Monday, September 20, 2021

अध्याय – 3 : दिल्ली सत्लतन का वास्तविक संस्थापक इल्तुतमिश

इल्तुतमिश का प्रारम्भिक जीवन

इल्तुतमिश का पिता आलम खाँ तुर्कों के इल्बरी कबीले का एक प्रधान व्यक्ति था। इल्तुतमिश बाल्यकाल से प्रतिभाशाली तथा रूपवान था इस कारण उसे अपने पिता की विशेष कृपा तथा वात्सल्य प्राप्त था। इससे भाइयों तथा सम्बन्धियों को उससे ईर्ष्या हो गई। वे लोग उसे घर से बहकाकर ले गये और बुखारा जाने वाले घोड़ों के सौदागर के हाथ बेच दिया। घोड़ों के सौदागर ने उसे बुखारा के मुख्य काजी के एक सम्बन्धी को बेच दिया। इसके बाद इल्तुतमिश दो बार और बेचा गया। अन्त में जमालुद्दीन नामक एक सौदागर इल्तुतमिश को गजनी ले गया। गजनी के सुल्तान मुहम्मद गौरी के एक नौकर की दृष्टि इल्तुतमिश पर पड़ी। उसने सुल्तान से इल्तुतमिश की प्रशंसा की परन्तु मूल्य का निर्णय न होने के से इल्तुतमिश खरीदा नहीं जा सका। कुछ दिनों के उपरान्त कुतुबुद्दीन ऐबक ने इल्तुतमिश को दिल्ली में खरीद लिया।

1205 ई. में जब मुहम्मद गौरी ने पंजाब में खोखरों के विरुद्ध अभियान किया तो उसमें इल्तुतमिश ने असाधारण पराक्रम का परिचय दिया। इससे प्रसन्न होकर गौरी ने कुतुबुद्दीन को आदेश दिया कि वह इल्तुतमिश को गुलामी से मुक्त कर दे तथा उसके साथ अच्छा व्यवहार करे। इसके बाद ऐबक इल्तुतमिश के साथ सौम्य व्यवहार करने लगा तथा सदैव अपने साथ रखने लगा। ऐबक ने उसे ‘सर जानदार’ के पद पर नियुक्त किया और बाद में ‘अमीरे शिकार’ बना दिया। जब ग्वालियर पर कुतुबुद्दीन का अधिकार स्थापित हो गया तब इल्तुतमिश वहाँ का अमीर नियुक्त किया गया। कुतुबुद्दीन ने अपनी एक पुत्री का विवाह इल्तुतमिश के साथ कर दिया तथा उसे बदायूँ का गवर्नर नियुक्त किया।

इल्तुतमिश का दिल्ली पर अधिकार

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के समय इल्तुतमिश बदायूं का गवर्नर था। जिस समय लाहौर के अमीरों ने आरामशाह को ऐबक का उत्तराधिकारी घोषित किया, उस समय दिल्ली का सेनापति अली इस्माइल, दिल्ली के मुख्य काजी के पद पर भी कार्य कर रहा था। उसने कुछ अमीरों को अपने साथ मिलाकर, इल्तुतमिश को सुल्तान बनने के लिये आमंत्रित किया। इससे इल्तुतमिश को दिल्ली की सेना एवं अमीरों का विश्वास प्राप्त हो गया। इल्तुतमिश ने पहले भी कई अवसरों पर अपने रण-कौशल का परिचय दिया था इसलिये सेना तथा अमीर उसकी नेतृत्व प्रतिभा से परिचित थे। सेना का प्रिय तथा विश्वासपात्र बन जाने से इल्तुतमिश की स्थिति सुदृढ़़ हो गई। इल्तुतमिश ने दिल्ली के बाहर ही आरामशाह का मुकाबला किया तथा उसे परास्त करके दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। इस प्रकार अपनी योग्यता एवं भाग्य के बल पर इल्तुतमिश गुलाम से सुल्तान बन गया।

इल्तुतमिश की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ

सुल्तान बनते ही इल्तुतमिश को अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा। उसके समक्ष निम्नलिखित चुनौतियाँ थीं-

(1.) आरामशाह की समस्या: आरामशाह, कुतुबुद्दीन ऐबक का पुत्र था जबकि इल्तुतमिश कुतुबुद्दीन ऐबक का गुलाम तथा जामाता था। इसलिये इल्तुतमिश  की अपेक्षा आरामशाह, ऐबक की सल्तनत का प्रबल दावेदार था। इसलिये दिल्ली पर अधिकार करने से पहले इल्तुतमिश को आरामशाह से निबटना था किंतु इल्तुतमिश को दिल्ली की सेना एवं कुछ अमीरों का समर्थन मिल जाने से यह काम बड़ी सरलता से सम्पन्न हो गया। इल्तुतमिश ने आरामशाह को बंदी बना लिया। इसके बाद आरामशाह का कुछ पता न चला। सम्भवतः उसका वध कर दिया गया।

(2.) उत्तराधिकार की समस्या: यद्यपि दिल्ली के काजी अली इस्माइल की सहायता से इल्तुतमिश दिल्ली के तख्त पर बैठ गया था परन्तु उसने इस पद को उत्तराधिकार के नियम से नहीं प्र्राप्त किया था। यह पद उसने अपने गुणों एवं कुछ अमीरों के सहयोग से प्राप्त किया था। चूूँकि वह एक गुलाम का गुलाम था, अतः बहुत से कुतुबी तथा मुइज्जी अमीरों ने उसे सुल्तान स्वीकार नहीं किया। स्वतन्त्र तुर्क सरदार गुलाम के गुलाम को अपना स्वामी स्वीकार करने में अपना अपमान समझते थे। वे उसे राज्य का अपहर्ता मानते थे। इल्तुतमिश ने धैर्य के साथ इन विरोधियों का दमन किया।

