Monday, July 15, 2024
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44. खून की होली

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा पहाड़ों की तलहटी में उन दिनों धमरी के पास मऊका परगना हुआ करता था। किसी जमाने में मऊका जमींदार हुमायूँ का ताबेदार था। जब हुमायूँ मर गया तो मऊका जमींदार, सिकंदर सूर का सितारा बुलंदी पर जान कर सिकंदर का ताबेदार हो गया।

जब सिकंदर सूर मानकोट खाली करके बिहार चला गया तो मऊका जमींदार को अपने भविष्य की चिंता हुई। वह फिर से अकबर की शरण में चला गया। अकबर ने उसे माफ कर दिया। जब यह बात बैरामखाँ को मालूम हुई तो उसने मऊका जमींदार को गद्दार और मौका परस्त जानकर उसकी हत्या करवा दी और उसके भाई बखतमल को मऊका का परगना दे दिया।

कहने को तो नासिरुलमुल्क बैरामखाँ का वकील था किंतु इधर वह बादशाह के काफी नजदीक आ गया था और कुल मुख्तार के पद पर नियुक्त हो गया था। बादशाह ने मुल्क और माल के सब काम उसके ऊपर छोड़ दिये थे। नासिरुल्मुल्क बादशाह के मुँह लगकर अपने आप को बैरामखाँ के बराबर समझने लगा था और गाहे-ब-गाहे बैरामखाँ की हुक्म उदूली कर बैठता था। बैरामखाँ ने नासिरुल्मुल्क को समझाने की कोशिश की किंतु नासिरुलमुल्क बादशाह की नजदीकी के कारण मुँहजोरी  पर उतर आया। इससे वह बैरामखाँ के निशाने पर आ गया।

नासिरुल्मुल्क पक्का शातिर था। उसने बैरामखाँ को नीचा दिखाने के लिये बुर्जअली और मुसाहिब बेग नाम के दो बदमाशों को मरवा डाला और इनकी हत्या के लिये बैरामखाँ को जिम्मेदार ठहराकर बैरामखाँ को बदनाम करने लगा। बुर्जअली और मुसाहिब बेग अवध के हाकिम अलीकुलीखाँ के नौकर थे और अब बैरामखाँ की खिदमत में रहते थे तथा दोनों ही बैरामखाँ के मुँह लगे हुए थे। बैरामखाँ को लगा कि इस साजिश में अकबर भी शामिल था। इसलिये बैरामखाँ ने काबुल के हाकिम मुनअमखाँ के साथ मिलकर गजनी के हाकिम जलालुद्दीन महमूद और उसके भाई मसऊद का कत्ल करवा दिया। एक तरह से यह अकबर पर सीधा हमला था किंतु अकबर बैरामखाँ से कुछ नहीं कह सका।

कुछ दिनों बाद नासिरुल्मुल्क बीमार पड़ा तो बैरामखाँ उसे देखने के लिये उसके महल पर गया। दरबान ने खानखाना को महल के दरवाजे पर ही खड़ा रहने के लिये कह दिया और स्वयं नासिरुल्मुल्क को खबर करने के लिये महल के भीतर गया। खानखाना इस बेअदबी से बहुत झल्लाया। जब नासिरुल्मुल्क को सूचना हुई तो वह दौड़ा-दौड़ा आया और बहुत निहोरे करके खानखाना को अंदर ले गया।

नासिरुल्मुल्क के नौकरों ने खानखाना के साथ आये आदमियों को महल के बाहर ही रोक लिया जिससे वे भी चिढ़ गये। जब खानखाना नासिरुल्मुल्क से मिलकर बाहर आया तो उसके आदमियों ने नासिरुल्मुल्क के नौकरों की शिकायत की। इस पर खानखाना नाराज होकर अपने ठिकाने पर चला गया और वहाँ से एक पत्र नासिरुल्मुल्क को भिजवाया।

खानखाना ने लिखा कि जब तू कन्धार में हमसे मिलने आया था तो एक गरीब विद्यार्थी था। हमने तुझे बढ़ावा देकर ऊँचे ओहदे पर पहुँचाया। मुल्ला से अमीर बनाया। मगर तू ओछे पेट का आदमी निकला। जल्दी से अफर गया। हमें तुझसे ऐसे-ऐसे फसाद होने का डर है जिनका इलाज हम मुश्किल से कर सकेंगे। इसलिये यह बेहतर है कि तू कुछ दिन के लिये अपने कम्बल में पाँव समेट कर बैठ जा और अपने नक्कारा निशान वगैरह अपनी अमीरी और घमण्ड के सामान हमें सौंप दे तथा अपना मिजाज दुरस्त कर ले जिसमें तेरा और दुनिया का फायदा है।

खानखाना का पत्र पाकर नासिरुल्मुल्क का खून जम गया। उसने भयभीत होकर अपना नक्कारा, निशान और अमीरी के सब राजकीय चिह्न खानखाना को भिजवा दिये। इस पर भी बैरामखाँ के चुगलखोर नौकरों को चैन नहीं आया और उन्होंने बैरामखाँ को उल्टा-सीधा भड़का कर नासिरुल्मुल्क को बयाना के दुर्ग में भिजवा दिया। नासिरुल्मुल्क समझ गया कि अब मुगल सल्तनत से उसका दाना-पानी उठ गया है। इसलिये वह राजकीय सेवा से छुट्टी लेकर मक्का की ओर रवाना हो गया।

जब वह राधनपुर पहुँचा तो उसे मिर्जा शर्फुद्दीन हुसैन और अदहमखाँ की चिट्ठियाँ मिलीं कि जहाँ पहुँचा हो वहीं ठहर जाये और देखता रहे कि आगे क्या होता है! नासिरमुल्क इस पत्र को पाकर राधनपुर से रणथंभौर के पास झायन के घाटे में आ गया। जब बैरामखाँ ने यह सुना तो उसने अपने आदमी नासिरुल्मुल्क को पकड़ने के लिये भेजे। नासिरुल्मुल्क किसी तरह जान बचा कर अकबर के पास भाग आया। जब उसने आपबीती कहानी अपने मुँह से अकबर को सुनाई तो अकबर कांप उठा। अकबर को अपना भविष्य अंधकारमय दिखायी देने लगा। उसके आदमी चुन-चुन कर मारे जा रहे थे और बैरामखाँ के आदमी शान से सिर उठाये हुए घूमते थे लेकिन बादशाह होते हुए भी अकबर कुछ करने की स्थिति में नहीं था।

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