Monday, May 20, 2024
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205. बाबर के आखिरी वंशज ने रात के अंधेरे में लाल किला छोड़ दिया!

17 सितम्बर 1857 का सूरज निकलने से पहले ही बादशाह बहादुरशाह जफर लाल किले के पानी वाले दरवाजे से होकर यमुनाजी की तरफ निकल गया। उसने वजीरे आजम और बेगम जीनत महल को भी अपने जाने के बारे में सूचना नहीं दी। बादशाह के साथ कुछ विश्वसनीय सेवक थे जो बादशाह का खजाना अपने कंधों पर उठाए हुए थे।

बादशाह ने खानदानी खजाने की कुछ चुनी हुई चीजें अपने साथ ली थीं जिनमें कुछ बहुमूल्य शाही जेवरात, व्यक्तिगत स्वामित्व के कागज, उनकी पूरी सूची और एक पालकी थी। जब सूरज निकला तो बादशाह एक कश्ती में बैठकर अपनी मंजिल की ओर रवाना हो गया। कुछ देर बाद वह यमुना नदी के पुराने किले के घाट की तरफ उतरा।

बादशाह समझ रहा था कि उसे किले से निकलते हुए कोई नहीं देख रहा है किंतु वह गलत था। हॉडसन के कुछ जासूस चौबीसों घण्टे बादशाह पर दृष्टि रखते थे और पल-पल की खबर हॉडसन तक भिजवाते थे। कहने की आवश्यकता नहीं कि इन जासूसों ने इस सूचना को हॉडसन तक पहुंचाने में कितनी शीघ्रता की होगी!

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

बादशाह शाहजहानाबाद से तीन मील दूर र्दिक्षण में ख्वाजा निजामुद्दीन की दरगाह पर पहुंचा। उसने अपना सारा खजाना निजामी खानदान के वारिसों के पास अमानत के तौर पर रख दिया जिसमें एक संदूक उन पवित्र चीजों का था जिनके बारे में दुनिया के बहुत कम लोग जानते थे। इस सामग्री में पैगम्बर की दाढ़ी के तीन पवित्र बाल भी थे जो तैमूरी खानदान में चौदहवीं सदी से बाप से बेटे को पवित्र विरासत के रूप में मिलते रहे थे और जफर को उनसे बेहद लगाव था। महल की डायरी और दूसरे संदर्भों से पता चलता है कि विशेष अवसरों पर बहादुरशाह जफर स्वयं अपने हाथों से उन पवित्र बालों को गुलाबजल से धोता था।

यह समस्त सामग्री निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर सुरक्षित रख देने के बाद बादशाह ने दरगाह में अपनी और अपने परिवार की सलामती के लिए दुआ मांगी। दरगाह के पीरजादे ने बादशाह को बहुत साधारण नाश्ता करवाया।

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नाश्ता करने के बाद बादशाह फूट-फूट कर रोने लगा तथा पीरजादा से कहने लगा- ‘मैं हमेशा से जानता था कि ये बागी हमारे सिर पर मुसीबत लाएंगे। मुझे शुरू से ही बहुत से अंदेशे थे और अब वे सब सच साबित हो रहे हैं। ये सिपाही अंग्रेजों के सामने भाग खड़े हुए। हालांकि मैं एक दरवेश हूँ और मेरा मिजाज सूफियाना और फकीराना है लेकिन मेरी रगों में जो अजीम खून दौड़ रहा है, वह मुझे खून की आखिरी बूंद तक लड़ने के लिए तैयार रखेगा। मेरे बुजुर्गों ने इससे भी ज्यादा बुरे दिन देखे थे लेकिन वे कभी हिम्मत नहीं हारे। लेकिन मैंने किस्मत का लिखा पढ़ लिया है। मुझे अपनी नजरों के सामने यह मुसीबत नजर आ रही है जो मेरी नस्ल की शान को खत्म कर देगी और अब कोई शक नहीं रहा कि मैं तैमूर घराने का आखिरी हूँ जो हिंदुस्तान के तख्त पर बैठा। मुगल हुकूमत का चिराग भड़क रहा है तथा सिर्फ चंद घंटे और रौशन रहेगा। जब मुझे यह मालूम है तो मैं क्यों बेकार का और खून बहने की वजह बनूं! इसलिए मैंने किला छोड़ दिया। अब यह मुल्क खुदा के हवाले है और यह उसकी मिल्कियत है। वह जिसे चाहे सौंपे।’