(3.) समकक्ष तुर्क सरदारों की समस्या: सुल्तान बनने के पूर्व इल्तुतमिश एक छोटे से प्रान्त का गवर्नर था। अधिकांश तुर्क-सरदार उसके समकक्ष थे और कुछ तुर्क-सरदार कुबाचा तथा अलीमर्दा तो कुतुबुद्दीन ऐबक के ही काल से पद तथा प्रतिष्ठा में उससे कहीं अधिक ऊँचे थे। उन्हें इल्तुतमिश का उत्कर्ष सह्य नहीं था। उन्हें अपने वश में करने के लिए साहस, बुद्धि तथा धैर्य की आवश्यकता थी। इल्तुतमिश में ये समस्त गुण विद्यमान थे, अतः वह सफलतापूर्वक अपने समकक्ष विरोधियों का सामना कर सका।

(4.) सैनिक विद्रोह की आश्ंाका: तुर्कों में यह परम्परा थी कि कोई वंश-विशेष सदैव के लिए राज्य का अधिकारी नहीं होता था। सुल्तान, तुर्क अमीरों के निर्वाचन द्वारा नियुक्त किया जा सकता था। फलतः समस्त योग्य तथा महत्वाकांक्षी सेनापति राजपद प्राप्त करने की चेष्टा तथा प्रयास करते थे। ऐसी स्थिति में राज्य में सैनिक विद्रोह होने की सदैव सम्भावना बनी रहती थी।

(5.) खिलजी मलिक की समस्या: खिलजी मलिक बंगाल तथा बिहार में अपनी शक्ति बढ़ा रहा था और अपना स्वतन्त्र शासन स्थापित कर चुका था।

(6.) अलीमर्दा खाँ की समस्या: बंगाल में अलीमर्दा खाँ बड़ी निर्दयता तथा निरंकुशता से शासन कर रहा था और अलाउद्दीन का विरुद धारण करके अपने को स्वतन्त्र शासक घोषित कर चुका था।

(7.) कुबाचा की समस्या: कुबाचा भी ऐबक की तरह मुहम्मद गौरी का गुलाम था। उसने भी गौरी की वैसी ही सेवा की थी जैसी ऐबक ने की थी। गौरी ने उसे उच्च का गर्वनर नियुक्त किया था। मुहम्मद गौरी के मरने के बाद उसने स्वयं को मुल्तान तथा सिन्ध का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया। वह लाहौर तथा उत्तरी पंजाब पर भी अधिकार स्थापित करना चाहता था। इसलिये उसने पंजाब का बहुत सा भाग दबा लिया और लाहौर, भटिन्डा, सरसुती, कुहराम आदि दुर्गों पर अपनी चौकियाँ स्थापित कर दीं। अब उसकी दृष्टि दिल्ली पर लगी हुई थी।

(8.) यल्दूज की समस्या: ताजुद्दीन यल्दूज, कुतुबुद्दीन ऐबक का श्वसुर था। उसने गजनी पर अधिकार स्थापित कर लिया था इसलिये वह स्वयं को मुहम्मद गौरी का उत्तराधिकारी समझता था और उस सम्पूर्ण भारतीय भू-भाग को अपने साम्राज्य के अंतर्गत मानता था जो मुहम्मद गौरी ने जीता था। वह इल्तुतमिश को अपना प्रान्तपति समझता था। इसलिये यल्दूज ने राजकीय चिह्न इल्तुतमिश के पास भेज कर अपनी प्रभुता का प्रदर्शन भी किया। संकटपूर्ण परिस्थितियों में इल्तुतमिश ने उन वस्तुओं को स्वीकार कर लिया परन्तु उसने इस अपमान को स्मरण रखा तथा समय आने पर भरपूर बदला लिया।

(9.) भारतीय मुसलमानों की समस्या: इन दिनों दिल्ली की राजनीति में भारतीय मुसलमानों का एक प्रबल दल खड़ा हो गया था। उनमें तथा विदेशी मुसलमानों में बड़ा वैमनस्य था। इस कारण राज्य में आंतरिक संघर्ष की सम्भावना सदैव बनी रहती थी। ये लोग विद्रोह करने तथा अपना प्राबल्य स्थापित करने के लिए सचेष्ट रहते थे। इन विद्रोही-दलों पर नियन्त्रण रखना नितान्त आवश्यक था।

 (10.) राजपूतों की समस्या: मुहम्मद गौरी तथा कुतुबुद्दीन ऐबक ने जिन राजपूतों से उनके राज्य छीन लिये थे, वे ऐबक के मरते ही अपने खोये हुए राज्य प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगे। जालौर तथा रणथम्भौर के शासक फिर से स्वतन्त्र हो गये। अजमेर, ग्वालियर तथा दोआब में भी तुर्की सत्ता समाप्त हो गई। इल्तुतमिश के बदायूँ छोड़ते ही गहड़वालों की प्रतिक्रिया भी आरम्भ हो गई और उनके आक्रमणों का वेग बढ़ गया। कालिंजर तथा ग्वालियर तो ऐबक के शासन काल में ही स्वतन्त्र हो गये थे।

