Saturday, February 24, 2024
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अध्याय – 23 (ब) : मुगलों का राज्य विस्तार

जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर

पानीपत के युद्ध के उपरान्त बाबर की समस्याएँ

पानीपत की लड़ाई में विजय प्राप्त करने के उपरान्त बाबर ने दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार स्थापित कर लिया परन्तु उसे अनेक समस्याओं का सामना करना था। उसकी प्रमुख समस्याएँ इस प्रकार से थीं-

(1.) जन साधारण में अविश्वास की समस्या: बाबर की पहली समस्या जन साधारण में विश्वास उत्पन्न करने की थी जो या तो अपने नगरों को छोड़कर भागे जा रहे थे या नगरों के फाटकों को बन्द करके अपनी सुरक्षा करने में लगे हुए थे। लोग तैमूर लंग के आक्रमण को भूले नहीं थे इसलिये मंगोल भारत में घृणा की दृष्टि से देखे जाते थे।

(2.) अराजकता की समस्या: शासन के प्रति जन साधारण में अविश्वास के कारण सरकारी कर्मचारी भी अपना काम छोड़कर बैठ गये। इस कारण चारों ओर अराजकता फैल गई। बाजारों में खाद्य सामग्री की कमी हो गई। अवसर पाकर चोर तथा डकैत जन साधारण को लूटने लगे।

(3.) अफगान सरदारों की समस्या: पानीपत के युद्ध में इब्राहीम लोदी की मृत्यु हो जाने से अफगानों का संगठन बिखर गया। इस कारण अफगान सरदार अपनी सेनाओं के साथ इधर-उधर घूम रहे थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। इनमें से अनेक सरदार छोटे-छोटे भू-भागों पर स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने के लिये अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने का प्रयास करने लगे।

(4.) बाबर के सैनिकों में घर लौटने की इच्छा: दिल्ली तथा आगरा विजय करने के पश्चात् बाबर के सैनिक तथा सरदार अपने घरों को लौट जाने के लिए आतुर हो रहे थे। यद्यपि बाबर ने दिल्ली तथा आगरा से प्राप्त विपुल धन अपने सैनिकों तथा सरदारों में मुक्त हस्त से बाँट दिया था परन्तु अब वे भारत में ठहरने के लिए तैयार नहीं थे। ये सैनिक पहाड़ियों तथा घाटियों के निवासी होने के कारण भारत की गर्मी को सहन नहीं कर पा रहे थे। चूंकि अधिकतर किसान अपनी खेतीबाड़ी छोड़कर भाग खड़े हुए थे इसलिये उत्तर भारत में खाने-पीने की सामग्री का बड़ा अभाव हो गया था। जब इन सैनिकों एवं सरदारों को यह ज्ञात हुआ कि बाबर ने भारत में रहने का निश्चय कर लिया है तब वे समझ गये कि उन्हें भी बहुत दिनों तक भारत में रहना पडे़गा और निरन्तर युद्ध तथा संघर्ष करना पडे़गा। चूंकि अब उनके पास पर्याप्त धन था इसलिये वे अपना शेष जीवन युद्धों में बिताने की बजाय आराम से अपने घरों में बिताना चाहते थे।

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(5.) राणा सांगा की समस्या: इन दिनों राजपूतों का नेता मेवाड़ का शासक राणा संग्रामसिंह था जिसे राणा सांगा भी कहते हैं। वह अट्ठारह युद्धों में विजय प्राप्त कर चुका। युद्धों में ही उसने अपनी एक आँख, एक भुजा तथा एक पैर खो दिये थे। उसके शरीर पर अस्सी घावों के चिह्न थे। वह अत्यंत महत्त्वाकांक्षी शासक था और लोदी साम्राज्य के ध्वंसावशेष पर अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था। पानीपत के युद्ध में वह भाग नहीं ले सका था क्योंकि उसे गुजरात के शासक मुजफ्फरशाह की ओर से आक्रमण की आशंका थी परन्तु अब मुजफ्फरशाह की मृत्यु हो चुकी थी और राणा का ध्यान दिल्ली तथा आगरा पर केन्द्रित था जहाँ पर बाबर ने अधिकार कर लिया था। राणा सांगा का अनुमान था कि बाबर अपने पूर्वज तैमूर की भांति दिल्ली को लूट-पाट कर काबुल लौट जाएगा परन्तु बाबर ने भारत में रहने का निश्चय कर लिया था। ऐसी स्थिति में राणा तथा बाबर में संघर्ष होना अनिवार्य था क्योंकि बाबर के निश्चय ने राणा सांगा की कामनाओं पर पानी फेर दिया था।

समस्याओं का समाधान

बाबर ने उपरोक्त समस्याओं का बड़ी सावधानी तथा चतुराई के साथ सामना किया।

(1.) जन साधारण में विश्वास की उत्पत्ति: बाबर ने जन साधारण में मंगोलों के शासन के प्रति विश्वास जागृत करने के लिये उदारता तथा सहानुभूति की नीति का अनुसरण किया और अपने व्यवहार से स्पष्ट कर दिया कि जो लोग उसकी शरण में आकर उसकी अधीनता स्वीकार कर लेंगे, उनके साथ अच्छा व्यवहार किया जायेगा तथा उन्हें नौकरी में समुचित पद भी दिये जायेंगे।

(3.) अफगान सरदारों को जागीरें: बाबर ने अफगान सरदारों को शांत करने तथा अपने पक्ष में करने के लिये उन्हें वचन दिया कि जो अफगान सरदार उसके स्वामित्व को स्वीकार कर लेंगे उनकी रक्षा की जायेगी और उन्हें बड़ी-बड़ी जागीरें दी जायेंगी। इस घोषणा का अफगान सरदारों पर अच्छा असर हुआ। बहुत से अफगान सरदार बाबर के समक्ष उपस्थित हो गये। बाबर ने उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें बड़ी-बड़ी जागीरें दे दीं। शेष अफगान सरदारों की समस्या को सुलझाने के लिए उसने अविजित भू-भागों को अपने सरदारों में बाँट दिया और उन्हें आदेश दिया कि वे विद्रोही अफगानों पर विजय प्राप्त करें और राज्य में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित करें। जो अफगान सरदार बड़े ही शक्तिशाली थे और सरलता से नियन्त्रण में नहीं लाये जा सकते थे उनका दमन बाद में करने का निर्णय लिया गया।

