Sunday, July 14, 2024
spot_img

कैबीनेट मिशन का भारत आगमन

भारत में सैनिक विद्रोह

18 अगस्त 1945 को सुभाषचंद्र बोस की एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उसके बाद अंग्रेजों ने आजाद हिंद फौज के सिपाहियों को पकड़ कर फांसी पर लटकाना आरम्भ कर दिया। कांग्रेस अब तक आजाद हिन्द फौज को अपने शत्रु के रूप में देखती रही थी। उसने आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं दिखायी। भारतीय सिपाहियों को यह बात बहुत बुरी लगी। उन्होंने आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों से सहानुभूति दिखाते हुए सशस्त्र विद्रोह कर दिया।

20 जनवरी 1946 को बम्बई, लाहौर तथा दिल्ली के वायु सैनिक, हड़ताल पर चले गए। 19 फरवरी 1946 को जल सेना में भी हड़ताल हो गई। हड़तालियों ने आजाद हिंद फौज के बिल्ले धारण किए। कराची, कलकत्ता और मद्रास के नौ-सैनिक भी हड़ताल पर चले गए। अंग्रेज सैन्य अधिकारियों ने इस हड़ताल को बंदूक से कुचलना चाहा। इस कारण दोनों तरफ से गोलियां चलीं। ठीक इसी समय जबलपुर में भारतीय सिगनल कोर में भी 300 जवान हड़ताल पर चले गए। इन हड़तालों से अंग्रेज सरकार थर्रा उठी।

मुस्लिम लीग द्वारा की जा रही मार-काट एवं भारतीय सेनाओं में हो रहे विद्रोहों के बाद इंग्लैण्ड की गोरी सरकार को समझ में आने लगा कि अब एक भी दिन की देरी किए बिना भारत को आजादी देनी होगी चाहे कांग्रेस, मुस्लिम लीग, दलित पक्ष एवं भारतीय-राजाओं द्वारा कितने ही अड़ंगे क्यों न लगाए जाएं। इंग्लैण्ड की सरकार ने भारत को शीघ्र से शीघ्र आजादी देने के लिए उच्चस्तरीय मंत्रिमंडल मिशन भेजने की घोषणा की।

कैबीनेट मिशन का भारत आगमन

15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने हाउस ऑफ कॉमन्स में घोषणा की कि ग्रेट-ब्रिटेन की लेबर सरकार, ब्रिटेन और हिन्दुस्तान तथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के गतिरोध को समाप्त करने का प्रयास करने के लिए एक कैबीनेट मिशन भारत भेज रही है।

उन्होंने कहा- ‘मुझे आशा है कि ब्रिटिश-भारत तथा रियासती-भारत के राजनीतिक एक महान नीति के तहत, इन दो भिन्न प्रकार के अलग-अलग भागों को साथ-साथ लाने की समस्या का समाधान निकाल लेंगे। हमें देखना है कि ‘भारतीय राज्य’ अपना उचित स्थान पायें। मैं एक क्षण के लिए भी इस बात पर विश्वास नहीं करता कि भारतीय राजा भारत के आगे बढ़ने के कार्य में बाधा बनने की इच्छा रखेंगे अपितु जैसा कि अन्य समस्याओं के मामले में हुआ है, भारतीय इस समस्या को भी स्वयं सुलझायेंगे।’

इंग्लैण्ड की सरकार द्वारा इस कमीशन (आयोग) में तीन कैबीनेट मंत्री रखे गए- (1) भारत सचिव लॉर्ड पैथिक लारेन्स, (2) व्यापार मंडल के अध्यक्ष सर स्टैफर्ड क्रिप्स और (3) फर्स्ट लॉर्ड आफ द एडमिरेल्टी ए. वी. अलैक्जेंडर। इस कमीशन को ‘कैबीनेट मिशन’ भी कहा जाता है। 24 मार्च 1946 को यह आयोग भारत पहुंच गया।

इसके साथ ही प्रधानमंत्री एटली ने भारत के वायसराय लॉर्ड वैवेल के नाम एक तार भेजा जिसमें लिखा था- ‘लेबर गवर्नमेंट वायसराय को नजर-अंदाज नहीं करना चाहती किंतु यह अनुभव करती है कि ऐसा दल जो वहीं फैसला कर सके, समझौते की बातचीत को काफी सहारा देगा और हिंदुस्तानियों को यह विश्वास दिलाएगा कि इस बार हम इसे कर दिखाना चाहते हैं।’

