Monday, January 24, 2022

2. जावा द्वीप का प्रारम्भिक इतिहास

जावा द्वीप का प्रारम्भिक इतिहास

भारतीय संस्कृत साहित्य में इस द्वीप का उल्लेख यवद्वीप के नाम से हुआ है जहाँ चावल एवं स्वर्ण प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था। चीनी संदर्भों के अनुसार जावा में लगभग 2 शताब्दी ईस्वी पूर्व में भारतीय लोग पहुंच चुके थे। ये लोग भारत के कलिंग राज्य से आए थे। डॉ. क्रोम नामक डच पुरातत्ववेत्ता के अनुसार हिन्दुओं के जावा पहुचंने से पहले ही जावा के लोग चावल की खेती करते थे। वे मछली पकड़ने, कपड़ा बुनने, वाद्ययंत्र बजाने, ज्योतिष जानने आदि कलाओं को जानते थे। जब भारतीय हिन्दू यहाँ पहुंचे तो यहाँ के लोगों ने हिन्दू विश्वासों एवं संस्कृति को अपना लिया और जावा की पुरानी संस्कृति भी उसमें घुल-मिल गई। दूसरी शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में हिन्दू राजा देववर्मन ने जावा द्वीप पर प्रबल हिन्दू राज्य की स्थापना की जो चौथी-पांचवी शताब्दी ईस्वी तक फलता-फूलता रहा। चीनी यात्री फाह्यान 400 शताब्दी ईस्वी में भारत आया था। जब वह ई. 412 में श्रीलंका होता हुआ समुद्र के रास्ते से चीन लौट रहा था, तब उसका जहाज समुद्रों में भटक गया तथा लगभग 100 दिनों तक समुद्री लहरों पर हिचकोले खाता हुआ जावा द्वीप पर पहुंचा। इस द्वीप पर उसने वैदिक एवं शैव धर्र्मों को मानने वाले लोगों को निवास करते हुए पाया।

गुप्तकाल में जावा एवं अन्य ईस्ट-इण्डीज द्वीपों पर भारतीय

राजाओं का प्रसार

भारत में ई. 320 से 495 तक गुप्तवंश के राजाओं का शासन रहा जिसे भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल कहा जाता है। उस काल में बौद्ध धर्म की जगह वैष्णव धर्म का उन्नयन किया गया। उस काल में सुमात्रा, जावा, बाली, बोर्नियो, चम्पा, कम्बोडिया, मलाया तथा मलक्का आदि द्वीपों में भारतीय भाषा, साहित्य तथा शिक्षा का खूब प्रचार हुआ। इन द्वीपों में नए सिरे से हिन्दू राज्यों की स्थापना हुई। जावा की एक अनुश्रुति के अनुसार इस काल में गुजरात के एक राजकुमार ने कई हजार मनुष्यों के साथ समुद्र पार कर जावा में उपनिवेश की स्थापना की।

गुप्त काल में ताम्रलिप्ति बंगाल का प्रसिद्ध बन्दरगाह था। उत्तरी भारत का सारा व्यापार इसी बन्दरगाह द्वारा चीन, बर्मा तथा पूर्वी-द्वीप-समूह से होता था। इन देशों के साथ दक्षिण-भारत के राज्यों से भी व्यापार होता था। यह व्यापार गोदावरी तथा कृष्णा नदियों के मुहानों पर स्थित बन्दरगाहों के द्वारा होता था। इस प्रकार गुप्तकाल में पूर्वी द्वीप समूहों के साथ भारत के घनिष्ठ राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हुए। इन द्वीपों में भारतीय सामाजिक प्रथाओं, धर्म, कला तथा शासन पद्धति का अनुसरण होने लगा। डॉ. अल्तेकर ने लिखा है- ‘यदि एक ओर भारत और दूसरी ओर चीन के बीच कोई सांस्कृतिक एकता विद्यमान है और यदि मूल्यवान स्मारक, जो भारत की संस्कृति के गौरव के मूक साक्षी हैं, समस्त इंडोचीन (विएतनाम), जावा, सुमात्रा तथा बोर्निया में विकीर्ण परिलक्षित होते हैं तो इसका श्रेय गुप्तकाल को ही प्राप्त है, जिसने भारतीय संस्कृति को बाहर विस्तारित करने की प्रेरणा प्रदान की।’

