Monday, May 20, 2024
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12. समिति

जन के ठीक मध्य में स्थित यज्ञशाला के निकट ही वृहद पर्णशाला [1] बनी हुई है जिसमें प्रातः कालीन सभा, सांध्यकालीन गोष्ठि [2] तथा विशेष अवसर उपस्थित होने पर समिति [3] का आयोजन होता है। गोधूलि बेला [4] के आगमन में अभी विलम्ब है तथा सूर्य देव की प्रखरता भी अभी कम नहीं हुई है। वृहद पर्णशाला में इस समय तीव्र प्रकाश है तथा कुछ-कुछ गर्मी भी। मध्यान्ह के भोजन के पश्चात समस्त ‘तृत्सु-जन’ आज की समिति में बिना किसी सूचना के उपस्थित हो गया है। परिस्थिति ही ऐसी थी कि समिति के आयोजन की सूचना देने की आवश्यकता नहीं रही। समस्त आर्य परिवारों ने अनुमान लगा लिया था कि आज समिति का आयोजन होगा। इस कारण आर्य स्त्री-पुरुष आज गौ-चारण के लिये अधिक दूर नहीं गये थे तथा मध्यान्ह पश्चात् ही लौट आये थे। यही कारण है कि आबाल-वृद्ध समस्त आर्य जन समिति में उपस्थित हैं।

क्या ऋषि-मुनि और क्या आर्य पुरुष-ललनायें सब के मुखमण्डल पर एक ही प्रश्न अंकित है। सोम के नष्ट हो जाने पर यज्ञ कैसे होगा! सोम की आहुतियों के अभाव में अग्नि को कैसे संतुष्ट किया जायेगा! इसी समस्या पर विचार करने के लिये आज की अनाहूत समिति का आयोजन हो रहा है। आहूत समितियों एवं अनाहूत समितियों में जो

अन्तर सदैव होता है, उसे आज भी परिलक्षित किया जा सकता है। आहूत समितियों में आर्य स्त्री-पुरुष परस्पर वार्ता में निमग्न रहते हैं, बालवृंद के कोलाहल से पर्णशाला भर जाती है किंतु अनाहूत समितियों का आयोजन अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में होने के कारण अथवा विपत्तिकाल में होने के कारण आद्योपरांत मौन ही अधिक मुखर रहता है। आज भी चारों ओर मौन पसरा हुआ है। अल्पवयस् बालवृंद में भी असाधारण परिस्थितियों को समझने की क्षमता होती है, इसीसे वे अपनी प्रकृति के विपरीत शांत बैठे हैं।

  – ‘समिति आरंभ की जाये।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने अपने दीर्घ श्मश्रुओं पर अंगुंलियाँ फिराते हुए पर्णशाला में व्याप्त मौन को भंग किया।

  – ‘ऋषिश्रेष्ठ! हमें आज के अग्निहोत्र के लिये हव्यवाहक [5] नियुक्त किया गया था किंतु हम अपना कर्तव्य पूर्ण नहीं कर सकीं इससे हमारा मन अत्यंत उद्विग्न है।’ आर्या मेधा और आर्या द्युति ने अपने स्थान पर खड़े होकर अपनी व्यथा व्यक्त की।

  – ‘इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं। दोष मेरा है, मुझे सोम की रक्षा का दायित्व सौंपा गया था किंतु मैं ही अपने प्रमादवश अपने कर्तव्य का ठीक से पालन नहीं कर सका।’ आर्य सुनील के चेहरे पर पश्चाताप के भाव स्पष्ट पढ़े जा सकते थे।

  – ‘यह कितना आश्चर्यकारी है कि असुरों ने रात्रि भर उत्पात किया और हमें किंचित् मात्र भी आभास नहीं हुआ।’ गोप सुरथ ने अपने खड्ग को अपने बाहुओं पर तोलते हुए कहा।

  – ‘असुर मायावी हैं वत्स। रात्रि में उनकी तामसी शक्तियों का वेग प्रबल होता है। वे छल का सहारा लेते हैं, अप्रकट रह कर दुष्कर्म करते हैं ………।’

  – ‘………और आर्यों की असावधानी का लाभ उठाते हैं।’ आर्या समीची ने ऋषिश्रेष्ठ की बात को पूरा किया।’ उत्तेजना के कारण आर्या समीची के कण्ठ की तीक्ष्णता बढ़ गयी। आर्य अतिरथ ने चैंक कर उनकी ओर देखा, भगिनि समीची उनकी भाषा बोल रही हैं।

  – ‘यह पहली बार नहीं हुआ है जब सोम लुप्त हो गया हो।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने विचार विमर्श का विषय असुरों से हटाकर पुनः सोम पर लाते हुए कहा।

  – ‘ऋषिश्रेष्ठ मैंने सुना है कि एक बार पहले भी सोम देवों को त्याग कर जा चुका है।’ आर्य सुमति ने जिज्ञासा व्यक्त की।

