Wednesday, June 29, 2022

175. गोरियों एवं खिलजियों ने मालवा में मुस्लिम जनसंख्या का प्रसार किया!

मालवा भारत का एक समृद्ध एवं हरा-भरा प्रदेश है। ई.1310 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने मालवा को जीतकर दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित किया था। तैमूर लंग के आक्रमण के समय यह प्रदेश दिल्ली सल्तनत से स्वतन्त्र हो गया और मालवा का सूबेदार दिलावर खाँ गौरी मालवा का स्वतन्त्र शासक बन गया।

दिलावर खाँ गौरी तथा उसके वंशजों ने ई.1401 से ई.1436 तक मालवा पर शासन किया। उसका वंश गौरी वंश कहलाता है। ई.1406 में दिलावर खाँ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अलपखाँ, हुसंगशाह के नाम से मालवा का सुल्तान बना। उसने उड़ीसा, दिल्ली, गुजरात, जौनपुर तथा बहमनी राज्यों के विरुद्ध युद्ध किये परन्तु इन युद्धों से मालवा को विशेष लाभ नहीं हुआ।

हुसंगशाह ने माण्डू को अपनी राजधानी बनाया। माण्डू दुर्ग-रक्षित नगर था एवं एक ऊँची पहाड़ी पर बना हुआ था। अब उसके केवल भग्नावशेष ही बचे हैं, जो जामी मस्जिद, हिंडोला महल, जहाज महल, हुसंग का मकबरा, बाजबहादुर तथा रूपमती के महल एवं अन्य भवनों के लिए विख्यात हैं।

ई.1435 में हुसंगशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र गाजी खाँ ‘महमूदशाह’ के नाम से मालवा का सुल्तान हुआ। वह एक अयोग्य शासक था। उसमें अपने प्रतिद्वंद्वियों का सामना करने की शक्ति नहीं थी। ई.1436 में सुल्तान महमूदशाह गौरी को उसके वजीर महमूद खाँ खिलजी ने जहर देकर मार डाला और मालवा के तख्त पर अधिकार कर लिया।

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महमूद खाँ खिलजी ने 33 वर्ष तक शासन किया। उसका वंश खिलजी वंश कहलाता है। उसके वंशज ई.1531 तक मालवा पर शासन करने में सफल रहे। महमूद खाँ खिलजी का अधिकांश समय गुजरात, दिल्ली, बहमनी और मेवाड़ के शासकों से लड़ने में व्यतीत हुआ।

इतिहासकार श्रीराम शर्मा ने लिखा है- ‘शायद ही कोई ऐसा वर्ष बीता हो जब महमूद खाँ खिलजी युद्धक्षेत्र में न उतरा हो। इसलिए उसका शिविर उसका घर तथा युद्धभूमि उसका विश्रामगृह बन गई।’

इन युद्धों के परिणामस्वरूप महमूद खाँ खिलजी के राज्य की सीमाएँ दक्षिण में सतपुड़ा तक, पश्चिम में गुजरात की सीमाओं तक, पूर्व में बुन्देलखण्ड तक और उत्तर में मेवाड़ तथा बून्दी राज्य की सीमाओं तक जा पहुँची। तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों ने लिखा है कि सुल्तान महमूद विनम्र, वीर, न्यायप्रिय तथा विद्वान शासक था। उसके शासनकाल में हिन्दू तथा मुसलमान समस्त जनता सुखी थी और एक-दूसरे के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करती थी।

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मुस्लिम लेखकों ने महमूद खाँ की प्रशंसा तो की है किंतु महमूद खाँ खिलजी की उदारता एवं प्रजावत्सलता के कार्यों का कोई उल्लेख नहीं किया है। उन्होंने महमूद खाँ खिलजी की इतनी प्रशंसा संभवतः इसलिए की क्योंकि उसके बाद के तीन सुल्तान अत्यंत क्रूर एवं प्रजापीड़क सिद्ध हुए।

ई.1469 में सुल्तान महमूद की मृत्यु के बाद उसका पुत्र गियासुद्दीन के नाम से मालवा के तख्त पर बैठा। वह अत्यधिक भोग-विलासी था। उसके हरम में लगभग 15,000 òियाँ थी। ई.1500 में गियासुद्दीन के पुत्र नासिरूद्दीन ने उसे जहर देकर मार डाला और तख्त पर अधिकार कर लिया।

नासिरूद्दीन भी अपने पिता की तरह व्याभिचारी तथा प्रजा-पीड़क था। ई.1510 में एक दिन मदिरा के नशे में एक झील में गिर जाने से उसकी मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका पुत्र महमूद (द्वितीय) मालवा का सुल्तान बना। उसके समय में मालवा शीघ्रता से पतन की ओर अग्रसर हुआ।

महमूद (द्वितीय) ने एक योग्य हिन्दू सरदार को मालवा राज्य का प्रधानमंत्री बनाया किंतु मालवा के मुस्लिम अमीरों को सुल्तान का यह कार्य अच्छा नहीं लगा तथा अमीरों ने षड़यंत्र करके हिन्दू प्रधानमंत्री को मार डाला।

इस पर महमूद (द्वितीय) ने मुहाफिज खाँ को प्रधानमंत्री बनाया जो खाण्डू का सूबेदार भी था। मुहाफिज खाँ अत्यंत अत्याचारी व्यक्ति था। इस कारण सल्तनत में चारों ओर से विद्रोह फूट पड़े। शीघ्र ही मालवा में तीन सुल्तान हो गए जिन्होंने एक-दूसरे को चुनौती दी।

अन्त में, चन्देरी के शासक मेदिनीराय की सहायता से महमूद (द्वितीय) को अपने प्रतिद्वन्द्वियों को मार भगाने में सफलता मिली परन्तु महमूद (द्वितीय) को इसका भारी मूल्य चुकाना पड़ा। अब शासन पर मेदिनीराय का अधिकार हो गया। मेदिनीराय ने राज्य के महत्त्वपूर्ण पदों पर अपने विश्वस्त हिन्दुओं को नियुक्त किया जिसके कारण मालवा के मुस्लिम सरदारों में जबरदस्त असंतोष उत्पन्न हुआ।

उन्होंने गुजरात के मुस्लिम सुलतान से साँठ-गाँठ करके मेदिनीराय को उखाड़ फेंकने का निश्चय किया परन्तु मेदिनीराय ने मेवाड़ के महाराणा सांगा से सहयोग लेकर गुजरात एवं मालवा के विद्रोही मुस्लिम सरदारों की सेनाओं को परास्त कर दिया।

महाराणा सांगा द्वारा मालवा का सुल्तान बन्दी बना लिया गया किंतु महाराणा सांगा ने उदारता दिखाते हुए कुछ दिनों बाद सुल्तान महमूद (द्वितीय) को रिहा कर दिया तथा उसका राज्य भी उसे वापस लौटा दिया। ई.1531 में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने मालवा को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया।

बहादुरशाह ने मालवा के पूर्व सुल्तान महमूद (द्वितीय) तथा उसके पुत्रों को चम्पानेर के दुर्ग में बंदी बनाकर रखने का आदेश दिया गया परन्तु मार्ग में ही उनकी हत्या कर दी गई। इस प्रकार मालवा की स्वतंत्र सत्ता का अंत हो गया और वह गुजरात राज्य का हिस्सा बन गया।

गुजरात और मालवा की सल्तनतें अब कुछ ही दिनों तक जीवित रहने वाली थीं क्योंकि समरकंद के मुगलों का विजय-रथ काबुल और पानीपत से होकर दिल्ली एवं आगरा तक पहुंच चुका था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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