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जावा में शैलेन्द्र राजवंश का उदय (मेदांग राज्य)

चौथी शताब्दी ईस्वी में जब भारत में गुप्त राजाओं का राज्य विस्तार पा रहा था, जावा द्वीप पर शैलेन्द्र राजवंश की स्थापना हुई। यह राज्य मलाया (मलेशिया), सुमात्रा, जावा, बाली तथा बोर्नियो द्वीपों पर विस्तृत था। मलाया में उससे पहले भी हिन्दू बस्तियां थीं किंतु उनके राजनीतिक स्वरूप की जानकारी नहीं मिलती है। शैलेन्द्र साम्राज्य 11वीं शताब्दी ईस्वी तक चलता रहा। दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य के राजा राजेन्द्र चोल ने 11वीं शताब्दी ईस्वी में इण्डोनेशिया के शैलेन्द्र राजवंश का अंत कर दिया। चोल राजा दक्षिण भारत से हजारों किलोमीटर दूर के क्षेत्र पर मजबूती से नियंत्रण स्थापित नहीं कर पाए। इसलिए 12वीं शताब्दी में एक बार पुनः शैलेन्द्र राजवंश ने अपनी सत्ता विस्तृत कर ली। शैलेन्द्र राजवंश के राजा बौद्ध धर्म के अनुयायी हो गए थे। इसलिए उन्होंने जावा में कई बौद्ध मंदिरों एवं विहारों का निर्माण करवाया। उनके द्वारा निर्मित सर्वाधिक महत्वपूर्ण बौद्ध मठ नालंदा कहलाता था तथा सर्वाधिक महत्वपूर्ण विहार नागपट्टनम कहलाता था। ये दोनों स्थान जावा द्वीप में थे। शैलेन्द्र राजवंश ने चंडी कालासन (कालासन मंदिर) तथा बोरोबुदुर बौद्ध विहार का भी निर्माण करवाया।

कुछ शिलालेखों से प्रमाणित हुआ है कि जावा का शैलेन्द्र राज-परिवार प्राचीन मलाया भाषा का प्रयोग करता था। यह भाषा इस बात का प्रमाण है कि शैलेन्द्र राज-परिवार जावा में आने से पहले सुमात्रा द्वीप पर शासन करता था तथा यह श्रीविजय राजवंश से सम्बन्धित था। उसने मध्य जावा के स्थानीय शासकों को परास्त करके जावा द्वीप पर अधिकार किया। उन्होंने माताराम राज्य के संजय राजवंश को अपना जागीरदार बना लिया। शैलेन्द्रों की सत्ता का केन्द्र दक्षिण केडू था जो मगेलांग के निकट स्थित था। वर्तमान में यह योग्यकार्ता के उत्तर में स्थित है।

शैलेन्द्र राजवंश आरम्भ में शैव मत का अनुयायी था किंतु बाद में राजा संखरा (राकाई पनरबन अथवा पनंगकरन) द्वारा महायान बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिए जाने के बाद बौद्ध हो गया था। राजा संखरा के शिलालेख, सोजोमेर्तो शिलालेख एवं चरित परह्यंगान ग्रंथ के के अनुसार परवर्ती काल के शैलेन्द्र राजा पनंगकरन के वंशज, बौद्ध धर्म की महायान शाखा के अनुयायी बने रहे। वे समरतुंग के शासन के अंत तक बौद्ध धर्म को राजकीय प्रश्रय देते रहे। सोजोमेर्तो शिलालेख अब उपलब्ध नहीं है।

सुंदा राज्य (पश्चिमी जावा)

सुंदा राज्य, पश्चिम जावा में स्थित हिन्दू राज्य था जिसकी स्थापना ई.669 में हुई। वर्तमान जकार्ता, पश्चिमी जावा, मध्य जावा का पश्चिमी भाग तथा बान्टेन इसी सुंदा राज्य में स्थित थे। ”बुजंग्गा माकिन” पाण्डुलिपि के अनुसार सुंदा राज्य की पूर्वी सीमा का निर्माण पामाली नदी नामक नदी करती थी जिसे अब ब्रेब्स नदी कहा जाता है। मध्य जावा में इसकी सीमा में सारायू नामक नदी बहती थी। ई.1579 में इस राज्य को मध्य जावा के मुस्लिम शासकों ने नष्ट कर दिया।

