Thursday, May 30, 2024
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207. अंग्रेजों ने लाल किले में घुसकर शाही बेगमों के कपड़े लूट लिए!

20 सितम्बर 1857 की दोपहर होने से पहले ही अंग्रेजी सेना लाल किले में घुस चुकी थी और अंग्रेज सिपाही पागल कुत्तों की तरह भारत के निर्दोष एवं निरीह लोगों को अपनी गोलियों से छलनी करते हुए बादशाह बहादुरशाह जफर और उसके परिवार को ढूंढ रहे थे। विलियम हॉडसन भी चुपचाप अपनी बंदूक ताने हुए उन सिपाहियों के साथ चल रहा था। केवल वही जानता था कि बादशाह और उसका परिवार कहाँ है, किंतु वह बड़ी चालाकी से बादशाह को लाल किले में ढूंढता रहा।

लेफ्टिनेंट फ्रेड मेसी ने लिखा है- ‘लाल किले के भीतर पतली गलियों वाला एक पूरा शहर बसा हुआ था। हम लोग बादशाह को ढूंढने लगे। हमने धरती पर घायल पड़े हुए एक मुस्लिम युवक से पूछा कि बादशाह और उसका परिवार कहाँ है तो उसने कहा कि बादशाह का पूरा परिवार इस महल के सबसे भीतरी कमरे में है। वह लड़का जानबूझ कर झूठ बोल रहा था क्योंकि उसे पता था कि बादशाह अपने परिवार के साथ कई दिन पहले ही लाल किला छोड़कर जा चुका है। हमने लाल पर्दा हटाकर महल के अंतःपुर में प्रवेश किया। अंतःपुर के सारे कमरों, भण्डारों, रसोईघरों, गुसलखानों, अलमारियों और बक्सों को देख मारा किंतु हमें बादशाह या उसके परिवार का एक भी सदस्य नहीं मिला।’

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

जब बादशाह और उसका परिवार नहीं मिला तो हमारे सैनिक, अंग्रेज अधिकारियों की परवाह करना छोड़कर लाल किले के महलों को लूटने में व्यस्त हो गए। न जाने कहाँ से शहर से बदमाशों की टोलियां भी आ गईं। उन्होंने महलों के पर्दे, चद्दरें, बर्तन-भाण्डे, घोड़ों का सजावटी सामान, औरतों और मर्दों के लिबास झाड़-फानूस, किताबें, पिस्तौलें, मिठाइयां, शर्बत और शराब की बोतलें लूट लिए। जो दुपट्टे, कमीजें, सलवारें, घाघरे और गरारे कल तक मुगल बेगमें और शहजादियां पहनती थीं, उन दुपट्टों, कमीजों सलवारों, घाघरों और गरारों को अंग्रेज और अंग्रेजी सेना के भारतीय सिपाही अपनी बीवियों के लिए ले जा रहे थे।

लेफ्टिनेंट फ्रेड मेसी ने लिखा है कि यह सारा सामान किसी काम का नहीं था किंतु मैंने भी एक नया हवाई गद्दा उठा लिया जो बाद में मैंने जनरल कैम्पबैल से अनुमति लेकर अपनी पत्नी मैसी को दे दिया। मैसी ने वह हवाई गद्दा अपनी पहाड़ी पालकी में बिछा लिया।

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जब बादशाह लाल किले में नहीं मिला तो अंग्रेज सिपाहियों ने यमुना नदी पर नावों को जोड़कर बनाए गए पुल के पास स्थित सलीमगढ़ पर भी हमला किया। बादशाह और उसके परिवार को वहाँ भी पूरी सावधानी से ढूंढा गया किंतु वे लोग वहाँ भी नहीं मिले, कहीं भी नहीं मिले! अंग्रेज अधिकारियों का अनुमान था कि बागी सिपाही बूढ़े और बेदम बादशाह को लेकर दिल्ली से अधिक दूर नहीं गए होंगे। इसलिए उन्होंने बादशाह के भाग जाने की अधिक चिंता नहीं की और वे दिल्ली की जीत का जश्न मनाने की तैयारियों करने लगे।

उसी शाम अंग्रेजों ने जामा मस्जिद के अंदर नाचना शुरु किया। जनरल कैम्पबैल ने मलिका विक्टोरिया के नाम पर जाम पेश किया- ‘फॉर सक्सेस ऑफ हर हाईनेस, मे द क्वीन लॉंग लिव।’

पंजाब से आई सिक्ख सेना ने मस्जिद के पवित्र मेहराब के सामने फतह की खुशी में आग जलाई अर्थात् कैम्प फायर का आयोजन किया। मेजर जनरल आर्कडेल विल्सन और उसका हैडक्वार्टर सेंट जेम्स चर्च को छोड़कर किले के दीवाने खास में रहने के लिए आ गए। जहाँ उनके सामने ‘हैम’ अर्थात् सूअर के मांस और अण्डों का डिनर परोसा गया।

दिल्ली के ब्रिटिश अधिकारियों ने लाहौर तार भेजकर सूचित किया कि दिल्ली की समस्त कठिनाइयां समाप्त हो गई हैं। बंगाल इन्फैण्ट्री की बगावत को कुचल दिया गया है और लॉर्ड क्लाइव तथा जनरल लेक के दिन लौट आए हैं।

