दलितों की आत्महत्या का मामला आज पूरे भारत में चिंता का विषय बना हुआ है। क्या है इन आत्महत्याओं की पृष्ठभूमि! क्या है इस समस्या का समाधान! इस आलेख में इस विषय पर संक्षेप में चर्चा की गई है।
जब देश का संविधान बना तो इस बात पर सबका ध्यान था कि अंग्रेजों के शासनकाल में कुछ लोगों का अत्यधिक शोषण किया गया है और कुछ लोगों ने उस शोषण में अंग्रेजों का साथ देकर अपनी तिजोरियां भरी हैं।
इसलिए पूरी संविधान सभा ने भारत में निवास करने वाले उस बड़े शोषित वर्ग के लिए एक मत से कुछ विशिष्ट प्रावधान किए। इस संविधान का प्रारूप लिखने के लिए जो समिति बनाई गई, उसकी अध्यक्षता लंदन से बैरिस्ट्री पढ़कर आए डॉ. भीमराव अम्बेडकर को दी गई।
निश्चित रूप से संविधान सभा में सभी सदस्य बहुत विद्वान थे और अपने-अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर हाल ही में आजाद हुए भारत का समग्र विकास करना चाहते थे। वे संविधान के माध्यम से कोई राजनीति नहीं कर रहे थे। संविधान उनके लिए राजनीतिक हथियार था भी नहीं, यह तो आज बन गया है।
आज तो राजनीतिज्ञों ने संविधान को ही नहीं अपितु, संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर को भी अपनी राजनीति चमकाने का जरिया बना लिया है। तब ऐसा नहीं था। उस काल में ऐसा हो भी नहीं सकता था। इसलिए संविधान सभा के सदस्यों ने एकमत से आरक्षण का प्रावधान किया।
हिन्दू समाज का वह निर्धन वर्ग जो मुसलमानों के लगभग छः सौ सालों के शासनकाल में और उसके बाद अंग्रेजों के लगभग 200 सालों के शासनकाल में अछूत और अस्पृश्य कहकर समाज की मुख्य धारा से दूर कर दिया गया, जिनका तरह-तरह से शोषण किया गया, जिन्हें आधा पेट भोजन देकर, दो गुना – चार गुना काम लिया गया, उन्हें आजाद भारत में तेजी से विकास करने के अवसर देने के उद्देश्य से उनके लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान किया गया।
संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर अच्छी तरह जानते थे कि आरक्षण एक दुधारी तलवार की तरह है जो दलित समाज का भला करने के साथ ही उनके लिए कुछ न कुछ खतरे भी अवश्य पैदा करेगी। डॉ. अम्बेडकर ने अपनी इस चिंता को संविधान सभा के भाषणों में खुलकर व्यक्त किया था।
इस समस्या से बचने के लिए संविधान में आर्टीकल 335 का प्रावधान किया गया जो यह कहता था कि आरक्षण के लाभ से युक्त अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को सरकारी सेवाओं में नियुक्ति देते समय यह ध्यान में रखा जाएगा कि प्रशासन की दक्षता बनी रहे।
अर्थात् आरक्षित पदों पर केवल उन्हीं युवाओं को लिया जाएगा जो उस सेवा को करने की दक्षता एवं योग्यता रखते हैं। यह प्रावधान इसलिए था ताकि इन पदों पर आने के इच्छुक दलित एवं पिछड़े कहे जाने वाले युवा अपनी गुणवत्ता में निरंतर सुधार करके समाज के शेष लोगों के बराबर आ जाएं।
इस प्रकार आर्टीकल 335 के माध्यम से आरक्षण के प्रावधान में संतुलन स्थापित किया गया। डॉ. अम्बेडकर जानते थे कि यदि आरक्षण के साथ गुणवत्ता की शर्त नहीं रखी गई तो दलित वर्ग का बहुत नुक्सान होगा। सरकार के कामकाज की क्वालिटी भी गिरेगी और दलित वर्ग अपनी बौद्धिक क्षमता का विकास करने के प्रयास छोड़ देगा।
समय के साथ संविधान सभा भंग हो गई। चुनी हुई लोकसभाएं आने लगीं। राजनीतिक दलों में में सभी तरह के तत्व शामिल हो गए। निश्चित रूप से हर राजनीतिक दल में अच्छे लोगों के साथ-साथ कुछ लोग लालची, चालाक और धूर्त लोग भी स्थान पाने लगे।
