Monday, May 20, 2024
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26. तूर्य

नाग कुमारियों ने आज तूर्य [1] का आयोजन किया था। रानी मृगमंदा ने शिल्पी प्रतनु को भी इसमें सम्मिलित होने का निमंत्रण दिया। सैंधवों में तूर्य आयोजित करने की परम्परा नहीं है इस कारण प्रतनु के लिये इस तरह का आयोजन देखने का पहला ही अवसर था।  रानी मृगमंदा ने बताया कि तूर्य समारोह में नागकन्यायें अपना पति चुनती हैं, इस कारण तूर्य में भाग लेने के लिये दूर-दूर तक बसे नाग विवरों से नाग दम्पत्ति अपनी विवाह योग्य कन्याओं को लेकर आते हैं। विवाह के इच्छुक नाग युवकों को तो वर्ष भर तूर्य की प्रतीक्षा रहती है। तूर्य में नाग राजकुमारी ही मुख्य नृत्यांगना होती है इस कारण रानी मृगमंदा, निऋति अथवा हिन्तालिका में से कोई भी मुख्य नृत्यांगना हो सकती है किंतु निऋिति ने प्रतनु को बताया था कि अतिथि प्रतनु के सम्मान में इस बार के तूर्य में रानी मृगमंदा स्वयं मुख्य नृत्यांगना के रूप में नृत्य करेगीं।

रानी मृगमंदा के प्रासाद के निकट स्थित उपवन में तूर्य का आयोजन किया गया था। सूर्योदय के साथ ही तूर्यनाद हुआ। पांचों वाद्य- नगाड़ा, तंत्री, झांझ, तुरही और शंख एक साथ बज उठे। रानी मृगमंदा पार्वती के अलंकारिक वेश में उपवन के मध्य में प्रकट हुई और विशिष्ट मुद्रा में अंग संचालन करते हुए भगवान शिव को अघ्र्य प्रदान करने लगी। इस समय रानी मृगमंदा का शृंगार देखते ही बनता था। उसने सिर से पैरों तक विभिन्न प्रकार की दिव्य वनस्पतियों से सज्जा कर रखी थी। रानी मृगमंदा की देह पर सजे विविध रंगों के मनोहारी पुष्पों की गंध सम्पूर्ण वातावरण को सुगंधित बनाये दे रही थी। उसके अंग-अंग से ज्योत्सना की धारायें फूट रहीं थीं। नाग कन्या का ऐसा उद्दाम रूप अब से पहले प्रतनु ने नहीं देखा था।

अर्घ्य पूर्ण होते ही तूर्य वादन रूक गया और नागस्वरम् से उत्पन्न स्वरलहरी वातावरण में सुगंधित वायु की तरह प्रसारित हो गयी। अब रानी मृगमंदा ने शिव-नृत्य आरंभ किया। मृगमंदा ने यह नृत्य पूर्वी पर्वतीय प्रदेश से आये एक व्रात्य [2] से सीखा था। नृत्यरत पार्वती को भगवान शिव की प्रतीक्षा में संलग्न दिखाया गया था। आकाश में काली-काली घटायें छा गयीं किंतु भगवान शिव कैलास पर नहीं लौटे। विरहणी पार्वती के रूप में रानी मृगमंदा ने अनेक भाव-भंगिमायें बनाकर दिखायीं। संगीत वादकों ने पार्वती के विरह को प्रदर्शित करने के लिये बांसुरी का अत्यंत मार्मिक उपयोग किया। पार्वती के विरही भाव को चरम तक पहुँचाने के लिये नागफनी और दुर्दुर का भी बहुत सुंदर प्रयोग किया गया।