संजय राजवंश (माताराम राज्य)

संजय राजवंश एक प्राचीन जावाई राजवंश था। इस वंश के राजाओं ने जिस राज्य की स्थापना की, वह माताराम राज्य कहलाया। संभवतः जावा द्वीप की मातृ-सत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के कारण इस राज्य को माताराम कहा गया। माताराम राज्य की स्थापना ब्रांटाज नदी की घाटी में हुई थी। यहाँ की भूमि उपजाऊ थी और खेती प्रचुरता से होती थी। कंग्गल लेख के अनुसार इस राजवंश की स्थापना ई.732 में संजय नामक राजा ने की। यह शिलालेख मागेलांग नामक नगर के दक्षिण-पश्चिम में मिला है। इसकी लिपि दक्षिण भारत के तत्कालीन पल्लव शासकों द्वारा प्रयुक्त होने वाली लिपि है तथा इसकी भाषा संस्कृत है। इस शिलालेख में कुंजरकुंजा क्षेत्र की पहाड़ी पर शिवलिंग स्थापित किए जाने के बारे में जानकारी दी गई है। इस शिलालेख में कहा गया है कि राजा सन्न ने इस द्वीप पर फिर से अधिकार किया तथा उसने लम्बे समय तक बुद्धिमत्ता पूर्वक एवं कौशल पूर्वक राज्य किया। राजा सन्न की मृत्यु के बाद राजवंश की एकता भंग हो गई जिससे राज्य खण्डित होने लगा किंतु स्वर्गीय राजा सन्न की बहिन सन्नह के पुत्र संजय ने सत्ता संभाली। उसने राज्य में धर्म, साहित्य तथा विविध कलाओं का प्रचार किया तथा सैन्य शक्ति में वृद्धि की। उसने आसपास के क्षेत्रों को अपने राज्य में मिला लिया तथा जनता को सुखी एवं समृद्ध बनाने का प्रयास किया। राजा सन्न एवं संजय को ”चरित परहयंगान” भी कहा जाता है।

पश्चवर्ती काल की एक पुस्तक के अनुसार राजा सुन्न को गलुह के राजा पुरबासोरा ने परास्त कर दिया। इसलिए उसे मेरापी के पर्वत में शरण लेनी पड़ी। संजय ने उसके खोए हुए राज्य को फिर से जीता तथा पश्चिमी जावा, मध्य जावा, पूर्वी जावा एवं बाली तक अपना राज्य फैला लिया। संजय ने मलयु तथा केलिंग परह्यंगान के राजा ”संग श्रीविजय” से भी युद्ध किया। इसके बाद की अवधि में शैलेन्द्र राज्य द्वारा संजय राज्य को उत्तरी जावा में धकेल दिया गया। कालासन शिलालेख के अनुसार शैलेन्द्र राज्य का उत्थान ई.778 के लगभग हुआ था। इस काल में संजय राज्य एवं शैलेन्द्र राज्य एक दूसरे के पड़ौस में स्थित थे और यह काल शांति, सहयोग एवं सहअस्तित्व से युक्त था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि संजय राजवंश नामक कोई वंश नहीं था, केवल शैलेन्द्र राजवंश था जो मध्य जावा में शासन करता था। इस राज्य को मेदांग कहा जाता था। इसकी राजधानी माताराम क्षेत्र में थी तथा इसके शासक शैलेन्द्र वंश के थे। संजय वंश के राजा भी इसी शैलेन्द्र राजवंश से निकले थे।

