Thursday, May 30, 2024
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206. अंग्रेजों ने लाल किले में रहने वालों को तीतरों की तरह मार डाला!

अब बहादुरशाह जफर और उसका परिवार पूरी तरह से हॉडसन के जाल में फंस चुका था। बादशाह यह समझ रहा था कि वह अंग्रेजों को चकमा देकर लाल किले से निकलने में सफल रहा है किंतु वास्तविकता यह थी कि वह हॉडसन का बंदी हो गया था। एक मासूम परिंदा बहेलिये के जाल में बंद था और मासूमियत की इन्तिहां यह थी कि परिंदा समझ रहा था कि बहेलिया कभी भी उस तक नहीं पहुंच सकता।

विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि बहादुरशाह जफर की क्रांतिकारी सेनाओं के मुख्य सेनापति बख्त खान तथा अन्य क्रांतिकारियों ने बादशाह से अनुरोध किया कि वे भी बादशाह के साथ हुमायूँ के मकबरे में रहेंगे ताकि बादशाह की रक्षा की जा सके किंतु बादशाह का विचार था कि ऐसा करना अधिक खतरनाक होगा क्योंकि अंग्रेज अधिकारी तो क्रांतिकारी सैनिकों से बदला लेने के लिए उन्हें खोज रहे हैं, इसलिए अंग्रेज अधिकारी बादशाह तथा उसके परिवार को नहीं मारेंगे। इस प्रकार हुमायूँ के मकबरे में बादशाह और उसका परिवार बिना किसी सिपाही के अकेले ही रह गए।

वीर सावरकर ने लिखा है कि सेनापति बख्त खाँ ने बादशाह को सुझाव दिया था कि वह क्रांतिकारियों के साथ दिल्ली से बाहर निकल जाए क्योंकि आत्मसमर्पण करने से बेहतर होगा कि हम लड़ते हुए मरें किंतु बादशाह ने बख्त खाँ का यह निमंत्रण अस्वीकार कर दिया और हुमायूँ के मकबरे में जाकर छिप गया तथा मिर्जा इलाही बख्श का परामर्श मानकर अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण करने पर विचार करने लगा।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

जब दिल्ली की बची खुची जनता को यह ज्ञात हुआ कि बादशाह और बेगमें भी लाल किला छोड़कर भाग गए तो दिल्ली से जन साधारण के पलायन की गति और तेज हो गई। विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि दिल्ली की जनता में यह सूचना फैल गई कि दिल्ली से बाहर निकलने वालों को गूजर और मेवाती मार रहे हैं तो दिल्ली के लोग अजमेरी दरवाजे से निकलने की बजाय कश्मीरी दरवाजे की तरफ बढ़े क्योंकि बहुत से लोगों को लगता था कि उन्हें अंग्रेजों की बजाय गूजरों और मेवातियों से अधिक खतरा है।

जब कश्मीरी दरवाजे पर नियुक्त अंग्रेज सिपाहियों ने देखा कि दिल्ली की जनता उनकी तरफ भागी आ रही है तो अंग्रेजों ने उन पर गोलियों की ताबड़तोड़ बौछार कर दी। इससे बहुत से निरपराध लोग मारे गए। अंग्रेज सिपाहियों द्वारा इन लोगों की तलाशी ली गई तथा उनके समस्त जेवर एवं रुपए छीन लिए गए।

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बहुत से दिल्ली वासियों ने दिल्ली से बाहर निकलकर प्रायः वही रास्ते पकड़े जिन पर चार महीने पहले अंग्रेज भागे थे। अर्थात् करनाल एवं मेरठ की ओर जाने वाले रास्ते।

हैरियट टाइटलर नामक एक अंग्रेज औरत जो 11 मई को स्वयं दिल्ली से जीवित बचकर करनाल भागी थी और अब दिल्ली लौट आई थी, उसने लिखा है- ‘कितना दर्दनाक दृश्य था जब औरतों और बच्चों की भीड़ कश्मीरी और मोरी दरवाजे से बाहर आ रही थी। इनमें वे औरतें भी थीं जो कभी अपने घरों से बाहर नहीं निकली थीं। जो अपने सहन में भी बस कुछ कदम ही चलती थीं और वे भी अपने नौकरों या घरवालों के साथ। अब उन्हें न केवल यूरोपियन सिपाहियों अपितु अपने लोगों के भी घूरने का सामना करना पड़ रहा था। मुझे उन पर बहुत तरस आ रहा था विशेषकर ऊंची जाति की उन हिन्दू औरतों पर जिनके लिए निचली जाति की औरतों के साथ चलना बहुत तकलीफदेह था।’