(11.) पश्चिमोत्तर सीमा की सुरक्षा की समस्या: पश्चिमोत्तर सीमा की रक्षा की समुचित व्यवस्था करना नितान्त आवश्यक था क्योंकि मध्य-एशिया में स्थित तुर्क तथा मंगोल राज्यों में इस समय बड़ी खलबली मची हुई थी। अनेक मंगोल सरदारों को अपना देश छोड़कर पलायन करना पड़ रहा था। मंगोल सरदार, नये राज्य स्थापित करने की कामना से प्रेरित होकर अन्य देशों पर आक्रमण कर रहे थे।

(12.) खोखरों की समस्या: पश्चिमोत्तर की समस्या के जटिल हो जाने का एक यह भी कारण था कि पंजाब में निवास करने वाले खोखर बड़े विद्रोही प्रवृत्ति के थे जो प्रायः शान्ति भंग कर देते थे।

कठिनाइयों पर विजय

इल्तुतमिश ने विपत्तियों से घबराने के स्थान पर, निर्भीकता के साथ उनका सामाना किया तथा एक-एक करके समस्त बाधााओं पर विजय प्राप्त करने में सफल रहा।

(1) राजधानी के विद्रोहों का दमन: इल्तुतमिश के दिल्ली का सुल्तान बनते ही कुतुबुद्दीन ऐबक के तुर्की अंग-रक्षकों का सरदार तथा कुतुबी एवं मुइज्जी सरदार दिल्ली के आस-पास अपनी सेनाएँ एकत्रित करने लगे। इल्तुतमिश ने उन पर अचानक आक्रमण करके उन्हें बुरी तरह परास्त किया। उनमें से बहुतों को मौत के घाट उतार कर उनकी शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया और अपनी राजधानी को पूर्ण रूप से सुरक्षित बना लिया।

(2) दोआब का दमन: इल्तुतमिश की कठिनाइयों से लाभ उठा कर दोआब के कई शासक भी स्वतन्त्र हो गये। इल्तुतमिश ने राजधानी में अपनी स्थिति सुदृढ़़ करके दोआब के विद्रोही हिन्दुओं की ओर ध्यान दिया। उसने बदायूँ, कन्नौज तथा बहराइच पर आक्रमण करके वहाँ के शासकों का दमन किया। कछार के प्रान्त पर भी उसने अपनी सत्ता स्थापित कर ली। इसके बाद उसने बहराइच को जीत कर वहाँ पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। इसके बाद उसने अवध पर आक्रमण किया, परन्तु सम्भवतः तिरहुत को उसने अपने राज्य में नहीं मिलाया। इल्तुतमिश ने बनारस तथा तराई क्षेत्र के तुर्क-सरदारों एवं हिन्दू-राजाओं को परास्त किया और उन्हें अपना आधिपत्य स्वीकार करने के लिए बाध्य किया।

(3) यल्दूज का दमन: इल्तुतमिश के गद्दी पर बैठने के कुछ समय बाद ख्वारिज्म के शाह ने गजनी पर आक्रमण करके उस पर अपना अधिकार कर लिया। यल्दूज गजनी से भागकर लाहौर आ गया। लाहौर से उसने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। इल्तुतमिश पहले से ही इस विपत्ति का सामना करने के लिए तैयार था। उसने अपनी सुसज्जित सेना के साथ दिल्ली से प्रस्थान कर दिया और 1215 ई. में तराइन के मैदान में यल्दूज को बुरी तरह परास्त किया। यल्दूज बंदी बनाकर बदायूँ के दुर्ग में भेज दिया गया जहाँ उसकी हत्या कर दी गई। इस प्रकार इल्तुतमिश के एक बड़े प्रतिद्वंद्वी का नाश हो गया।

(4) कुबाचा का अंत: यल्दूज की पराजय के कुछ समय उपरान्त कुबाचा ने लाहौर पर अधिकार कर लिया। इस पर इल्तुतमिश ने एक सेना लाहौर भेजी। इस सेना ने कुबाचा को परास्त कर दिया। उसने इल्तुतमिश का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया। इसी समय ख्वारिज्म के शाह के पुत्र जलालुद्दीन ने मंगोलों के आक्रमण से त्रस्त होकर पंजाब में शरण ली। उसने कुबाचा के राज्य को लूटकर उसे नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। इससे कुबाचा की शक्ति तथा प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का लगा। थोड़े ही दिनों बाद, मंगोल सेना ने भी मुल्तान पर आक्रमण किया तथा कुबाचा को बड़ी क्षति पहुँचाई। खिलजी तुर्क भी इन दिनों सीमान्त प्रदेशों में बड़ा उपद्रव मचा रहे थे। इस प्रकार कुबाचा की स्थिति बड़ी संकटापन्न हो गई। इस स्थिति से लाभ उठा कर 1227 ई. में इल्तुतमिश ने लाहौर पर आक्रमण कर दिया तथा लाहौर पर फिर से अपना अधिकार कर लिया। इसके बाद इल्तुतमिश ने उच्च की ओर प्रस्थान किया। इस पर कुबाचा ने अपनी सेना तथा कोष के साथ भक्कर के दुर्ग में शरण ली। तीन महीने के घेरे के बाद उच्च पर इल्तुतमिश का अधिकार हो गया। इससे कुबाचा इतना आंतकित हो गया  कि अपने प्राणों की रक्षा के लिए उसने सिन्ध नदी से उस पार भाग जाने का निश्चय किया। जब वह एक नाव में बैठ कर सिन्ध नदी को पार कर रहा था तब नाव उलट गई और कुबाचा नदी में डूब कर मर गया। इस प्रकार इल्तुतमिश के दूसरे बड़े प्रतिद्वन्द्वी का भी नाश हो गया।