नभ में स्थित घन घनघोर गर्जन करने लगे, तड़ित चमकने लगी और देखते ही देखते बड़ी-बड़ी बूंदें गिरने लगीं । बादलों की गर्जना उत्पन्न करने के लिये नाग वादकों ने घनवाद्यों का तथा पर्वतों पर गिरने वाली बड़ी-बड़ी बूंदों के प्रहार से उत्पन्न ध्वनि के लिये मृदंग का उपयोग किया। बादलों के घनघोर गर्जन के साथ ही गयासुर डकराने लगा। जिसे सुनकर पार्वती भयभीत होने लगीं। गयासुर के कठोर कर्कश गर्जन के लिये एक साथ कई विशाल ढोल बजाये गये।

हुड्डुक, बंशी तथा मृदंग की स्वरलहरी के साथ त्रिलोकीनाथ शिव प्रकट हुए। प्रतनु ने देखा कि निऋति भगवान शिव के वेश में प्रकट हुई। उसकी नृत्य गति देखते ही बनती थी। शिव के आने पर पार्वती के उपालंभों का क्रम आरंभ हुआ। रुष्ट पार्वती ने भगवान शिव की अभ्यर्थना नहीं की और मुँह फेर कर बैठ गयी। पार्वती को रिझाने के लिये शिव ने कई उपक्रम किये। किंतु पार्वती रुष्ट ही रही। पार्वती की आवाज के लिये करताल तथा खोलवाद्यों का और शिव की आवाज के लिये पाँच मृदंगों का प्रयोग किया गया। पार्वती के रुष्ट बने रहने पर शिव कृत्रिम क्रोध के साथ उठ खड़े हुए और विशिष्ट मुद्रा में ताण्डव करने लगे। नेपथ्य से कृत्रिम क्रोध के भाव उत्पन्न करने वाले शब्द उभरने लगे-

किड़किड़ान   किड़किड़ान   किड़किड़ान

धांधी    किट   धिधि  किट  धान  धान

तत्तड़ान       तत्तड़ान      तत्तड़ान ।

धू धू किट धू धू किट धमधम  धान धान।

तत्तड़ान   तत्तड़ान   तत्तड़ान  तत्तड़ान्।

शिव के कृत्रिम ताण्डव को देखकर पार्वती को हँसी आ गयी और वे प्रसन्न होकर शिव के वाम भाग में सुशोभित हो गयीं। शिव-पार्वती को प्रसन्न मुद्रा में विराजमान हुआ देखकर नाग कन्यायें उनकी अभ्यर्थना के लिये उपस्थित हुईं। इस सामूहिक नृत्य का नेतृत्व हिन्तालिका कर रही थी। अंत में शिव की अभ्यर्थना आरंभ हुई और शिव-पार्वती समस्त नागकन्याओं को मनवांछित वर प्राप्ति का आशीर्वाद देकर अदृश्य हो गये।

अब तूर्य का दूसरा भाग आरंभ हुआ। इस भाग में नागकन्यायें एक-एक करके नृत्य के लिये प्रस्तुत हुईं। जो नागयुवक उस नागकन्या से विवाह के इच्छुक होते वे भी उस नागकन्या के साथ नृत्य के लिये आगे बढ़ते। जो युवक उस नर्तकी के साथ नृत्य करने में असमर्थ रहते, वे पुनः अपने स्थान पर जा कर बैठ जाते। जिस युवक का नृत्य नागकन्या को पसंद आता, उसी युवक के गले में वह पुष्पाहार डाल देती। कुछ नाग कन्याएं और नाग युवक नृत्य में भाग न लेकर बाहर ही अपने युगल बना रहे थे। चारों ओर उल्लास ही उल्लास बिखरा हुआ था। प्रतनु ने बहुत दिन बाद ऐसा उत्सवमय वातावरण देखा था। उसे मोहेन-जोदड़ो के पशुपति महालय के वार्षिकोत्सव का स्मरण हो आया। रोमा का स्मरण हो आने से उसका मन भीगा-भीगा सा हो गया।