18 सितम्बर 1857 को अंग्रेजों ने जामा मस्जिद पर अधिकार कर लिया। अब वे लाल किले से अधिक दूर नहीं रह गए थे। 19 सितम्बर की रात में अंग्रेजों ने लाल किले के सामने मोर्चा बना लिया। इसके लिए दिल्ली बैंक के ध्वस्त भवन के मलबे का उपयोग किया गया।

तोपें जमा दी गईं और उनके पीछे गोला-बारूद रख दिया गया। आसपास के भवनों पर अंग्रेज सिपाहियों को बंदूकों के साथ तैनात कर दिया गया ताकि यदि कोई आदमी किले से बाहर निकलकर आए तो उसे उसी क्षण भून दिया जाए।

सर थॉमस मेटकाफ के जंवाई सर एडवर्ड कैंपबैल ने स्वयं अपनी निगरानी में यह तैयारी करवाई। वह भारत के इतिहास का एक पुराना पन्ना हमेशा के लिए फाड़कर नष्ट करने जा रहा था और एक नया पन्ना लिखने जा रहा था। उसने 20 सितम्बर की सुबह लगभग 10 बजे अपने सिपाहियों को बारूद के कुछ थैले लाल किले के मुख्य दरवाजों के नीचे रखने के लिए दौड़ाया, इन सिपाहियों पर लाल किले से हमला न हो, इसके लिए अंग्रेजों ने किले की तरफ खूब गोलियां बरसाईं।

विलियम हॉडसन को मालूम था कि इस समय किले में अंग्रेजों का सामना करने वाला कोई नहीं है किंतु उसने यह सूचना जानबूझ कर अपने जनरल को नहीं दी। हॉडसन चाहता था कि जनरल कैंपबैल को लगे कि उसने लाल किले को बड़ी मुश्किल से जीता है तथा बादशाह मौके का लाभ उठाकर कहीं फरार हो गया है और बाद में हॉडसन बहादुरशाह को बंदी बनाकर जीत का सारा श्रेय स्वयं ले ले।

हॉडसन ने बड़े आश्चर्य के साथ देखा कि भले ही बहादुरशाह जफर का कोई सिपाही या बख्त खाँ की सेना का कोई सिपाही इस समय लाल किले की रक्षा के लिए आगे नहीं आया किंतु दिल्ली के कुछ सिरफिरे लोग अब भी बंदूकें लेकर लाल किले की रक्षा के लिए खड़े थे जो स्वयं को गाजी कहते थे और इसलिए मृत्यु का वरण करने आए थे कि उन्हें कभी भी वह दिन न देखना पड़े जब अंग्रेज बहादुरशाह को बंदी बनाएं या उसे मार डालें। बादशाह से पहले वे स्वयं मर जाना चाहते थे!

लेफ्टिनेंट फ्रेड मेसी इस आक्रमण में शामिल था। उसने इस आक्रमण का वर्णन अपनी माँ एवं बहनों को लिखे पत्रों में किया है। वह लिखता है कि जैसे ही लाल किले के दरवाजे के पास रखे बारूद के थैलों में विस्फोट हुआ, वैसे ही उस विशालाकाय दरवाजे का एक हिस्सा तेज आवाज के साथ धरती पर गिर पड़ा और हम लोग नारे लगाते हुए किले में घुस गए। हमने लाल किले में दिखाई देने वाले इक्का दुक्का आदमियों को तीतरों की तरह गोलियों से उड़ा दिया।

सदियों से इस धरती पर यही परम्परा रही है, कमजोर को देखकर ताकतवर का गुस्सा और ज्यादा खतरनाक हो जाता है, लाल किले में घुसे अंग्रेज भी इस समय जबर्दस्त गुस्से में थे।

लाल किले के भीतर कुछ लोग ऐसे भी थे जो सैनिक नहीं थे, जिहादी नहीं थे, बादशाह के परिवार के नहीं थे, अपितु तांगा एवं बैलगाड़ी चलाकर रोजी-रोटी कमाने वाले थे। वे लाल किले के महलों में बर्तन मांजते थे, कपड़े धोते थे या फिर झाड़ू-बुहारी करते थे, अंग्रेज सिपाहियों ने अप्रतिम शौर्य का प्रदर्शन करते हुए इन निर्धन और निर्दोष लोगों को मार डाला। मानो इस शौर्य प्रदर्शन से प्रसन्न होकर लंदन में बैठी महारानी विक्टोरिया उन्हें विक्ट्री क्रॉस से सम्मानित करेगी और उन्हें अंग्रेजी पलटन का मेजर जनरल बना देगी।

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