Tuesday, May 24, 2022

183 हिन्दू राजाओं को अपने राज्य में जाने के लिए अकबर से छुट्टी लेनी होती थी!

15 अक्टूबर 1605 को अकबर की मृत्यु हो गई। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि भारत में सोलहवीं सदी का उत्तरार्ध अकबर के व्यक्तित्व से प्रभावित था। इस कारण भारत के मध्यकालीन इतिहास में अकबर एक बड़े व्यक्तित्व के रूप में उभर कर सामने आता है। उसने अफगानिस्तान से लेकर बंगाल तक तथा कश्मीर से लेकर खानदेश, अहमदनगर एवं बरार तक एक विशाल सल्तनत का निर्माण किया। उसने अपनी सल्तनत में अनेक ऐसे नवाचार किए जिन्होंने करोड़ों भारतीयों को बड़े स्तर पर प्रभावित किया।

अकबर ई.1556 में बादशाह बना था, उस समय उसकी आयु केवल साढ़े तेरह वर्ष थी एवं उसके पास एक काल्पनिक राज्य ही बचा था जिस पर उसके बाबा बाबर एवं पिता हुमायूँ ने थोड़े-थोड़े समय के लिए शासन किया था। अपनी थोड़ी सी सेना के बल पर अकबर को वास्तविक राज्य प्राप्त करने एवं उसका विस्तार करने में कई दशक लग गए। जैसे-जैसे अकबर का भारतीय क्षेत्रों पर अधिकार होता गया, वैसे-वैसे उसे पता लगता गया कि वह केवल अफगानिस्तान से आए हुए मुट्ठी भर मुगलों, उज्बेकों एवं तातारियों अथवा सुन्नियों एवं शियाओं का बादशाह नहीं है। उसकी सल्तनत में 99 प्रतिशत से अधिक हिन्दू रहते हैं, उन्हें शासन एवं सेनाओं में सम्मिलित करके ही हिन्दुस्तान पर बेहतर तरीके से शासन किया जा सकता है। अकबर ने यह भी अनुभव कर लिया था कि मध्यएशिया से आए हुए लड़ाके किसी भी स्तर पर न तो नैतिकता का पालन करते हैं और न बादशाह के प्रति स्वामिभक्त हैं। जबकि उनकी तुलना में भारतीय हिन्दू राजा एवं राजकुमार अधिक नैतिक एवं अधिक विश्वसनीय हैं।

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इसलिए अकबर ने अपनी सैनिक एवं राजनीतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु हिन्दुओं को अपने साथ लेना आरम्भ किया। बहुत से लोग इसमें अकबर की उदारता एवं धर्म-सहिष्णुता की नीति के दर्शन करते हैं जबकि बहुत से लोग इसे अकबर द्वारा हिन्दुस्तान को अपना गुलाम बनाने के लिए कसा गया शिकंजा समझते हैं। यह सही है कि अकबर ने हिन्दू नरेशों को अपने साथ लिया किंतु समझने वाली बात यह है कि अकबर ने हिन्दुओं को उनकी अस्मिता की रक्षा की शर्त पर अपने साथ नहीं लिया अपितु अपनी अस्मिता खो देने की शर्त पर उन्हें अपनी नौकरी में रखा। हिन्दू राजाओं को अपनी बेटियां मुगलों से ब्याहकर मुगलों के प्रति जीवन भर के लिए अपनी निष्ठा का अनुबंध करना होता था। दूसरी ओर मुगल शहजादियों के विवाह हिन्दू नरेशों से नहीं किए जाते थे ताकि हिन्दू नरेश मुगलों से बराबरी का दावा न कर सकें।

आरम्भ से लेकर अंत तक अकबर ने इस तरह के उपाय किए कि हिन्दू नरेश सत्ता में कनिष्ठ भागीदार बनकर रहें और वे किसी भी मुगल शहजादे से प्रतिस्पर्धा या बराबरी का दावा न कर सकें। मुगल शहजादों एवं अमीरों की हिन्दू राजाओं पर श्रेष्ठता एवं वरीयता स्थापित करने के लिए अकबर ने मनसबदारी व्यवस्था आरम्भ की। अबुल फजल के अनुसार अकबर ने मनसबदारों को लिए दहववाशी अर्थात् 10 सैनिकों के नायक से लेकर दस हजारी अर्थात् 10,000 सैनिकों के नायक तक के मनसब बनाए। बाद में इसकी उच्च सीमा बारह हजारी कर दी गई। अकबर ने 5,000 से ऊपर के मनसब अपने पुत्रों के लिये आरक्षित कर दिये। हिन्दुओं को 10 घोड़ों से लेकर 5000 घोड़ों तक का मनसब दिया जाता था। बड़े से बड़े राजा को अपनी नौकरी के आरम्भ में डेढ़-दो हजार के मनसब दिए जाते थे जिन्हें बाद में धीरे-धीरे बढ़ाया जाता था। राजा मानसिंह एकमात्र हिन्दू नरेश था जिसे 7,000 जात एवं 6,000 सवार का मनसब दिया गया।