(4.) बाबर के सैनिकों में घर लौटने की इच्छा: बाबर ने अपने सैनिकों को अपने घरों को लौटने से रोकने के लिये अपने सैनिकों की एक सभा आयोजित की और उसमें ओजपूर्ण भाषण दिया। उसने अपने सैनिकों को समझाया कि अनेक वर्षों के परिश्रम से, कठिनाइयों का सामना करके, लम्बी यात्रा करके, अपनी सेना को युद्धों में झौंककर और भीषण हत्याएं करके हमने अल्लाह की कृपा से शत्रुओं के झुण्ड को परास्त किया है जिससे हम उनकी विशाल भूमि को प्राप्त कर सकें। अब वह कौनसी शक्ति है जो हमें विवश कर रही है, कौनसी ऐसी आवश्यकता उत्पन्न हो गई है कि हम ‘अकारण ही उन प्रदेशों को छोड़ दें जिन्हें हमने अपने जीवन को संकट में डालकर प्राप्त किया है!’ बाबर के इस ओजपूर्ण भाषण का उसके सैनिकों एवं सेनापतियों पर इतना प्रभाव पड़ा कि कुछ को छोड़कर शेष ने भारत में रहने और बाबर के उद्देश्य को पूरा करने का निश्चय कर लिया।

(5.) राणा सांगा से युद्ध का निश्चय: महत्वाकांक्षी राणा सांगा रूपी समस्या का समाधान एक ही तरह से हो सकता था कि बाबर सांगा को युद्ध में परास्त करे। अतः बाबर ने राणा सांगा पर आक्रमण करने का निश्चय किया। राणा सांगा से लोहा लेने के पूर्व बाबर ने उसके मार्ग में आने वाले धौलपुर, बयाना तथा ग्वालियर के छोटे-छोटे अफगान शासकों को भी नतमस्तक करने का निश्चय किया।

खनवा का युद्ध

पानीपत का प्रथम युद्ध बाबर के लिये भारत में पैर टिकाने के लिये पर्याप्त था किंतु साम्राज्य की स्थापना एवं विस्तार के लिये बाबर को कई युद्ध लड़ने पड़े। वह कभी भी भारत में शांति से शासन नहीं कर सका। बाबर का पूरा जीवन युद्धों की एक लम्बी शृंखला है। इन्हीं युद्धों को लड़ते हुए उसकी मृत्यु हुई। बाबर पानीपत का प्रथम युद्ध जीत चुका था तथा अब खनवा का युद्ध उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। यह युद्ध भी पानीपत के प्रथम युद्ध की भांति बाबर के जीवन के निर्णायक युद्धों में से एक है। खनवा युद्ध का प्रमुख कारण बाबर द्वारा भारत में ही रहने का निर्णय लेना था। इस कारण सांगा उसे भारत से बाहर निकालने के लिये उद्धत हो उठा।

बाबर का बयाना के दुर्ग पर अधिकार: बयाना मेवाड़ की सीमा पर स्थित था। इसे राजपूताने का फाटक कहा जाता था। इन दिनों बयाना पर आलम खाँ के छोटे भाई निजाम खाँ का अधिकार था। बयाना दुर्ग का सामरिक दृष्टि से बड़ा महत्त्व था। बयाना पर अधिकार कर लेने पर बाबर को अपने साम्राज्य की रक्षा करने में भी सुविधा होती और इसे आधार बनाकर वह राजपूताने में प्रवेश भी कर सकता था। इसलिये बाबर ने तार्दी बेग को बयाना पर आक्रमण करने के लिए भेजा परन्तु निजाम खाँ ने उसे मार भगाया। विवश होकर बाबर ने निजाम खाँ के साथ मैत्री करने का प्रयत्न किया। अंत में निजाम खाँ ने इस्लाम की रक्षा तथा काफिर राणा सांगा के विनाश के लिये बाबर से मैत्री कर ली।

बाबर का धौलपुर तथा ग्वालियर के दुर्गों पर अधिकार: बयाना में घट रही घटनाओं ने राणा की चिंताएं बढ़ा दीं। इसलिये वह भी अपनी सेनाओं के साथ आगे बढ़ा और रणथंभौर से थोड़ी दूरी पर स्थित कन्दर दुर्ग पर अधिकार करके बैठ गया। बाबर ने राणा की गतिविधियों को देखकर अनुमान लगा लिया कि राणा से अकेले पार पाना असंभव है। इसलिये उसने अफगान सरदारों को अपनी ओर मिलाने के लिये नया पासा फैंका। बाबर ने अपने युद्ध को ‘जेहाद’ या धर्मयुद्ध के नाम से पुकारा और अफगान सरदारों से अनुरोध किया कि वे इस्लाम की रक्षा के लिये अपनी जागीर छोड़कर सुरक्षित प्रान्तों में चले जायें जहाँ उन्हें उतनी ही बड़ी जागीर मिल जाएगी। प्रायः समस्त अफगान सरदारों ने बाबर के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार ग्वालियर, बयाना, धौलपुर तथा अन्य दुर्ग बाबर के अधिकार में आ गये जिनमें उसने मुगल सेनाएँ रख दीं।

राणा सांगा द्वारा बयाना पर अधिकार: अफगान सरदार हसन खाँ मेवाती ने बाबर के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। उसने इब्राहीम लोदी के भाई महमूद लोदी को इब्राहीम लोदी का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया और उसे दिल्ली के तख्त पर बैठाने के लिए राणा सांगा से सहायता मांगी। राणा सांगा ने हसन खाँ मेवाती का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। अब हसन खाँ मेवाती तथा राणा सांगा की संयुक्त सेनाएँ आगे बढ़ीं और उन्होंने बयाना पर अधिकार कर लिया।