(5) मंगोल आक्रमण: 1221 ई. में मंगोलों ने चंगेज खाँ के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया। चंगेज खाँ तूफान की भाँति मध्य एशिया से चला था। जब उसने ख्वारिज्म पर आक्रमण किया, तब वहाँ के शाह का पुत्र जलालुद्दीन भारत की ओर भाग आया परन्तु मंगोल उसका पीछा करते हुए भारत तक आ पहुँचे। जलालुद्दीन ने सिन्ध नदी के तट पर अपना खेमा डाल दिया तथा इल्तुतमिश से शरण मांगी।  इल्तुतमिश जानता था कि दिल्ली में जलालुद्दीन की उपस्थिति इल्तुतमिश के तुर्की अमीरों पर अच्छा प्रभाव नहीं डालेगी। इसलिये उसने जलालुद्दीन के पास कहला भेजा कि दिल्ली की जलवायु उसके अनुकूल नहीं होगी और उसके दूत को मरवा डाला। निराश होकर जलालुद्दीन सिन्ध की ओर बढ़ा और कुबाचा के राज्य में लूटमार करता हुआ फारस की ओर चल दिया परन्तु मार्ग में ही उसकी हत्या कर दी गई। जलालुद्दीन का अंत हुआ देखकर मंगोल भी लौट गये। इस प्रकार इल्तुतमिश ने अपनी दूरदर्शिता से जलालुद्दीन तथा मंगोलों से भी अपने राज्य की रक्षा कर ली।

(6) पंजाब पर विजय: पंजाब में इल्तुतमिश को अपने दो शत्रुओं का दमन करना था। एक थे विद्रोही खोखर जाति के लोग और दूसरा था खोखरों का मित्र सैफुद्दीन करलुग जो ख्वारिज्म के शाह की ओर से पश्चिमी पंजाब में नियुक्त था। इल्तुतमिश ने पहले खोखरों पर आक्रमण कर उनकी शक्ति को छिन्न-भिन्न करना आरम्भ किया और उनके राज्य के कुछ भाग पर अधिकार जमा लिया। लाहौर तो इल्तुतमिश के अधिकार में पहले से ही था। पंजाब के अन्य प्रमुख नगर- स्यालकोट, जालन्धर, नन्दना आदि भी उसके अधिकार में आ गये। जिन स्थानों पर खोखरों के उपद्रव का भय था, वहाँ पर इल्तुतमिश ने सैनिक चौकियाँ स्थापित कर दीं तथा खोखरों के गांव तुर्क अमीरों को जागीर में दे दिये। इससे उसके राज्य की पश्चिमी सीमा सुरक्षित हो गई।

(7) बंगाल का दमन: कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के उपरान्त बंगाल स्वतन्त्र हो गया था। इन दिनों हिसामुद्दीन इवाज, सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी की उपाधि धारण करके बंगाल में शासन कर रहा था। 1225 ई. में इल्तुतमिश ने बंगाल पर आक्रमण किया। गयासुद्दीन ने निर्विरोध इल्तुतमिश के आधिपत्य को स्वीकार कर लिया और बिहार पर अपने अधिकार को त्याग दिया। इल्तुतमिश संतुष्ट होकर लौट आया, परन्तु उसके दिल्ली पहुँचते ही गयासुद्दीन ने फिर से स्वयं को बंगाल का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और बिहार पर अधिकार कर लिया। इस पर इल्तुतमिश ने 1226 ई. में अपने पुत्र नासिरुद्दीन महमूद को जो उन दिनों अवध का गवर्नर था, बंगाल पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया। नासिरुद्दीन ने लखनौती पर अधिकार स्थापित करके गयासुद्दीन को मरवा डाला। इल्तुतमिश ने नासिरुद्दीन को बंगाल का गवर्नर नियुक्त किया। नासिरुद्दीन ने बंगाल में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित करने का काफी प्रयास किया किंतु 1229 ई. में नासिरुद्दीन के हटते ही बंगाल में फिर से विद्रोह की चिन्गारी फूट पड़ी। इल्तुतमिश ने 1230 ई. में पुनः बंगाल पर अधिकार कर लिया और अलाउद्दीन जैनी को वहाँ का गवर्नर नियुक्त किया।

