Tuesday, April 23, 2024
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104. हुमायूँ की तलवार

अभी सूरज निकलने में कुछ समय था जब सलीमा बेगम ने अपनी लौण्डी सहित बादशाह सलामत के कक्ष में प्रवेश किया। सलीमा बेगम ने अपना पूरा बदन बुर्के में छिपा रखा था किंतु उसके मुँह से कपड़ हटा हुआ था। जबकि लौण्डी के चेहरे पर कपड़ा पड़ा हुआ था।

सलीमा बेगम को देखकर कच्छवाहा पहरेदार चिंता में पड़ गया। क्या करे? क्या न करे? इससे पहले कभी भी ऐसी स्थिति पैदा नहीं हुई थी। उसमें इतना साहस न था कि सलीमा बेगम का मार्ग रोके या उससे कुछ पूछने का साहस करे। सलीमा बेगम के प्रवेश पर उसे कोई आपत्ति भी नहीं थी। उसे आपत्ति थी उसकी बुर्केदार लौण्डी से। राजा मानसिंह का आदेश था कि किसी को भी चेहरा छुपा कर बादशाह के पास जाने की अनुमति न दी जाये।

इधर पहरेदार उचित अनुचित के ही विचार में फंसा हुआ था और उधर सलीमा बेगम अपनी लौण्डी सहित बादशाह के कक्ष में प्रवेश कर गयी। पहरेदार ने सतर्क होकर अपने साथी को दौड़ाया कि जाकर राजा मानसिंह को सूचित कर दे।

– ‘इस नेक सुबह के नेक उजाले में कनीज खुदाबंद से बादशाह सलामत की तंदरुस्ती की दुआ करती है।’ सलीमा बेगम ने बादशाह को जागा हुआ देखकर तसलीम किया।

अकबर के जर्द चेहरे पर मुर्दानी छायी हुई थी और कमजोरी के कारण उसका पूरा बदन काँप रहा था। उसकी आँखें गढ़ों में धंस गयी थीं और बालों का रंग मिट्टी में सनी सफेद सन जैसा हो गया था।

– ‘बेगम! सुबह भले ही नेक हो किंतु उसके उजाले में पहले की सी नेकी न रही।’ बादशाह ने काँपते हुए शब्दों में सलीमा बेगम का अभिवादन स्वीकार किया।

– ‘दिल मायूस न करें शहंशाह। सुबह के उजाले में नेकी न रही तो क्या हुआ, दुनिया आपकी नेकी के उजाले से रौशन है।’

– ‘आप शाइरा हैं। उम्मीदों को जगाये रख सकती हैं किंतु हमारी तो सारी उम्मीदें ही खत्म हो गयीं।’

– ‘परवरदिगार! रियाया को अभी आपसे काफी उम्मीदें हैं।’

– ‘लेकिन हम किससे उम्मीद करें?’

– ‘अपनों से। बादशाह सलामत, उम्मीदें अपनों से ही की जाती हैं।’

– ‘लेकिन जो अपने थे, वे सब तो एक-एक करके हमें छोड़ते जा रहे हैं। बादशाह सलामत हुमायूँ हमें छोड़ गये। वालिदा हमीदाबानंू हमें छोड़ गयीं। खान बाबा बैरामखाँ ने हमें छोड़ दिया। हमारे नवरत्नों में से अबुल फजल, राजा टोडरमल और मियाँ तानसेन हमें छोड़ गये। शहजादे मुराद और दानियाल हमें छोड़ गये। और भी जाने कौन-कौन हमें छोड़ दें। इससे तो अच्छा है कि अब दुनिया से हमारी विदाई हो जाये।’

– ‘कायनात में आपकी सलामती की दुआ मांगने वालों की अब भी कमी नहीं है बादशाह सलामत।’

– ‘हाँ! उनकी कमी नहीं है। आप हैं, शाह बेगम मरियम उज्जमानी हैं, खानखाना अब्दुर्रहीम हैं लेकिन फिर भी जाने क्यों हर वक्त ऐसा लगता है कि जिसे हमारी सलामती की सबसे ज्यादा दुआ मांगनी चाहिये थी, वह तो खुद ही हमारी जान ले लेना चाहता है।’

– ‘आपका इशारा किस ओर है, शहंशाह?’

