Tuesday, May 28, 2024
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1. इण्डोनेशियाई द्वीपों के पौराणिक संदर्भ

इण्डोनेशिया गणराज्य, दीपान्तर अर्थात् पार-महा-द्वीपीय (ट्रांसकॉन्टीनेन्टल) देश है जो दक्षिण-पूर्व एशिया और ओशिनिया (उष्णकटिबन्धीय प्रशान्त महासागर के द्वीप) क्षेत्रों में स्थित है। भारतीय पुराणों में इसे ”द्वीपान्तर भारत” अर्थात् समुद्र-पार-भारत कहा गया है। इसी कारण यूरोपीय इतिहासकारों एवं यात्रियों ने इसे इण्डोनेशिया कहा जो ”इण्डिया इन एशिया” की ध्वनि देता है। इण्डोनेशिया के निवासियों ने बाद में यही नाम अपना लिया। डचों द्वारा शासित औपनिवेशिक काल में इस द्वीप समूह को ईस्ट-इण्डीज कहा जाता था। वर्तमान में इण्डोनेशिया गणराज्य, दक्षिण-पूर्व एशिया का सबसे बड़ा देश है। इसकी स्थलीय सीमाएं पापुआ न्यू गिनी, पूर्वी तिमोर और मलेशिया (पुराना नाम मलाया) के साथ मिलती हैं, जबकि इसकी जलीय सीमाओं पर सिंगापुर, फिलीपींस, ऑस्ट्रेलिया तथा भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की जलीय सीमाएं स्थित हैं। यह संसार का एकमात्र देश है जो 17,508 द्वीपों में विस्तृत है। इनमें से बहुत से द्वीपों के नाम तक नहीं रखे गए हैं। हाल ही में यूएनओ ने इण्डोनेशिया से उसके द्वीपों की सूची, उनके नाम सहित मांगी थी। इण्डोनेशिया गणराज्य की जनसंख्या लगभग 23 करोड़ है। यह विश्व का चौथा सर्वाधिक जनसंख्या वाला एवं विश्व का सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या वाला देश है। इंडोनेशिया में 2 हजार से अधिक सांस्कृतिक समूहों के लोग निवास करते हैं। इन द्वीपों के अति प्राचीन इतिहास के कुछ साक्ष्य चीन देश के साहित्यिक संदर्भो में मिलते हैं।

भूगोलविदों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों एवं प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार ईस्ट-इण्डीज द्वीप किसी समय एशिया से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक जुड़े हुए थे। बाद में भूगर्भीय हलचलों के कारण टूट-टूट कर अर्द्धचंद्राकार आकृति में बिखर गए। इनमें से जावा, सुमात्रा, बाली तथा बोर्नियो बड़े द्वीप हैं, इनकी तुलना में अन्य द्वीप काफी छोटे हैं। भारतीय पौराणिक साहित्य के संदर्भ इण्डोनेशियाई द्वीपों से भारत का सम्बन्ध रामकथा के काल से भी पहले ले जाते हैं। उस काल में भारत की भौगोलिक सीमाएं जम्बूद्वीप (भारत) से लेकर सिंहल द्वीप (श्रीलंका), स्याम (थाइलैण्ड), यवद्वीप (जावा), स्वर्णद्वीप (सुमात्रा), मलय द्वीप (मलेशिया), शंखद्वीप (बोर्नियो), बाली तथा आंध्रालय (ऑस्ट्रेलिया) तक थीं। मलय द्वीप अथवा मलाया को अब मलेशिया कहते हैं, काम्बोज, कम्बोडिया (कम्पूचिया) के नाम से अलग देश है।

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उस काल के चम्पा राज्य के द्वीप वर्तमान में वियेतनाम और कम्बोडिया (कम्पूचिया) में बंट गए हैं। यहाँ आज भी संस्कृत भाषा व्यवहार में लाई जाती है। उस काल में भारत के राजा दूर-दूर के समुद्री द्वीपों पर अधिकार कर लेते थे। इनमें कुशद्वीप (अफ्रीका) तथा वाराहद्वीप (मेडागास्कर) प्रमुख हैं। रामकथा से पहले से लेकर सातवीं शताब्दी ईस्वी में इस्लाम का उदय होने तक इनमें से अधिकांश द्वीप भारत का हिस्सा थे तथा यहाँ की जनता हिन्दू थी। मेडागास्कर अब अफ्रीका महाद्वीप के दक्षिण-पूर्व में समुद्र के बीच स्थित एक विशाल द्वीप है तथा अलग राष्ट्र है।

वाल्मीकि रामायण में सप्तद्वीपों का वर्णन

वाल्मीकि रामायण में लिखा है- ‘यत्रवन्तो यवद्वीपः सप्तराज्योपशोभितः।।’ अर्थात् यवद्वीप में सात राज्य हैं। निश्चित रूप से उस काल में यवद्वीप (जावा), भारत की मुख्य भूमि के पर्याप्त निकट रहा होगा। इसके निकटवर्ती समुद्री क्षेत्र में अन्य द्वीप होंगे जिनमें से छः-सात द्वीप मानव-बस्तियों की उपस्थिति की दृष्टि से प्रमुख रहे होंगे।