(8) राजपूतों का दमन: ऐबक के मरते ही राजपूतों ने अपने खोये हुए राज्यों को फिर से प्राप्त करने के प्रयास किये। अनेक राजपूत राजाओं ने स्व्यं को स्वतन्त्र कर दिया। मंगोल आक्रमणों से मुक्ति पाते ही इल्तुतमिश ने राजपूतों को दण्डित करने का निर्णय लिया। 1226 ई. में उसने रणथम्भौर का घेरा डाला।  रणथम्भौर पर तुर्कों का अधिकार हो गया और उसकी सुरक्षा के लिए वहाँ मुस्लिम सेना नियुक्त की गई। इसके उपरान्त इल्तुतमिश ने परिहार राजपूतों की राजधानी मन्डोर की ओर प्रस्थान किया और उस पर भी अधिकार स्थापित कर लिया। 1228 ई. में इल्तुतमिश ने जालौर का घेरा डाला जहाँ चौहान शासक उदयसिंह शासन कर रहा था। उदयसिंह ने इल्तुतमिश का सामना किया किंतु उदयसिंह परास्त हो गया। उसने इल्तुतमिश को कर देने का वचन दिया अतः उसका राज्य उसे लौटा दिया गया। इसके बाद इल्तुतमिश ने बयाना तथा थानागिरि पर अधिकार कर लिया। अजमेर, साम्भर तथा अन्य निकटवर्ती राज्यों को भी जीत लिया। इसके बाद इल्तुतमिश ने नागौर पर अधिकार कर लिया। 1232 ई. में इल्तुतमिश ने ग्वालियर के राजा मलय वर्मा तथा कालिंजर के राजा त्रिलोक्य वर्मा को भी परास्त किया परन्तु वहाँ पर तुर्कों के पैर अधिक दिनों तक नहीं टिक सके और विवश होकर उन्हें कालिंजर छोड़ना पड़ा। इल्तुतमिश ने स्वयं सेना लेकर नागदा पर आक्रमण किया किंतु इल्तुतमिश को सफलता नहीं मिली। इल्तुतमिश ने गुजरात के चालुक्यों पर भी आक्रमण किया, परन्तु वहाँ भी उसे सफलता नहीं मिली। 1234 ई. में उसने मालवा पर आक्रमण किया और भिलसा तथा माण्डू के दुर्गों पर अधिकार कर लिया। उसने भिलसा के 300 वर्ष पुराने देवालय को नष्ट किया तथा उज्जैन पहुँच कर महाकाल के मंदिर को नष्ट कर दिया।

इल्तुतमिश की शासन व्यवस्था

इल्तुतमिश की शासन-व्यवस्था निम्न लिखित प्रकार से थी-

(1.) चालीस तुर्की अमीरों के दल का संगठन: इल्तुतमिश ने अनुभव किया कि राज्याधिकारियों में पूर्ण स्वामि-भक्ति संचारित करने का एक मात्र उपाय यही है कि राज्य के समस्त उच्च पदों पर उन्हीं व्यक्तियों को नियुक्त किया जाये जो अपनी उन्नति के लिए पूर्णतः सुल्तान की कृपा-दृष्टि पर निर्भर हों। इस उद्देश्य से उसने चालीस तुर्की अमीरों अथवा गुलामों के दल को संगठित किया। इसे चरगान अथवा तुर्कान ए चिहालगानी (चालीस दास अमीरों का दल) कहते थे। इस दल में बड़े ही योग्य तथा प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। ये लोग अपनी राजभक्ति के लिए प्रसिद्ध थे और इनका उत्थान तथा पतन सुल्तान की इच्छा पर निर्भर रहता था। 

(2.) योग्य व्यक्तियों का चयन: शासन को सुदृढ़़ बनाने के लिये इल्तुतमिश ने योग्य व्यक्तियों का चयन किया। उसने विदेशी मुसलमानों तथा भारतीय मुसलमानों को भी शासन व्यवस्था में स्थान दिया। उसने मिनहाजुस्सिराज को प्रधान काजी तथा सद्रेजहाँ के पद पर और मखरुल्मुल्क इमामी को वजीर के पद पर नियुक्त किया। मिनहाजुस्सिराज बहुत विद्वान था और इमामी तीस वर्ष तक खलीफा का वजीर रह चुका था।

(3.) विद्रोही प्रदेशों में तुर्कों को जागीरें: जिन पर्वतीय क्षेत्रों, दोआब क्षेत्र तथा खोखर प्रदेश सहित अन्य प्रदेशों में बार-बार विद्रोह होते थे, उन प्रदेशों में इल्तुतमिश ने तुर्क सरदारों को जागीरें देकर वहाँ तुर्कों की बस्तियाँ बसाईं।

(4.) न्याय की समुचित व्यवस्था: प्रजा के विवादों एवं झगड़ों का निबटारा करने के लिये इल्तुतमिश ने दिल्ली में अनेक काजी नियुक्त किये। दिल्ली के साथ-साथ राज्य के बड़े नगरों में अमीर दादा नियुक्त किये गये थे। उनके कार्यों का निरीक्षण करने तथा उनके निर्णयों के विरुद्ध अपील सुनने का भार प्रधान काजी तथा सुल्तान पर रहता था। इब्नबतूता लिखता है कि दिन के समय पीड़ित व्यक्ति को एक विशेष प्रकार का वस्त्र पहन कर अपने को सताया हुआ सूचित करना होता था। रात्रि काल के लिये अलग तरह की व्यवस्था थी। सुल्तान के राजप्रसाद के सामने संगमरमर के दो सिंह बने हुए थे जिनके गलों में घण्टियाँ लटकी रहती थीं। जब रात्रिकाल में कोई पीड़ित व्यक्ति इन घण्टियों को बजाता था तब उसकी फरियाद सुनी जाती थी तथा उसके साथ न्याय करने का प्रयत्न किया जाता था।

(5.) मुद्रा में सुधार: इल्तुतमिश ने मुद्रा में भी सुधार किया। उसके पहले की मुद्राओं में एक ओर सांड और दूसरी ओर अश्व अंकित रहता था। सुल्तान का नाम नागरी तथा अरबी दोनों लिपियों में अंकित रहता था। इल्तुतमिश ने शुद्ध अरबी मुद्राओं का प्रचार किया जो 175 ग्रेन तौल की होती थी। चाँदी के टंक का प्रयोग इल्तुतमिश ने ही प्रारम्भ किया था।