जिस दिन विजेता अंग्रेज जामा मस्जिद में विजय का जश्न मना रहे थे, उस दिन ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन रिज पर स्थित एक सैनिक तम्बू में पड़ा हुआ अपनी आखिरी सांसें गिन रहा था। उसका दोस्त नेविली चैम्बरलेन उसके पास यह सूचना लेकर गया कि लाल किला फतह कर लिया गया है तथा बादशाह और उसका परिवार किला छोड़कर भाग चुके हैं तो निकल्सन ने कहा कि मेरी अंतिम इच्छा पूरी हुई। इसके तीन दिन बाद से 23 सितम्बर 1857 को वह मर गया। बहादुरशाह जफर के प्रिय महताब बाग में लगी एक संगमरमर की चौकी को उखाड़कर उसके नीचे निकल्सन के शव को गाढ़ दिया गया।

जिस समय अंग्रेजों ने लाहौर को यह तार भिजवाया था कि दिल्ली की कठिनाइयां समाप्त हो गई हैं, वस्तुतः उस समय दिल्ली में कठिनाइयों का एक नया युग आरम्भ हो रहा था। बहुत से अंग्रेज सिपाहियों को लग रहा था कि हमारे कुछ साथी लाल किले से मिले लूट के माल से मालामाल हो गए हैं किंतु हमें कुछ भी नहीं मिला। इसलिए वे दिल्ली के उन मौहल्लों में निकल गए जहाँ कभी दिल्ली के धनी-मानी लोग रहते थे।

अंग्रेज सिपाही इन धनी-मानी लोगों को लूटना चाहते थे किंतु अब वहाँ सन्नाटा था और लूटे जाने के लिए कपड़े और बर्तनों के अतिरिक्त शायद ही कुछ बचा था। कुछ स्थानों पर क्रांतिकारी सिपाहियों के तम्बू लगे हुए मिले जो अधिकतर खाली थे किंतु कुछ तम्बुओं में अब भी घायल और बीमार सिपाही पड़े हुए थे जिन्हें अंग्रेज सिपाहियों ने तुरंत गोलियां मार दीं।

शहर में स्थान-स्थान पर उन कपड़ों और बर्तनों का ढेर लगा हुआ था जिन्हें दिल्ली के गुण्डों ने धनी-मानी लोगों के घरों से लूटा था किंतु जब वे गुण्डे भी अंग्रेज सिपाहियों द्वारा मार दिए गए या अंग्रेजों के भय से दिल्ली खाली करके भाग गए तो यह सामान किसी के काम का नहीं रहा। अब वह सामान कचरे के ढेर के रूप में स्थान-स्थान पर पड़ा हुआ था। अंग्रेज सिपाहियों ने बागी सिपाहियों के शव उठाकर उन्हीं ढेरों पर फैंक दिए और उनमें आग लगा दी।

इसके बाद अंग्रेज सिपाहियों को आदेश दिए गए कि वे दिल्ली की सफाई कर दें। इस सफाई का अर्थ यह था कि दिल्ली में एक भी आदमी जीवित नहीं बचे। उन्हें गोलियों से उड़ा दिया जाए। दिल्ली वासियों को यह सजा इसलिए दी जा रही थी कि उन्होंने 11 मई 1857 को दिल्ली की सड़कों पर गिरते हुए अंग्रेजों के शव अपनी आंखों से देखे थे।

यद्यपि इस समय तक दिल्ली में बहुत अधिक लोग नहीं रह गए थे किंतु बूढ़े, बीमार, विकलांग, लाचार, विक्षिप्त, गर्भवती महिलाएं जिनके प्रसव निकट थे, अब भी दिल्ली की गलियों और घरों के तहखानों में छिपे हुए थे, इन्हें ढूंढ-ढूंढ कर निकाला गया और गोलियों से भूनकर अंग्रेज शक्ति का विकराल परिचय दिया गया। मरने वालों में अब इतनी शक्ति नहीं रह गई थी कि वे मरते समय आर्त्तनाद करें, वे चुपचाप गोलियां खाते थे और निर्जीव कुंदे की तरह धरती पर गिर जाते थे।

देखा जाए तो विजेता का परिचय उसके द्वारा की गई हिंसा ही होती है। यदि प्राचीन भारतीय नरेशों की सेनाओं को अपवाद मानकर अलग कर दिया जाए तो धरती के प्रत्येक स्थान पर और मानव सभ्यता के प्रत्येक युग में विजेताओं ने पराजितों को अपना परिचय इसी प्रकार मौत और खून से दिया है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि अंग्रेज फिर से दिल्ली के स्वामी हो गए थे किंतु यह वह दिल्ली नहीं थी जिसे वे चार महीने पहले छोड़कर गए थे। यह तो एक विशाल शमशान था जिसमें चारों ओर कुछ आधे जले हुए और कुछ बिना जले हुए शव बिखरे हुए थे। जब कुछ अंग्रेज अधिकारियों को अपने पुराने भारतीय मित्रों और उनके साथ बिताए हुए अच्छे दिनों की याद आई तो वे उन्हें ढूंढते हुए उनकी हवेलियों और कोठियों पर गए किंतु वहाँ सड़ती हुई लाशों के अतिक्ति कुछ नहीं देख सके। लेफ्टिनेंट एडवर्ड ओमैनी ने लिखा है- ‘दिल्ली के डेढ़ लाख शहरियों में से लगभग सब जा चुके थे।’

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