Tuesday, October 26, 2021

9. बचपन में ही बूढ़ा हो गया था बाबर!

तुर्को-मंगोल वंश में उत्पन्न मिर्जा उमर शेख तैमूर लंग का चौथा वंशज था। मिर्जा उमर शेख भी अपने बाप-दादों की तरह परम असंतोषी था। उसे समरकंद के विशाल राज्य में स्थित फरगना नामक एक छोटा सा क्षेत्र शासन करने के लिए मिला था किंतु मिर्जा उमर शेख अपने छोटे राज्य और अल्प साधनों से संतुष्ट नहीं था। अपने बड़े भाई अहमद मिर्जा से उसकी गहरी शत्रुता थी जो समरकंद और बुखारा का शासक था।

मिर्जा उमर शेख का विवाह कुतलुग निगार खानम नामक औरत से हुआ था जो मंगोल सम्राट चंगेज खान की तेरहवीं पीढ़ी में थी। मिर्जा उमर शेख और कुतलुगनिगार खानम के कुल आठ संतानें हुई जिनमें जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर सबसे बड़ा था। इस प्रकार बाबर की धमनियों में मध्य ऐशिया के दो खूंखार आक्रांताओं- चंगेज खाँ और तैमूर लंगड़े के खून का संगम हो गया।

मिर्जा उमर शेख बहुत रंगीन तबियत का आदमी था और सदा मौज-मस्ती में डूबा रहता था। 8 जून 1494 को जब मिर्जा उमर शेख कबूतर उड़ा रहा था तो उसके ऊपर एक मकान आ गिरा और उसी समय उसकी मृत्यु हो गयी। बाप की आकस्मिक मौत के कारण मात्र ग्यारह साल चार महीने का बाबर फरगना का शासक हुआ। इतिहासकारों ने उसे ‘अकाल प्रौढ़ बालक’ कहा है। अर्थात् जिम्मेदारियों के बोझ के कारण वह अपने बचपन में ही बूढ़ा हो गया था और अपने बाप-दादाओं से भी बढ़कर महत्वाकांक्षी एवं दुस्साहसी था।

मिर्जा उमर शेख के मरते ही बाबर के तीन दुश्मनों ने अलग-अलग दिशाओं से बाबर के फरगना राज्य पर आक्रमण कर दिया। इनमें से एक तो बाबर का सगा ताऊ अहमद मिर्जा था और दूसरा बाबर का सगा मामा महमूद खाँ था। काशनगर के सुल्तान ने भी फरगना का कुछ हिस्सा दबा लिया। बाबर की नानी ऐसान दौलत बेगम ने बाबर को समस्त विपत्तियों से बचाया जिसके कारण बाबर के दुश्मन मैदान छोड़कर भाग गये। ऐसान दौलत बेगम के कहने पर बाबर ने अपने ताऊ अहमद मिर्जा को संदेश भिजवाया कि मैं आपकी अधीनता स्वीकार करने को तैयार हूँ अतः आप मेरे राज्य पर आक्रमण नहीं करें किंतु अहमद मिर्जा फरगना की ओर बढ़ता रहा। इस पर बाबर भी अपनी छोटी सी सेना लेकर अहमद मिर्जा के मार्ग में जा बैठा। बाबर के भाग्य से अहमद मिर्जा मार्ग में ही बीमार हो गया जिसके कारण उसे युद्ध किए बिना ही समरकंद वापस लौट जाना पड़ा। बाबर भी अपनी सेना सहित फरगना लौट आया।

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इसके बाद बाबर ने अपने मामा महमूद खाँ को अक्षी के कड़े युद्ध में परास्त किया। दो शत्रुओं से निबटने के बाद बाबर ने काशनगर की सेना पर आक्रमण किया तथा उसे बुरी तरह परास्त किया। इस प्रकार बाबर को तीनों शत्रुओं से छुटकारा मिल गया तथा उसकी आरम्भिक कठिनाइयां दूर हो गईं। ई.1496 में समरकंद के शासक अहमद मिर्जा की मृत्यु हो गई तथा उसके पुत्रों में समरकंद पर अधिकार को लेकर उत्तराधिकार का युद्ध आरम्भ हो गया। यद्यपि बाबर इस समय लगभग चौदह वर्ष का ही हुआ था तथापि उसने समरकंद की स्थिति का लाभ उठाने के लिए अपने पूर्वजों की राजधानी समरकंद पर आक्रमण कर दिया किंतु वह समरकंद पर अधिकार नहीं कर सका।

अगले ही वर्ष अर्थात् ई.1497 में बाबर ने एक बार पुनः समरकंद पर आक्रमण किया। इस बार बाबर समरंकद पर अधिकार करने में सफल हो गया किंतु कुछ ही समय बाद बाबर को समरकंद खाली करना पड़ा। संभवतः शैबानी खाँ द्वारा समरकंद पर हमला किए जाने के कारण ऐसा हुआ। शैबानी खाँ एक उज्बेक नेता था और तैमूर के वंशजों से मध्य-एशिया छीनने के अभियान पर था। शैबानी खाँ ने तैमूरी बादशाहों के बहुत से राज्य छीन लिए। इस कारण शैबानी खाँ बाबर के लिए भी बड़ी चुनौती बन गया।