वायुपुराण के छः द्वीप

वायुपुराण के एक श्लोक में कहा गया है- ‘अंगद्वीपं, यवद्वीपं, मलयद्वीपं, शंखद्वीपं, कुशद्वीपं वराहद्वीपमेव च।। एवं षडेषे कथिता अनुद्वीपाः समन्ततः। भारतं द्वीपदेशो वै दक्षिणे बहुविस्तरः।।’ अर्थात्- अंग द्वीप, यव द्वीप, मलय द्वीप, शंख द्वीप, कुश द्वीप तथा वराह द्वीप आदि, भारतवर्ष के अनुद्वीप हैं जो दक्षिण की ओर दूर तक फैले हुए हैं। इस काल में बाली द्वीप भी इन्हीं द्वीपों की शृंखला में गिना जाता था जहाँ भारतीय आर्यों की बस्तियां थीं और जहाँ मनुस्मृति के आधार पर सामाजिक एवं न्याय व्यवस्था स्थापित थी।

लंका के सम्बन्ध में पौराणिक मान्यताएं

लंका को आजकल सीलोन कहा जाता है जो कि सिंहल का अपभ्रंश है। पौराणिक काल में लंका को सिंहल द्वीप भी कहा जाता था। पौराणिक काल में लंका का आशय जिस द्वीप से होता था, उसमें मलय एवं सुमात्रा की भूमि भी सम्मिलित थी। ब्रह्माण्ड पुराण कहता है– ‘तथैव मलयद्वीपमेवमेव सुसंवृतम्। नित्यप्रमुदिता स्फीता लंकानाम महापुरी।’ इस श्लोक से ज्ञात होता है कि ब्रह्माण्ड पुराण के रचना काल में मलयद्वीप लंका के ठीक निकट उसी प्रकार स्थित रहा होगा जिस प्रकार आज लंका, भारत के निकट है। सुमात्रा द्वीप पर आज भी सोनी-लंका नामक एक स्थान है जो सुमात्रा के उत्तर-पूर्व वाले पर्वत के निकट समुद्र तट पर स्थित है। इस स्थान पर अत्धिक मात्रा में सुवर्ण उपलब्ध था। इस स्वर्ण की प्राप्ति पहले यक्षों ने और बाद में राक्षसों द्वारा की गई। नारद खण्ड में लिखा है– ‘भविष्यन्ति काले कालि दरिद्राः नृपमानवः तेऽत्र स्वर्णस्य लोभेन देवतादर्शनाय च।। नित्यं चैवागमिष्यन्ति त्यक्त्वा रक्षः कृत भयम्।’ अर्थात् कलियुग में राजा-प्रजा दरिद्री हो जाएंगे, इसलिए यहां लोभ के कारण नित्य ही आया करेंगे।

लंका के राजा रावण का नाना सुमाली, अपने राक्षसों को भगवान विष्णु के संहार से बचाने के लिए, लंका छोड़कर पाताल में जाकर रहने लगा। यह पाताल जावा-सुमात्रा-बाली आदि द्वीप समूह का कोई द्वीप होना अनुमानित किया जाता है। इस घटना के सही समय के बारे में यद्यपि अलग-अलग मान्यताएं हैं। आचार्य चतुरसेन ने इस विषय पर श्रमसाध्य शोध किया था। उनके अनुसार यह घटना आज से लगभग सात हजार साल पहले हुई। इन द्वीपों पर रामकथा के प्रसंगों वाली हजारों साल पुरानी प्रतिमाएं मिलती हैं। सुमात्रा द्वीप को भारतीय पौराणिक साहित्य में सुवर्ण द्वीप तथा अंगद्वीप कहा गया है जहाँ स्वर्ण के विशाल भण्डार उपलब्ध थे। यक्ष जाति के लोगों ने अपना स्वर्ण, स्वर्णद्वीप (इसे अंगद्वीप भी कहते थे) से लाकर सिंहल द्वीप (लंका) में रखा था। यक्षों का राजा कुबेर इस धन की रक्षा करता था।

राक्षसों के राजा रावण का बचपन ऑस्टेलिया में व्यतीत हुआ था जो तब आंध्रालय कहलाता था। रावण ने आन्ध्रालय से आकर लंका पर चढ़ाई की तथा लंका के राजा कुबेर को परास्त करके सोने की लंका पर अधिकार कर लिया तथा उसका पुष्पक विमान भी छीन लिया। इसके बाद राक्षस पुनः लंका में रहने लगे। कुबेर और रावण, दोनों ही विश्रवा के पुत्र थे। बाली एवं जावा द्वीपों पर आज भी राक्षसों की तरह दिखाई देने वाली मूर्तियां यत्र-तत्र दिखाई देती हैं। बाली द्वीप पर राक्षस जैसी दिखने वाली विशालाकाय मूर्तियों का बड़ा संग्रहालय है। इन मूर्तियों की उपस्थिति भारतीय पौराणिक साहित्य में वर्णित राक्षसों के इन द्वीपों से सम्बन्ध की पुष्टि करती हैं।

बोर्नियो में हिन्दू संस्कृति

शंखद्वीप (बोर्नियो) में हिन्दू संस्कृति का प्रसार पहली शताब्दी इस्वी में आरम्भ हुआ। चौथी शताब्दी ईस्वी में हिन्दू राजाओं ने बोर्नियो में अपनी सत्ता स्थापित की। बोर्नियो से चौथी शताब्दी ईस्वी के शिलालेख प्राप्त हुए हैं जिनसे बोर्नियो में उस काल में वैदिक धर्म के अस्तित्व में होने के साक्ष्य मिलते हैं। पांचवी शताब्दी ईस्वी में बोर्नियो एवं सुमात्रा द्वीपों पर जावा के शैलेन्द्र राजवंश का अधिकार हो गया। बोर्नियो में प्राप्त होने वाले खण्डहरों से भगवान शिव एवं बुद्ध की मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। लकड़ी का एक मंदिर भी प्राप्त हुआ है। बोर्नियो के स्थापत्य एवं कला पर भारतीय प्रभाव आज भी देखा जा सकता है।

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