(6.) साहित्य तथा कला के कार्य: यद्यपि इल्तुतमिश के समय में साहित्य तथा विभिन्न कलाओं के सम्बन्ध में उल्लेखनीय उपलब्धियांें की जानकारी नहीं मिलती है तथापि मुस्लिम इतिहासकारों ने उसे कला-प्रेमी सुल्तान बताया है जिसने साहित्यकारों को आश्रय दिया तथा कुतुबमीनार का निर्माण पूरा करवाया। उसने एक मस्जिद का भी निर्माण करवाया था।

(7.) खलीफा द्वारा सुल्तान-ए-हिन्द की उपाधि: 1229 ई. में बगदाद के खलीफा ने इल्तुतमिश को सुल्तान-ए-हिन्द की उपाधि दी और उसके लिए एक खिलवत भिजवाई। उस खिलवत के उपरान्त इल्तुतमिश को मुस्लिम सुल्तान कहलाने का नैतिक आधार प्राप्त हो गया। इस कारण इल्तुतमिश अपनी मुद्राओं के एक ओर अपना तथा दूसरी ओर खलीफा का नाम अंकित कराने लगा।

(8.) धार्मिक नीति: अधिकांश भारतीय मुसलमान तथा तुर्क, सुन्नी मत को मानने वाले थे इस कारण सुल्तान ने सुन्नियों के साथ ही अपना समर्थन दिखाया। इससे उसकी राजनीतिक स्थिति सुदृढ़़ हो गई। इल्तुतमिश ने उलेमाओं की सम्पत्ति को इतना अधिक महत्व दिया कि वे शियाओं के साथ दुर्व्यवहार तथा अत्याचार करने लगे। इससे इल्तुतमिश नेे शिया सम्प्रदाय की सहानुभूति खो दी और वे विद्रोह करने लगे। इल्तुतमिश ने उनके विद्रोहों का कठोरता के साथ दमन किया।

इल्तुतमिश के अंतिम दिन

इल्तिुतमिश ने कठोरता और दृढ़़ता से दिल्ली पर शासन किया। लगभग पूरे उत्तर भारत को अपने साम्राज्य में मिलाया। अपने अंतिम दिनों में वह बीमार पड़ा और 1236 ई. में उसका निधन हो गया।

इल्तुतमिश का चरित्र तथा उसके कार्यों का मूल्यांकन

इल्तुतमिश में प्रशासकीय योग्यता थी या नहीं, इस प्रश्न पर इतिहासकारों में विपरीत राय है। डॉ. निजामी ने लिखा है कि उसने दिल्ली सल्तनत को इक्ता की शासन व्यवस्था और सुल्तान की सेना के निर्माण का विचार प्रदान किया तथा उसने मुद्रा में सुधार किया। जबकि डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि इल्तुतमिश ने शासन संस्थाओं का निर्माण नहीं किया। वह रचनात्मक प्रतिभा सम्पन्न राजनीतिज्ञ नहीं था। तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों के विवरण ही इल्तुतमिश के बारे में जानकारी प्राप्त करने के स्रोत हैं जिनसे उसके चरित्र के कई पहलू सामने आते हैं।

(1.) व्यक्ति के रूप में: इल्तुतमिश असहायों तथा दीन-दुखियों के प्रति इतनी दया एवं सहानुभूति रखता था कि उसकी उदारता के सम्बन्ध में अनेक कहानियाँ प्रचलित हैं। इल्तुतमिश अत्यन्त धार्मिक विचारों का सुल्तान था। वह नियम से दिन में पांच बार नमाज पढ़ता था। वह साधु-महात्माओं को आश्रय देता था और रमजान के महीने में रोजा रखता था। अपनी इस धर्मनिष्ठा से उसने राजसत्ता को दैवी बल प्रदान किया।

(2.) राज्य-संस्थापक के रूप में: इल्तुतमिश को ही गुलाम वंश के राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। ऐबक ने जिस राज्य की स्थापना की थी, वह आरामशाह के निर्बल शासन में कमजोर पड़ गया तथा बहुत से स्थानीय शासक स्वतंत्र हो गये थे। इल्तुतमिश ने उन्हें परास्त करके फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन किया। यदि इल्तुतमिश दिल्ली पर अधिकार नहीं करता तो निर्बल आरामशाह के शासन काल में दिल्ली सल्तनत पूरी तरह बिखर जाती।

(3.) विजेता के रूप में: इल्तुतमिश वीर, साहसी तथा सतर्क सैनिक था। वह कुशल तथा सफल सेनापति था। उसमें उच्च-कोटि की सैनिक प्रतिभा थी। उसकी योग्यता के कारण ही दिल्ली के अमीरों ने उसे सुल्तान बनाया था। अपने बाहुबल से उसने प्रतिद्वन्द्वियों को परास्त किया, विद्रोहियों का दमन किया, राजपूतों को अपने अधीन किया, दोआब में फिर से अपनी राजसत्ता स्थापित की, मंगोलों के आक्रमण से अपने राज्य की रक्षा की और सम्पूर्ण राज्य में शांति तथा सुव्यवस्था स्थापित की। पंजाब और बंगाल पर दुबारा अधिकार स्थापित किया। अवध, बहराइच तथा बनारस के राजाओं का दमन किया। जालोर, मण्डोर तथा मालवा के हिन्दू शासकों को परास्त किया। उसने न केवल मुहम्मद गौरी द्वारा जीते हुए प्रदेशों पर फिर से तुर्कों की सत्ता स्थापित की, वरन् ऐबक के भी अपूर्ण कार्यों को पूर्ण करके राज्य का विस्तार किया।