रानी मृगमंदा पार्वती का वेश त्यागकर दर्शक दीर्घा में प्रतनु के निकट आ बैठी। इस समय नाग युगलों का नृत्य अपने चरम पर था। रानी मृगमंदा ने परिचारिका को संकेत किया और परिचारिका ने एक वाद्ययंत्र रानी मृगमंदा को लाकर दिया। प्रतनु ने इस तरह का वाद्ययंत्र पहले कभी नहीं देखा था। अत्यंत बारीक और तीक्ष्ण ध्वनि उत्पन्न कर रहा था यह। रानी मृगमंदा सुध-बुध खोकर वाद्ययंत्र संचालित कर रही थी, अचानक नेत्र खोलकर बोली- ‘आप बजायेंगे ?

  – ‘क्या है यह ?

  – ‘इसे नहीं जानते ?’

  – ‘नहीं। पहले कभी देखा नहीं।’

– ‘जब चिच्चिक वृषारव के प्रत्युत्तर में बोलता है, तब अरण्यानी आघाटि की भांति ध्वनि करता हुआ पूजित होता है।” [3] रानी मृगमंदा ने मुस्कुरा कर कहा।

  – ‘क्या अर्थ हुआ इसका!’ रानी मृगमंदा की रहस्यभरी बात प्रतनु समझ नहीं सका।

  – ‘इसका अर्थ यह हुआ कि चिच्चिक और वृषारव के परस्पर संवाद को सुनकर वन के देवता इतने प्रसन्न होते हैं मानो उनका पूजन हो रहा हो और तब वन के देवता जो ध्वनि उत्पन्न करते हैं वैसी ध्वनि आघाटि  [4]नामक इस वाद्ययंत्र में से निकलती है।’

  – ‘चिच्चिक और वृषारव परस्पर क्या संवाद करते हैं ?’

  – ‘वही जो इस समय नृत्य कर रहे युवक-युवतियाँ कर रहे हैं।’

  – ‘ये तो कोई संवाद नहीं कर रहे, केवल नृत्य कर रहे है।’

  – ‘नहीं! ये केवल नृत्य नहीं कर रहे। नृत्य के माध्यम से संवाद कर रहे हैं।’

  – ‘क्या मैं जान सकता हूँ कि वे क्या संवाद कर रहे है।’

  – ‘जब चिच्चिक कहता है कि वृषारव तुम कितना अच्छा गाती हो, क्या मैं भी तुम्हें गीत सुनाऊँ! वृषारव कहती है कि हाँ मैं गाती तो हूँ किंतु तुम्हारे जितना सुंदर नहीं गाती हूँ। इसलिये तुम मुझे अपना गीत अवश्य सुनाओ। इसपर चिच्चिक कहता है कि मैं तुम्हें गीत तब सुनाऊँगा जब तुम भी मेरे साथ गाओ। वृषारव चिच्चिक की बात मान लेती है और दोनों मिलकर गाते हैं। ठीक यही तो इस समय नाग युवक-युवतियाँ एक-दूसरे से कह रहे हैं।’

  – ‘अच्छा! एक बात बताओ, तुमने कहा कि जब चिच्चिक वृषारव के प्रत्युत्तर में बोलता है तो अरण्यानि प्रसन्न होते हैं। क्या इन युवक-युवतियों के परस्पर संवाद से भी अरण्यानि प्रसन्न होते हैं! ‘

  – ‘केवल अरण्यानि ही क्यों, सभी देवता प्रसन्न होते हैं। स्वयं शिव-पार्वती प्रसन्न होकर इन्हें आशीर्वाद देते हैं। क्या मैं भी आपसे एक बात पूछूँ!’

  – ‘हाँ पूछो!’

  – ‘क्या आपने कभी चिच्चिक वृषारव संवाद किया है ?’

  – ‘हाँ!’ प्रतनु ने मुस्कुराकर उत्तर दिया।

  – ‘कहाँ ? अपने पुर में ?’

  – ‘नहीं।’

  – ‘तो ?’

  – ‘राजधानी मोहेन-जो-दड़ो में।’

  – ‘कितनी बार ?’

