी बालासोर में तथा दूसरी कोठी हरिपूर में, जो कटक से 25 मील दक्षिण-पश्चिम में है, खोली। 1640 ई. में कम्पनी ने चन्द्रगिरी के राजा से मद्रास के निकट का क्षेत्र खरीदकर वहाँ सेण्ट जॉर्ज फोर्ट का निर्माण करवाया। 1651 ई. में बंगाल में हुगली नामक स्थान पर एक अँग्रेजी कारखाना खोला गया। 1661 ई. में इंग्लैण्ड के राजा चार्ल्स (द्वितीय) ने पुर्तगाल की राजकुमारी (बेग्रांजा की कैथरीन) के साथ विवाह किया। इस अवसर पर पुर्तगाल के राजा ने बम्बई का पुर्तगाली क्षेत्र, चार्ल्स को दहेज में दे दिया। चार्ल्स ने यह क्षेत्र ईस्ट इंडिया कम्पनी को किराये पर दे दिया।

बंगाल में व्यापार करने की विशेष आज्ञा

1652 ई. में बंगाल के सूबेदार शहजादा शुजा ने अँग्रेजों को एक निशान (विशेष आदेश) लिखकर दिया जिसके अनुसार सब तरह की चुंगी और अन्य करों के बदले अँग्रेजों द्वारा प्रतिवर्ष तीन हजार रुपये देते रहने पर अँग्रेजों को बंगाल में व्यापार करने दिया जाये। उन दिनों यूरोप से आने वाले समस्त जहाजों का माल बालसोर में उतारा जाता था।

फ्रांसीसियों का आगमन

भारत में फ्रांसीसियों का आगमन सबसे पीछे हुआ। 1604 से 1619 ई. के मध्य फ्रांस की सरकार ने दो बार फ्रेंच ईस्ट इंडिया कम्पनी स्थापित की किन्तु ये कम्पनियाँ असफल रहीं। लुई चौहदवें के शासनकाल में उसके मंत्री कालबर्ट ने 1644 ई. में तीसरी बार फ्रेंच ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना की। इस कम्पनी को व्यापार के साथ-साथ भारत में उपनिवेश स्थापित करने तथा ईसाई धर्म का प्रसार करने का काम भी सौंपा गया। इस कम्पनी ने 1668 ई. में सबसे पहले सूरत में अपना पहला व्यापारिक केन्द्र स्थापित किया। कम्पनी ने 1669 ई. में मछलीपत्तम् में और 1674 ई. में पाण्डिेचेरी में अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापति कीं। इसी समय कलकत्ता से 16 मील दूर चन्द्रनगर में भी फ्रांसीसी बस्ती स्थापित की गई जहाँ से सूती और रेशमी वस्त्र खरीदकर यूरोपीय देशों को भेजे जाते थे। 1672 से 1678 ई. के मध्य, यूरोप में फ्रांस और नीदरलैण्ड के बीच युद्ध चला। 1693 ई. में भारत में डचों ने पॉण्डिचेरी को जीत लिया किन्तु यूरोप में शान्ति हो जाने के बाद डचों ने पॉण्डिचेरी फिर से फ्रैंच कम्पनी को लौटा दिया। फ्रांस का शासक लुई चौदहवाँ आजीवन युद्धों में व्यस्त रहा जिसके कारण फ्रांसीसी कम्पनी की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि वह व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में अन्य कम्पनियों के समक्ष खड़ी नहीं रह सकी। इस कारण 1720 ई. में नई फ्रेंच कम्पनी स्थापित करके उसे पर्याप्त आर्थिक सहायता दी गई।

इस फ्रेंच कम्पनी ने भारत में प्रगति की। उसका व्यापार बढ़ने लगा इस कारण कम्पनी ने कुछ दूसरे स्थानों पर भी अपने व्यापारिक केन्द्र खोले। 1721 ई. में कारोमण्डल तट पर स्थित मॉरीशस द्वीप पर तथा 1725 ई. में मलाबार तट पर स्थित माही पर अधिकार हो जाने से फ्रांसीसियों की समुद्री शक्ति सुदृढ़ हो गई।

पुर्तगाली, डच, अँग्रेज और फ्रांसीसी

यूरोप से पुर्तगाली, डच, अँग्रेज और फ्रांसीसी जातियाँ भारत आयीं। ये चारों जातियाँ यूरोप में एक दूसरे के रक्त की प्यासी थीं और एक दूसरे को नष्ट करने पर तुली हुई थीं। पूर्वी मसाला द्वीपों और भारत में व्यापारिक एकधिकार स्थापित करने के लिये भी इन देशों ने समुद्र से लेकर भारत की भूमि पर रक्त रंजित संघर्ष किया। इन कम्पनियों के लिये व्यापारकि प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिये यह आवश्यक हो गया कि सशस्त्र संघर्ष करके अपने-अपने क्षेत्रों का विस्तार करें। इस खूनी संघर्ष में अँग्रेजों ने पुर्तगालियों और डचों को पछाड़कर अपनी स्थित सुदृढ़ कर ली। फ्रांसीसियों के भारत आगमन के बाद अँग्रेजों एवं फ्रांसीसियों में व्यापारिक प्रतिस्पर्धा आरम्भ हुई। 18वीं शताब्दी के मध्य से यह व्यापारिक प्रतिस्पर्धा, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में बदलने लगी। भारत की अस्थिर राजनीतिक स्थिति तथा केन्द्रीय सत्ता की अवनति ने अँग्रेजों एवं फ्रांसिसियों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को जागृत कर दिया और उन्होंने भारत के देशी राज्यों के पारस्परिक संघर्षों तथा राज्यों में सत्ता के लिए होने वाले उत्तराधिकार के झगड़ों में भाग लेना आरम्भ कर दिया। इस प्रकार वे भारत में राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने लगे। दक्षिण भारत की राजनीतिक अराजकता का लाभ उठाने के लिये अँग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच तीन युद्ध लड़े गये जो कर्नाटक के युद्ध कहलाते हैं। इनका विवरण आगे के अध्यायों में दिया गया है। तृतीय कर्नाटक युद्ध में अँग्रेजों को निर्णायक सफलता मिली। इसके बाद अँग्रेजों ने भारत में उपस्थित अन्य विदेशी शक्तियों को परास्त किया और अंत में देशी शक्तियों को परास्त करके भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने में सफल हो गये।

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