इसके बाद बादशाह अपनी पालकी में बैठकर अपने गर्मियों के महल को चल दिया जो महरौली में कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के पास स्थित था। वहीं पर उसे प्रधान सेनापति बख्त खाँ मिलने वाला था। बादशाह अभी थोड़ी दूर ही गया था कि इलाही बख्श घोड़ा दौड़ाता हुआ बादशाह के पास आया और बादशाह से कहने लगा कि गूजरों का एक गिरोह रास्ते में हर एक को लूट रहा है जैसा उन्होंने पहले अंग्रेजों के साथ किया था।

विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि इलाही बख्श ने जो कहा था, वह सच था किंतु जफर को मालूम नहीं था कि इलाही बख्श हॉडसन का वेतनभोगी कर्मचारी था और वह हॉडसन के कहने पर ही बाहदशाह को ढूंढता हुआ वहाँ आया था।

बादशाह अंग्रेजों के हाथों में पड़ने से बचता फिर रहा था और हॉडसन अपना खेल खेल रहा था। वह भी नहीं चाहता था कि बादशाह अंग्रेजों के हाथों में पड़ जाए। वह बादशाह को एक सुरक्षित स्थान में जाकर छिप जाने देना चाहता था ताकि समय आने पर वह बादशाह को गिरफ्तार करके कम्पनी सरकार के सामने स्वयं को अत्यंत योग्य अधिकारी सिद्ध कर सके।

विलियम हॉडसन ने बेगम जीनत महल से एक गुप्त समझौता समय रहते ही कर लिया था कि जब भी बागियों का अंत हो जाएगा तो बादशाह तथा बेगम को विलियम हॉडसन के समक्ष आत्मसमर्पण करना पड़ेगा। इसके बदले में विलियम हॉडसन कम्पनी सरकार से यह वचन लेगा कि कम्पनी सरकार बादशाह बहादुरशाह जफर, बेगम जीनत महल, शहजादे जवांबख्त और जीनत के पिता मिर्जा कुली खाँ की जान नहीं लेगी।

इस समझौते में बहादुरशाह जफर की अन्य बेगमों एवं उनके पुत्रों का कोई उल्लेख नहीं था किंतु यह बात न तो बादशाह को पता थी और न कम्पनी सरकार के किसी अन्य अधिकारी को। इसलिए बादशाह विचार कर रहा था कि वह अपने प्रधान सेनापति बख्त खाँ से मिलकर उसकी सहायता से दिल्ली से बाहर चला जाए।

यही कारण था कि बादशाह ने इलाही बख्श की बात नहीं मानी और कुतुब साहब की दरगाह की तरफ बढ़ना जारी रखा किंतु जब इलाही बक्श ने कहा कि बेगम जीनत महल ने हॉडसन से सारी बातें तय कर ली हैं तथा बेगम जीनत महल भी निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर पहुंचने वाली हैं तो बादशाह वापस निजामुद्दीन की दरगाह की तरफ मुड़ गया। कुछ देर बाद बेगम जीनत महल निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर आई तथा बादशाह को लेकर हुमायूँ के मकबरे पर चली गई जो निजामुद्दीन की दरगाह से अधिक दूर नहीं था।

पाठकों की सुविधा के लिए यह बता देना समीचीन होगा कि हुमायूँ का मकबरा एक विशाल भवन है जिसमें मुगल बादशाहों, बेगमों, शहजादियों की कब्रें बनी हुई हैं। इनकी संख्या इतनी अधिक है कि इसे मुगलों का कब्रिस्तान भी कहा जाता है। इस मकबरे का निर्माण सोलहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में अकबर के शासन काल में हुआ था। बहादुरशाह जफर के समय की दिल्ली में इससे बड़ा और इससे शानदार भवन और कोई नहीं था।

बादशाह ने हुमायूँ के मकबरे पर पहुंचकर लाल किले में स्थित अपने विश्वसनीय अधिकारी के नाम गुप्त संदेश भेजा कि वह बादशाह के हाथी, हकीम अहसनुल्लाह की हवेली पर भेज दे तथा हकीम अहसनुल्लाह से कहे कि वह शाही खानदान के पास मकबरे पर आ जाए। इसके बाद बादशाह अपने पूर्वजों के मकबरे के अंदर के तहखाने में इंतजार और दुआ करने चला गया।

इधर तो यह सब घटनाएं हो ही रही थीं और उधर पूरी दिल्ली में यह सूचना आग की तरह फैल गई कि बहादुरशाह जफर ने आखिर वही कर दिखाया जिसे करने की धमकी वह लम्बे समय से दे रहा था। अर्थात् वह किला छोड़कर ख्वाजा कुतुब की दरगाह पर चला गया। जनता यही समझती थी कि बादशाह कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह पर गया है क्योंकि बादशाह कहाँ है, इस सूचना को बहुत सावधानी के साथ गुप्त रखा गया था।

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