संजय राजवंश के राजा राकाई पिकातान का विवाह शैलेन्द्र वंश के राजा समरतुंग की पुत्री प्रमोदवर्द्धिनी (ई.833-56) से हुआ। समय के साथ संजय राजवंश का प्रभाव माताराम राज्य में बढ़ता गया तथा वे बौद्ध धर्म मानने वाले शैलेन्द्र राज्य को प्रतिस्थापित करते रहे। राकाई पिकातान ने शैलेन्द्र वंश के राजा समरतुंग के पुत्र बालापुत्र को उसके राज्य से निकाल दिया जो कि राकाई पिकातान की रानी प्रमोदवर्द्धिनी का भाई था। जब मध्य जावा से शैलेंद्र वंश के राजा बालापुत्र का राज्य समाप्त हो गया तो वह भाग कर सुमात्रा चला गया। सुमात्रा में श्री विजय वंश के राजा राज्य करते थे। बालापुत्र ने श्री विजय साम्राज्य के तत्कालीन राजा को परास्त करके अपने अधीन कर लिया और स्वयं सुमात्रा का परमोच्च शासक बन गया। राजा पिकातान के काल में जावा में शैव धर्म को पुनः राजकीय प्रश्रय प्राप्त हुआ तथा यह संरक्षण मेदांग राज्य के अंत होने तक जारी रहा। संजय वंश के हिन्दू राजाओं ने मध्य जावा में विश्वविख्यात शिव मंदिर बनवाया तथा जावा द्वीप पर हिन्दू संस्कृति का प्रसार किया। राकाई पिकातान की रानी प्रमोदवर्द्धिनी ने 9वीं शताब्दी ईस्वी में विश्व प्रसिद्ध बोरोबुदुर बौद्ध विहार बनवाया। योग्यकार्ता, सुराकार्ता तथा मध्य जावा, माताराम राज्य के प्रमुख केन्द्र थे। यह अत्यंत ऊर्वर क्षेत्र में स्थित था इसलिए इस राज्य में परमबनन तथा बोरोबुदुर जैसे विशाल मंदिरों का निर्माण संभव हो सका। ई.850 तक संजय राजवंश, सम्पूर्ण माताराम राज्य का शासक बन गया।

ई.907 के बालितुंग शिलालेख से भी संजय राजवंश की जानकारी मिलती है। इसके अनुसार जब संजय वंश का कोई राजा मर जाता था तो वह दिव्य रूप धारण कर लेता था। इसी शिलालेख के आधार पर संजय राजवंश के राजाओं की सूची तैयार की गई है। ई.929 में संजय वंश का राजा मपु सिंदोक, माताराम राज्य की राजधानी को मध्य जावा से पूर्व जावा में ले गया। इसका कारण स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है किंतु अनुमान किया जाता है कि मेरापी ज्वालामुखी के फट पड़ने के कारण ऐसा किया गया होगा। यह भी अनुमान लगाया जाता है कि सुमात्रा के श्री विजय राज्य द्वारा मध्य जावा पर आक्रमण कर देने के कारण राजधानी को मध्य जावा से पूर्वी जावा में ले जाना पड़ा होगा। इसके साथ ही मध्य जावा से संजय राजवंश का शासन समाप्त हो गया तथा पूर्वी जावा में इस्याना नामक नवीन राजवंश का उदय हुआ।

चम्पा से सम्बन्ध

जावा राज्य का चम्पा राज्य से निकट का सम्बन्ध था जो कि दक्षिण-पूर्वी एशिया की मुख्य भूमि पर स्थित था। यह सम्बन्ध संजय राजवंश के उदय होने तक बना रहा। चम्पा के लोग चम कहलाते थे और उन्हें भारतीयकृत ऑस्ट्रोनेशियाई माना जाता है। मध्य जावा के द्वीप पर संजय राजवंश के काल में निर्मित मंदिरों की अनेक स्थापत्य विशेषताओं को चम मंदिरों में देखा जा सकता है।

इस्याना राजवंश

जावा द्वीप के माताराम हिन्दू राज्य के नए शासक वंश को इस्याना राजवंश कहा जाता है जिन्होंने संजय राजवंश के बाद सत्ता संभाली। इसकी स्थापना मपु सिंदोक ने की जो माताराम राज्य की राजधानी को मध्य जावा से पूर्वी जावा में ले गया। चोइदेस नामक लेखक ने लिखा है कि सिंदोक ने श्री इस्याना (विक्रमाधर्मोत्तुंगदेव) के नाम से पूर्वी जावा में नए राजवंश की स्थापना की। उसकी पुत्री इस्याना तुंगविजय, मपु सिंदोक की उत्तराधिकारी हुई। इस्याना तुंगविजय के बाद इस्याना तुंगविजय का पुत्र मकुतावंशवर्द्धन पूर्वी जावा का राजा हुआ। उसके बाद धर्मवंग्सा उसका उत्तराधिकारी हुआ। इस्याना राजवंश के काल में ई.996 में भारत-युद्ध गाथा का जावाई भाषा में अनुवाद किया गया। ई.1016-17 में सुमात्रा द्वीप के श्री विजय साम्राज्य के राजा ने जावा द्वीप पर आक्रमण किया तथा राजा धर्मवंग्स की राजधानी को नष्ट कर दिया। इस युद्ध में इस्याना राजवंश समाप्त हो गया।

