Monday, May 20, 2024
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अध्याय – 26 – भारत में परिवारिक जीवन (ब)

भारतीय परिवार के प्रमुख कर्त्तव्य

विश्व की प्रत्येक संस्कृति में परिवार के प्रमुख कर्त्तव्यों में बच्चों का लालन-पालन, वृद्धों की सेवा, बीमारों की सुश्रुषा तथा प्रत्येक सदस्य को संरक्षण एवं सहारा देना शामिल होता है किंतु भारतीय परिवार कुछ विशिष्ट कार्यों को भी सम्पादित करता है। तीन ऋणों से उऋण होना, पंच महायज्ञ करना तथा सोलह संस्कारों को सम्पादित करना प्रत्येक भारतीय परविार के प्रमुख कर्त्तव्य थे।

तीन ऋणों से उऋण होना

भारतीय ऋषियों का मानना था कि प्रत्येक मनुष्य देवताओं, ऋषियों, माता-पिता, अतिथियों और समाज के अन्य व्यक्तियों एवं प्राणियों से कुछ न कुछ सेवा, वस्तु, ज्ञान, आशीर्वाद एवं अनुग्रह प्राप्त करता है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य पर तीन ऋण होते हैं- (1.) देव ऋण, (2.) ऋषि ऋण, (3.) पितृ ऋण। प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह धर्मानुकूल आचरण करके तथा अपने कर्त्तव्यों का पालन करके इन तीनों ऋणों से उऋण होने का प्रयत्न करे।

(1.) देव ऋण: मनुष्य को जीवन-यापन करने के लिए जल, भूमि, वायु आदि साधनों की आवश्यकता होती है। ये समस्त साधन दैवीय-शक्तियों द्वारा उपलब्ध कराए जाते हैं। इसलिए हमें ऐसे काम नहीं करने चाहिए जिससे जल, भूमि या वायु को हानि पहुँचे। प्राकृतिक साधनों के संरक्षण के लिए वृक्ष लगाना, जलाशयों को साफ करवाना, उनमें से मिट्टी निकलवाना, पशु-पक्षियों के प्रति हिंसा नहीं करना, उनके दाने-पानी की व्यवस्था करना आदि कार्य देव-ऋण से उऋण करने में सहायक होते हैं।

(2.) ऋषि ऋण: मनुष्य समाज के विभिन्न व्यक्तियों से ज्ञान प्राप्त करता है। इस ज्ञान के सहारे वह अपना जीवन-यापन करता है, इस कारण मनुष्य पर समाज का ऋण होता है। इसे ऋषि ऋण कहते हैं। इस ऋण से उऋण होने के लिए लिए मनुष्य को समाज के लोगों में ज्ञान बांटना चाहिए तथा विद्यार्थियों के लिए विद्यालय खोलने, निःशुल्क पुस्तकें उपलब्ध कराने तथा स्कॉलरशिप बांटने जैसी व्यवस्थाएं करनी चाहिए।

(3.) पितृ ऋण: मनुष्य का पालन-पोषण उसके माता-पिता अथवा परिवार के सदस्य करते हैं तथा उसे समुचित शिक्षा दिलवाकर जीविकोपार्जन के योग्य बनाते हैं। इस कारण प्रत्येक मनुष्य पर अपने परिवार की देख-भाल करने तथा अपनी संतान के लालन-पालन की जिम्मेदारी होती है। इसे पितृ ऋण कहते हैं। इस ऋण से उपकृत होने के लिए प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह विवाह करके गृहस्थी बसाए तथा अपने परिवार की समुचित देखभाल करे।

(4.) गौण ऋण: इन तीन प्रमुख ऋणों के अतिरिक्त दो गौण ऋण और होते हैं- अतिथि ऋण और भूत ऋण। इन दोनों से भी हमें समय-समय पर कुछ न कुछ ज्ञान एवं सहयोग मिलता रहता है। धर्मशास्त्रों में इन पाँचों ऋणों से उऋण होने के लिए पंच-महायज्ञों का विधान रख गया है।