सीकरी की पराजय: 11 फरवरी 1527 को बाबर ने आगरा से प्रस्थान किया। उसने सीकरी के निकट स्थित बड़ी झील के किनारे अपना खेमा लगाया और युद्ध की तैयारी करने लगा। राणा भी अपनी सेना लेकर सीकरी के पास आ गया। सांगा की सेना ने बाबर की सेना के एक अंग पर धावा बोलकर उसे छिन्न-भिन्न कर दिया। इससे बाबर के सैनिकों में निराशा फैल गई और उनका उत्साह भ¦ होने लगा। इसी समय कुछ अफगान सरदारों ने उपद्रव किया और वे बाबर का साथ छोड़कर चले गये। इससे बाबर की चिन्ता और बढ़ गई। उसने फिर से अपने सैनिकों की सभा बुलाई और उनके सामने पहले की ही तरह ओजपूर्ण भाषण देकर उनसे यह शपथ करवा ली कि मरते दम तक लड़ेंगे। बाबर ने सैनिकों के समक्ष, शराब नहीं पीने की शपथ ली तथा शराब पीने के सोने-चांॅदी के बर्तन तोड़कर गरीबों तथा फकीरों में बंटवा दिये। इससे बाबर के सैनिकों का उत्साह बढ़ गया और वे फिर से शत्रु का सामना करने के लिए कटिबद्ध हो गये।

युद्ध का आरम्भ: सीकरी से दस मील की दूरी पर कनवाह अथवा खनवा नामक स्थान है। इस स्थान पर 27 मार्च 1527 ई. को प्रातः साढ़े नौ बजे बाबर तथा राणा सांगा की सेनाओं में भीषण संघर्ष आरम्भ हुआ। बाबर ने खनवा के युद्ध में उसी प्रकार की व्यूह रचना की जिस प्रकार की व्यूह रचना उसने पानीपत के मैदान में की थी। उसने अपनी सेना के सामने गाड़ियों की कतार लगवाकर उन्हें लोहे की जंजीरों से बँधवा दिया। इन गाड़ियों की आड़ में उसने तोपें तथा बंदूक चलाने वालों को रखा जो शत्रु सैन्य पर गोलों तथा जलते हुए बारूद की वर्षा करते थे। उसने अपनी सेना को तीन भागों में विभक्त किया- दाहिना पक्ष, बांया पक्ष तथा मध्यभाग। दाहिने पक्ष का संचालन हुमायूँ, बायें का मेंहदी ख्वाजा और मध्य भाग का संचालन स्वयं बाबर के नेतृत्व में रखा गया। तोपों तथा बन्दूकों के संचालन का कार्य उस्ताद अली को सौंपा गया। सेना के दोनों सिरों पर बाबर ने तुलगम सैनिक रखे जिनका कार्य युद्ध के जम जाने पर दोनों ओर से घूम कर, शत्रु सैन्य पर पीछे से आक्रमण करना था।

राणा सांगा की पराजय: युद्ध का आरम्भ राजपूतों ने किया। उन्होंने बाबर की सेना के दाहिने पक्ष पर धावा बोलकर उसे अस्त-व्यस्त कर दिया। यह देखकर बाबर ने राजपूतों के बायें पक्ष पर अपने चुने हुए सैनिकों को लगा दिया। इससे युद्ध ने विकराल रूप ले लिया। थोड़ी ही देर में राजपूतों की सेना में घुसने के लिये वामपक्ष तथा मध्यभाग का मार्ग खुल गया। मुस्तफा रूमी ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए अपने तोपखाने को आगे बढ़ाया और राजपूत सेना पर गोलों तथा जलते हुए बारूद की वर्षा आरम्भ कर दी। मुगलों के बायें पक्ष पर भी भयानक युद्ध हो रहा था। इसी समय तुलगम सेना ने राजपूतों पर पीछे से आक्रमण किया। राजपूत सेना चारों ओर से घेर ली गई। राजपूतों के लिये तोपों की मार के समक्ष ठहरना असम्भव हो गया। वे तेजी से घटने लगे। राणा सांगा युद्ध में बुरी तरह घायल हो गया। राजपूत सेनापति राणा को रणक्षेत्र से निकाल कर ले गये। सांगा की सेना बुरी तरह परास्त हो गई।

राणा सांगा का निधन: राणा सांगा युद्ध के आरंभिक भाग में ही किसी हथियार की चपेट में आ जाने से बेहोश हो गया था। इसलिये उसके सरदार उसे रणक्षेत्र से निकालकर सुरक्षित स्थान पर ले गये। होश में आने पर सांगा को अपने सरदारों का यह कार्य उचित नहीं लगा। उसने फिर से युद्ध क्षेत्र में जाने की इच्छा प्रकट की इससे रुष्ट होकर कुछ सरदारों ने सांगा को जहर दे दिया जिससे कालपी में सांगा की मृत्यु हो गई। राणा का शव भरतपुर के निकट बसवा ले जाया गया और वहीं पर उसका अंतिम संस्कार किया गया।

खनवा के युद्ध में राजपूतों की पराजय के कारण

(1.) बाबर की तुलगम रणनीति: खनवा के मैदान में राजपूतों की पराजय का सबसे बड़ा कारण बाबर द्वारा अपनाई गई तुलगम रणनीति थी। उसने तुलगम सैनिकों के माध्यम से राजपूतों की सेना को चारों ओर से घेर लिया तथा राजपूत सेना के मध्य में घुसने का भी मार्ग बना लिया। इससे राजपूत सैनिक, आग बरसाती तोपों की मार के सामने ही रहे। उन्हें पीछे हटने का अवसर ही नहीं मिला। तुलगम सेना रक्षा के दृष्टिकोण से निर्बल होती है परन्तु तीव्र आक्रमण के लिये बड़ी उपयोगी होती है। जब बाबर की तुलगम सेना ने राजपूतों को पीछे से घेर लिया तब राजपूतों का भीषण संहार आरम्भ हो गया और वे परास्त हो गए।

(2.) तोपखाने का प्रयोग: बाबर की विजय का दूसरा कारण बाबर द्वारा प्रयुक्त तोपखाना था। राजपूत सैनिक तोपों के सामने लड़ने के अभ्यस्त नहीं थे। तोपों के सामने राजपूतों की प्रत्येक रणनीति एवं वीरता विफल हो गई। उनका अब तक का युद्ध अनुभव भी काम नहीं आया।

(3.) राणा सांगा की सेना की विशालता: बाबर की सेना से युद्ध करते समय जो गलती इब्राहीम लोदी ने की, लगभग वही गलती राणा सांगा ने भी की। वह बाबर की छोटी सेना से लड़ने के लिये विशाल सेना लेकर आ गया। बाबर की छोटी सेना बड़ी ही सुव्यस्थित थी। इससे उसका संचालन सुचारू रीति से हो सकता था। इसके विपरीत राणा सांगा की सेना अत्यन्त विशाल थी जिसका त्वरित संचालन करना अत्यंत कठिन था। जब सांगा की बड़ी सेना आगे से तोपखाने और पीछे से तुलगम सैनिकों के बीच में फंस गई तब वह चाह कर भी युद्ध क्षेत्र से नहीं हट सकी।

