Thursday, February 29, 2024
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50. अलविदा आगरा

जब अपने सारे आदमियों को अकबर की सेवा में भेज देने के कई दिन बाद तक भी बैरामखाँ के पास दिल्ली से कोई जवाब नहीं आया तो बैरामखाँ बेचैन हो उठा। उसके सारे विश्वसनीय अमीर पहिले ही दिल्ली जा चुके थे, इनमें से कुछ अपनी मर्जी से गये थे और कुछ को स्वयं बैरामखाँ ने यह सोचकर भेज दिया था कि एक न एक दिन ये भी धोखा देंगे ही। फिर क्यों न इन्हें स्वयं ही जाने के लिये कह दे। यदि ये मेरे हितैषी होंगे तो अकबर को मेरे पक्ष में करेंगे किंतु संभवतः उनमें से एक भी हितैषी न था जो लौटकर बैरामखाँ को दिल्ली की कुछ तो सूचना देता!

अब संसार में ऐसा कोई नहीं था जो बैरामखाँ को सलाह दे सकता था। ऐसे में बैरामखाँ को वृद्ध रामदास की याद आयी। बैरामखाँ अकेला ही घोड़े पर सवार होकर आगरा के लिये रवाना हो गया।

जिस समय बैरामखाँ गौघाट पहुँचा, उस समय तक सूर्यदेव आकाश के ठीक मध्य में आ विराजे थे और हजारों गायें यमुनाजी में पानी पीने के लिये तट पर आयी हुई थीं। उनके गलों में बंधे घुंघरुओं की रुनझुन से पूरा वातावरण गुंजायमान था। कुछ गायें तट पर खड़े वृक्षों के नीचे बैठी सुस्ता रही थीं। अचानक दाढ़ी वाले खान को देखते वे ही त्रस्त होकर भाग खड़ी हुईं।

बैरामखाँ को रोना आ गया। धिक्कार है ऐसे जीवन पर जो मनुष्य तो मनुष्य, पशु तक शक्ल देखकर बिदक जायें। उसकी मनःस्थिति इन दिनों ऐसी थी कि वह छोटी से छोटी बात को अनुभव करने लगा था।

जिस समय बैरामखाँ कुटिया तक पहुँचा, उस समय बाबा रामदास कुटिया के बाहर करंज के घने पेड़ के नीचे बैठा अपने बेटों के साथ चावल खा रहा था। बालकों की माँ पत्तलों में पानी ला-लाकर पुत्रों को पिला रही थी। पिता पुत्रों में किसी बात को लेकर विनोद हो रहा था और पुत्रवती माता भी उनकी इस चुहल में सम्मिलित थी। इस आनंद विभोर परिवार को देखकर बैरामखाँ के पैर जमीन से चिपक गये।

बैरामखाँ को अचानक खानुआ के मैदान का स्मरण हो आया। ऐसे ही निरीह लोगों के रहे होंगे वे नरमुण्ड भी जिनकी मीनारें बनाकर बाबर ने ठोकरों से लुढ़का दिया था! क्या अपराध था उन लोगों का? केवल इतना ही तो कि वे सब नंगे तन रहकर पेड़ों की छाया में बैठकर मुठ्ठी भर चावल खाने वाले लोग थे? वे तलवार चलाना नहीं जानते थे, सत्ता तथा सियासत से उनका दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था! वे तानपूरा बजाकर पूरा जीवन निकाल देते थे!

स्वयं बैरामखाँ भी तो जीवन भर यही करता आया है। बाबर, हुमायूँ और अकबर का राज जमाने के लिये कितने निरीह और निरपराध लोगों को उसने तलवार के घाट उतार दिया था! और आज……… आज वह उन सारे बादशाहों से दूर इस तानपूरे वाले बाबा के पास किस उम्मीद में चला आया था? अपनी दयनीय स्थिति पर बैरामखाँ वहीं रोने लगा। जाने क्या था इस डेढ़ पसली के भिखारी में, जो बैरामखाँ उसके सामने आते ही रोने लगता था?

बैरामखाँ ने आनंद और विनोद में डूबे उस परिवार को दखल देना ठीक नहीं समझा और दूर से ही उल्टे पैरों लौट गया। उसने मन ही मन निश्चय कर लिया था। अब सत्ता और सियासत से दूर रखेगा वह अपने आप को। खुदा की इबादत के लिये मक्का चला जायेगा।

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohan Lal Gupta is a renowned historian from India. He has written more than 100 books on various subjects.

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