Monday, September 20, 2021

अध्याय – 4 : दिल्ली पर इल्तुतमिश के वंशजों का शासन

(रुकनुद्दीन फीरोजशाह, रजिया सुल्तान, बहरामशाह, अलाउद्दीन मसूदशाह, नासिरुद्दीनशाह )

रुकुनुद्दीन फीरोजशाह

तुर्क शासकों में उत्तराधिकार के नियम निश्चित नहीं थे। सुल्तान के मरते ही सल्तनत के ताकतवर अमीरों में संघर्ष होता था और विजयी अमीर सल्तनत पर अधिकार कर लेता था। इल्तुतमिश का योग्य एवं बड़ा पुत्र नासिरुद्दीन महमूद, इल्तुतमिश के जीवनकाल में ही मर गया। उसका दूसरा पुत्र रुकुनुद्दीन निकम्मा और अयोग्य था तथा अन्य पुत्र अवयस्क थे। इसलिये इल्तुतमिश को अपने उत्तराधिकारी की चिंता रहती थी। वह अपनी पुत्री रजिया से बड़ा प्रेम करता था तथा उसकी योग्यता को कई बार परख चुका था। रजिया कई बार इल्तुतमिश की अनुपस्थिति में राज्यकार्य करती थी। इन सब बातों को देखते हुए इल्तुतमिश ने अपने अमीरों से रजिया को उत्तराधिकारी नियुक्त करने की सहमति प्राप्त की तथा रजिया को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। इसके बाद रजिया का नाम चांदी के टंका पर खुदवाया जाने लगा।

जब इल्तुतमिश की मृत्यु हुई तो तुर्की अमीर, एक औरत को सुल्तान के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए। भारत में मुस्लिम सुल्तान अरब के खलीफा के प्रतिनिधि के रूप में शासन करते थे। अरब वालों के रिवाजों के अनुसार औरत, मर्दों के द्वारा भोगे जाने के लिये बनाई थी न कि शासन करने के लिये। इस कारण मर्द अमीरों को, औरत सुल्तान का अनुशासन मानना बड़े शर्म की बात थी। अतः दिल्ली के तुर्की अमीरों ने रजिया को अस्वीकार करके इल्तुतमिश के सबसे बड़े जीवित पुत्र रुकुनुद्दीन फीरोजशाह को तख्त पर बैठा दिया।

तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार रुकुनुद्दीन रूपवान, दयालु तथा दानी सुल्तान था परन्तु उसमें दूरदृष्टि नहीं थी। वह प्रायः मद्यपान करके हाथी पर चढ़कर दिल्ली की सड़कों पर स्वर्ण-मुद्राएँ बाँटा करता था। वह अपने पिता इल्तुतमिश के जीवन काल में बदायूँ तथा लाहौर का गवर्नर रह चुका था परन्तु उसने सुल्तान बनने के बाद मिले अवसर से कोई लाभ नही उठाया।

मद्यपान में धुत्त रहने के कारण रुकुनुद्दीन राज्य कार्यों की उपेक्षा करता था। इसलिये उसकी माँ शाह तुर्कान ने शासन की बागडोर अपने हाथों में ले ली। शाह तुर्कान का जन्म अभिजात्य तुर्कों में न होकर निम्न समझे जाने वाले वंश में हुआ था। वह अपने दैहिक सौन्दर्य के बल पर इल्तुतमिश जैसे प्रबल सुल्तान की बेगम बनी थी और अब रुकुनुद्दीन जैसे निकम्मे सुल्तान की राजमाता बन गई थी। शासन की बागडोर हाथ में आते ही उसने मदांध होकर इल्तुतमिश की अन्य उच्च-वंशीय बेगमों के साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया। तुर्कान ने कुछ बेगमों तथा इल्तुतमिश के एक पुत्र कुतुबुद्दीन की हत्या करवा दी। उसने कुछ अमीरों की भी हत्या करवा दी। इस कारण दरबार में सुल्तान रुकुनुद्दीन तथा बेगम तुर्कान के विरुद्ध असंतोष भड़क गया।

उन्हीं दिनों पश्चिमोत्तर सीमा पर मंगोलों के आक्रमण आरम्भ हो गए। दिल्ली की सेनाओं ने इन आक्रमणों का सफलतापूर्वक सामना किया परन्तु सल्तनत में आन्तरिक अंशाति बढ़ती चली गई। चारों ओर विरोध की अग्नि भड़क उठी। रुकुनुद्दीन तथा उसकी माँ शाह तुर्कान इस विरोध को शांत करने में असमर्थ रहे। रुकुनुद्दीन का भाई गियासुद्दीन जो अवध का सूबेदार था, खुले रूप में विद्रोह करने पर उतर आया। उसने बंगाल से दिल्ली जाने वाले राजकोष को छीन लिया तथा भारत के कई बड़े नगरों को लूट लिया। मुल्तान, हांसी, लाहौर तथा बदायूं के प्रांतीय शासकों ने परस्पर समझौता करके रुकुनुद्दीन को गद्दी से उतारने के लिये दिल्ली की ओर चल पड़े।

लोग रजिया को सुल्तान बनाने की चर्चा करने लगे। इस पर शाह तुर्कान ने शहजादी रजिया की हत्या कराने का प्रयत्न किया। शहजादी रजिया की हत्या का षड़यंत्र असफल रहने पर स्थिति अत्यन्त गंभीर हो गई। रजिया ने शाह तुर्कान का सामना करने का निश्चय किया। एक शुक्रवार को जब मुसलमान, मध्याह्न की नमाज के लिए एकत्रित हो रहे थे, रजिया सहसा लाल वस्त्र धारण करके उनके समक्ष उपस्थित हो गई और शाह तुर्कान के विरुद्ध अभियोग लगाते हुए अपने लिये न्याय की प्रार्थना करने लगी। मुस्लिम नौजवानों ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। शाह तुर्कान को बंदी बना लिया गया और 9 नवम्बर 1236 को रुकुनुद्दीन फीरोजशाह की हत्या कर दी गई। शाह तुर्कान को भी मार डाला गया।

रजिया सुल्तान (1236-1240 ई.)