– ‘आप अच्छी तरह जानती हैं। शेखूबाबा से हमने कितना प्रेम किया! क्या उसका फर्ज नहीं था कि आज वो हमारा सहारा बनता?’

– ‘शेखूबाबा ने कुछ नादानियां की हैं जिल्ले इलाही किंतु वे आपके शहजादे हैं, क्षमा के योग्य हैं।’

– ‘क्षमा के योग्य हैं? आखिर कितनी बार क्षमा के योग्य हैं?’

– ‘राजा शालिवाहन के उपचार से उनका रोग दूर हो गया है और वे हर तरह से स्वस्थ होकर आपकी सेवा में हाजिर होने का इंतजार कर रहे हैं।’

– ‘बेगम! आप जानती हैं कि हमने शेखू बाबा का मुँह न देखने की कसम खाई है।’

– ‘जो रहमदिल बादशाह अपनी पूरी रियाया को औलाद मानकर उसके गुनाह माफ करता है, क्या वह अपनी औलाद पर रहम न कर सकेगा?’

– ‘जब किसी को रहम की जरूरत हो तो रहम करूं?’ बादशाह खीझ पड़ा।

– ‘यह भी ठीक रही बादशाह सलामत! एक ओर तो आप शेखू बाबा का मुँह भी नहीं देखना चाहते और दूसरी ओर उनसे रहम की दरख्वास्त भी चाहते हैं आखिर वे अपनी बात कहंे भी तो कैसे………?’

सलीमा बेगम की बात पूरी भी न हो पायी थी कि राजा मानसिंह ने कक्ष में प्रवेश किया। उसे देखते ही सलीमा बेगम का ईरानी चेहरा और भी सफेद हो गया। उसे समझ में नहीं आया कि क्या करे।

ठीक उसी समय सलीमा बेगम की लौण्डी ने अपने मुँह पर से पर्दा उठाया और आगे बढ़कर बादशाह के पास रखी म्यान में से तलवार खींच कर अपने हाथ में ले ली। लौण्डिया को तलवार खींचते देखकर राजा मानसिंह ने भी अपनी म्यान से तलवार खींची और लौण्डिया की ओर लपका किंतु उसका चेहरा पहचान कर उसकी ओर जाने के स्थान पर बादशाह की शैय्या के निकट जाकर खड़ा हो गया।

यह सब इतनी शीघ्रता से हुआ कि कोई कुछ नहीं समझ सका।

सलीमा बेगम ने चीख कर कहा- ‘शेखू बाबा!’

– ‘शेखू बाबा! कहाँ है शेखू बाबा?’ बूढ़े बादशाह ने काँपती हुई आवाज में चिल्लाकर पूछा। उसने उठने का प्रयास किया किंतु उठ न सका।

– ‘मैं यहाँ हूँ बादशाह सलामत।’ लौण्डी ने चीखकर कहा और अपना बुर्का उतार कर फैंक दिया।

– ‘तुमने यह तलवार क्यों उठायी? यह क्या बदसलूकी है?’

– ‘अपने पुरखों की तलवार उठाना बदसलूकी नहीं होती बादशाह सलामत। इस तलवार पर जितना आपका हक है, उतना ही मेरा भी है।’

– ‘इस चंगेजी तलवार को हाथ लगाने योग्य नहीं है तू। ला इसे इधर दे।’

– ‘अब आप बूढ़े और कमजोर हो गये हैं, अब आपको इसकी जरूरत नहीं रही। बड़े बादशाह हुजूर हुमायूँ की यह तलवार अब मेरे पास ही रहने दीजिये।’

– ‘मैं तेरे दिल की हसरत को जानता हूँ लेकिन तू इतना जान ले कि हाथ में तलवार पकड़ने लेने भर से तख्त और ताज हासिल नहीं हो जाते।’

– ‘जानता हूँ, अच्छी तरह से जानता हूँ कि तख्त और ताज कैसे हासिल होते हैं। इसलिये आपसे दरख्वास्त करता हूँ कि अब यह ताज भी मेरे सिर पर रख दें और आप इसके भार से मुक्त हो जायें।’ सलीम ने अकबर की पगड़ी की ओर संकेत करते हुए कहा।

– ‘यह पाक चीज तुम्हारे सिर पर नहीं, शहजादे खुसरो के सिर पर रखी जायेगी।’

– ‘क्यों? क्या मैं चंगेजी खानदान का नहीं? क्या मेरी रगों में तैमूर लंग का खून नहीं?’