  – ‘केवल एक बार।’

  – ‘किससे।’

  – ‘एक सैंधव नृत्यांगना से।’

  – ‘क्या अरण्यानि प्रसन्न हुए।’

  – ‘पता नहीं।’

  – ‘क्या भविष्य में उससे पुनः चिच्चिक वृषारव संवाद होने की संभावना है ?’

  – ‘कह नहीं सकता।’

  – ‘आपके मन में अभिलाषा है ?’

  – ‘हाँ है।’

  – ‘कोई और वृषारव आपसे संवाद करना चाहे तो क्या आप उसके लिये चिच्चिक बनेंगे।’

  – ‘कह नहीं सकता।’

  – ‘अर्थात् कर भी सकते हैं और नहीं भी! ‘

  – ‘हाँ! किंतु आप मुझसे इतने सारे प्रश्न क्यों कर रही हैं! प्रतिबंध के अनुसार मैं सारे प्रश्नों के उत्तर दे चुका हूँ।’

  – ‘घबराओ मत अतिथि। ये प्रश्न किसी प्रतिबंध के साथ नहीं जुड़े हुए हैं।’ रानी मृगमंदा ने हँस कर कहा और आघाटि बजाने में व्यस्त हो गयी। सामने मैदान में अधिकांश नाग युवतियाँ अपनी पसंद के युवकों के साथ युगल बना चुकी थीं और अब वे मत्त होकर दुगुने उल्लास से नृत्य कर रही थीं।

  – ‘क्या आप मेरे साथ नृत्य करेंगे शिल्पी ?’ अचानकर रानी मृगमंदा ने आघाटि बजाना रोक कर प्रतनु के सामने प्रस्ताव रखा।

  – ‘किंतु मैं तो एक शिल्पी हूँ।’

  – ‘तो क्या शिल्पी के लिये नृत्य करना वर्जित है ?’

  – ‘नहीं वर्जित तो नहीं, किंतु मुझे नृत्य करना आता ही नहीं। इसी से संकोच होता है।’

  – ‘एक कलाकार के लिये दूसरी कला को अपनाने में संकोच कैसा ? चलो उठो, तुम्हे नृत्य करना मैं सिखाऊंगी।’ रानी मृगमंदा ने हाथ पकड़कर उठा ही दिया प्रतनु को।

एक दिन उसे भी नृत्य करना पडे़गा, ऐसा तो प्रतनु ने कभी नहीं सोचा था। उसने तो आज तक केवल शिल्पकला की ही साधना की थी। नृत्यकला से तो उसका इतना ही सम्बन्ध था कि वह उसे देख सकता था, उसकी प्रशंसा कर सकता था। इससे अधिक कुछ नहीं किंतु आज नृत्यकला से उसका सजीव सम्बन्ध स्थापित होने जा रहा था।

रानी मृगमंदा को फिर से नृत्य हेतु उपस्थित हुआ जानकर नाग युवक-युवतियों का उत्साह दुगुना हो गया। तूर्ण में जैसे नवीन उल्लास आ गया। निऋति और हिन्तालिका भी रानी मृगमंदा की सहायता के लिये आगे आयीं। डगमगाते पदों से रानी मृगमंदा का अनुसरण करता हुआ प्रतनु काफी देर तक झिझकता ही रहा। जाने क्यों बार-बार उसे लगता रहा कि वह नृत्य करने के लिये नहीं बना है। उसे तो बस छैनी-हथौड़ी से  लेना-देना है किंतु साथ ही यह विचार भी मस्तिष्क में चक्कर काट रहा था कि यदि वह नृत्य करना सीख जाये तो रोमा कितना प्रसन्न होगी! फिर यह भी तो पर्याप्त संभव है कि नृत्यकला शिल्पकला के परिमार्जन में सहायक सिद्ध हो। नृत्यरत रोमा की प्रतिमा संभवतः और भी श्रेष्ठ बनी होती यदि स्वयं प्रतिमाकार को नृत्यकला की बारीकियों का ज्ञान होता। अतः प्रतनु प्रयास करने लगा कि रानी मृगमंदा द्वारा बताई जा रही मुद्राओं का वह कुशलता के साथ अनुसरण करे किंतु उसके पद संचालन में आत्मविश्वास का अभाव बना ही रहा।

