Saturday, February 24, 2024
spot_img

13. रोमन साम्राज्य में ईसाइयों को प्राणदण्ड

यीशू के भयग्रस्त अनुयायियों ने राज्याधिकारियों के भय से यीशू के अंतिम क्षणों में उन्हें अपना मानने से मना कर दिया था किंतु यीशू की मृत्यु के कुछ समय बाद ईसा मसीह के बारह प्रमुख शिष्यों ने ईसाई मत का प्रचार करना आरम्भ किया। इन शिष्यों ने एक दूसरे से लगभग स्वतंत्र रहकर ईसा मसीह के संदेश यहूदियों एवं गैर यहूदियों में पहुँचाए।

इस कारण ईसा मसीह की शिक्षाओं के कई रूप प्रचलित हो गए। इन 12 शिष्यों ने अपने-अपने उत्तराधिकारी नियुक्त किए जिन्हें ‘बिशप’ कहा जाता था। उन्हीं दिनों सेंट पॉलुस अथवा संत पॉल नामक एक ईसाई संत हुआ। वह ईसा मसीह के 12 शिष्यों में सम्मिलित नहीं था किंतु उसे यहूदी जगत में ‘गोस्पल‘ का प्रचार करने में सर्वाधिक सफलता प्राप्त हुई। गोस्पल उस शुभ संदेश को कहते हैं जो ईसा मसीह ने दिया था। यह शुभ संदेश यह है कि- ‘धरती पर ईश्वर का राज्य आ रहा है।’

बहुत से लोगों का विचार है कि संत पॉल ने जिस ईसाइयत का प्रचार किया वह यीशू के उपदेशों से बहुत भिन्न है। संत पॉल एक योग्य एवं विद्वान व्यक्ति था किंतु वह यीशू की तरह सामाजिक विद्रोही नहीं था। अर्थात् पॉल ने यहूदियों की सामाजिक परम्पराओं एवं मान्यताओं की आलोचना नहीं की तथा स्वयं को केवल धर्मिक शिक्षाओं पर केन्द्रित किया।

पॉल को अपने उद्देश्य में सफलता मिली और ईसाई मत के प्रचार का काम आगे बढ़ने लगा। कुछ ही समय में ईसाई धर्म जेरूसलम से निकलकर रोम तक जा पहुँचा। हालांकि ईसा मसीह के प्रमुख शिष्य सेंट पीटर ने रोम में चर्च की स्थापना की थी तथा सेंट पीटर ने अपने एक शिष्य को वहाँ का बिशप नियुक्त किया था। फिर भी रोम में जिस ईसाइयत का प्रचार हुआ, वह संत पॉल द्वारा प्रचारित की गई थी।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

बाइबिल की रचना

यहूदियों के तीन प्रमुख धार्मिक ग्रन्थ हैं जिन्हें तनख़, तालमुद तथा मिद्रश कहा जाता है। तनख की रचना ईसा से लगभग 1300 साल पहले की गई थी तथा समय-समय पर इसमें परिवर्तन होते रहे थे। इस पुस्तक का बहुत बड़ा हिस्सा मूसा ने लिखा था। बाइबिल की रचना तनख पर आधारित है जिसे बाइबिल का ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ अर्थात् पुराना नियम कहा जाता है। इसे ‘तालमुद’ एवं ‘तौरा’ भी कहते हैं। ई.50 से ई.100 के बीच बाइबिल का नवविधान अर्थात् ‘न्यू टेस्टामेंट’ लिखा गया। इसे ‘इंजील’ भी कहा जाता है।

इसमें ईसा मसीह का जीवन परिचय और उनके उपदेशों का वर्णन है। इसकी मूल भाषा ‘अराम’ तथा ‘ग्रीक’ थी। न्यू टेस्टामेंट को ईसा मसीह के चार शिष्यों ने लिखा था जिनके नाम इस प्रकार हैं- मत्ती, लूका, यूहन्ना और मरकुस। ईसाई धर्म का आरम्भ ‘न्यू टेस्टामेंट’ से माना जाता है। न्यू टेस्टामेंट, बाइबिल का दूसरा भाग या उत्तरार्ध है जिसमें यीशु मसीह की जीवनी, शिक्षाएं, और उनके शिष्यों द्वारा किया गया धर्म-प्रचार सम्मिलित हैं।