रुकुनुद्दीन फीरोजशाह की हत्या हो जाने के बाद रजिया दिल्ली की सुल्तान बन गई। जिन अमीरों ने आरम्भ में रजिया के उत्तराधिकार का विरोध किया था, उन्हीं अमीरों ने उसे अब सुल्तान स्वीकार कर लिया। ऐसा करने के कई कारण थे-

(1.) रुकुनुद्दीन की अयोग्यता: रुकुनुद्दीन अयोग्य सुल्तान था। वह शराब पीने के बाद हाथी पर चढ़कर दिल्ली की सड़कों पर सोने की अशर्फियां बांटता फिरता था। शासन के काम में रुचि नहीं लेने के कारण शासन व्यवस्था बिगड़ रही थी।

(2.) शाह तुर्कान का निम्न वंश में जन्म: सुल्तान रुकुनुद्दीन की अयोग्यता के कारण शासन का काम उसकी माता शाह तुर्कान के हाथों में था। तुर्कान निम्न समझे जाने वाले वंश में जन्मी थी जिसके अनुशासन में काम करना तुर्की अमीरों को सहन नहीं था।

(3.) बेगमों तथा अमीरों की हत्या: शाह तुर्कान ने हरम की कई बेगमों तथा अमीरों की हत्या करवाकर चारों ओर असंतोष का वातावरण तैयार दिया था। उसने शहजादे कुतुबुद्दीन को भी आँखें फुड़वाकर मरवा दिया।

(4.) रजिया की हत्या का प्रयास: शाह तुर्कान ने शहजादी रजिया की हत्या का प्रयत्न किया। रजिया इल्तुतमिश की प्रिय पुत्री थी। उसमें कई गुण थे जिनके कारण इल्तुतमिश के स्वामिभक्त अमीर रजिया को बड़े आदर की दृष्टि से देखते थे। शाह तुर्कान की निकृष्ट चेष्टा से अमीरों की सहानुभूति रजिया के साथ हो गई।

(5.) विकल्प का अभाव: शाह तुर्कान को बन्दी बना लेने के उपरान्त अमीरों के पास इसके अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं बचा था कि वे रुकुनुद्दीन को तख्त से उतारकर रजिया को तख्त पर बैठा दें। अन्यथा रुकुनुद्दीन उन्हें मरवा डालता।

(6) इल्तुतमिश की इच्छा पूर्ति: शहजादी रजिया को तख्त पर बैठाकर तुर्की अमीर, मुसलमान रियाया के समक्ष यह प्रदर्शित करना चाहते थे कि ऐसा करके सुल्तान इल्तुतमिश की इच्छा पूरी की जा रही है। क्योंकि सुल्तान इल्तुतमिश ने रजिया को ही अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था।

(7) कमालुुुुुद्दीन जुनैदी से ईर्ष्या: बहुत से तुर्की अमीर, वजीर कमालुद्दीन जुनैदी से ईर्ष्या करते थे जो स्वयं को सर्व-शक्ति-सम्पन्न बनाने का प्रयत्न कर रहा था। तुर्की अमीरों को भय था कि यदि रजिया को सुल्तान नहीं बनाया गया तो जुनैदी दिल्ली के तख्त पर अधिकार कर लेगा। अतः अमीरों ने जुनैदी से निबटने के लिये रजिया को दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया।

रजिया की कठिनाइयाँ

यद्यपि रजिया को तख्त प्राप्त हो गया था परन्तु आगे का मार्ग अत्यन्त कठिन था। उसकी प्रमुख कठिनाइयाँ निम्नलिखित थीं-

(1) आंशिक समर्थन: रजिया की पहली कठिनाई यह थी कि उसे केवल कुछ युवा तुर्कों और दिल्ली के सामान्य नागरिकों का सहयोग प्राप्त था। सल्तनत का प्रधान वजीर जुनैदी तथा वे तुर्क सरदार जो फीरोजशाह को तख्त से हटा कर अपनी इच्छानुसार सुल्तान चुनना चाहते थे, रजिया का विरोध करने के लिए उद्यत हो गये। अन्य प्रान्तीय हाकिम भी उन्हें देखकर विद्रोह करने पर उतर आये।

(2) प्रतिद्वन्द्विता की सम्भावना: इल्तुतमिश के कुछ पुत्र अभी जीवित थे जिनके अनेक समर्थक अमीर भी मौजूद थे। उनके द्वारा रजिया सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह किये जाने की पूरी संभावना थी।

(3) राजपूतों के विद्रोह की आशंका: दिल्ली के शासन में आंतरिक संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होते ही राजपूतों ने फिर से अपने राज्य प्राप्त करने का प्रयास आरम्भ किया तथा रणथम्भौर का घेरा डाल दिया।

(4) रजिया का स्त्री होना: तुर्की अमीर, कट्टर सुन्नी थे। उन्हें एक औरत के अधीन रहकर काम करना सहन नहीं था। इसलिये वे रजिया को राजपद के लिए सर्वथा अनुपयुक्त समझते थे। इब्नबतूता, एसामी, फरिश्ता, निजामुद्दीन, बदायूनीं आदि मुस्लिम इतिहासकारों ने भी रजिया के स्त्री होने के कारण उसके आचरण को निंदनीय ठहराया है।

उपरोक्त कठिनाइयों का निस्तारण किये बिना रजिया दिल्ली पर शासन नहीं कर सकती थी। वह योग्य तथा प्रतिभा-सम्पन्न सुल्तान थी। उसमें अपने विरोधियों का सामना करने तथा अपने साम्राज्य को सुदृढ़़ बनाने की इच्छाशक्ति भी थी।

