Thursday, February 29, 2024
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रक्त की नदी में तैर कर निकला पाकिस्तान (4)

कैप्टेन एटकिन्स और उसके गोरखा सैनिकों ने शरणार्थियों की सुरक्षा के पीछे अनेक सप्ताह व्यतीत किए। हिन्दुओं का कारवां भारत में जाते और मुसलमानों के कारवां को पाकिस्तान तक पहुंचाते। ……. शरणार्थी रवानगी के समय प्रसन्न दिखाई देते फिर ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते, त्यों-त्यों भूख-प्यास और थकान के मारे बेहाल हो जाते। भीषण गर्मी उनसे सहन नहीं होती। उन्हें डर सा लगने लगता कि यह देशान्तर यात्रा कभी खत्म होगी भी या नहीं?

छोटी-से छोटी चीज का वजन भी उन्हें भारी पड़ने लगता। एक-एक करके वे चीजें फैंकना शुरू करते। अंत में जब वे अपनी मंजिल तक पहुंचते, उनके पास कुछ भी शेष नहीं रहता। बिल्कुल कुछ नहीं। सबसे दुर्भाग्यशाली वे होते जो अपनी देशान्तर यात्रा पूरी कर ही न पाते। बूढ़े, बीमार और बच्चे जल्दी थक जाते। जिन मां-बापों की शक्तियां इतना साथ न देती कि वे बच्चों को उठाकर आगे बढ़ते रह सकें, वे उन्हें रास्ते में ही त्यागकर खुद कारवां के साथ निकल जाते।

ऐसे बच्चे भूख-प्यास से तड़प कर मरते। चलते करवां में से अचानक वृद्ध अलग निकल जाते। वे रास्ते के निकट किसी छाया की खोज करते जिसकी शांति में बैठकर वे अपने कष्टपूर्ण जीवन के अंत की प्रतीक्षा कर सकें। इन कारवाओं के साथ चल रहे सैनिकों को अपने स्टेशन वैगनों में गर्भवती स्त्रियों के प्रसव भी करवाने पड़ रहे थे। प्रसव के तुरंत बाद अपने नवजात शिशु को लेकर वह स्त्री भारत या पाकिस्तान की दिशा में पैदल चल देती।

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कारवां अपने पीछे लाशों की जो गंदगी छोड़ जाते, उसका वर्णन कठिन है। लाहौर से अमृतसर के बीच की 45 मील लम्बी सड़क पर से अनेक कारवां गुजरे। वह पूरी सड़क खुली कब्र में बदल गई। इस सड़क पर भयानक दुर्गंध आती थी। …… गिद्ध लाशें खा-खाकर इतने भारी हो गए थे कि उड़ भी नहीं सकते थे। जंगली कुत्तों को स्वाद का ऐसा नशा पड़ गया कि वे लाशों के केवल यकृत खाते, बाकी अंगों को छोड़ देते।

भारत विभाजन के समय पूर्वी पंजाब से बीकानेर आए ऐसे ही एक परिवार की सदस्य श्रीमती कैलाश वर्मा ने मुझे बताया था कि लोगों में अपने दुधमुँहे शिशुओं को अपने साथ लाने की चाहत अंत तक समाप्त नहीं होती थी किंतु जब उन्हें भूख, बीमारी, अशक्तता आदि के कारण बच्चों को लेकर चल पाना असंभव हो जाता तो वे अपने लड़के को गोदी से उतार कर जीवित ही सड़क के किनारे छोड़ देते ताकि यदि ईश्वर ने उसके भाग्य में जिंदगी लिखी हो तो वह जिंदा बच जाए किंतु गोद से उतारी हुई लड़की को धरती पर रखकर उसका गला अपने पैरों से दबा देते थे ताकि उसे बड़ी होकर वेश्यावृत्ति न करनी पड़े।

लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर ने आरोप लगाया है कि सिक्खों के आक्रमण सबसे भयानक हुआ करते थे। उनके जत्थे गन्ने और गेहूं के खेतों में से अचानक प्रकट होकर, भयंकर चीत्कार के साथ, कारवां के उस हिस्से पर टूट पड़ते, जहाँ सुरक्षा प्रबंध सबसे कमजोर होता। कारवां के जो लोग लड़खड़ा कर पीछे रह जाते, उन पर भी वे भयानक आक्रमण करते।

कई बार हिन्दुओं और मुसममानों के कारवां आमने सामने से एक ही सड़क पर पार होने लगते। तब उनका व्यवहार कैसा रहेगा, पहले से कोई अनुमान नहीं लगा सकता। घृणा की आग में झुलसते वे लोग एक-दूसरे पर टूट पड़ते और उन्हें छुड़ाना कठिन हो जाता। इन आपसी झगड़ों में लाशें तक गिर जातीं। कई बार एक दूसरे को पार करते मुसलमान हिन्दुओं को बताते और हिन्दू भी मुसलमानों को बताते कि वे अपने पीछे कौन-कौन सी जगहें खाली छोड़ आए हैं कि जहाँ आप लोग जाकर कब्जा जमा लें।

विभिन्न अनुमानों के अनुसार इन दंगों में 5 लाख लोग मारे गए। 1,20,00,000 लोगों को जन-धन की हानि हुई। इस दौरान पूरे देश में स्थान-स्थान पर बलवे, अग्निकाण्ड, स्त्रियों के अपहरण एवं लूट-मार हो रही थी। जस्टिस जी. डी. खोसला ने अपनी पुस्तक ‘स्टर्न रैकनिंग’ में पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त, सिन्ध और बंगाल में हो रहे बलवों इत्यादि का स्पष्ट चित्र चित्रित किया है। कांग्रेस के नेता जो अंतरिम सरकार में पहुंचे थे, अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं कर सके। वे इस पद के सर्वथा अयोग्य थे।

न्यायाधीश जी. डी. खोसला जिन्हें उन हत्याकाण्डों और विपदाओं का प्रमुख अध्येता माना जाता है, के अनुमान के अनुसार 16 अगस्त 1946 से ई.1947 के अंत तक 10 लाख लोगों की हत्या हुई थी। इंग्लैण्ड के दो प्रमुख इतिहासकारों पेण्डरल मून और एच. वी. हडसन ने क्रमशः 2 लाख और 2..5 लाख मौतें होने का अंदाजा लगाया। शरणार्थियों के काफिले तब तक आते रहे जब तक कि 1 करोड़ 50 लाख शरणार्थियों का आवागमन पूरा नहीं हो गया।

बंगाल की सरहद अपेक्षाकृत शांत रही जहाँ 10 लाख व्यक्ति शरणार्थी बनकर इस पार से उस पार आए-गए। इस तबाही के कारण भारत के सभी प्रमुख नेताओं एवं अंतिम वायसराय को पूरे विश्व में कटुतम आलोचना का सामना करना पड़ा। केवल 55 हजार सैनिकों की पंजाब बाउण्ड्री फोर्स उन दंगों को काबू में रखने के लिए इतनी संक्षिप्त थी कि उस सेना के निर्माता लॉर्ड माउण्टबेटन एवं उनके सलाहकारों की अदूरदर्शिता पर सभी इतिहासकार आश्चर्य करते रहे गए।

…… पंजाब के दंगे चाहे कितने प्रचण्ड रहे हों, कुल मिलाकर उन्होंने भारत की सम्पूर्ण आबादी के केवल दसवें हिस्से को प्रभावित किया और वे पंजाब के अलावा अन्य प्रांतों में प्रायः नहीं फैल सके।

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