(4.) राणा सांगा की रणनीतिक भूल: राणा सांगा ने एक बहुत बड़ी रणनीतिक भूल यह की कि बयाना पर अधिकार कर लेने के उपरान्त उसने तुरन्त बाबर पर आक्रमण नहीं किया। इससे बाबर को सेना की व्यूहरचना के लिए काफी समय मिल गया। यदि राणा ने तुरन्त आक्रमण कर दिया होता तो बाबर को संभलने का अवसर ही नहीं मिलता। न वह अपना तोपखाना सजा पाता और न तुलगम सैनिकों को यथा स्थान नियुक्त कर पाता। ऐसी स्थिति में युद्ध का परिणाम कुछ और ही हो सकता था।

(5.) राणा सांगा का बेहोश हो जाना: खनवा के युद्ध में बाबर की विजय का बहुत बड़ा कारण युद्ध की प्रारम्भिक अवस्था में ही राणा सांगा का घायल होकर बेहोश हो जाना तथा रण-क्षेत्र से हटा लिया जाना था। सेना के मनोबल को बनाए रखने के लिए झाला नामक सरदार को राणा के वस्त्र पहनाकर उसे हाथी पर बिठा कर युद्ध का संचालन होता रहा। ऐसी स्थिति में राजपूत लोग राणा की योग्यता, उसके रण-कौशल, उसके अनुभव तथा उसके नेतृत्व से वंचित रहे।

खनवा के युद्ध के परिणाम

भारतीय इतिहास पर खनवा के युद्ध के दूरगामी प्रभाव हुए। इससे भारत के भविष्य का राजनीतिक परिदृश्य बदल गया।

(1.) राणा सांगा के प्रभाव को क्षति: इस युद्ध से पहले राणा सांगा लगातार मालवा, दिल्ली तथा गुजरात के राज्यों को परास्त करता हुआ अपना प्रभाव बढ़ा रहा था। उसने सीकरी के पास बाबर की सेना को भी मार कर भगा दिया था। इस कारण सांगा का प्रभाव बहुत बढ़-चढ़ गया था किंतु खनवा के युद्ध में मिली पराजय से राणा सांगा के प्रभाव को बड़ी क्षति पहुँची। वह युद्ध क्षेत्र में घायल हो गया। उसके असंतुष्ट सरदारों ने उसे विष देकर उसका अंत कर दिया।

(2.) राजपूतों के संघ का बिखराव: खनवा युद्ध में मिली पराजय के बाद राजपूतों का संघ बिखर गया। सांगा की पराजय के बाद राजपूतों का नेतृत्व करने वाला कोई प्रभावशाही हिन्दू नरेश नहीं रहा। इस कारण हिन्दुओं के प्रभाव को बड़ा धक्का लगा और पास-पड़ौस के मुसलमान राज्यों में राजपूतों का भय समाप्त हो गया।

(3.) हिन्दुओं की आशा पर तुषारापात: लोदी सल्तनत के कमजोर पड़ जाने पर हिन्दू शासक उत्तरी भारत में अपनी शक्ति बढ़ाने का जो स्वप्न देख रहे थे वह स्वप्न बिखर गया।

(4.) राजपूताना असुरक्षित: खनवा युद्ध की पराजय के बाद राजपूताना एक बार फिर असुरक्षित हो गया और उस पर पास-पड़ोस के राज्यों के आक्रमण आरम्भ हो गये। राजपूताना की स्वतन्त्रता फिर से खतरे में पड़ गई।

(5.) मुगल साम्राज्य की स्थापना की राह आसान: खनवा युद्ध ने मुगल साम्राज्य की स्थापना का मार्ग खोल दिया। अब बाबर की रुचि अफगानिस्तान से समाप्त होकर पूरी तरह भारत में हो गई। इस युद्ध के बाद बाबर ने गाजी की उपाधि धारण की। गाज का अर्थ होता है बिजली तथा गाजी का अर्थ होता है वह योद्धा जो काफिरों पर बिजली बन कर गिरे।

मेवात पर अधिकार

बाबर खनवा विजय के उपरान्त बयाना चला गया। यहाँ से वह राजपूताना के भीतर घुसना चाहता था परन्तु भीषण गर्मी के कारण वह मेवात (अलवर) से आगे नहीं बढ़ सका। बाबर ने थोड़े से ही प्रयास से मेवात पर अधिकार कर लिया। मेवात से बाबर सम्भल गया और वहाँ से चन्देरी पर आक्रमण करने की योजनाएँ बनाने लगा।

चन्देरी पर विजय

चन्देरी दुर्ग पर इन दिनों राणा सांगा के दुर्गपति मेदिनी राय का अधिकार था। चन्देरी उन दिनों सम्पन्न नगर था। चन्देरी के सामने 230 फुट ऊँची चट्टान पर चन्देरी का दुर्ग था। यह दुर्ग मालवा तथा बुन्देलखण्ड की सीमाओं पर स्थित था और मालवा से राजपूताना जाने वाली सड़क पर बना हुआ था। इस कारण चंदेरी व्यापारिक तथा सामरिक दोनों ही दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण था। राणा की पराजय के बाद भी मेदिनी राय ने बाबर के प्रभुत्व को स्वीकार नहीं किया। 29 जनवरी 1528 को बाबर अपनी सेना के साथ चन्देरी पहुँचा। बाबर ने अपने सैनिकों को युद्ध के लिये प्रेरित करने हेतु इस युद्ध को भी ‘जेहाद’ का स्वरूप दिया। दूसरे दिन बाबर ने चन्देरी के दुर्ग पर आक्रमण कर दिया। राजपूतों ने अपनी पराजय निश्चित जानकर अपनी स्त्रियों को मौत के घाट उतार दिया तथा मरते दम तक मुगलों का सामना करते हुए रणखेत रहे।  भीषण युद्ध के उपरान्त बाबर ने दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इस युद्ध में भी राजपूतों का भीषण संहार हुआ। अहमदशाह को चन्देरी का शासक नियुक्त किया गया। मेदिनी राय की दो कन्याएँ इस युद्ध में पकड़ी गईं। जिनमें से एक कामरान को और दूसरी हुमायूँ को दे दी गई। चंदेरी विजय बाबर की बड़ी विजयों मे से एक मानी जाती है। यहाँ से भी बाबर को विपुल धन राशि प्राप्त हुई।