रजिया के कार्य

(1.) विद्रोहियों का दमन: सबसे पहले रुकुनुद्दीन के मुख्य वजीर मुहम्मद जुनैदी ने विद्रोह का झण्डा खड़ा किया और बदायूं, मुल्तान, झांसी तथा लाहौर के गर्वनरों से जा मिला। ये लोग अपनी-अपनी सेनाएं लेकर दिल्ली की ओर चल पड़े। इनका लक्ष्य रजिया के स्थान पर इल्तुतमिश के छोटे पुत्र बहराम को सुल्तान बनाना था। इन विद्रोहियों ने रजिया को उसकी राजधानी में घेर लिया। इस गम्भीर परिस्थिति में रजिया ने कूटनीति से काम लिया। उसने अपने विरोधियों में फूट पैदा कर दी। इससे वे विभिन्न दिशाओं में भाग खड़े हुए। रजिया ने उनका पीछा किया और उनका पूर्ण रूप से दमन किया। इस प्रकार पंजाब में उसने अपनी सत्ता स्थापित कर ली। बंगाल तथा सिंध के गवर्नरों ने भी उसके आधिपत्य को स्वीकार कर लिया।

(2.) राजपूतों से संघर्ष: इल्तुतमिश के मरने के बाद से ही रणथम्भौर के हिन्दुओं ने मुसलमान सेना को घेर रखा था। रजिया ने शीघ्र ही एक सेना भेज कर हिन्दुओं को मार भगाया।

(3.) राजपक्ष का सुदृढ़़ीकरण: रजिया ने राजपक्ष को सुदृढ़ बनाने के लिये उच्च पदों का पुनः वितरण किया। उसने ख्वाजा मुहाजबुद्दीन को अपना वजीर बनाया तथा प्रांतीय सूबेदारो के पदों पर भी नये अधिकारी नियुक्त किये गये। इस प्रकार लखनौती से देवल तक के भारत ने रजिया की अधीनता स्वीकार कर ली।

(4.) तुर्की अमीरों के वर्चस्व को समाप्त करने के प्रयास: रजिया ने सुल्तान की प्रतिष्ठा का उन्नयन करने के लिए तुर्कों के स्थान पर अन्य मुसलमानों को ऊँचे पद देने आरम्भ किये जिससे तुर्कों का अहंकार तथा एकाधिकार नष्ट हो जाये और वे राज्य पर अपना प्रभुत्व न जता सकें। उसने जमालुद्दीन याकूत नामक एक हब्शी को ‘अमीर आखूर’ के पद पर नियुक्त किया और मलिक हसन गौरी को सेनापति का पद प्रदान किया।

(5.) पर्दे का परित्याग: सुल्तान बनने के बाद रजिया ने पर्दे का परित्याग कर दिया। वह स्त्रियों के वस्त्र त्यागकर पुरुषों के वस्त्र धारण करने लगी। वह राजसभा तथा कैम्प में राज्य के कार्यों को स्वयं देखने लगी। वह स्वयं सेना का संचालन करने लगी और युद्ध में भाग लेने लगी। उसने अपनी योग्यता तथा शासन क्षमता से समस्त अमीरों एवं जनता को प्रभावित किया।

रजिया का पतन

रजिया भारत की प्रथम स्त्री सुल्तान थी। तुर्की अमीर उसे सहन नहीं कर सके। इस कारण थोड़े ही समय में चारों ओर विद्रोह के झण्डे बुलंद हो गये और रजिया का पतन आरम्भ हो गया।

(1.) इस्माइलिया मुसलमानों का विद्रोह: दिल्ली में बहुत से इस्माइलिया मुसलमान बस गये थे जिन्होंने शक्ति प्राप्त करने के लिये सुल्तान के विरुद्ध षड्यंत्र किया। उनके विद्रोह का दमन कर दिया गया और उनके समस्त प्रयत्न निष्फल कर दिये गये।

(2.) जियाउद्दीन का वध: जियाउद्दीन जुनैदी, ग्वालियर का हाकिम था। उसके द्वारा विद्रोह किये जाने की तैयारियां करने की आशंका से 1238 ई. में उसे दिल्ली बुलाया गया। दिल्ली में आने के बाद जुनैदी लापता हो गया। लोगों को यह आशंका होने लगी कि सुल्तान ने विश्वासघात करके उसका वध करवाया है। इससे तुर्की अमीरों में रजिया के विरुद्ध घृणा तथा संदेह का वातावरण बढ़ने लगा। वे रजिया की ओर से शंकित होकर गुप्त रूप से विद्रोह की तैयारियां करने लगे।

(3.) शम्सी तुर्क सरदारों का षड्यन्त्र: कुछ प्रान्तीय शासकों के मन में यह संदेह उत्पन्न होने लगा कि रजिया शम्सी तुर्क सरदारों की शक्ति का उन्मूलन करना चाहती है। अतः वे आत्मरक्षा के लिए षड्यन्त्र रचने लगे और विद्रोह की तैयारियां करने लगे। सबसे पहले पंजाब के गर्वनर कबीर खाँ अयाज ने विद्रोह का झण्डा खड़ा किया। रजिया एक सेना लेकर आगे बढ़ी। अयाज ने बिना युद्ध किए ही रजिया के आधिपत्य को स्वीकार कर लिया। रजिया ने उससे लाहौर छीन लिया परन्तु मुल्तान उसके अधिकार में रहा। इस कारण षड्यंन्त्र तथा विद्रोह की अग्नि शांत नहीं हुई। अब तुर्क सरदारों ने संगठित होकर रजिया का विरोध करने की योजना बनाई। इन विद्रोही तुर्क अमीरों का नेता इख्तियारूद्दीन एतिगीन था। विद्रोहियों ने बड़ी सावधानी तथा सतर्कता के साथ कार्य करना आरम्भ किया।

(4.) राज्य का पतन: भटिण्डा के गर्वनर मलिक अल्तूनिया ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। रजिया विद्रोहियों को दबाने के लिए एक विशाल सेना लेकर आगे बढ़ी। जब वह भटिण्डा पहंुची तब उसके विश्वस्त गुलाम याकूत का वध कर दिया गया और रजिया बंदी बनाई जाकर अल्तूनिया को समर्पित कर दी गई। विद्रोहियों ने इल्तुतमिश के छोटे पुत्र बहरामशाह को तख्त पर बैठा दिया। मिनहाज उस सिराज के अनुसार रजिया ने 3 वर्ष, 6 माह, 6 दिन राज्य किया।