(4.) शासक के रूप में: इल्तुतमिश दृढ़़ एवं कठोर शासक था। उसने शासन जमाने के लिये 40 तुर्की गुलामों का संगठन तैयार किया जो आगे चलकर तुर्की साम्राज्य के प्रबल स्तम्भ बन गए। कुतुबुद्दीन ऐबक के विशृंखलित राज्य को संगठित करने का श्रेय भी इल्तुतमिश को है। खलीफा से सुल्तान की उपाधि प्राप्त करने वाला वह भारत का पहला मुसलमान सुल्तान था। वह पहला तुर्क सुल्तान था जिसने भारत में शुद्ध अरबी-मुद्राओं को प्रचलित किया। अपनी प्रजा को न्याय देने के लिये उसने काजियों तथा अमीर दादाओं की नियुक्ति की तथा रात्रिकाल में भी पीड़ित व्यक्ति की गुहार सुनने की व्यवस्था की। इल्तुतमिश में वैसी ही धार्मिक असहिष्णुता थी जिस प्रकार तत्कालीन अन्य मुसलमान शासकों में थी। हिन्दुओं की तो बात ही क्या, वह शिया मुसलमानों के साथ भी उदारता तथा सहिष्णुता का व्यवहार न कर सका। उसकी इस धार्मिक कट्टरता के कारण ही दिल्ली के इस्माइली शिया मुसलमानों ने विद्रोह का झंडा खड़ा किया और उसकी हत्या करने का षड्यन्त्र रचा। हिन्दुओं के साथ उसका व्यवहार और अधिक कठोर था। इल्तुतमिश उलेमाओं का बड़ा आदर करता था और वे ही उसके धार्मिक अत्याचार के साधन थे।

(5.) शरण-दाता के रूप में: मंगोलों के आक्रमणों और अत्याचारों से भयभीत होकर बहुत से प्रसिद्ध मलिक, अमीर तथा वजीर भाग कर इल्तुतमिश के दरबार में आए। इल्तुतमिश ने उन्हें शरण प्रदान की। उसने बगदाद के वजीर फखरूल्मुल्क इसामी को भी शरण प्रदान की किंतु जब ख्वारिज्म के शाह के पुत्र जलालुद्दीन ने चंगेज खाँ से भयभीत होकर दिल्ली में शरण मांगी तो इल्तुतमिश ने उसे यह कहकर शरण देने से मना कर दिया कि दिल्ली का जलवायु उसके अनुकूल नहीं होगा तथा उसके दूत की हत्या करवा दी। इससे स्पष्ट है कि उसने उन्हीं विदेशियों को शरण दी जो उसके काम के थे तथा जिनसे उसे कोई भय नहीं था।

(6.) साहित्य तथा कला के प्रेमी के रूप में: इल्तुतमिश को मुस्लिम साहित्य तथा मुस्लिम कला से प्रेम था। इस कारण मध्य एशिया के बहुत से विद्वान्, इतिहासकार, कवि तथा दार्शनिक उसकी ओर आकृष्ट हुए। इल्तुतमिश ने उन्हें आश्रय प्रदान किया। फलतः दिल्ली नगर मुस्लिम सभ्यता तथा संस्कृति का केन्द्र बन गया। दिल्ली की कुतुबमीनार को पूरा बनवाने के अलावा उसने दिल्ली में कई मस्जिदें भी  बनवाईं।

निष्कर्ष

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि दिल्ली सल्तनत के इतिहास में इल्तुतमिश अत्यंत महत्व रखता है। तेरहवीं शताब्दी के मुस्लिम साम्राज्य निर्माताओं में वह विशिष्ट स्थान रखता है। भारत में तुर्की सल्तनत को स्थायित्व प्रदान करने में उसने बड़ा योग दिया। वह अपनी मुस्लिम प्रजा के प्रति जितना उदार था, उतना उदार हिन्दू प्रजा के प्रति नहीं था। उसने दिल्ली को मुस्लिम संस्कृति का केन्द्र बना दिया तथा हिन्दू मंदिरों को ध्वस्त करके मुस्लिम इतिहासकारों से प्रशंसा प्राप्त की।

भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कौन ?

प्रायः यह प्रश्न किया जाता है कि भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कौन था? विभिन्न इतिहासकार मुहम्मद बिन कासिम से लेकर, महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश को भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का श्रेय देते हैं किंतु अधिकांश इतिहासकारों की धारणा है कि भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक इल्तुतमिश था।

मुहम्मद बिन कासिम

मुहम्मद बिन कासिम भारत पर आक्रमण करने वाला पहला मुसलमान सेनापति था। उसने अरब से सिंध के रास्ते भारत में प्रवेश किया था और सिन्ध में अपनी राज-संस्था स्थापित कर ली थी परन्तु उस राजसत्ता का शीघ्र ही उल्मूलन हो गया।  इसलिये मुहम्मद बिन कासिम को भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का श्रेय नहीं दिया जा सकता। लेनपूल ने लिखा है कि सिंध में अरबों की विजय इस्लाम के इतिहास में एक घटना मात्र थी और इसका परिणाम शून्य था।