केदिरी वंश (काहुरिपन राज्य)

ई.1019 में ऐरलंग्गा ने मेदांग राज्य को फिर से इकट्ठा किया तथा काहुरिपन नामक नया राज्य अस्तित्व में आया। ऐरलंग्गा ई.1042 तक शासन करता रहा। ऐरलिंग्गा के वंशज केदिरी कहलाए। माना जाता है कि काहुरिपन नामक राज्य, इस्याना राज्य की ही निरंतरता में था। केदिरी राजवंश ई.1222 तक शासन करता रहा।

सिंघसरी वंश

ई.1222 में जावा के केदिरी राजा नष्ट हो गए तथा सिंघसरी राजवंश अस्तित्व में आया। वे ई.1292 तक शासन करते रहे। इस क्षेत्र को वर्तमान में मलांग कहते है।

मजापहित साम्राज्य

ई.1294 में जावा में विजय नामक राजा ने मजापहित साम्राज्य की स्थापना की। यह इण्डोनेशिया का सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य था। इसकी राजधानी त्रोवुलान थी जो सुराबाया के निकट स्थित थी। ई.1350 में इस वंश में हायम वुरुक नामक राजा हुआ जो इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा था। उसका मंत्री ‘गजह मद’ वीर एवं बुद्धिमान व्यक्ति था। उसने शपथ ग्रहण की कि जब तक वह सम्पूर्ण इण्डोनेशिया द्वीप समूह को मजापहित साम्राज्य के अधीन नहीं लाएगा, तब तक वह अपने भोजन में पलापा (मसाले) का उपयोग नहीं करेगा। निश्चत ही उसने अपनी शपथ पूरी की जिसके कारण मजापहित साम्राज्य में वह सम्पूर्ण क्षेत्र सम्मिलित हो गया जो वर्तमान में इण्डोनेशिया गणतंत्र में सम्मिलित है। हालांकि उसका प्रत्यक्ष नियंत्रण केवल जावा, बाली एवं मदुरा पर था। हायम वुरुक ई.1389 तक शासन करता रहा। जब बीसवीं सदी में इण्डोनेशिया ने अपना पहला सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजा तो उसका नाम गजह मद के सम्मान में पलापा रखा गया। यह राजवंश ई.1478 तक हिन्दू राजवंश के रूप में शासन करता रहा।

देमक राज्य (मध्य जावा)

ई.1478 के पश्चात् जावा में इस्लाम की आंधी चलने लगी जिसके क्रूर झौंकों से मजापहित साम्राज्य के हिन्दू राजाओं ने इस्लाम स्वीकार कर लिया और सत्ता का केन्द्र मध्य जावा के सेमारांग से 30 किलोमीटर पूर्व में चला गया। यह जावा की हजारों साल पुरानी संस्कृति के लिए बहुत बड़ा आघात था। हजारों हिन्दू परिवार जावा द्वीप छोड़कर भाग गए और उन्होंने बाली द्वीप में ब्रोमो पर्वत (टेंगेर) के निकट जाकर शरण ली। पंद्रहवीं शताब्दी में जावा के लोगों ने जब इस्लाम स्वीकार किया तो एक बार पुनः जावा की संस्कृति में बदलाव आया और हिन्दू-जावाई संस्कृति में इस्लाम ने प्रवेश करके जावा की वर्तमान संस्कृति को जन्म दिया। देमक राज्य का पहला राजा रादेन पाताह था। उसका पिता मजापहित वंश का अंतिम राजा था तथा माता जेआम्पा, एक मुस्लिम स्त्री थी। दूसरा राजा पातिउनूस और तीसरा राजा ट्रेंग्गोनो हुआ।