न्यू टेस्टामेंट में 27 पुस्तकें हैं जो तीन भागों में विभक्त हैं- (1.)  सुसमाचार- चार, (2) कार्य- एक और (3.) पत्रियाँ- बाईस। बाईस पत्रियों में 14 पॉल से 7-कैथोलिक से तथा 1 इल्हाम से सम्बन्धित हैं। न्यूटेस्टामेंट की इन 27 पुस्तकों को ईसाई धर्म में लगभग सर्वमान्य रूप से मान्यता दी गई है।

ई.400 में संत जेरोम ने बाइबिल का ‘लैटिन’ भाषा में अनुवाद प्रस्तुत किया। इसे ‘वुलगाता’ कहा जाता है। शताब्दियों तक बाइबिल का यही रूप प्रचलित रहा। कैथोलिक बाइबिल के ओल्डटेस्टामेंट में 46 तथा न्यू टेस्टामेंट में 27 ग्रंथ हैं। प्रोटेस्टेंट बाइबिल के ओल्डटेस्टामेंट में 39 तथा न्यू टेस्टामेंट में 27 ग्रंथ हैं। ऑर्थोडॉक्स बाइबिल के ओल्डटेस्टामेंट में 49 तथा न्यूटेस्टामेंट में 27 ग्रंथ सम्मिलित हैं।

सुसमाचार

ईसाई धर्म में, सुसमाचार या गॉस्पेल, जिसे इस्लाम में इंजील भी कहा जाता है, परमेश्वर के शासन के आगमन के समाचार को कहते हैं। यह मूलतः एक वर्णनात्मक कथा है जिसमें यीशु मसीह, उनके जन्म, उनके जीवन, सूली पर चढ़ाये जाने और पुनरुत्थान की कथा बताई गई है। बाइबल के विभिन्न अनुवादों में इसे शुभसंदेश भी कहा गया है, जो कि यूनानी शब्द ‘यूआनजेलिऑन’ का पुरानी अंग्रेजी में किया गया अनुवाद है। सुसमाचार की कथा का सार, बाइबल क उन चार प्रारम्भिक संस्करणों में पाया जाता है जिन्हें ईसा के चार शिष्यों मत्ती, मरकुस, लुका तथा यूहन्ना ने लिखा है।

ईसाई प्रचारकों को मृत्यु-दण्ड

रोमन लोगों ने आरम्भ में ईसाई धर्म पर कोई ध्यान नहीं दिया। उन्होंने समझा  कि यह भी यहूदी धर्म का कोई सम्प्रदाय होगा। धीरे-धीरे ईसाइयों का साहस बढ़ने लगा। वे दूसरे समस्त मतों के विरोधी बन गए। उन्होंने प्राचीन रोमन देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की पूजा करने से मना कर दिया। यहाँ तक कि रोम के सम्राट की मूर्ति की पूजा करने से भी मना कर दिया।

इसलिए रोमन लोग ईसाइयों को झगड़ालू और संकीर्ण मनोवृत्ति वाला समझने लगे। सम्राट की मूर्ति के समक्ष सिर नहीं झुकाना राजद्रोह समझा गया तथा इसके लिए बहुत से ईसाइयों को मृत्युदण्ड दिया गया। ईसाई लोग मनोरंजन के उद्देश्य से होने वाली पशुओं और मनुष्यों की लड़ाइयों का भी विरोध करते थे।

जबकि यह रोमन लोगों की हजारों साल पुरानी परम्परा थी तथा इस काल तक आते-आते रोमन लोगों के लिए धर्म का रूप धारण कर चुकी थी। इस कारण ईसाई प्रचारकों को राज्य एवं प्रजा दोनों की तरफ से सताया जाने लगा और उनकी सम्पत्तियां जब्त की जाने लगीं। बहुत से ईसाइयों को शेरों के सामने फैंक दिया गया।