(5.) रजिया की हत्या: रजिया ने अल्तूनिया के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। अल्तूनिया इस प्रस्ताव से सहमत हो गया और उसने रजिया को कारागार से मुक्त करके उसके साथ विवाह कर लिया। अब अल्तूनिया और रजिया एक सेना लेकर दिल्ली के तख्त पर अधिकार करने के लिए दिल्ली की ओर चल दिये। मलिक इज्जुद्दीन सालारी तथा मलिक कराकश आदि कुछ अमीर भी उनसे आ मिले परन्तु नये सुल्तान बहरामशाह की सेना ने अल्तूनिया को परास्त कर दिया। रजिया और अल्तूनिया युद्ध के मैदान से भाग निकले किंतु कैथल के निकट कुछ लुटेरों ने अल्तूनिया तथा रजिया की हत्या कर दी।

रजिया की असफलता के कारण

यद्यपि रजिया इल्तुतमिश के उत्तराधिकारियों में सर्वाधिक योग्य तथा राजपद के सर्वाधिक उपयुक्त थी परन्तु दूषित राजनीतिक वातावरण में वह शासन चलाने में असफल रही तथा लगभग तीन साल बाद ही उसका पतन हो गया। उसकी असफलता के कई कारण थे-

(1.) रजिया का स्त्री होना: मध्यकालीन इतिहासकारों ने रजिया की विफलता का प्रधान कारण उसका स्त्री होना बताया है। तलवार को ही योग्यता का एकमात्र आधार मानने वाले तुर्की अमीर, एक औरत के अधीन रहकर काम करने को तैयार नहीं हुए। पर्दे का त्याग करके, औरतों के कपड़ों का त्याग करके तथा पुरुषों के कपड़े धारण करके उसने तुर्की अमीरों के अहंकार को गहरी चोट पहुँचाई। यदि वह पुरूष होती तो निश्चय ही अधिक सफल हुई होती क्योंकि तब याकूत के प्रेम का अपवाद नहीं फैला होता और इस आधार पर जुनैदी आदि तुर्की अमीरों ने उसका विरोध करने का दुस्साहस नहीं किया होता। 

(2.) तुर्की अमीरों का स्वार्थ: रजिया की असफलता का दूसरा कारण तुर्की अमीरों का स्वार्थ तथा उनका शक्तिशाली होना बताया है। दिल्ली सल्तनत में तुर्की अमीरों का प्रभाव इतना अधिक था कि सुल्तान के लिये उनसे विरोध करके शासन करना अत्यन्त दुष्कर कार्य था। रजिया ने तुर्कों की शक्ति को एक सीमा तक घटा दिया। रजिया ने बड़ी सतर्कता के साथ अमीरों के प्रतिद्वन्द्वी दलों को संगठित किया परन्तु इसके लिये समय की आवश्यकता थी जो दुर्भाग्यवश उसे नहीं मिल सका।

(3.) रजिया की स्वेच्छाचारिता: रजिया ने अपने विपक्षियों पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त स्वेच्छाचारिता तथा निरंकुश शासन स्थापित करने का प्रयत्न किया। तुर्की अमीरों ने ऐबक के शासन काल से ही राज्य की सारी शक्ति अपने हाथ में कर ली थी। वे एक स्त्री सुल्तान के स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश शासन को सहन नहीं कर सके। उन्होंने रजिया के स्वेच्छाचारी शासन को समाप्त करके ही दम लिया।

(4.) याकूत के प्रति अनुराग: रजिया की सेवा में एक अबीसीनियाई हब्शी गुलाम जमालुद्दीन याकूत रहता था। सुल्तान बनते ही रजिया ने उसे अमीर-ए-आखूर अर्थात् घुड़साल का अध्यक्ष बना दिया। रजिया इस गुलाम को घुड़सवारी करते समय अपने साथ ले जाती। उस गुलाम को किसी भी समय सुल्तान के समक्ष उपस्थित होने का अधिकार दिया गया। इस कारण लोगों में रजिया सुल्तान और याकूत के प्रेम का अपवाद प्रचलित हो गया। यह बात स्वयं को उच्च रक्तवंशी मानने वाले तुर्की अमीरों को पसन्द नहीं आयी। इससे रजिया का विरोध बड़ी तेज गति से बढ़ने लगा। अन्त में अमीरों तथा सरदारों ने उसके शासन को समाप्त कर दिया।

(5.) जनता के सहयोग का अभाव: रजिया की विफलता का एक कारण यह भी था कि मुसलमान प्रजा कट्टर इस्लामी प्रथाओं में विश्वास करने के कारण उसे सहयोग न दे सकी। हिन्दू प्रजा का सहयोग तथा समर्थन प्राप्त करना वैसे भी असम्भव था क्योंकि तुर्की शासक, विधर्मी तथा विदेशी थे।

(6.) इल्तुतमिश के वयस्क पुत्रों का जीवित रहना: इल्तुतमिश के वयस्क पुत्रों का जीवित रहना रजिया के लिए बड़ा घातक सिद्ध हुआ। उनसे षड्यन्त्रकारियों को सम्बल तथा प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। षड्यन्त्रकारी इन शहजादों की आड़ में रजिया पर प्रहार करने लगे। अंत में इन्हीं शहजादों में से एक बहरामशाह ने राज्य पर अधिकार कर लिया।

(7.) केन्द्रीय सरकार की दुर्बलता: रजिया की विफलता का एक कारण यह बताया जाता है कि अभी तक भारत में तुर्की साम्राज्य का शैशव काल था। इस कारण केन्द्रीय सरकार स्थानीय हाकिमों को अपने पूर्ण नियंन्त्रण में नहीं कर पाई थी। स्थानीय हिन्दू सरदारों के निरन्तर विद्रोह होते रहने के कारण सुल्तानों को अपने स्थानीय हाकिमों को पर्याप्त मात्रा में सैनिक एवं प्रशासकीय अधिकार देने पड़ते थे। अतः विरोधियों द्वारा इन हाकिमों से सांठ-गांठ कर लेने पर केन्द्रीय सरकार उन्हें ध्वस्त नहीं कर पाती थी।