पंच-महायज्ञ

हिन्दू-धर्मशास्त्रों ने प्रत्येक परिवार के लिए पंच-महायज्ञों का विधान निर्धारित किया है-

(1.) ब्रह्म यज्ञ: इस यज्ञ के माध्यम से मनुष्य अपने प्राचीन ऋषियों के प्रति सम्मान व्यक्त करता था। इसलिए इसे ‘ऋषि यज्ञ’ भी कहा जाता है। प्राचीन ऋषियों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने का सर्वोत्तम ढंग विद्याध्ययन करना माना गया। इस कारण आर्यों ने स्वाध्याय करने का नियम बनाया।

(2.) देव यज्ञ: इसे देवताओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए किया जाता था। प्रत्येक व्यक्ति को प्रातःकाल और सायं काल में अग्नि, इन्द्र, प्रजापति, सोम, पृथ्वी आदि देवी-देवताओं के मंत्रों के साथ ‘स्वाहा’ कहकर अग्नि में घी, दूध, दही आदि हविष्य की आहुतियाँ देने का विधान किया गया।

(3.) भूत यज्ञ: इस यज्ञ के अन्तर्गत सृष्टि के समस्त तत्त्वों की संतुष्टि के लिए पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, प्रजापति एवं विश्वदेव आदि को भोजन की बलि दी जाती है और कौआ, गाय, चींटी एवं श्वान आदि पशु-पक्षियों को भोजन डालकर तुष्ट किया जाता है।

(4.) पितृ यज्ञ: इस यज्ञ में पितरों के लिए तर्पण, बलि-हरण अथवा श्राद्ध का आयोजन होता है। पितरों के लिए दक्षिण दिशा की ओर भोजन एवं जल फेंका जाता है।

(5.) मनुष्य यज्ञ: मनुष्य मात्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना का प्रदर्शन करने के लिए अतिथि-सत्कार की अनिवार्यता स्थापित की गई। इस यज्ञ के अंतर्गत स्वयं भोजन करने से पहले अतिथि को भोजन कराया जाता है।

भारत में विवाह-प्रणालियाँ

स्त्री-पुरुष के यौन सम्बन्धों को अनुशासन में बांधने तथा मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की उपलब्धि कराने के लिए उसे सुव्यवस्थित गृहस्थ जीवन प्रदान करने के उद्देश्य से स्त्री-पुरुष के विवाह की परम्परा आरम्भ हुई। वैदिक-काल से लेकर सूत्रकाल तक भारत में कई प्रकार की विवाह प्रणालियाँ प्रचलन में आईं जिनमें से आठ प्रणालियों को प्रमुख माना गया और इन्हें ‘अष्ट-प्रणाली’ कहा गया। विवाह की ये आठ प्रणालियाँ इस प्रकार से हैं-

(1.) ब्रह्म विवाह: इस प्रणाली के अन्तर्गत कन्या के विवाह का उत्तरदायित्व उसके पिता अथवा अभिभावक पर था। वह अपनी कन्या के लिए सुयोग्य वर खोजकर, विधि-विधान पूर्वक अपनी कन्या का विवाह उस सुयोग्य वर से करता था। इस विवाह में वर अथवा वधू पक्ष की ओर से कोई वस्तु नहीं ली जाती थी। इस विवाह को समस्त प्रकार की विवाह प्रणालियों में श्रेष्ठ माना जाता था तथा इसे ब्रह्म विवाह कहा जाता था।

(2.) प्रजापत्य विवाह: यह विवाह प्रणाली ब्राह्म विवाह के ही अनुरूप है, केवल नाम का अन्तर है। इस विवाह का उद्देश्य प्रजा (सन्तान) की उत्पत्ति करना है। इसमें कन्या का पिता वर की पूजा करके विधिपूर्वक अपनी कन्या का दान करता है और दोनों को गृहस्थ-जीवन बिताने का उपदेश देते हुए कहता है- ‘तुम दोनों (पति-पत्नी) साथ रहकर धर्माचरण करो।’ इस प्रकार के विवाह में भी किसी प्रकार का लेन-देन नहीं होता।