हिन्दू राज्य केलापा का पतन

देमक राज्य में नौ ”वली सोंगो” नामक इस्लामिक नेता हुए जिन्होंने जावा द्वीप पर इस्लाम को फैलाया। ई.1527 में देमक सुल्तानों ने जावा द्वीप के अंतिम हिन्दू राज्य ”केलापा” को भी जीत लिया और उसका नाम ”जयकार्ता” रखा जो अब ”जकार्ता” कहलाता है। उन्हीं दिनों उत्तर भारत का सर्वाधिक प्रबल-प्रतापी हिन्दू शासक महाराणा सांगा, बर्बर मुस्लिम आक्रांता बाबर के हाथों पराजित हुआ।

पाजांग राज्य

ट्रेंग्गोनो का जामाता जोको टिंग्किर, देमक राज्य का अंतिम शासक सिद्ध हुआ। वह ई.1540 में देमक राज्य की राजधानी सोलो से 10 किलोमीटर पश्चिम में पाजांग में ले गया। वह टिंग्किर गांव का रहने वाला जोको (लड़का) था इसलिए उसे जोको टिंग्किर कहा जाता था।

मुस्लिम माताराम राज्य (द्वितीय)

माताराम राज्य (द्वितीय) में योग्यकार्ता तथा सुराकार्ता नामक क्षेत्र स्थित थे। पानेमबाहान सेनोपति माताराम (द्वितीय) राज्य का पहला राजा था। वह ई.1584 में राजा बना तथा ई.1601 तक राज्य करता रहा। उसका पिता पेमानाहान (की अगेंग माताराम) पाजांग राज्य का प्रमुख योद्धा था। उसका पड़दादा मजापहित राज्य का अंतिम राजा था। पानेमबाहान का अर्थ होता है दोनों हाथ जोड़कर नाक से स्पर्श करते हुए आदर पूर्वक प्रणाम करना। प्राचीन जावाई संस्कृति में बड़ों को प्रणाम करने का यही तरीका रहा है। सुल्तान पानेमबाहान का जावा में बहुत सम्मान था। उसके बचपन का नाम सुतोविजोयो था। उसकी जादुई शक्तियों और रहस्यमयी कारनामों की कहानियां कही जाती हैं। जिस महल में वह साधना करता था तथा अलौकिक शक्तियां प्राप्त करता था, वह योग्यकार्ता से 5 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। उसकी कब्र पर प्रतिवर्ष हजारों यात्री तीर्थयात्रा करते हैं तथा इसे माताराम साम्राज्य का पवित्र स्थल माना जाता है। ई.1613-45 तक इस वंश में आगुंग हान्योक्रोकुसुमो नामक शक्तिशाली राजा हुआ। उसकी मृत्यु के बाद माताराम राजवंश का ह्रास होने लगा।

जावा की प्राचीन संस्कृति पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव

जावा के प्राचीन साहित्य, कला एवं संस्कृति पर भारतीय साहित्य, कला एवं संस्कृति का प्रभाव प्रभूत मात्रा में देखा जा सकता है। जावा द्वीप पर बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू मंदिरों के खण्डहर बिखरे पड़े हैं। मध्य जावा में स्थित लारा जोंग्गरांग का मंदिर भारतीय शैली में बना है जिसमें राम कथा और कृष्णलीला के प्रसंग उत्कीर्ण हैं। जावा द्वीप की प्रतिमाओं में भारतीय आभूषणों की भरमार है जिनमें काल-मकर अधिक लोकप्रिय है। जावा का धार्मिक साहित्य रामायण एवं महाभारत की कथाओं पर आधारित है। भारतीय उपनिषदों का अध्यात्म एवं दर्शन तथा बाद के युगों में उत्पन्न होने वाले तांत्रिक विधानों का भी जावा की संस्कृति पर बहुतायत से प्रभाव है। शिव एवं विष्णु की संयुक्त प्रतिमाएं भी जावा द्वीप पर मिली हैं। जावा की कविताओं एवं गीतों पर भी भारतीय प्रभाव देखा जा सकता है। जावा के राजाओं के नाम भी भारतीय राजाओं से मिलते-जुलते हैं। उनके दरबारों में भी भारतीय राजपरम्पराएं प्रचलित थीं। वर्तमान में जावा द्वीप में 90 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या रहने के कारण हिन्दू संस्कृति के चिह्न विलुप्त प्रायः हैं किंतु हिन्दी एवं संस्कृत भाषा के कुछ शब्द जावा द्वीप पर आज भी प्रचलित हैं जो भारत से जावा के प्राचीन सम्बन्धों के मुंह बोलते प्रमाण हैं।

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