रजिया के चरित्र तथा उसके कार्यों का मूल्यांकन

(1) प्रथम स्त्री सुल्तान: रजिया भारत की प्रथम तथा अन्तिम स्त्री सुल्तान थी। यद्यपि विदेशों में रजिया के पूर्व भी स्त्रियां तख्त पर बैठ चुकी थीं परन्तु भारत में तख्त पर बैठने का सौभाग्य तथा गौरव रजिया को ही प्राप्त हुआ।

(2) सुल्तानोचित गुण-सम्पन्नता: रजिया योग्य तथा प्रतिभा-सम्पन्न स्त्री थी। अपने पिता के जीवन काल में ही वह अपनी योग्यता का परिचय दे चुकी थी। इसी से उसके पिता ने अपने पुत्रों की उपेक्षा करके उसी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। रजिया में सुल्तानोचित गुण विद्यमान थे। अनुकूल परिस्थितियों में वह सफल शासक सिद्ध हुई होती, परन्तु तत्कालीन वातावरण उसके विपरीत था। जिन संकटों और षड़यंत्रों में वह तख्त पर बैठी थी, उनमें किसी भी शासक का नष्ट हो जाना संभव था। रजिया ने धैर्य तथा साहस के साथ उनका सामना किया और समस्त विपक्षियों पर विजय प्राप्त करके अपने पिता के साम्राज्य को सुरक्षित रखा।

(3) उच्च-कोटि की सैनिक योग्यता: रजिया में उच्च कोटि की सैनिक योग्यता तथा संगठन की अद्भुत क्षमता थी। इसी से वह रण क्षेत्र में अपने विपक्षियों के विरुद्ध सफलता प्राप्त कर पाती थी। अपने शासन के प्रारंभिक काल में वह समस्त विद्रोहियों का दमन करने में सफल रही।

(4) कूटनीतिज्ञ: रजिया न केवल एक कुशल राजनीतिज्ञ वरन् बहुत बड़ी कूटनीतिज्ञ भी थी। जहाँ शक्ति तथा बल से कार्य की सिद्धि नहीं हो सकती थी, वहाँ वह कूटनीति से काम लेती थी। अपनी कूटनीति के बल पर ही वह अपने विपक्षियों के संघ को भंग कर सकी थी और उन पर विजय प्राप्त कर सकी थी।

(5) स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश: रजिया ने सुल्तान की शक्ति को बढ़ाया तथा उसे स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश बनाया। वह दिल्ली की प्रथम सुल्तान थी जिसने अमीरों तथा मलिकों को शासन की इच्छानुसार कार्य करने के लिए विवश किया। उसने तुर्की अमीरों को सुल्तान के अधीन होने का अहसास करवाया। उसने तुर्की अमीरों के वर्चस्व को तोड़ने के लिये याकूत जैसे अबीसीनियाई हब्शी को उच्च पद दिया।

(6) दुर्बलताएं: रजिया का पतन उसकी दुर्बलताओं के कारण नहीं वरन् कट्टर मुसलमानों की असहिष्णुता के कारण हुआ था। फिर भी इतिहासकारों ने उस पर यह आरोप लगाया है कि उसमें स्त्री-सुलभ दुर्बलताएं थीं। याकूत से उसका अनुराग उत्पन्न होना तथा अल्तूनिया से विवाह कर लेना उसकी दुर्बलताओं के प्रमाण हैं। रजिया की विफलता ने इस तथ्य को सिद्ध कर दिया कि उस युग की राजनीति में स्त्रियों के लिए कोई स्थान न था, वे चाहे कितनी ही योग्य क्यों न हों।

मुइजुद्दीन बहरामशाह (1240-42 ई.)

रजिया के बाद इल्तुतमिश का तीसरा पुत्र मुइजुद्दीन बहरामशाह दिल्ली का सुल्तान हुआ। वह दुस्साहसी तथा क्रूर व्यक्ति था। उसे इस शर्त पर बादशाह बनाया गया था कि शासन का पूरा अधिकार विद्रोहियों के नेता एतिगीन के हाथ में रहेगा। एतिगीन ने सुल्तान के कई विशेषाधिकार हड़प लिये। वह अपने फाटक पर नौबत बजवाता तथा अपने यहाँ हाथी रखता था। उसने बहराम की एक बहिन से विवाह भी कर लिया। इस प्रकार वह सुल्तान से भी अधिक महत्वपूर्ण तथा शक्तिशाली हो गया। इस कारण कुछ ही दिनों में बहरामशाह तथा एतिगीन में ठन गई और बहरामशाह ने एतिगीन की उसके ही कार्यालय में हत्या करवा दी। बहरामशाह ने वजीर निजामुलमुल्क की भी हत्या करवाने का प्रयास किया किंतु वजीर बच गया। सुल्तान प्रकट रूप से उसके साथ मित्रता का प्रदर्शन करता रहा। एतिगीन की हत्या के बाद मलिक बदरुद्दीन सुंकर को अमीर ए हाजिब नियुक्त किया गया। सुंकर ने वजीर तथा सुल्तान, दोनों की उपेक्षा करके शासन पर कब्जा जमाने का प्रयास किया। उसने बहरामशाह के विरुद्ध षड़यंत्र रचा। इस पर सुंकर को बदायूं का सूबेदार नियुक्त करके बदायूं भेज दिया गया। चार माह बाद सुंकर सुल्तान की अनुमति लिये बिना दिल्ली लौट आया। इस पर सुल्तान बहरामशाह ने सुंकर तथा उसके सहयोगी ताजुद्दीन अली को मरवा दिया। सुल्तान ने काजी जलालुद्दीन की भी हत्या करवा दी। इन हत्याओं से चारों ओर सुल्तान के विरुद्ध षड़यंत्र रचे जाने लगे। आन्तरिक कलह तथा षड्यन्त्र के साथ-साथ सुल्तान बहरामशाह को मंगोलों के आक्रमण का भी सामना करना पड़ा। 1241 ई. में मंगोलों ने लाहौर पर अधिकार कर लिया। 1242 ई. में बहरामशाह ने वजीर मुहाजबुद्दीन को एक सेना देकर लाहौर के लिये रवाना किया। वजीर मुहाजबुद्दीन सेना को लाहौर ले जाने के स्थान पर उसे भड़काकर मार्ग में से ही पुनः दिल्ली ले आया। जब विद्रोहियों ने दिल्ली पर आक्रमण किया तो दिल्ली के नागरिकों ने सुल्तान को बचाने के लिये अपने प्राणों की बाजी लगा दी किंतु अंततः विद्रोहियों ने बहरामशाह को बंदी बना लिया तथा दिल्ली पर अधिकार कर लिया। बहरामशाह बन्दी बना लिया गया और कुछ दिन बाद उसकी हत्या कर दी गई।

अलाउद्दीन मसूदशाह (1242-46 ई.)