  – ‘हाँ। जब असुर वृत्र ने वरुण को बंदी बना लिया तो सोम असुर वृत्र की क्रूरता से भयभीत होकर देवताओं का साथ छोड़कर अंशुमती के तट पर जा छिपा था।’ [6]  सोम का पुरोहित होने के कारण देवगुरु वृहस्पति को भी उसके साथ जाना पड़ा। ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने आर्य सुमति से सहमति व्यक्त की।

  – ‘यहाँ तक तो ठीक है ऋषिवर किंतु इन्द्र के पुनः-पुनः आह्वान करने पर भी सोम ने पुनः देवों के साथ चलना स्वीकार नहीं किया। इसका क्या कारण था ? क्या सोम देवों से रुष्ट हो गया था ?’ आर्य सत्य ने शंका व्यक्त की।

  – ‘नहीं आर्य! सोम देवों से रुष्ट नहीं हुआ था। उसने समझा कि मायावी वृत्र ही इंद्र का रूप धारण करके आया है। इसलिये वह इंद्र से युद्ध के लिये सन्नद्ध हो गया।’

  – ‘क्या देवगुरु ने सोम को इन्द्र का परिचय नहीं दिया ? वे भी तो सोम के साथ थे।’     

– ‘देवगुरु वृहस्पति ने सोम को इन्द्र का परिचय दिया किंतु सोम यही समझता रहा कि देवगुरु को भ्रम हुआ है। वास्तव में वह इंद्र नहीं वृत्र है। अतः वह इंद्र के साथ चलने को तैयार नहीं हुआ।’  

  – ‘फिर क्या हुआ ऋषिश्रेष्ठ ?’ आर्य सुरथ के चार वर्षीय पुत्र सौभरि ने कथा को रुका हुआ जानकर जिज्ञासा व्यक्त की।

विपत्ति काल होने पर भी बालक सौभरि की तुतलाती वाणी में प्रकट हुई चिंता को लक्ष्य करके समस्त आर्य हँस पड़े। क्षण भर को वे अपनी चिंता भूल गये।

  – ‘फिर यह हुआ बाल-ऋषि सौभरि कि सोम अंशुमती के तट को असुरक्षित जानकर चंद्रमा में जा छिपा।’ ऋषि श्रेष्ठ ने बालक सौभरि की तरह वाणी में तुतलाहट लाकर कहा।

  – ‘वह चंद्रमा में जाकर क्यों छिप गया ? बालक सौभरि को इस नवीन कथा में बड़ा आनंद आ रहा था। उसका बाल-मन चाह रहा था कि वह भी चंद्रमा में जाकर छिप जाये और माता उसे खोजती फिरे। यदि ऐसा हो तो कितना आनंद हो! सौभरि की माता ने उसे चुप रहने के लिये कहा।

  – ‘चंद्रमा के ही सदृश शुक्ल वर्ण होने के कारण सोम सरलता से उसमें छिप गया। सोम के फिर से लुप्त हो जाने पर समस्त देवों की समिति हुई और वे फिर से सोम को खोजने निकल पड़े। अन्ततः देवों ने चन्द्रमा में छिप कर बैठे सोम को देख ही लिया। समस्त देवों ने चन्द्रमा को घेर कर शोर मचाया- देख लिया-देख लिया। इस पर सोम ने अपने शरीर पर भस्म आच्छादित कर लिया और दीर्घकाल तक तीर्थों में रहकर तपस्या की। तप-बल से तेज प्राप्त करके वह आकाश के मध्य भाग में प्रकाशित हुआ तथा स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य स्थित रहकर योग सम्पत्ति से नाना प्रकार के रस स्वरूप को धारण करता हुआ पुनः देवों को प्राप्त हुआ।’ ऋषिश्रेष्ठ ने संक्षेप में सोम की पुनप्र्राप्ति की कथा पूरी की।

  – ‘ऋषिश्रेष्ठ आर्यों को सोम की प्राप्ति कैसे हुई ? आर्या स्वधा ने जिज्ञासा व्यक्त की।

  – ‘महाजलप्लावन के पश्चात आर्य मनु की नौका मनोरवसर्पण [7] पर्वत पर आकर रुकी। वहाँ किसी वनस्पति, पक्षी अथवा पशु आदि किसी भी जीव का चिह्न नहीं था। दीर्घ समय तक देवपुत्र मनु उस विकट पर्वतीय प्रदेश में एकाकी विचरण करते रहे। पायमेरू [8] से कुछ नीचे उतरने पर देवपुत्र मनु ने वहाँ त्रिविष्टप [9] अर्थात् तीन वनस्पतियों के दर्शन किये- कुष्ठ, अश्वत्थ तथा सोम। उन्हीं तीन वनस्पतियों को लेकर मनु सरस्वती के तट पर उतर आये और धरित्री पर यज्ञ आरंभ किया। मनु ने प्रजापति बनकर जब प्रजा की रचना की तब प्रजाजनों का परिचय सोम से करवाया। तब से सोम आर्यों के साथ है।’ क्षण भर के लिये विराम देकर ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने पुनः समिति को सम्बोधित किया-