घाघरा का युद्ध

बाबर अब तक पंजाब, दिल्ली, खनवा तथा चन्देरी के युद्ध जीत चुका था। अब वह रायसेन, भिलसा, सारंगपुर तथा चित्तौड़ पर आक्रमण करना चाहता था परन्तु इसी समय उसे अफगानों के उपद्रव की सूचना मिली। इसलिये वह अपनी योजना बदल कर अफगानों के दमन के लिए चल पड़ा। अफगान लोग भयभीत होकर बिहार तथा बंगाल की ओर भाग गये और महमूद लोदी की अध्यक्षता में संगठित होने लगे। महमूद लोदी, सुल्तान सिकन्दर लोदी का पुत्र और इब्राहीम लोदी का भाई था। पानीपत के युद्ध के उपरान्त हसन खाँ मेवाती तथा राणा सांगा ने उसे इब्राहीम लोदी का उत्तराधिकारी स्वीकार कर लिया था। खनवा के युद्ध में वह बाबर के विरुद्ध लड़ा भी था और परास्त होकर कुछ दिनों के लिये मेवाड़ चला गया जहाँ से वह बिहार पहुँचा और अफगानों को मुगलों के विरुद्ध संगठित करने लगा। अफगानों को दण्डित करने के लिये बाबर ने 20 जनवरी 1529 को आगरा से बिहार के लिये कूच किया। महमूद लोदी भी अपनी सेना के साथ गंगा नदी के किनारे-किनारे चुनार की ओर बढ़ा। 31 मार्च 1529 को बाबर चुनार पहुँच गया। बहुत से अफगान डरकर बाबर की शरण में आ गये और बहुत से अफगान बंगाल की ओर भाग गये। बाबर निरंतर आगे बढ़ता हुआ गंगा तथा कर्मनाशा नदी के संगम पर पहुँच गया।

अफगानों की पराजय: बाबर ने अफगानों से अन्तिम संघर्ष करने का निश्चय कर लिया। एक मई 1529 को उसने गंगा नदी को पार कर लिया। तीन दिन बाद उसकी सेना ने घाघरा नदी को पार करने का प्रयत्न किया। अफगानों ने उसे रोकने का भरसक प्रयास किया परन्तु बाबर की सेना नदी पार करने में सफल हो गई। 6 मई को घाघरा के तट पर अफगानों तथा मुगलों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में अफगान परास्त हो गये। बहुत से अफगान भयभीत होकर मैदान से भाग खड़े हुए। बाबर ने नसरतशाह को संधि करने के लिये विवश किया। नसरतशाह ने बाबर की अधीनता स्वीकार कर ली तथा भविष्य में विद्रोह नहीं करने का वचन दिया। यह बाबर की भारत में चौथी तथा अन्तिम विजय थी जिसके द्वारा बाबर सम्पूर्ण उत्तरी भारत का स्वामी बन गया।

निष्कर्ष

भारत में बाबर की उपलब्धियाँ तीन भागों में विभक्त की जा सकती हैं- सामरिक उपलब्धियाँ, राजनीतिक उपलब्धियाँ तथा सांस्कृतिक उपलब्धियाँ। बाबर ने पंजाब पर कम से कम पांच बार आक्रमण करके उसे अपने नियंत्रण में किया। उसने पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहीम लोदी को परास्त किया। खनवा के युद्ध में सांगा को परास्त किया। चंदेरी के युद्ध में मेदिनी राय को परास्त किया। घाघरा के युद्ध में अफगानों को परास्त किया। ये बाबर की शानदार सामरिक उपलब्धियाँ थीं। बाबर की राजनीतिक उपलब्धियाँ भी अत्यंत महत्वपूर्ण थीं। उसने दिल्ली सल्तनत को सदा के लिये समाप्त कर दिया। उसने भारत में मंगोलों के राज्य की स्थापना की जो अगले 200 वर्षों तक भारत पर शासन करते रहे। उसने हिन्दुओं को सदा के लिये राजनीतिक शक्ति बनने से वंचित कर दिया। उसने अफगानों को नष्ट प्रायः कर दिया किंतु वे पूरी तरह नष्ट नहीं हुए। उनमें अफगान राज्य के पुनरुत्थान की आशा अब भी जीवित बची थी। बाबर की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ रचनात्मक नहीं थीं किंतु विध्वंसात्मक अवश्य थीं। इस्लाम के सिपाही के रूप में उसने भारत में काफिर हिन्दुओं का बड़े पैमाने पर विनाश किया। उसने शियाओं का भी दमन किया। उसने भारत के कई महत्वपूर्ण मंदिरों को तोड़कर भारत को शानदार भवनों एवं स्थापत्य के नमूनों से वंचित कर दिया। जिस कार्य को 125 वर्ष पहले तैमूर लंग ने आरम्भ किया था, उस कार्य को बाबर ने पूरा किया। भारत में विशाल मुगल साम्राज्य के संस्थापक के रूप में वह विश्व इतिहास में अमर हो गया।

बाबर के अन्तिम दिन

बाबर की अस्वस्थता

24 जून 1529 को बाबर घाघरा से आगरा लौट आया। अफगानों के दमन के लिए प्रस्थान करने के पूर्व ही बाबर ने अपने पुत्र हुमायूँ को काबुल तथा बदख्शाँ की देखभाल करने के लिए भेज दिया था। आगरा लौटने पर उसने स्वयं भी काबुल की ओर प्रस्थान किया परन्तु वह केवल लाहौर तक ही जा पाया तथा गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। इतिहासकारों का मानना है कि शराब के अत्यधिक सेवन से बाबर का शरीर दुर्बल एवं बीमार हो गया था। इसलिये वह लाहौर से वापस आगरा लौट आया। इसी समय हुमायूँ को सूचना मिली कि प्रधानमन्त्री ख्वाजा निजामुद्दीन खलीफा, बाबर के बहनोई मीर मुहम्मद मेंहदी ख्वाजा को हुमायूँ के स्थान पर बाबर का उत्तराधिकारी बनाने का षड्यन्त्र रच रहा है। इसलिये हुमायूँ काबुल से चलकर आगरा आ गया। इस कारण प्रधानमन्त्री ख्वाजा निजामुद्दीन खलीफा का षड्यन्त्र सफल नहीं हुआ। कुछ समय बाद बाबर ने हुमायूँ को संभल का शासक बनाकर भेज दिया।