अकबर की अधीनता स्वीकार करने के बाद हिन्दू नरेश एक भी दिन अपनी इच्छा से अपने राज्य में नहीं रह सकते थे। उन्हें अपने राज्य में जाने के लिए अकबर से न केवल अनुमति लेनी होती थी अपितु छुट्टी भी लेनी होती थी। छुट्टियां पूरी होने पर हिन्दू राजाओं को अपनी नौकरी पर लौटना होता था। अन्यथा उसके मनसब में कमी कर दी जाती थी, या उसकी कोई बड़ी जागीर जब्त कर ली जाती थी। हिन्दू राजाओं को यह नौकरी उनके अपने राज्य से सैंकड़ों किलोमीटर दूर किसी युद्ध के मोर्चे पर रहकर करनी होती थी। इन मोर्चों पर युद्ध करते हुए न केवल हिन्दू राजाओं को अपने प्राण गंवाने पड़ते थे अपितु उनके कुल एवं वंश के राजकुमार एवं सामंत भी उन्हीं मोर्चों पर खड़े रहकर मौत को गले लगाते थे। राजा के न रहने पर उसके अवयस्क पुत्रों को भी इन मोर्चों पर जबर्दस्ती भेज दिया जाता था।

जब ये हिन्दू राजा एवं राजकुमार अधिकांश समय तक अपने राज्य से बाहर रहने लगे तो उनका अपनी प्रजा से सम्पर्क टूट गया। उनके कारिंदे उनकी प्रजा पर अत्याचार करने लगे और वे ही राज्य के वास्तविक स्वामी हो गए। इससे विगत हजारों वर्षों से राजा एवं प्रजा के बीच विश्वास एवं स्नेह का जो मधुर सामंजस्य स्थापित था, वह कमजोर हो गया। जब राजाओं की लड़कियां मुगलों के महलों में जाने लगीं तो जनता में इन राजाओं के प्रति आदर का भाव समाप्त होने लगा जबकि दूसरी ओर जोधपुर के राव चंद्रसेन तथा मेवाड़ के महाराणा प्रताप जैसे राजा उच्च आदर्शों के रूप में समाज में स्थापित होने लगे।

अकबर की अधीनता स्वीकार करने से हिन्दू राजाओं को एक बड़ा नुक्सान यह हुआ कि अब हिन्दू राजाओं के लिए अपने कुल के असंतुष्ट राजकुमारों को नियंत्रित करना संभव नहीं रह गया। हिन्दू राजकुमार अपने भाई, पिता या चाचा के विरुद्ध शिकायतें लेकर अकबर की शरण में पहुंचने लगे। जोधपुर के राजा चंद्रसेन को इस कारण इतनी क्षति हुई कि उसे अपने राज्य से हाथ धोना पड़ा क्योंकि राव चंद्रसेन के भाई उदयसिंह ने अपनी पुत्री का विवाह अकबर के साथ करके उसका संरक्षण प्राप्त कर लिया तथा वह जोधपुर का राजा बन गया। जबकि राव चंद्रसेन को अपना जीवन जंगलों एवं पहाड़ों में बिताना पड़ा।

इसी प्रकार मेवाड़ का राजकुमार शक्तिसिंह अपने पिता महाराणा उदयसिंह के विरुद्ध सहायता पाने के लिए अकबर की शरण में पहुंच गया। शक्तिसिंह को अपने इस कार्य से इतनी ग्लानि हुई कि वह स्वयं ही अकबर को छोड़कर वापस अपने पिता उदयसिंह की सेवा में आ गया। जब महाराणा उदयसिंह की मृत्यु हो गई तो उसका पुत्र जगमाल अकबर की शरण में जा पहुंचा। अकबर ने उसे चित्तौड़ का किला देकर महाराणा घोषित किया किंतु मेवाड़ के सामंतों ने जगमाल को महाराणा स्वीकार नहीं किया। इस प्रकार मेवाड़ राजघराने में फूट का बीज पड़ गया। ऐसी घटनाएं और भी राजवंशों में हुईं।

अकबर की अधीनता स्वीकार करने वाले हिन्दू राजा अकबर के लिए बहुत लाभकारी सिद्ध हुए। उन्होंने न केवल अकबर की सल्तनत का विस्तार किया, न केवल अकबर की सल्तनत को मजबूत सुरक्षा चक्र प्रदान किया अपितु उन्होंने मध्यएशिया से आए ईरानी, तूरानी, अफगानी, उज्बेक, चगताई, कजलबाश, हब्शी एवं तातार योद्धाओं को भी नियंत्रित रखा। जब भी कोई मध्यएशियाई अमीर अथवा शहजादा एवं भारतीय राजा अथवा राजकुमार अकबर के विरुद्ध विद्रोह करने का प्रयास करता था, अकबर इन निष्ठावान हिन्दू राजाओं को उनके विरुद्ध झौंक देता था। इस विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अकबर ने अपने व्यक्तित्व के प्रभाव से हिन्दू राजाओं को न केवल अपने अधीन किया अपितु उन्हें शासन में कनिष्ठ भागीदारी देकर निष्ठावान दोस्तों की एक रक्षापंक्ति तैयार कर ली। भारतीय राजनीति में इस तरह के प्रयोग अकबर से पहले एवं उसके बाद के अन्य मुस्लिम शासक नहीं कर सके थे।   

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