शिल्पी बार-बार त्रुटि कर रहा था और बार-बार बताने पर भी न तो नृत्य भंगिमा का और न मुद्रा का अनुसरण कर पा रहा था। फिर भी रानी मृगमंदा ने साहस नहीं छोड़ा, वह शिल्पी का उत्साह बढ़ाती रही। निऋति और हिन्तालिका भी पर्याप्त सहायता कर रही थीं। शिल्पी का अभ्यास जारी रहा। अन्त्ततः वह क्षण आया जिसकी प्रतीक्षा रानी मृगमंदा, निऋति और हिन्तालिका पर्याप्त धैर्य के साथ कर रही थीं। शिल्पी के पैर थरथराये और उसे लगा कि उसके पैरों ने नये ढंग से धरा पर रखे जाने की कला सीख ली है। कुछ और समय बीतने पर हस्त संचालन और पद संचालन में भी साम्य होने लगा।

रानी मृगमंदा, निऋति और हिन्तालिका के लिये इतना पर्याप्त था। कुछ देर के विश्राम के पश्चात् रानी मृगमंदा ने वादकों को पुनः संकेत किया। पटह, तन्त्री, झांझ, तुरही, और बांसुरी फिर से बज उठे। रानी मृगमंदा ने शिल्पी की बांह पकड़ी और बहुत ही साधारण रीति से पद संचालित करते हुए नृत्य करने लगी। इस बार रानी मृगमंदा से साम्य बैठाने में शिल्पी को अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ा। जब नृत्य तीव्र होने लगा तो निऋति और हिन्तालिका भी आ गयीं। तीनों नाग राजकुमारियों के साथ नृत्य करते हुए शिल्पी की देह में मानो किसी नर्तक की आत्मा आ बैठी। थोड़ी देर के लिये वह भूल ही गया कि वह तो शिल्पी है, केवल छैनी हथौड़ी के लिये बना है।

शिल्पी के चारों ओर अलौकिक आनंद की स्वर्णिम रश्मियाँ प्रवाहित हो रही थीं। इस आनंद का अनुभव उसे आज से पूर्व कभी नहीं हुआ था। प्रतनु को लगा कि वह अपने स्थूलत्व को त्याग कर तरल हो गया है। किसी पक्षी की भांति मुक्त गगन में उड़ रहा है अथवा वायु में गमन करने वाले किसी अदृश्य शटक पर सवार होकर दिशाओं के मंगलमय उत्स को प्राप्त कर रहा है। उस क्षण उसे किसी का स्मरण नहीं हुआ, यहाँ तक कि रोमा का भी नहीं। जब वह निज अस्तित्व ही विस्मृत किये हुए था तो विश्व के अन्य उपक्रमों को कैसे स्मरण कर पाता! आनंदित होकर नृत्य करता हुआ प्रतनु इस समय केवल इतना ही अनुभव कर रहा था कि वह जन्मजात नर्तक है और युगों से इसी तरह तीनों राजकुमारियों के साथ नृत्यलीन है।