बाबर को समरकंद तो खाली करना पड़ा किंतु उसी अभियान के दौरान बाबर की मौसी हबीबा सुल्तान बेगम अपनी पुत्री मासूमा को लेकर बाबर के शिविर में आई और उसने बाबर से शरण मांगी। हबीबा सुल्तान बेगम बाबर की मौसी तो थी ही, साथ ही वह बाबर की ताई भी थी। वह बाबर के मरहूम ताऊ अहमद मिर्जा की बेवा थी। बाबर ने अपने मौसी एवं ताई हबीबा को न केवल अपने हरम में शरण दी अपितु उसकी पुत्री मासूमा से निकाह भी कर लिया।

ई.1501 में बाबर ने पुनः समरकंद पर हमला किया जिसके कारण शैबानी खाँ को समरकंद खाली करके भाग जाना पड़ा। यह बाबर की बहुत बड़ी विजय थी जिसके कारण बाबर ने अपनी पत्नी मासूमा को अपने लिए भाग्यशाली समझा किंतु यह जीत बहुत कम समय तक ही टिकी रह सकी। शैबानी खाँ फिर से एक विशाल सेना लेकर आया और समरकंद पर चढ़ बैठा। सर-ए-पुल की लड़ाई में शैबानी खाँ की सेना ने बाबर की सेना को परास्त कर दिया। इस कारण केवल एक सौ दिन के अधिकार के बाद समरकंद पुनः बाबर के हाथ से निकल गया।

इस बार शैबानी खाँ ने समरकंद के साथ-साथ बाबर की राजधानी फरगना पर भी अधिकार कर लिया तथा बाबर को बंदी बना लिया। बाबर ने अपनी बहिन खानजादः बेगम का विवाह शैबानी खाँ से करके कैद से मुक्ति पायी और बे-घरबार हो कर पहाड़ों मंे भाग गया। पूरे तीन साल तक बाबर अपने मुट्ठी भर साथियों के साथ पहाड़ों और जंगलों में भटकता रहा। इस दौरान उसके घोड़े मर गये, जूते फट गये और वह दाने-दाने को मोहताज हो गया। वह मीलों दूर तक पैदल चलकर किसी गाँव तक जाता तथा किसी तरह दो जून रोटी का जुगाड़ करता।

इस समय दुनिया में कोई भी बाबर का सहायक नहीं था। इसलिये वह दुनिया की दो क्रूरतम प्रबल शक्तियों का वंशज होने के उपरांत भी किसी को अपना नाम तक नहीं बताता था। उसके मुट्ठी भर साथी ही उसके बारे में जानते थे कि वह कौन था और कहाँ रहता था! एक दिन पहाड़ियों में भटकता हुआ भूखा-प्यासा बाबर अपने कुछ साथियों के साथ दिखकाट नामक गांव में पहुंचा।

किसी समय यह गांव बाबर के दादा अबू सईद मिर्जा की सल्तनत में हुआ करता था जिसकी राजधानी समरकंद थी। जब बाबर का पिता मिर्जा उमर शेख फरगना का शासक बना तो अबू सईद मिर्जा ने यह गांव फरगना राज्य में शामिल कर दिया। जब बाबर फरगना का बादशाह बना तो दिखकाट गांव बाबर के अधीन हो गया। आज उसी गांव में बाबर वेश बदलकर पहुंचा ताकि किसी तरह पेट भरने का जुगाड़ कर सके। बाबर को ज्ञात था कि इस गांव का मुखिया उसके पिता का विश्वासपात्र हुआ करता था। इसलिए बाबर ने उसी मुखिया से मदद लेने का निश्चय किया। गांव के लोगों से पूछताछ करते हुए बाबर और उसका एक साथी गांव के मुखिया के घर तक पहुंचे। मुखिया तो घर में नहीं था किंतु घर के बाहर एक बुढ़िया बैठी थी। बाबर तथा उसका साथी बुढ़िया का अभिवादन करके चुपचाप खड़े हो गये।

बुढ़िया ने अजनबियों को घर के दरवाजे पर खड़े देखा तो पूछा कि तुम कौन हो और क्या चाहते हो! बाबर ने अपना असली परिचय छिपा लिया तथा राहगीर होने का वास्ता देकर खाने के लिए कुछ मांगा। बुढ़िया ने कहा कि यदि तुम यहाँ पड़ी लकड़ियों को चीर दो तो मैं तुम्हें खाने के लिए दे सकती हूँ। बाबर और उसके साथियों ने बुढ़िया की बात मान ली तथा लकड़ियां चीर दीं। बुढ़िया ने उन दोनों को भरपेट रोटियाँ खिलाईं।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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