बाबर की मृत्यु

बाबर की मृत्यु के पीछे मुस्लिम इतिहासकारों ने एक मिथक गढ़ा है जिसके अनुसार 1530 ई. के प्रारम्भ में हुमायूं सम्भल में बीमार पड़ा और उसकी दशा चिंताजनक हो गई। हुमायूँ को आगरा लाया गया परन्तु हकीमों की समस्त औषधियाँ निष्फल सिद्ध हुईं। तब ज्योतिषियों ने बाबर को परामर्श दिया कि ऐसे अवसर पर किसी मूल्यवान वस्तु का त्याग करना चाहिए। बाबर ने अपने जीवन से अधिक मूल्यवान कोई दूसरी वस्तु नहीं समझी। उसने अपने पुत्र के पलंग की परिक्रमा की और उसके स्वस्थ हो जाने के लिए अल्लाह से दुआ मांगी। उसी दिन से हुमायूं का स्वास्थ्य सुधरने लगा और बाबर का स्वास्थ्य गिरने लगा। 26 दिसम्बर 1530 को आगरा में बाबर की मृत्यु हो गई।

आधुनिक इतिहासकार इस मिथक पर विश्वास नहीं करते। डॉ. एस. आर. शर्मा की खोज ने यह सिद्ध कर दिया है कि हुमायूँ की बीमारी ठीक हो जाने के छः माह बाद बाबर बीमार हुआ। बाबर की बीमारी का हुमायूँ की बीमारी से कोई सम्बन्ध नहीं था। बाबर के शव को पहले आगरा में दफनाया गया किंतु बाद में उसे काबुल ले जाया गया जहाँ उसे बाबर द्वारा पहले से ही नियत स्थान पर दफनाया गया।

हुमायूँ की उत्तराधिकारी के रूप में नियुक्ति

अपनी आँखें बन्द करने से पहले बाबर ने हुमायूँ को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया तथा उसे आदेश दिया कि वह अपने भाइयों के साथ सदैव सद्व्यवहार करे चाहे वे उसके साथ दुर्व्यवहार ही क्यों न करें। हुमायूँ ने अपने पिता की इस आज्ञा का आजन्म पालन किया। यद्यपि इस आज्ञा के कारण उसे बड़े कष्ट उठाने पड़े।

बाबर का चरित्र तथा उसके कार्यों का मूल्यांकन

बाबर में मंगोलों की क्रूरता, तुर्कों का साहस एवं ईरानियों की शिष्टता एक साथ मौजूद थे। इस कारण बाबर में अच्छे और बुरे कई विरोधी गुण एक साथ विद्यमान थे। उसके चरित्र तथा कार्यों का मूल्यांकन इस प्रकार से किया जा सकता है-

(1.) व्यक्ति के रूप में: बाबर अत्यंत महत्वाकांक्षी व्यक्ति था। वह अपने  माता-पिता का आज्ञाकारी पुत्र था किंतु अपने पिता के छोटे से राज्य से संतुष्ट नहीं था। उसने हुमायूँ के लिये अपने प्राणों की आहुति देकर पिता-पुत्र के प्रेम की मिसाल कायम की किंतु अपने चाचा अहमद मिर्जा से वह ईर्ष्या करता था तथा उसके राज्य को हड़पने के लिये उसने समरकंद पर कई बार आक्रमण किये। बाबर अपने मित्रों तथा साथियों को खुले हाथों से उपहार देता था किंतु अपने मामा महमूद खाँ से उसकी बिल्कुल नहीं बनती थी। वह दीन-दुखियों पर दया करता था और उन्हें दान देता था किंतु उसने हिन्दुओं पर कतई दया नहीं दिखाई। उसमें उच्चकोटि का पारिवारिक प्रेम था किंतु उसने निरीह हिन्दुओं के सिर कटवाकर उनके कटे हुए सिरों की मीनारें चिनवाईं।

(2.) पिता के रूप में: बाबर के मन में अपनी पत्नी तथा सन्तान के प्रति प्रगाढ़ स्नेह था। उसके चार पुत्र थे- हुमायूँ, कामरान, अस्करी तथा हिन्दाल। तीन पुत्रियां- गुलबदन बेगम, मासूमा बेगम तथा एक अन्य पुत्री भी थी। बाबर अपने समस्त परिवार से प्रेम करता था किंतु बड़े पुत्र हुमायूँ से विशेष प्रेम करता था। उसने हुमायूँ को सलाह दी थी कि संसार उसका है जो परिश्रम करता है। किसी भी आपत्ति का सामना करने से मत चूकना। परिश्रमहीनता तथा आराम बादशाह के लिये हानिकारक है।

(3.) साहित्य प्रेमी के रूप में: बाबर की साहित्य पढ़ने एवं लिखने में बड़ी रुचि थी। वह फारसी, अरबी तथा तुर्की भाषाओं का ज्ञाता था। वह तुर्की तथा फारसी भाषा में सुन्दर शैली में साहित्यिक रचनाएँ कर सकता था। बाबर ने कई पद्य ग्रन्थ लिखे। उसने एक नयी लेखन शैली को जन्म दिया जिसे ‘खते बाबरी’ कहा जाता है। तुर्की के सबसे बड़े कवि मीर अली शेर बेग के बाद बाबर को ही स्थान दिया जाता है। उसने गद्य शैली में अपनी आत्मकथा लिखी जिसे बाबरनामा अथवा तुजुक-ए-बाबरी कहा जाता है। इस ग्रंथ को विश्व के महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक माना जाता है। उसमें मनुष्य को परखने की अद्भुत क्षमता थी। अपने सैनिक अभियानों के दौरान उसने जिन देशों तथा जातियों को देखा, उनका सुन्दर तथा सजीव वर्णन किया। इस प्रकार फारसी, अरबी तथा तुर्की साहित्य के साथ-साथ विश्व के इतिहास लेखन में भी बाबर ने बहुमूल्य योगदान दिया।

(4.) प्रकृति प्रेमी के रूप में: बाबर कवितायें लिखता था इसलिये उसे प्रकृति से विशेष प्रेम था। उपवनों में अत्यन्त रुचि होने के कारण उसे ‘उपवनों का राजकुमार’ कहा गया है। वह उपवन लगाने की नई-नई योजनाएँ बनाता था तथा स्वयं भी उपवनों में अपने हाथ से काम करता था।