(3.) दैव विवाह: कभी-कभी यज्ञ कराने वाले पुरोहित के गुणों व योग्यता से प्रभावित होकर यजमान उसके साथ अपनी कन्या का विवाह कर देता था। चूँकि वर दैव कार्य (यज्ञ) करता था अतः विवाह की इस प्रणाली को दैव विवाह कहा जाता था। वैदिक यज्ञों की परम्परा लुप्त हो जाने के साथ ही इस इस प्रकार के विवाह बंद हो गए।

(4.) आर्ष विवाह: इस विवाह प्रणाली में कन्या का पिता वर पक्ष से एक गाय और एक बैल लेकर अपनी कन्या का विवाह करता था। इस प्रकार प्राप्त गाय-बैल का प्रयोग याज्ञिक कर्मों में किया जाता था। इसी से इसका नाम ‘आर्ष विवाह’ पड़ा।

(5.) गान्धर्व विवाह: इस प्रकार के विवाह को ‘प्रेम विवाह’ या ‘प्रणय विवाह’ कह सकते हैं। इस प्रणाली में लड़के और लड़की में विवाह के पूर्व ही प्रेम हो जाता है और वे एक-दूसरे को पति-पत्नी स्वीकार कर लेते हैं। इसमें माता-पिता की सहमति का कोई महत्त्व नहीं होता। दुष्यन्त एवं शकुन्तला का विवाह इसका उदाहरण है। यह विवाह-प्रणाली वर-वधू की वयस्क अवस्था का भी संकेत करती है। आपस्तम्ब और वशिष्ठ आदि ऋषियों ने इस प्रणाली को अधर्म्य माना है।

(6.) आसुर विवाह: इस विवाह-प्रणाली में कन्या का विक्रय होता है। कन्या का पिता विवाह के पूर्व, वर-पक्ष से अपनी कन्या का मूल्य माँगता है और मूल्य मिल जाने के बाद ही अपनी कन्या का विवाह करता है। इस विवाह प्रणाली का घोर विरोध किया गया। बोधायन ने लिखा है- ‘कन्या को बेचने वाला पिता घोर नर्क में जाता है और क्रीत-पत्नी धर्म- विवाहिता नहीं हो सकती। वह एक दासी के समान होती है।’

(7.) राक्षस विवाह: कन्या की इच्छा के विरुद्ध कन्या के पिता तथा सम्बन्धियों को पराजित कर या मारकर कन्या का अपहरण करके उसके साथ विवाह करना राक्षस विवाह कहलाता है। क्षत्रियों में यह विवाह प्रणाली अधिक लोकप्रिय थी परन्तु सूत्रकारों ने इस विवाह-प्रणाली का निषेध किया है।

(8.) पैशाच विवाह: विवाह की आठ प्रणालियों में सबसे निम्न कोटि की प्रणाली पैशाच विवाह है। जब कोई व्यक्ति किसी सोती हुई, बेहोश, पागल अथवा उन्मत्त कन्या के साथ छलपूर्वक अथवा जागृत अवस्था में कन्या के साथ बलपूर्वक समागम करता था तो उस व्यक्ति को उस कन्या के साथ विवाह करने के लिए विवश किया जाता था। इसी कारण इसे पैशाच विवाह कहा जाता था।

विवाह-सम्बन्ध में कुल-गौत्र का विचार

प्राचीन हिन्दू-धर्मग्रन्थों में माता-पिता के गौत्र, प्रवर एवं रक्त-सम्बन्ध के भीतर विवाह करना निषेध माना गया है। गौत्र और प्रवर उस पूर्वज ऋषि के नाम होते हैं जिससे किसी समुदाय विशेष की उत्पत्ति मानी गई है। ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य सहित विभिन्न जातियाँ स्वयं को किसी प्राचीन ऋषि यथा- भरद्वाज, वशिष्ठ, शाण्डिल्य आदि की संतान मानती है।