बहरामशाह की हत्या के बाद दिल्ली का तख्त रिक्त हो गया। इसके पहले कि अमीर नये सुल्तान का निर्वाचन करते, इज्जूद्दीन किशलू खाँ ने स्वयं को सुल्तान घोषित कर दिया। वह किसी राजवंश में उत्पन्न नहीं हुआ था परन्तु चूंकि उसने इल्तुतमिश की एक पुत्री से विवाह कर लिया था, इसलिये वह स्वयं को राजपद का अधिकारी समझता था। अमीरों ने उसे सुल्तान स्वीकार नहीं किया और रुकुनुद्दीन फीरोज के पुत्र अलाउद्दीन मसूद को तख्त पर बैठा दिया। उसे इस शर्त पर सुल्तान बनाया गया कि वह केवल सुल्तान की उपाधि का उपयोग करेगा, सल्तनत के सारे अधिकार चालीस अमीरों के मण्डल के पास रहेंगे। इन अमीरों ने अपनी स्थिति को सुदृढ़़ बनाने के लिए इल्तुतमिश के जीवित बचे दो शहजादों नासिरुद्दीन तथा जलालुद्दीन को कारागार में डाल दिया और प्रायः समस्त उच्च-पद आपस में बांट लिये। ताकि सुल्तान को स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश होने का अवसर न प्राप्त हो। कुछ समय बाद ही अमीरों में फूट पड़ गई।

सुल्तान अलाउद्दीन मसूदशाह ने इस परिस्थिति से लाभ उठाया। उसने अपने चाचा जलालुद्दीन को कन्नौज की और नासिरुद्दीन को बहराइच की जागीर देकर लोकप्रियता प्राप्त करने का प्रयास किया परन्तु वह सल्तनत को पतनोन्मुख होने से नहीं रोक सका। उसके समय में सुदूरस्थ प्रांतों के हाकिमों ने पर्याप्त स्वतंत्रता प्राप्त कर ली। खोखर लोग भी सक्रिय हो गये। कटेहर तथा बिहार में राजपूतों ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। 1243 ई. में जाजनगर के राय ने बंगाल पर आक्रमण कर दिया जिससे वहाँ पर बड़ी गड़बड़ी फैल गई। 1245 ई. में मंगोलों ने भारत पर आक्रमण कर दिया। अलाउद्दीन मसूदशाह ने उन्हें भारत से मार भगाया। इस विजय के बाद मसूदशाह में बड़ा परिवर्तन आ गया। वह विजयी, विलासी तथा क्रूर हो गया। उसने षड़यंत्रकारी अमीरों की हत्या करानी आरम्भ कर दी। इससे अमीरों तथा मलिकों में बड़ा असंतोष फैला और उन्होंने सुल्तान के चाचा नासिरुद्दीन को सुल्तान बनने के लिये आमन्त्रित किया। नासिरुद्दीन ने इस निमन्त्रण को स्वीकार कर लिया। वह औरत का वेश धरकर दिल्ली में प्रविष्ट हुआ। मसूद को पदच्युत करके उसकी हत्या कर दी गई। इस प्रकार नासिरुद्दीन दिल्ली का सुल्तान बन गया।

नासिरुद्दीन महमूद (1246-66 ई.)

नासिरुद्दीन महमूद का जन्म 1228 ई. में हुआ था। वह इल्तुतमिश का पुत्र था। उसका बचपन कारागार में व्यतीत हुआ था। मसूदशाह के तख्त पर बैठने के उपरान्त वह कारागार से मुक्त कर दिया गया और बहराइच का शासक बना दिया गया। जब दिल्ली के अमीरों ने मसूदशाह से असन्तुष्ट होकर उसे सुल्तान बनने के लिए आमन्त्रित किया तो उसने औरत का वेश धरकर नगर में प्रवेश किया और 10 जून 1246 को मसूदशाह की हत्या के बाद, स्वयं सुल्तान बन गया। जनवरी 1247 ई. में प्रजा ने भी उसे सार्वजनिक दरबार में अपना सुल्तान स्वीकार कर लिया। इतिहासकारों ने नासिरुद्दीन के चरित्र की मुक्त-कण्ठ से प्रशंसा की है। वह बड़ा ही उदार तथा सरल स्वभाव का व्यक्ति था। वह अत्यन्त सादा जीवन व्यतीत करता था। कहा जाता है कि वह कुरान की आयतों को लिखकर अपनी जीविका चलाया करता था। उसके एक ही पत्नी थी और कोई दासी नहीं थी। यह कथन असत्य प्रतीत होता है।

नासिरुद्दीन की समस्याएँ

दिल्ली का सुल्तान बनने के बाद नासिरुद्दीन को तीन प्रमुख समस्याओं का सामना करना पड़ा। ये समस्याएँ निम्नलिखित थीं-