एण्ड्रोक्लस एण्ड लॉयन

 रोमन ईसाई साहित्य में एक यवन साधु और एक सिंह की कथा मिलती है जिसे ब्रिटिश लेखक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने अपने सुप्रसिद्ध नाटक ‘एण्ड्रोक्लस एण्ड लॉयन’ में बहुत मार्मिक ढंग से लिखा है। यह कथा उस काल की रोमन सभ्यता पर प्रकाश डालती है और ईसा की प्रथम तीन शताब्दियों में रोमन साम्राज्य में ईसाइयों पर हुए अत्याचारों को भी दर्शाती है।

इस कथा के अनुसार एण्ड्रोक्लस नामक ईसाई साधु को एक बार जंगल में एक सिंह मिला जिसके अगले पैर में काँटा गड़ा हुआ था जिसके कारण वह लंगड़ाता हुआ चल रहा था और पीड़ा से कराह रहा था। एण्ड्रोक्लस को सिंह से भय लगा किंतु जब उसने सिंह को बार-बार अपना पंजा चाटते और पीड़ा से कराहते देखा तो एण्ड्रोलक्स ने साहस करके शेर के पंजे से कांटा निकाल दिया।

कुछ समय बाद वह साधु ‘ईसाई’ होने के आरोप में रोमन सैनिकों द्वारा पकड़ लिया गया तथा गुलामों की टोली के रूप में रोम ले जाया गया। यहाँ रोमन सम्राट अपने सामंतों के साथ कोलेाजियम में बैठकर गुलामों की लड़ाई देखता था। इस लड़ाई के दौरान गुलामों के शरीरों से रक्त की धार बह निकलती थी तथा उनके जीवित रहने तक उनके अंग-अंग कटकर भूमि पर गिरते रहते थे।

रोमन सम्राट एवं नागरिक उन गुलामों को तड़पते हुए देखकर बहुत आनंदित होते थे। यदि कोई गुलाम लड़ने से मना कर देता था तो उसे अखाड़े में भूखे शेर के समक्ष छोड़ दिया जाता था और रोमनवासी शेर को गुलाम-मनुष्य पर झपटते और उसके चीथड़े करके खाते हुए देखते। ईसाई साधु एण्ड्रोक्लस को भी इसी कोलोजियम में लाया गया तथा उसे किसी दूसरे आदमी से लड़ने के लिए कहा गया।

दुबले-पतले एण्ड्रोक्लस ने लड़ने से मना कर दिया। इस पर एण्ड्रोक्लस को भूखे सिंह के समक्ष धकेला गया। पिंजरे में बंद भूखा सिंह दहाड़कर अखाड़े में कूदा किंतु जैसे ही सिंह ने उस साधु को देखा तो वह शांत होकर अपने पंजे सिकोड़कर बैठ गया और अपना वही पंजा साधु की ओर बढ़ा दिया।

इस दृश्य को देखकर सम्राट बहुत अचम्भित हुआ उसने एण्ड्रोक्लस तथा सिंह को मुक्त कर दिया। ईसाई साधु उस सिंह को लेकर जंगल की तरफ चला गया।

धर्म के लिए बलिदान

ईसाई प्रचारकों ने रोमन शासकों द्वारा किए जा रहे इन अत्याचारों को धर्म के लिए आवश्क बलिदान माना और वे सहर्ष अपने प्राणों का उत्सर्ग करने को तैयार हो गए। ईसाई प्रचारकों के इस धैर्य-पूर्ण आचरण ने रोम के लोगों को प्रभावित किया और वे ईसाइयों की बातों को सुनने लगे जिसका परिणाम यह हुआ कि बहुत से रोमनवासी अपना प्राचीन धर्म छोड़कर ईसाई बनने लगे।

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohan Lal Gupta is a renowned historian from India. He has written more than 100 books on various subjects.

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

21,585FansLike
2,651FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles

// disable viewing page source