Monday, July 15, 2024
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आगरा का लाल किला

शाहजहाँ दिल्ली छोड़कर आगरा चला गया! आगरा का लाल किला उसने नहीं बनवाया था किंतु फिर भी आगरा और लाल किला दोनों ही उसे पसंद थे।

शाहजहाँ चाहता था कि जिस तरह उसके पिता जहाँगीर ने अपनी वृद्धावस्था का अधिकांश समय काश्मीर में व्यतीत किया था, उसी तरह शाहजहाँ भी काश्मीर में जाकर रहे किंतु शाहजहाँ यह भी जानता था कि यदि उसने दिल्ली या आगरा की जगह कहीं और जाकर प्रवास किया तो शहजादे उसी तरह बगावत पर उतर आएंगे जिस तरह शाहजहाँ स्वयं, अपने पिता जहाँगीर की बीमारी की सूचना पाकर दक्खिन का मोर्चा छोड़कर दिल्ली भाग आया था।

अकबर के समय से लेकर शाहजहाँ द्वारा दिल्ली में लाल किला बनाए जाने तक आगरा ही मुगलों की मुख्य राजधानी रही थी। हालांकि अकबर आगरा के निकट फतेहपुर सीकरी के महलों में रहा करता था किंतु राजधानी तो उस समय भी आगरा ही थी।

शाहजहाँ ने अनुभव किया कि जब तक वह आगरा में अपनी राजधानी रखे हुए था, उसे सल्तनत सम्बन्धी मसलों में कोई विशेष कठिनाई नहीं हुई थी। अतः उसने स्वास्थ्य-लाभ करने एवं आबोहवा बदलने के लिए एक बार फिर आगरा जाने का विचार किया।

आगरा जाने का एक कारण और भी था। शाहजहाँ की चहेती बेगम मुमताज महल की कब्र भी आगरा में थी जिसे मरे अब 26 साल हो चुके थे। आगरा में रहते हुए वह कुछ पलों के लिए मुमताज की कब्र के पास जाकर बैठ सकता था जहाँ मुमताज की रूह सोई पड़ी थी तथा कयामत होने का इंतजार कर रही थी।

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शाहजहाँ यह भी चाहता था कि जिस ताजमहल को उसने इतने चाव से बनवाया था तथा धरती भर में जिसकी बराबरी कोई दूसरी इमारत नहीं कर सकती थी, उस ताजमहल को भी वह कुछ समय के लिए ही सही अपनी आँखों से निहार कर तृप्ति का अनुभव करे।

आगरा से शाहजहाँ के बचपन की स्मृतियां भी जुड़ी हुई थीं। आगरा के लाल किले में ही वह खेल-कूद कर बड़ा हुआ था। शाहजहाँ के बाबा अकबर ने लाल पत्थरों के इस विशाल दुर्ग का जीर्णोद्धार स्वयं खड़े रहकर अपनी आँखों के सामने करवाया था जिस पर हालांकि शाहजहाँ के पिता जहाँगीर ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था।

शाहजहाँ की ताजपोशी भी आगरा के लाल किले में हुई थी तथा शाहजहाँ ने लाल पत्थरों के इस भव्य दुर्ग के भीतर सफेद संगमरमर की कई इमारतें बनाई थीं। एक बार फिर से शाहजहाँ उन्हीं इमारतों में जाकर रहना चाहता था। इन सब कारणों से आगरा का लाल किला शाहजहाँ को बुला रहा था।

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इन सब कारणों से शाहजहाँ ने अपनी राजधानी को एक बार फिर दिल्ली से आगरा ले जाने का निर्णय लिया और नजूमियों से अच्छा वक्त निश्चित करवाकर एक दिन वह अपने समस्त हरम के साथ, हाथियों और पालकियों पर बैठकर आगरा के लिए कूच कर गया। हालांकि वह नहीं जानता था कि आगरा का लाल किला ही उसके जीवन का अंतिम पड़ाव है।

उसके हरम में रूप और यौवन के भार से लदी हुई न जाने कितने देशों की शहजादियाँ, राजकुमारियां और लौण्डियाएं भरी पड़ी थीं। वे भी अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार हाथियों पालकियों, बग्घियों और बहलियों पर सवार होकर बड़े ठसके से लाल किले से बाहर निकलीं।

यद्यपि उनके हाथियों के हौदों, पालकियों के झरोखों, बग्घियों तथा बहलियों को खूबसूरत झीने पर्दों से ढंक दिया गया था तथापि रूप के चौंधे दूर तक चमक मारते थे, जैसे रात की रानी बहुत दूर से अपनी उपस्थिति का अहसास करवाती है।
नंगी तलवारें लिए तातारी और हब्शी जनाना सिपाही इन पालकियों के चारों ओर सर्पिणी सी फुंफकारती रहती थीं जिन्हें पड़दा बेगम कहा जाता था। राजपूत योद्धा इन्हें उड़दा बेगणियां कहा करते थे।

जब पूरा हरम हाथियों एवं पालकियों आदि पर सवार हो गया और मुँह पर पर्दा डाले एवं हाथ में नंगी तलवारें लिए तातारी और हब्शी जनाना सिपाहियों ने मुगलिया हरम को चारों ओर से घेर लिया तब शाहजहाँ, शाही महल की ख्वाबगाह से बाहर निकला।

बादशाह ने ख्वाबगाह की दीवारों पर देश-देश से लाकर सजाए गए मोती, माणक, हीरे, पन्ने, लाल, याकूत, गोमेद तथा चमकीले अकीकों पर अंतिम दृष्टि डाली, जाने क्यों उसे लग रहा था कि ये सब उसे अंतिम बार देखने को मिल रहे हैं। आज के बाद ये दृश्य हमेशा-हमेशा के लिए उसकी आंखों से दूर हो जाऐंगे।

ख्वाबगाह की छतों पर लटके विलायती झाड़-फानूसों और फर्श पर बिछे ईरानी गलीचों से विदा लेते हुए भी शाहजहाँ का मन कमजोर पड़ रहा था, शायद वे भी अब हमेशा के लिए उससे दूर होने जा रहे थे। इन्हीं फानूसों के नीचे और इन्हीं गलीचों के ऊपर शाहजहाँ ने जाने कितनी महफिलें सजाई थीं।

एक नजर उसने उन रंगीन शमादानों पर भी डाली जिनसे रौशनी और खुशबू की पिचकारियां सी छूटती रहती थीं। बूढ़ा शाहजहाँ चार कदम तेजी से चला और अपनी ख्वाबगाह से बाहर हो गया।

जब शाहजहाँ का हाथी, लाल किले के भीतर बसे शाहजहानाबाद से बाहर निकलने लगा तो शाहजहाँ ने बड़ी हसरत भरी दृष्टि से पीछे छूटते जा रहे बागीचों को देखा जिन्हें मुगल शहजादियों ने अपने हाथों से सजाया था और जिसके हाथों की मेहंदी की खूशबू आज भी इन बागीचों की मिट्टी में रची-बसी थी। जैसे-जैसे बादशाह का हाथी आगे बढ़ रहा था, दिल्ली का लाल किला पीछे छूटता जा रहा था और आगरा का लाल किला नजदीक आता जा रहा था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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