(1) तुर्की अमीरों की समस्या: इल्तुतमिश की मृत्यु के उपरान्त राज्य में तुर्की अमीरों का प्रभाव बहुत बढ़ गया था। वे अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और पारस्परिक ईर्ष्या से ग्रस्त रहते थे। फलतः वे कई दलों में विभक्त हो गये। प्रत्येक दल राजनीति में अपना प्राबल्य स्थापित कर राज्य के महत्वपूर्ण पदों पर अपने दल वालों को नियुक्त करना चाहता था। इन्हीं अमीरों तथा सरदारों के षड्यन्त्रों एवं कुचक्रों के कारण एक के बाद एक करके सुल्तान मारे जा रहे थे। अतः नासिरुद्दीन के लिये यह आवश्यक था कि वह इन अमीरों पर नियन्त्रण रखे और उनमें सुल्तान के प्रति स्वामिभक्ति एवं भय उत्पन्न करे, अन्यथा उसका अपना जीवन भी संकट में पड़ सकता था।

(2) मंगोलों की समस्या: इन दिनों दिल्ली सल्तनत के पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश पर मंगोलों के आक्रमण बढ़ गये थे। सल्तनत की रक्षा के लिए इन आक्रमणों का रोकना नितान्त आवश्यक था। अनेक तुर्क सरदार मंगोलों की शरण में चले गये जिससे दिल्ली सल्तनत की चिन्ता बढ़ती ही चली गई।

(3) राजपूतों की समस्या: जैसे ही केन्द्रीय शक्ति क्षीण होती दिखाई देती थी, राजपूत शासक विद्रोह का झण्डा खड़ा करके दिल्ली की सल्तनत को कर देना बन्द कर देते थे। इस काल में विद्रोही राजपूतों की शक्ति इतनी प्रबल हो गई थी कि वे प्रायः राजधानी में प्रवेश करके लूट-मार किया करते थे। सल्तनत की सुरक्षा के लिए राजपूतों को दबाना आवश्यक था। नासिरुद्दीन इन समस्त समस्याओं को सुलझाने में सफल हुआ।

समस्याओं का निवारण

नासिरुद्दीन की समस्याएँ अत्यन्त विकराल थीं जिनसे राज्य के नष्ट हो जाने तथा सुल्तान के मारे जाने का पूरा भय था परन्तु नासिरुद्दीन में उन समस्याओं को सुलझाने की क्षमता भी थी। उसने इस कार्य को दृढ़़तापूर्वक सम्पन्न किया।

(1) तुर्की अमीरों पर नियंत्रण: नासिरुद्दीन ने सुल्तान बनने के बाद पुराने अमीरों को उनके पद पर बने रहने दिया तथा नये अमीरों की नियुक्ति नहीं की। तीन वर्ष तक वह अपने अमीरों के कार्यों का निरीक्षण करता रहा। बाद में बलबन को चालीसा मण्डल (तुर्कान ए चिहालगानी) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया किंतु जब बलबन के विरुद्ध शिकायतें मिलीं तो उसने बलबन को नायब के पद से हटाकर दिल्ली से बाहर भेज दिया। जब नया नायब अयोग्य निकला तो उसने बलबन को पुनः उसके पद पर बहाल कर दिया। अमीरों के काम में हस्तक्षेप नहीं करने के कारण अमीर उससे संतुष्ट रहे।

(2) बंगाल में विद्रोहों का प्रकोप: नासिरुद्दीन के पूरे शासन काल में लखनौती में गड़बड़ी व्याप्त रही। उसके बीस वर्षीय शासन में लखनौती में सात-आठ शासक हुए। लखनौती में दिल्ली का प्रभुत्व उसी समय स्थापित हो पाता था जब वहाँ के शासक अपने पड़ौसियों से झगड़ा मोल ले लेते थे। नासिरुद्दीन दिल्ली की समस्याओं में उलझे रहने से बंगाल में स्थायी रूप से अपना शासन स्थापित नहीं कर सका।

(3) पंजाब पर सत्ता की पुनः स्थापना: 12 नवम्बर 1246 को सुल्तान नासिरुद्दीन ने पंजाब पर अपनी सत्ता की पुर्नस्थापना करने के उद्देश्य से बलबन के साथ पंजाब की ओर प्रस्थान किया। मार्च 1247 में उसने रावी नदी को पार किया। इसके बाद उसने बलबन को नमक की पहाड़ियों में भेज दिया जहाँ बलबन ने खोखरों तथा अन्य हिन्दू-कबाइलियों से दण्ड वसूल किया। इसके बाद वह सिन्ध के किनारे पहुँचा जहाँ उसने नमक की पहाड़ी के राजा जयपाल को परास्त किया। 9 नवम्बर 1247 को सुल्तान नासिरुद्दीन, बलबन के साथ दिल्ली लौट आया।

(4) जलालुद्दीन का विद्रोह: सुल्तान नासिरुद्दीन का भाई जलालुद्दीन सम्भल तथा बदायूँ का सूबेदार था। वह बलबन की बढ़ती हुई शक्ति से सशंकित होकर बदायूँ से मुल्तान की ओर भाग गया और मंगोलों से जा मिला तथा दिल्ली की गद्दी पाने की चेष्टा करने लगा। अंत में वह निराश होकर 1255 ई. में भारत लौट आया। नासिरुद्दीन ने उसे लाहौर का शासक बनाकर अपनी उदारता का परिचय दिया और उसके विरोध का अन्त कर दिया।

(5) किशलू खाँ का विद्रोह: नागौर के सरदार किशलू खाँ ने बागी होकर मुल्तान तथा उच्च पर अधिकार कर लिया। सुल्तान नासिरुद्दीन स्वयं सेना लेकर वहाँ गया और किशलू खाँ के विद्रोह का दमन किया।

(6) अन्य विद्रोह: बलबन की बढ़ती हुई शक्ति को देखकर बहुत से अमीर उससे ईर्ष्या करने लगे। इन लोगों ने बलबन के विरुद्ध सुल्तान के कान भरने आरम्भ किये। सुल्तान ने बलबन को राजधानी दिल्ली से निष्कासित कर दिया। बलबन ने सुल्तान की आज्ञा को शिरोधार्य कर लिया। बलबन की अनुपस्थिति में राज्य का काम बिगड़ने लगा। फलतः सुल्तान ने उसे फिर से दिल्ली बुला लिया। इससे बलबन के विरोधियों को बड़ी निराशा हुई और वे फिर से बलबन के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगे। इन विद्रोहियों में रहैन, कुतुलुग खाँ, किशलू खाँ तथा जलालुद्दीन प्रमुख थे। सुल्तान नासिरुद्दीन ने बलबन की सहायता से इन समस्त विद्रोहियों का दमन कर दिया।