– ‘शहजादे खुसरो में भी ये सब खूबियां हैं।’

– ‘लेकिन खुसरो और इस पगड़ी के बीच मैं खड़ा हूँ।’

– ‘तुम्हें हटा दिया जायेगा।’ अकबर ने गुस्से से काँपते हुए कहा।

– ‘कहीं ऐसा न हो कि हटाने वालों को हटना पड़े।’

– ‘तुम्हारी जुबान खींच ली जायेगी गुस्ताख। अकबर बीमार भले ही है किंतु मरा नहीं है।’

– ‘मेरी जुबान खींची गयी तो जिस खुसरो को आप मोहरा बनाकर मुझे शिकस्त दिया चाहते हैं, उसके बदन पर एक इंच चमड़ी भी न बचेगी।’

– ‘ऐसी बात कहने से पहले इतना तो सोच कि वह तेरी औलाद है!’

– ‘आप भी मेरे बारे में कुछ कहने से पहले यही सोचें तो बेहतर होगा जिल्ले इलाही।’

– ‘मैं चाहूं तो इसी समय मानसिंह तेरा सिर कलम कर दे।’

– ‘लेकिन सिर मानसिंह के बदन पर भी नहीं बचेगा। मेरे खैरख्वाह रामसिंह कच्छवाहे ने चारों ओर से महल को घेर रखा है। मानसिंह मेरी तरफ बढ़कर तो देखे।’ सलीम ने चालाक चीते की तरह गुर्राकर कहा और अपने हाथ की तलवार तेजी से हवा में घुमायी।

अकबर ने सिर पकड़ लिया। नहीं जीत सकता वह इस लड़ाई में। जाने कैसी लड़ाई है यह! उसे लगा कि उसकी साँस डूब रही है। आँखों के सामने अंधेरा सा छाता जा रहा है। पूरे बदन पर चींटियां सी रेंग रही हैं। सलीमा ने चौंक कर बादशाह की ओर देखा और चीखती हुई सी बोली- ‘जिल्ले इलाही! संभालिये अपने आप को।’

अकबर ने सलीम और अपने जीवन दोनों से मायूस होकर सलीमा बेगम व मानसिंह की ओर देखा बैरामखाँ और अब्दुर्रहीम के बाद जिन दो शरीरों में अकबर के प्राण बसते थे वे दोनों ही उसके सामने खड़े थे। अकबर के एक संकेत पर वे अपने प्राण दे सकते थे किंतु लाख चाह कर भी वे वह नहीं कर सकते थे जिससे अकबर को शांति मिले। सच पूछो तो उस क्षण स्वयं अकबर भी नहीं जानता था कि क्या करने से उसके मन को शांति मिलेगी।

अचानक डूबती हुई सांसें कुछ स्थिर हुईं। अकबर को लगा कि शरीर में अचानक ही चेतना लौट आयी है। आँखों से फिर दिखाई देने लगा है। कक्ष के बिम्ब अचानक ही बहुत स्पष्ट हो चले हैं। वह समझ गया कि यह बुझते हुए चिराग़ की अंतिम रौशनी है जो चिराग़ के बुझने से पहले एक बार अपनी पूरी चमक दिखाना चाहती है। उसने मानसिंह को संकेत किया कि पगड़ी उठाये। मानसिंह ने पगड़ी उठाकर अकबर के हाथों में रख दी।

– ‘मेरी हसरत तो अधूरी रह गयी सलीमा बेगम! तुम्हारी ही हसरत पूरी हो। आओ शहजादे मेरे पास आओ।’

मानसिंह ने आश्चर्यचकित होकर बादशाह की ओर देखा। सलीम आगे बढ़कर ठीक बादशाह के पलंग तक पहुंच गया। बादशाह ने काँपते हुए हाथों से अपनी पगड़ी सलीम के माथे पर रख दी।

– ‘आज से तुम्हारा बादशाह यही है मानसिंह। इसकी रक्षा करना।’ अपनी बात पूरी करके बूढ़ा बादशाह एक ओर को लुढ़क गया।

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