(5.) कला प्रेमी के रूप में: बाबर की काव्य कला के साथ-साथ संगीत कला में भी बड़ी रुचि थी। वह अच्छा कवि था तथा स्वयं भी अच्छी तरह गा सकता था। संगीत सुनने में भी उसकी रुचि थी।

(6.) भवन-निर्माता के रूप में: मस्जिदों तथा उपवनों के निर्माण में बाबर की बड़ी रुचि थी। उसने अयोध्या में रामजन्म भूमि पर बाबरी मस्जिद बनवाई। आगरा के लोदी किले में जामा मस्जिद बनवाई। पानीपत में काबुली बाग मस्जिद बनवाई। कश्मीर में निशात बाग बनवाया। लाहौर में शालीमार बाग बनवाया। पंजाब में पिंजोर बाग बनवाया। वह राजपूताने की सीमा पर ऐसे भवन बनवाना चाहता था जो ठण्डे हों। उसके आदेश से आगरा, सीकरी, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर तथा अन्य नगरों में अनेक भव्य भवनों का निर्माण किया गया।

(7.) सैनिक तथा सेनापति के रूप में: एक सेनापति के रूप में बाबर की सफलताएं उल्लेखनीय हैं। फरगना का शासक रहते हुए उसने समरकंद जीतने के लिये युद्धों की शुरुआत की। इसके बाद वह जीवन भर लड़ता रहा। अपनी आत्मकथा में उसने लिखा है कि उसने अपने जीवन में रमजान का त्यौहार दो बार एक ही जगह पर नहीं बनवाया। वह एक दुःसाहसी योद्धा था। वह कुशल तीरन्दाज तथा दक्ष घुड़सवार था। वह पराजय से कभी हतोत्साहित नहीं होता था और अपने लक्ष्य की पूर्ति में निरंतर संलग्न रहता था। उसमें सैन्य संचालन की अद्भुत क्षमता थी। युद्ध क्षेत्र में उसकी व्यूह रचना बड़ी अद्भुत होती थी और शत्रु को अस्त-व्यस्त कर देती थी। रणक्षेत्र में अपने को परिस्थितियों के अनुकूल बना लेने की उसमें अदभुत क्षमता थी। सैनिकों के हतोत्साहित हो जाने पर अपने ओजपूर्ण वक्तव्य द्वारा उनको उत्साहित करने की उसमें विलक्षण प्रतिभा थी।

(8.) शासक के रूप में: कहा जाता है कि बाबर में सामरिक तथा साहित्य प्रतिभा तो थी परन्तु प्रशासकीय प्रतिभा नहीं थी। उसने अफगानिस्तान अथवा भारत में किसी भी ऐसी शासकीय संस्था का निर्माण नहीं किया जिस पर उसके अपने व्यक्तित्त्व की छाप हो। वह जीवन भर युद्धों में इतना व्यस्त रहा कि वह शासकीय संस्थाओं के निर्माण के लिये समय नहीं निकाल सका। इतना होने पर भी यह कहना सही नहीं है कि एक शासक के रूप में बाबर असफल रहा। उसने शासकीय संस्थाओं का निर्माण भले ही नहीं किया हो किंतु उसने फरगना, समरकंद, काबुल, कन्दहार, गजनी तथा आगरा आदि जिन राज्यों पर भी शासन किया, दृढ़ता पूर्वक शासन किया। भारत में बाबर ने केवल चार वर्ष तक शासन किया। ये चार वर्ष निरंतर युद्धों में व्यतीत हुए। फिर भी बाबर ने आगरा से काबुल के बीच की सड़कों को सुरक्षित बनाया और प्रत्येक पन्द्रह मील की दूरी पर सरायों का निर्माण करवाया। इन चौकियों पर छः घुड़सवार नियुक्त किये गये जो यात्रियों की सुरक्षा का प्रबंध करते थे। बाबर ने डाक वितरण की व्यवस्था सुधारने का भी प्रयत्न किया। बाबर अपने मंत्रियों पर पूरा विश्वास रखता था और उन्हें कार्य करने की स्वतन्त्रता देता था। मंत्रियों को अपना कार्य ईमानदारी तथा जिम्मेदारी से करना पड़ता था।

(9.) इस्लाम के अनुयायी के रूप में: बाबर इस्लाम के सिद्धांतों में पूर्ण विश्वास रखता था। इस कारण उसमें मुस्लिम उलेमाओं तथा लेखकों के प्रति बड़ी श्रद्धा थी परन्तु राजनीतिक मामलों में वह उनके प्रभाव से मुक्त रहा। वह सुन्नी मुसलमान था इसलिये शियाओं को भी हिन्दुओं की तरह काफिर कहता था। हिन्दुओं के प्रति उसका दृष्टिकोण अत्यंत कठोर था। उसने हिन्दुओं के विरुद्ध अपने युद्धों को ‘जेहाद’ कहकर धार्मिक संकीर्णता एवं कट्टरता का परिचय दिया। उसने राजपूतों के सिर कटवाकर उनकी मीनारें खड़ी कीं और उन्हें अपनी ठोकरों से लुढ़काया। उसने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की जन्मभूमि पर बने मंदिर को तोड़कर वहाँ मस्जिद खड़ी करवाई। उसने मुसलमानों को तमगा नामक कर से मुक्त किया।

(10.) साम्राज्य निर्माता के रूप में: साम्राज्य निर्माता के रूप में बाबर का विश्व इतिहास में बड़ा स्थान है। उसने अफगानों तथा राजपूतों की शक्ति को छिन्न-भिन्न करके भारत में विशाल मुगल सल्तनत की स्थापना की जो आगे चलकर अकबर के समय में चरम पर पहुँची। बाबर के द्वारा स्थापित साम्राज्य लगभग 200 साल तक अस्तित्त्व में रहा। बाबर द्वारा स्थापित साम्राज्य यूरोप के रोमन साम्राज्य की प्रतिस्पर्धा कर सकता था। यद्यपि मुगल साम्राज्य का वास्तविक निर्माता बाबर का पौत्र अकबर था क्योंकि बाबर की मृत्यु के समय उसका राज्य असंगठित, प्रशासन अस्त-व्यस्त और राजकोष रिक्त था। बाबर के खड़े किये हुए राज्य को हुमायूँ ने खो दिया और ईरान के शाह की सहायता से उसे फिर से खड़ा किया।