(7) मंगोलों के आक्रमण: मंगोलों ने भारतीय सीमा के निकट अपने राज्य को अत्यन्त सुदृढ़़ बना लिया था। अतः अब उनका ध्यान दिल्ली सल्तनत की ओर अधिक आकृष्ट होने लगा। इन परिस्थितियों में दिल्ली सल्तनत की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था करना अनिवार्य था। 1246-47 ई. में खोखरों के विद्रोह को शान्त करने के लिए बलबन पंजाब गया। इन्हीं दिनों एक मंगोल सेना सिन्ध के पार पड़ी हुई थी। बलबन की अध्यक्षता में सुल्तान की विशाल सेना के आगमन का समाचार पाते ही मंगोल सेना भयभीत होकर खुरासान की ओर पलायन कर गई।

(8) हिन्दुओं के विद्रोह का दमन: नासिरुद्दीन ने हिन्दुओं के विद्रोह का सामना धैर्य पूर्वक किया। बंगाल पर हिन्दुओं का निरन्तर आक्रमण होता रहा। इन्हीं दिनों बुन्देलखण्ड तथा बघेलखण्ड पर चन्देल राजपूतों ने अधिकार कर लिया। 1248 ई. में बलबन ने बुन्देलखण्ड पर आक्रमण किया। इससे चन्देलों की उत्तर की प्रगति रुक गई। बघेलों तथा अवध के शासकों में भी कई बार संघर्ष हुआ, परन्तु इससे बघेलों की शक्ति किसी भी प्रकार क्षीण नहीं हुई। मालवा के राजपूतों ने भी अपनी शक्ति में वृद्धि कर ली। 1251-52 ई. में बलबन ने मालवा पर आक्रमण कर दिया और लूट का माल लेकर दिल्ली लौट आया। मालवा पूर्ववत् स्वतन्त्र बना रहा। राजपूताना के चौहान तथा अन्य राजा भी अपनी शक्ति बढ़ाते रहे। बलबन ने कई बार रणथम्भौर पर आक्रमण किया और बूँदी तथा चितौड़ तक धावा मारा परन्तु इन आक्रमणों से कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ा और राजपूत राजा पूर्ववत् स्वतन्त्र बने रहे। मेवातियों के उपद्रव का भी सुल्तान को सामना करना पड़ा। बलबन ने कई बार मेवातियों पर आक्रमण किया तथा उनके गांवों तथा नगरों को भस्म करवा दिया और उन जंगलों को कटवा दिया जिनमें मेवाती लोग भाग कर शरण लेते थे परन्तु मेवातियों का प्रकोप कम नहीं हुआ। दोआब तथा कटेहर में भी विद्रोह फैल गया। यद्यपि बलबन ने इन विद्रोहों की बड़ी क्रूरता से दमन किया परन्तु वह स्थायी शांति स्थापित नहीं कर सका और विद्रोह अनवरत जारी रहे।

दिल्ली का वास्तविक शासक कौन

सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद ने बीस वर्ष तक दिल्ली पर शासन किया परन्तु इस अवधि में वास्तविक सत्ता किसके हाथ में रही, इस बात पर इतिहासकारों में मतभेद है। अधिकांश इतिहासकार उसके प्रधानमंत्री बलबन को ही राज्य का वास्तविक शासक मानते हैं। इसामी के अनुसार नासिरुद्दीन महमूद, तुर्क अमीरों की पूर्व आज्ञा के बिना कोई राय व्यक्त नहीं करता था और उनके आदेश के बिना हाथ-पैर तक नहीं हिलाता था। डॉ. निजामी के अनुसार नासिरुद्दीन महमूद ने पूर्ण रूप से अमीरों के समक्ष आत्म समर्पण कर दिया था। चालीसा मण्डल का प्रधान बलबन, सुल्तान को कठपुतली बनाकर उसके समस्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए शासन करता रहा। डॉ. अवध बिहारी पाण्डेय इस मत को स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार 1255 ई. तक नासिरुद्दीन महमूद शासन तंत्र पर प्रभावी रहा। सुल्तान बनने के बाद उसने पुराने अमीरों को उनके पद पर बने रहने दिया तथा नये अमीरों की नियुक्ति नहीं की। तीन वर्ष तक वह अपने अमीरों के कार्यों का निरीक्षण करता रहा। बाद में बलबन को चालीसा मण्डल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया किंतु जब बलबन के विरुद्ध शिकायतें मिलीं तो उसने बलबन को नायब के पद से हटाकर दिल्ली से बाहर भेज दिया। जब नया नायब अयोग्य निकला तो उसने बलबन को पुनः उसके पद पर बहाल कर दिया। इन घटनाओं से सिद्ध हो जाता है कि वह कठपुतली शासक नहीं था। फिर भी यह सत्य है कि वास्तविक सत्ता बलबन के हाथों में रही। 1249 ई. में बलबन ने अपनी पुत्री का विवाह नासिरुद्दीन महमूद के साथ कर दिया। इससे बलबन की प्रतिष्ठा बढ़ गई। सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद ने बलबन को उलूग खाँ की उपाधि दी तथा नायब-ए-मुमालिक का पद प्रदान किया।

नासिरुद्दीन की मृत्यु

1265 ई. में नासिरुद्दीन रोगग्रस्त हो गया और 18 फरवरी 1266 को उसकी मृत्यु हो गई। कुछ लोगों की मान्यता है कि बलबन ने उसे विष दिलवा दिया था परन्तु यह कल्पना निराधार प्रतीत होती है। नासिरुद्दीन के कोई औलाद नहीं थी। इस कारण  नासिरुद्दीन ने अपने जीवन काल में ही बलबन को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था। अतः सुल्तान की मृत्यु के उपरांत बलबन दिल्ली के तख्त पर बैठा।

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