[1] तूर्य शब्द का प्रयोग अलग-अलग काल में अलग-अलग वाद्यों के समूह के लिये किया जाता था। रामायण काल में तूर्य में शंख, दुंदुभि तथा बांसुरी आदि का उपयोग होता था। पाणिनी की अष्टाध्यायी में वीणा वाद्य का तूर्य में विशेष महत्व दिखाया गया है। इस काल में तूर्य में पटह, तन्त्री, झांझ, तुरही तथा शंख का प्रयोग होता था। इस कारण इसे पंच शब्द भी कहा गया है। बाद में इसका उपयोग सेना के प्रस्थान के समय तथा युद्ध के अवसरों पर होने लगा। राजाओं के आगमन की सूचना देने तथा उनका स्वागत करने में भी तूर्य का उपयोग होने लगा। जातक साहित्य में तुरीय का प्रयोग तूर्य के रूप में होता है। पंचागिक में तत्, वितत्, अवनद्ध, घन और सुषिर वाद्यों को तूर्य में रखा गया है। वात्सयायन के कामसूत्र में तूर्य विभिन्न वाद्य समूहों के लिये प्रयुक्त हुआ है। वात्सयायन काल में तूर्य मनोरंजन प्रधान था और यह भावी जीवन का आधार भी था। स्त्री-पुरुष सामूहिक रूप से तूर्य में भाग लेते थे। इस समूहगान में प्रयास किया जाता था कि दोनों समूहों का एकीकरण हो जाये। इस एकीकरण के साथ ही मण्डली का मुखिया अपनी कन्या का विवाह उसी संगीतज्ञ के साथ कर देता था जो उस मण्डली में सर्वश्रेष्ठ होता था। यह कहना कठिन है कि वैदिक काल में तूर्य का आयोजन किया जाता था अथवा नहीं किंतु विवाह आरंभ काल से सार्वजनिक समारोह के रूप में होते आये हैं इसलिये अनुमान किया जाता है कि इस काल में भी तूर्य जैसा कोई आयोजन अवश्य होता होगा। इस आयोजन से मिलता-जुलता वैवाहिक आयोजन आज भी दक्षिणी राजस्थान की भीलएवं गरासिया आदि जन जातियों में होता है।

[2] व्रात्य आर्यों का वह दल था जो जलप्लावन के पश्चात् मनु के साथ पायमेरू से त्रिविष्टप होते हुए हिमालय से नीचे नहीं उतर कर पूर्व में आगे बढ़ा और यक्ष सभ्यता के सम्पर्क में आया। इसी कारण ब्रात्यों में वैदिक कर्मकाण्ड के प्रति रुझान नहीं था। वे आर्य भाषा जानते थे किंतु उनका रहन-सहन आर्यों से भिन्न था। वे यज्ञ में विश्वास नहीं करते थे तथा उनकी वेशभूषा भी अलग थी। व्रात्यों का देवता एकव्रात्य था। अथर्ववेद में ब्रात्यकाण्ड में एकव्रात्य को तप करते हुए दिखाया गया है। वह एक वर्ष के लिये निश्चल खड़ा है। उसके सात प्राण, सात अपान और सात व्यान हैं। आर्य देवता उसके अनुचर हैं और उसके पीछे चलते हैं। इस वर्णन से वह रुद्र का प्रतिरूप लगता है। नीले पेट और लाल कमर से वह महादेव लगता है। व्रात्यों के अन्य देवता उग्र, रुद्र, भव, शर्व, पशुपति और ईशान हैं। वर्तमान में ये सारे नाम भगवान शिव के माने जाते हैं। चूंकि आर्य, नाग और व्रात्य आर्यों की ही विभिन्न शाखायें थीं इसलिये उनमें सम्पर्क होना स्वाभाविक प्रक्रिया थी। स्वयंभू प्रजापति मनु की पत्नी इला एक गांधर्वी थी।

[3] चिच्चिक एक सूक्ष्म जंतु है जो ची ची की ध्वनि निकालता है। वृषारव दूसरा सूक्ष्म जंतु है, जिसका दूसरा नाम झिल्ली है। अरण्यानी अरण्य के देवता को कहते हैं। ऋग्वेद में यह ऋचा इस प्रकार से मिलती है-वृषारवाय वदते यदुपावति चिच्चिकः आघाटिभिरिव धावयन्न्रण्यानिर्महीयते (10. 146. 2)

[4] 4 झांझ।

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