(11.) कूटनीतिज्ञ के रूप में: बाबर बहुत बड़ा कूटनीतिक था। वह बल का तभी प्रयोग करता था जब कूटनीति से काम नहीं चलता था। भारत के अफगान अमीरों में से अनेक को उसने कूटनीति से अपनी ओर मिला लिया था और उन्हें जागीरें दे दी थीं। अपने अमीरों को भी वह कूटनीति द्वारा अपने नियन्त्रण में रखता था। यदि बाबर में उच्चकोटि का धैर्य, सहनशीलता और व्यवहारकुशलता न होती तो वह मुगल, चगताई तथा अफगान अमीरों को संतुष्ट नहीं कर सकता था। उसके कूटनीतिज्ञ होने के समर्थन में डैनीसन रीस ने लिखा है- जिस नीति से उसने सुल्तान इब्राहीम के विद्रोही सामन्तों को आपस में एक दूसरे से भिड़ाया, वह मैकियावेली की योग्यता से कम नहीं थी।

बाबर की दुर्बलताएँ

बाबर में अनेक गुणों के साथ-साथ दुर्बलताएँ भी विद्यमान थीं। वह आवश्यकता से अधिक महत्वाकांक्षी था। इस कारण मध्य एशिया से चलता हुआ भारत में आकर शासन करने लगा। उसकी इस महत्वाकांक्षा के चलते लाखों मनुष्यों को मौत के मुँह में समा जाना पड़ा। बाबर आवश्यकता से अधिक मद्यपान करता था। इस कारण सेना में उसकी विश्वसनीयता के प्रति संदेह बना रहता था। इसलिये उसे सेना के सामने शराब के बर्तनों को तोड़कर तथा कुरान पर हाथ रखकर शराब न पीने की सौगंध खानी पड़ी। युद्ध क्षेत्र में बाबर प्रायः अत्यंत क्रूर होकर शत्रुओं का नाश करता था। बाबर ने अन्य मुसलमान आक्रांताओं की भाँति हिन्दुओं के विरुद्ध जेहाद का नारा बुलंद किया। अर्सकिन ने बाबर का बचाव करते हुए लिखा है- ‘उसकी क्रूरताएं उस युग की द्योतक थीं न कि व्यक्ति की।’

निष्कर्ष

बाबर की नसों में तैमूरलंग तथा चंगेजखां जैसे क्रूर आक्रांताओं का रक्त बह रहा था। वह अपने युग के बड़े विजेताओं में से था। बाबर जिन्हें पसंद करता था, उनके साथ अच्छा व्यवहार करता था किंतु अपने शत्रुओं का सामूहिक नरसंहार करने में संकोच नहीं करता था। उसने मध्य एशिया से आकर भारत में अफगानों और राजपूतों को परास्त करके ऐसे साम्राज्य की स्थापना की जिस पर उसके वंशज अगले दो सौ वर्षों तक शासन कर सके। वह दुःसाहसी योद्धा, कुशल घुड़सवार, दक्ष तलवारबाज, प्रतिभावान कवि, प्रकृति से प्रेम करने वाला, अप्रतिम विजेता तथा मुगल साम्राज्य का संस्थापक होने के साथ-साथ क्रूर, अत्याचारी, धर्मांध तथा कट्टर सुन्नी शासक था। हैवेल ने लिखा है कि बाबर इस्लाम के इतिहास का सबसे आकर्षक व्यक्ति था।

बाबर का भारतीय इतिहास पर प्रभाव

बाबर ने भारतीय इतिहास को कई प्रकार से प्रभावित किया-

(1.) अफगानों एवं राजपूतों की शक्ति का विनाश: बाबर ने अफगानों तथा राजपूतों की शक्ति को छिन्न-भिन्न करके उत्तरी भारत के राजनीतिक शक्ति संतुलन को बदल दिया।

(2.) भारत तथा मध्य एशिया के बीच सम्पर्क की स्थापना: बाबर ने एक बार पुनः भारत तथा पश्चिमी मध्य एशिया के बीच घनिष्ठ सम्पर्क स्थापित कर दिया जिसका राजनीतिक, व्यापारिक तथा सांस्कतिक दृष्टिकोण से बड़ा महत्त्व है।

(3.) भारत में नई रण पद्धतियों का प्रचलन: बाबर ने भारत में नई रण पद्धतियों का प्रचलन आरम्भ किया। उसने तुगलमा पद्धति की प्रभावी भूमिका को रणक्षेत्र में सिद्ध करके दिखा दिया जो आगे चलकर कई शासकों द्वारा अपनाई गई।

(4.) भारत में तोपों तथा तोपखानों का प्रचलन: बाबर ने पानीपत तथा खनवा के युद्धों में बड़ी तोपों का प्रयोग करके तोपखाने की उपयोगिता को सिद्ध किया जिससे भारतीय शासक समझ गये कि तोपखाने तथा अश्वारोहियों के संयुक्त मोर्चे के समक्ष बड़ी से बड़ी सेना का ठहरना कठिन है।

(5.) दुर्गों की अजेयता समाप्त: तोपखाने के प्रयोग ने भारत में दुर्गों की अजेयता को समाप्त कर दिया। तोपखाने के प्रयोग का न केवल सामरिक वरन् सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टिकोण से भी बहुत बड़ा महत्त्व है।

(6.) भारत में मंगालों के शासन की स्थापना: बाबर ने भारत में जिस वंश की स्थापना की, उसके वंशज अगले दो सौ वर्ष तक भारत पर शासन करते रहे।

(7.) हिन्दू राजकन्याओं से बलपूर्वक विवाह करने की परम्परा: बाबर ने चंदेरी के शासक मेदिनी राय की दो पुत्रियों को जबर्दस्ती अपने पुत्रों हुमायूँ तथा कामरान से ब्याह दिया था। बाबर के बाद भी मुगल बादशाहों तथा शहजादों में हिन्दू राजकुमारियों से जबर्दस्ती विवाह करने की परम्परा चलती रही।

(8.) मंगोलों के आक्रमण की समाप्ति: बाबर के भारत पर शासन स्थापित करने से पश्चिम दिशा से होने वाले मंगोलों के आक्रमण समाप्त हो गये।

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohan Lal Gupta is a renowned historian from India. He has written more than 100 books on various subjects.

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