अतः एक ही पूर्वज (गौत्र एवं प्रवर) की सन्तान पारस्परिक विवाह सूत्र में नहीं बाँधी जा सकतीं। सपिण्ड के भीतर भी विवाह का निषेध माना गया है। सपिण्ड से अभिप्राय माता और पिता के रक्त-सम्बन्ध से है। वर्तमान समय में सामान्यतः चार कुलों- दादा, दादी, नाना एवं नानी के गौत्र को टालकर विवाह किया जाता है।

अन्तर्जातीय विवाह

यद्यपि समाज में अपने वर्ण अथवा अपनी जाति में विवाह करना ही उचित माना जाता है तथापि प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक अन्तर्जातीय-विवाह भी प्रचलन में रहे हैं। अन्तर्जातीय-विवाह दो प्रकार के होते थे- अनुलोम और प्रतिलोम।

अनुलोम विवाह वे होते थे जिनमें पुरुष अपने से नीचे के वर्ण की कन्या के साथ विवाह करता था, जैसे ब्राह्मण पुरुष का क्षत्रिय अथवा वैश्य कन्या के साथ विवाह और क्षत्रिय पुरुष का वैश्य कन्या के साथ विवाह। प्रतिलोम विवाह वे होते थे जिसमें कोई पुरुष अपने से ऊँचे वर्ण की कन्या से विवाह करता था, जैसे क्षत्रिय पुरुष और ब्राह्मण कन्या अथवा वैश्य पुरुष और क्षत्रिय अथवा ब्राह्मण कन्या। धर्म शास्त्रों ने अनुलोम विवाह को मान्यता दी जबकि प्रतिलोम विवाह को धर्म-विरुद्ध एवं उससे उत्पन्न संतान को अवैध माना।

नियोग प्रथा

भारतीय समाज में नियोग-प्रथा अति प्राचीन काल से प्रचलन में रही है। इस प्रथा में कोई भी स्त्री निःसंतान अवस्था में अपने पति की मृत्यु होने पर अथवा पति के नपुसंक या रोगी होने पर अपने देवर या अन्य सगोत्र, सजातीय पुरुष के साथ समागम करके (नियोग स्थापित करके) पुत्र उत्पन्न कर सकती थी। इस प्रकार से उत्पन्न पुत्र को स्मृतियों ने ‘क्षेत्रज पुत्र’ कहा है। इस प्रकार से प्राप्त पुत्र को तत्कालीन समाज में पूर्ण मान्यता थी।

विवाह-विच्छेद

हिन्दू-धर्मग्रन्थों के अनुसार विवाह जन्म-जन्म का सम्बन्ध है इसलिए इसका विच्छेद नहीं हो सकता। मनुस्मृति में कहा गया है कि पति तथा पत्नी को धर्म, अर्थ और काम के विषय में एक-दूसरे के प्रति सच्चा और निष्ठावान रहना चाहिए तथा सदैव यही प्रयत्न करना चाहिए कि वे कभी भी अलग न हो सकें, पति-पत्नी की पारस्परिक निष्ठा जीवन-पर्यन्त चलती रहे, यही पति और पत्नी का परम धर्म है।

मनु ने वैवाहिक सम्बन्ध को एक पवित्र ओर कभी न भंग होने वाला संस्कार माना है तथा स्त्री के पुनर्विवाह का निषेध किया है। नारद मुनि और पाराशर मुनि विशेष परिस्थितियों में विवाह-विच्छेद की स्वीकृति देते हैं। कौटिल्य के अनुसार- ब्राह्म, प्रजापत्य, आर्ष तथा देव विवाहों का विच्छेद नहीं हो सकता किन्तु गान्धर्व, आसुर, राक्षस तथा पैशाच विवाहों में परस्पर द्वेष उत्पन्न हो जाने पर एक दूसरे की सहमति से विवाह विच्छेद हो सकता है।

प्राचीन हिन्दू समाज में पुरुषों का एकाधिकार बढ़ते जाने से स्त्री के लिए विवाह-विच्छेद के नियम भी कठोर हो गए। उच्च समझी जाने वाली जातियों में विवाह-विच्छेद को निकृष्ट कार्य माना जाता था। स्त्री के लिए पति परमेश्वर स्वरूप था जिसकी सेवा करना और आज्ञा पालन करना स्त्री का परम धर्म था।

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