इस मिशन के आगमन से राजनीतिक विभाग ने समझ लिया कि अब राज्यों को नये ढांचे में समाहित करने की शीघ्रता करने का समय आ गया है। 25 मार्च को एक प्रेस वार्त्ता के दौरान लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा- ‘हम इस आशा से भारत में आये हैं कि भारतीय एक ऐसे तंत्र का निर्माण कर सकें जो सम्पूर्ण भारत के लिए एक संवैधानिक संरचना का निर्माण कर सके।’

उनसे पूछा गया कि राज्यों का प्रतिनिधित्व राजाओं के प्रतिनिधि करेंगे या जनता के प्रतिनिधि? इस पर पैथिक लॉरेंस ने जवाब दिया कि- ‘हम जैसी स्थिति होगी वैसी ही बनी रहने देंगे। नवीन संरचनाओं का निर्माण नहीं करेंगे। ‘

2 अप्रेल 1946 को कैबीनेट मिशन तथा वायसराय के साथ हुई बैठक में नरेन्द्र मण्डल के चांसलर भोपाल नवाब हमीदुल्ला खाँ ने देशी राज्यों के लिए भारत एवं पाकिस्तान से अलग देश की मांग की। उसने कहा कि साइमन कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर देशी-राज्यों तथा ब्रिटिश-भारत के प्रांतों का एक प्रिवी कौंसिल बनाया जाना चाहिये। जब भारत में दो देशों (भारत एवं पाकिस्तान) का निर्माण हो सकता है तब तीसरे भारत को मान्यता क्यों नहीं दी जा सकती जो देशी-राज्यों से मिलकर बना हो?

कोई भी भारतीय राजा, भारत सरकार अधिनियम 1935 में दी गई संवैधानिक संरचना को स्वीकार नहीं करना चाहता। परमोच्चता भारत सरकार को स्थानांतरित नहीं की जानी चाहिये। कैबीनेट मिशन के सदस्य सर स्टैफर्ड क्रिप्स का मानना था कि यदि देशी राजाओं को भारतीय संघ से अलग रहने की स्वीकृति दी जाती है तो इससे भौगोलिक समस्याएं पैदा होंगी।

उसी संध्या को कैबीनेट मिशन ने नरेन्द्र मण्डल की स्थाई समिति के प्रतिनिधियों से बात की जिनमें भोपाल, पटियाला, ग्वालियर, बीकानेर तथा नवानगर के शासक सम्मिलित थे। इस बैठक में लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा कि यदि ब्रिटिश-भारत स्वतंत्र हो जाता है तो परमोच्चता समाप्त हो जाएगी तथा ब्रिटिश सरकार भारत में आंतरिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सैनिक टुकड़ियां नहीं रखेगी। राज्यों को संधि दायित्वों से मुक्त कर दिया जाएगा क्योंकि ब्रिटिश क्राउन संधि दायित्वों के निर्वहन में असक्षम हो जाएगा।

अंग्रेजों को स्वाभाविक तौर पर भारतीय राज्यों के साथ लम्बे समय से चले आ रहे सम्बन्धों को बनाए रखने में रुचि थी किंतु ये सम्बन्ध नवीन भारत में राज्यों की स्थिति पर निर्भर होने थे। यदि राज्य अपनी प्रभुसत्ता का समर्पण आजादी के समय बनने वाले भारतीय संघ को करते हैं तो ये सम्बन्ध केवल भारतीय-संघ के माध्यम से ही हो सकते थे। कैबीनेट मिशन भारत को आजादी देने का सर्वसम्मत फार्मूला ढूंढने के लिए कांग्रेस, मुस्लिम लीग एवं भारतीय राजाओं के संघ ‘नरेन्द्र मण्डल’ से वार्ता कर रहा था। इस वार्तालाप से राजाओं की समझ में आ गया कि अब अंग्रेज देश में नहीं रहेंगे।

इसलिए अंग्रेजों की कृपाकांक्षा प्राप्त करने के बजाय इस बात पर ध्यान लगाना चाहिए कि कहीं भविष्य में बनने वाला आजाद भारत राजाओं के राज्यों को न निगल जाए। दूसरी तरफ छोटे राजा इस बात को लेकर आशंकित थे कि कहीं बड़े राजा ही उन्हें न निगल जाएं। रियासती-भारत में अजीब सी बेचैनी और कई तरफा घमासान मचने लगा था। राजाओं और उनके प्रतिनिधियों से निबटने के बाद कैबीनेट मिशन ने कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के नेताओं से भी बात की।

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

21,585FansLike
2,651FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles

// disable viewing page source