  – मनुपुत्रो! वही दिव्य सोम आज फिर से विलुप्त हो गया है किंतु इस बार की परिस्थिति भिन्न प्रकार की है। सोम असुरों के भय से लुप्त नहीं हुआ है अपितु असुर ही उसका अपहरण करके ले गये हैं। उन्होंने समस्त सोम वल्लरियों को कुचल कर नष्ट कर दिया है। हमें फिर से सोम को प्राप्त करना होगा।’

  – ‘ऋषिश्रेष्ठ! सरस्वती से लेकर शतुद्रि, विपासा, परुष्णि, असिक्नी, वितस्ता तथा सिंधु के तटों पर आर्यों के कई जन स्थित हैं। मैं आर्य सुनील तथा कुछ अन्य आर्य वीरों को लेकर दूरस्थ आर्य जनों से सम्पर्क करता हूँ और सोम का पुनः आह्वान कर उसे प्राप्त करने का प्रयास करता हूँ।’ गोप सुरथ ने समिति के समक्ष प्रस्ताव रखा।

ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा तथा अन्य ऋषियों ने आर्य सुरथ के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इसके बाद विचार पुनः असुरों के दुष्कृत्य पर आकर केंद्रित हो गया।

  – ‘सोम की प्राप्ति के पश्चात् असुरों के दलन का कोई उपाय किया जाना चाहिये।’ आर्य अतिरथ ने प्रस्ताव रखा।

  – ‘असुरों का दलन सहज नहीं है। वे संख्या में इतने अधिक हैं कि उन्हें नष्ट करने में शताधिक वर्ष लग जायेंगे।’ ऋषि पर्जन्य ने अपना मत प्रस्तुत किया।

  – ‘इसका अर्थ हुआ कि हम सदैव असुरों से त्रस्त रहेंगे। वे मदमत्त महिष की भांति आर्यजनों में प्रवेश कर उत्पात मचाते रहेंगे!’ आर्या स्वधा ने ऋषि पर्जन्य के मत से असहमत होते हुए कहा।

  – ‘ हमें असुरों पर अंकुश लगाने के लिये निरंतर प्रयत्नरत रहना होगा किंतु वर्तमान परिस्थितियों में उनका पूर्ण रूपेण दलन आर्यों के लिये संभव नहीं है।’ ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने ऋषिवर पर्जन्य के मत का समर्थन किया।

  – ‘यदि वर्तमान परिस्थितियाँ आर्यों की अपेक्षा असुरों को बलवान बनाती हैं तो हमें वर्तमान परिस्थितियों को बदलने का प्रयास करना चाहिये।’ आर्या समीची ने अपना मत प्रकट किया।

  – ‘निःसंदेह आर्या समीची का मत स्वागत योग्य है। आर्यों को भावी रणनीति निश्चित करते समय इसी तथ्य पर केंद्रित रहना होगा।’ ऋषि सौम्यश्रवा ने आर्यों का आह्वान किया।

  – ‘किंतु देव यह समय असुरों पर अंकुश लगाने पर विचार-विमर्श का नहीं है। इस समय तो हमें प्रयास करना चाहिये कि शीघ्र से शीघ्र सोम प्राप्त किया जा सके।’ अम्बा अदिति ने कहा। समिति का समापन इसी निश्चय के साथ किया गया।


[1] पत्तों से बनी हुई झौंपड़ी

[2] लघु सम्मेलन के लिये ‘गोष्ठि’ शब्द का प्रयोग होता था।

[3] वैदिक साहित्य में सभा और समिति का अनेक स्थानों पर उल्लेख हुआ है। ऋग्वेद में एक स्थान पर सभा की वार्ता का विषय गायें और उनकी उपयोगिता है (ऋ.  7. 28. 6), दूसरे स्थान पर सभा में होने वाले द्यूत का उल्लेख है (ऋ. 10. 34. 6), अन्य तीसरे स्थान पर अश्व अथवा रथ पर आरूढ़ होकर जाते हुए एक सभासद का उल्लेख है। (ऋ. 8. 4. 9) ऋग्वेद में एक स्थान पर एक राजा समिति के सदस्यों से कहता है कि मैं तुम्हारा विचार और तुम्हारी समिति स्वीकार करता हूँ। अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है। (सभा च समिति श्चावतां प्रजापते दु हितरौ संविधाने। अथर्ववेद-7.12.1)

[4] प्रातःकाल में जब गौएं विचरण हेतु वन को जाती हैं एवं सांयकाल में पुनः ग्राम को लौटती हैं तब उनके पदाघात से धूलिकण वायु में प्रसारित होकर आकाश में छा जाते हैं, इन्हीं दोनों समय को गौधूलि बेला कहा जाता है।

[5] जो लोग यज्ञ हेतु समिधा एवं अन्य सामग्री का प्रबंध करते थे उन्हें हव्यवाहक कहा जाता था।

[6] इस घटना का उल्लेख ऋग्वेद (8.94.100), एतरेय ब्राह्मण (3/14, 1/13, 1/191/4) तथा जैमिनी ब्राह्मण (3/15) में भी हुआ है।

[7] यह हिमालय पर्वत की ऊँची चोटी पर स्थित है।

[8] पामीर।

[9] तिब्बत।

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