इन लालची नेताओं ने तुरंत ही समझ लिया कि आरक्षण को राजनीतिक हथियार बनाकर वोटतंत्र पर कब्जा किया जा सकता है। इसलिए इन नेताओं ने वर्ष 1995 में लोकसभा एवं राज्यसभा में 77वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1995 पारित करके, संविधान के अनुच्छेद 15 में आरक्षित पदों के लिए योग्यता अंकों में छूट और मूल्यांकन मानकों में शिथिलता दिए जाने का प्रावधान किया। पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान भी इसी संशोधन के माध्यम से किया गया था।
सतही दृष्टि से देखने पर यह एक अच्छा निर्णय लगता है किंतु अंदरूनी वास्तविकता यह थी कि इसने अब दलित एवं पिछड़े वर्ग के युवाओं को नौकरी पाने का मार्ग तो सरल बना दिया किंतु योग्यता में वृद्धि करके समाज साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के प्रयासों से वंचित कर दिया। कम योग्यता वाले लोग सरकार में उच्च पदों पर आ तो गए किंतु अब उनमें काम करने योग्य प्रतिभा न होने से वे अपने ही साथियों के बीच में स्वयं को कमजोर समझने लगे।
यही स्थिति उच्च शैक्षणिक संस्थानों में भी होने लगी। जब वे आईआईटी, आईआईएम तथा एमबीबीएस जैसी संस्थानों में पढ़ने गए तो उस पढ़ाई को न पकड़ सके। आरक्षित वर्ग के साथियों की इस कमजोरी को अनारक्षित वर्ग के छात्रों ने दलितों एवं पिछड़ों की जन्मजात मानसिक अयोग्यता माना लिया। जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।
दलितों अथवा पिछड़ों में मानसिक योग्यता की कमी जन्मजात नहीं होती, यह कमी तो योग्यता अर्जित करने के अवसरों से वंचित रह जाने से, उस योग्यता को अर्जित करने के लिए किए जाने वाले प्रयासों को छोड़ देने से उत्पन्न होती है।
सरकारों को चाहिए था कि आरक्षित वर्ग के छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए योग्य बनाने हेतु जी-जाने से प्रयास करतीं, न कि उन्हें एक कठपुतली की तरह आगे से आगे बढ़ाती रहतीं।
आज स्थिति यह है कि माइनस 30 या माइनस चालीस अंक लाने वाले छात्रों को डॉक्टरी में एडमिशन दिया जा रहा है। क्या एक ऐसा छात्र जो प्रवेश परीक्षा में न्यूनतम पासिंग मार्क्स नहीं ला सकता, कभी भी एमबीबीएस की मोटी-मोटी पुस्तकें पढ़कर डॉक्टर बन सकता है?
यही कारण है कि इनमें से बहुत से छात्र आत्महत्या करते हैं और उन्हें कमजोर वर्गों पर अत्याचार और दलितों की आत्महत्या कहकर राजनीतिक रंग दिया जाता है। विगत 25 वर्षों में भारत में लगभग दो लाख से अधिक छात्रों ने आत्महत्या की है। केवल पिछले 10 वर्षों में 1 लाख 17 हजार से अधिक छात्रों की आत्महत्याएँ दर्ज हुई हैं।
आज भारत में औसतन प्रतिदिन 35-36 छात्र आत्महत्या करते हैं। इन आत्महत्याओं के कारण अलग-अलग हैं किंतु पढ़ाई से घबराकर आत्महत्या करने के प्रकरण भी कम नहीं हैं।
दलितों की आत्महत्या को धूर्त किस्म के नेता, वामपंथी शातिर और कुछ नासमझ समझदार भी सवर्णों द्वारा दलितों के विरुद्ध किए गए अत्याचारों का परिणाम बताकर समाज की टूटन को और अधिक गहरी करके अपना उल्लू साधना चाहते हैं। हाल ही में बनाए गए यूजीसी के नियम इस षड़यंत्र का प्रमाण है।
क्या ऐसे दौर में हमें अम्बेडकर के उन भाषणों को फिर से नहीं पढ़ना चाहिए जो उन्होंने संविधान सभा में दिए थे?
अब भी समय है, अम्बेडकर की बात को मन लिया जाए तो दलित छात्रों को घृणित राजनीति की चौसर पर बलि चढ़ने से रोका जा सकता है।
हम जानते हैं कि धूर्त राजनीतिक पार्टियां ऐसा हरगिज नहीं होने देंगी किंतु उन्हें मालूम नहीं है कि यह आग धीरे-धीरे उनके दरवाजे तक भी पहुंच जाएगी! उस दिन क्या होगा, जब उनका अपना लड़का या लड़की किसी शैक्षणिक संस्थान की छत से कूद कर जान देगा?
जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हम सबको दलितों की आत्महत्या जैसी गंभीर समस्या को हल करने में ठोस कार्य करना चाहिए। कम से कम इस विचार के पक्ष में वातावरण तो तैयार करना ही चाहिए।