महमूद गजनवी

मुहम्मद बिन कासिम के बाद महमूद गजनवी दूसरा प्रबल मुस्लिम आक्रांता था जिसने नए मार्ग से भारत पर आक्रमण किये और उनमें बड़ी सफलताएं अर्जित कीं। यदि वह चाहता तो भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना कर सकता था परन्तु उसका ध्येय भारत की अपार सम्पत्ति को लूटना तथा हिन्दू काफिरों को दण्डित करके खलीफा को प्रसन्न करना था। वह भारत में अपना स्थायी राज्य स्थापित करना नहीं चाहता था। इसलिये महमूद गजनवी को भी भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का श्रेय नहीं दिया जा सकता।

मुहम्मद गौरी

भारत में मुस्लिम साम्राज्य स्थापित करने के लक्ष्य से प्रेरित होकर सर्वप्रथम मुहम्मद गौरी ने आक्रमण किया। वह सम्पूर्ण उत्तरी भारत को जीतने में सफल भी हुआ परन्तु उसने भारत में अपनी कोई अलग राजसंस्था स्थापित नहीं की और न भारत में वह स्थायी रूप से रहा, वरन् उसने अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को अपने गवर्नर के रूप में नियुक्त किया तथा स्वयं गजनी चला गया। इसलिये उसे भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का श्रेय नहीं दिया जा सकता।

कुतुबुद्दीन ऐबक

मुहम्मद गौरी की मृत्यु के उपरान्त कुतुबुद्दीन ऐबक उसके भारतीय साम्राज्य का स्वामी बना। उसने सम्पूर्ण उत्तरी भारत में अपनी सत्ता स्थापित कर ली और एक बड़े साम्राज्य का निर्माण किया। उसने प्रथम बार दिल्ली में मुस्लिम सल्तनत की स्थापना की। उसने इस सल्तनत का गजनी से सम्बन्ध विच्छेद कर दिया और स्वतन्त्र रूप से शासन करने लगा। उसमें स्वतन्त्र सुल्तान बनने के गुण विद्यमान थे। उसने भारत के एक बहुत बड़े भू-भाग पर स्वतन्त्र सुल्तान के रूप से शासन भी किया परन्तु उसे भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक मानने में कई आपत्तियाँ है-

(1.) ऐबक को खलीफा से स्वतन्त्र राज-सत्ता का कोई प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं हुआ इसलिये कुछ इतिहासकार उसे भारतीय प्रांतों का प्रान्तपति ही मानते हैं।

(2.) अब तक ऐसी एक भी मुद्रा प्राप्त नहीं हुई है जिसमें ऐबक का नाम अंकित  हो।

(3.) इतिहासकारों को इस बात पर भी सन्देह है कि उसके नाम का कोई खुतबा पढ़ा गया था या उसने सुल्तान की उपाधि धारण की थी।

(4.) गयासुद्दीन गौरी ने उसे दिल्ली का सुल्तान स्वीकार किया था परन्तु उसे किसी को भी सुल्तान की उपाधि देने का अधिकार नहीं था। यह उपाधि तो केवल खलीफा ही दे सकता था।

(5.) यल्दूज ने उसकी सत्ता को स्वीकार नहीं किया था। इससे अनुमान होता है कि ऐबक द्वारा स्थापित राज्य, असम्बद्ध तथा अव्यवस्थित संघ जैसा था।

(6.) ऐबक की मृत्यु के उपरान्त उसका साम्राज्य विश्ंृखलित हो गया और उसका अस्तित्त्व लगभग समाप्त हो गया।

उपरोक्त कारणों से कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक नहीं माना जा सकता।

आरामशाह

कुतुबुद्दीन ऐबक के बाद आरामशाह लाहौर में शासक बना। वह कुतुबुद्दीन ऐबक का पुत्र था। उसने अपने नाम से खुतबा पढ़वाया और अपने नाम की मुद्राएं चलवाईं। इतना होने पर भी उसे भारत में मुस्लिम सल्तनत का संस्थापक नहीं कहा जा सकता। उसमें सुल्तान बनने के गुण नहीं थे। उसमें उच्चकोटि की युद्ध प्रतिभा भी नहीं थी। उसने किसी भू-भाग पर विजय प्राप्त नहीं की थी। वह सेना का प्रिय नहीं था। उसे शासन करने का अनुभव नहीं था। उसे दिल्ली में प्रवेश करने से पहले ही इल्तुतमिश ने परास्त कर दिया था। ऐसी दशा में केवल उसके नाम में खुतबा पढ़े जाने तथा मुद्राओं के चलाने से उसे दिल्ली का सुल्तान मान लेना ठीक नहीं है। उसे खलीफा ने सुल्तान स्वीकार नहीं किया। ऐबक के मरते ही उसका साम्राज्य छिन्न-भिन्न होने लगा। इसलिये आरामशाह को भारत में मुस्लिम साम्राज्य का संस्थापक नहीं माना जा सकता।

इल्तुतमिश

अधिकांश इतिहासकार इल्तुतमिश को दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक मानते हैं। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं-

(1.) दिल्ली के अमीरों ने आरामशाह के स्थान पर इल्तुतमिश को दिल्ली का सुल्तान निर्वाचित कर लिया परन्तु दिल्ली की सल्तनत उस समय लगभग समाप्त हो चुकी थी। अतः इल्तुतमिश को फिर से सल्तनत का निर्माण करना पड़ा। यदि आरामशाह ही शासक बना रहा होता तो दिल्ली सल्तनत का अस्तित्त्व पूरी तरह समाप्त हो गया होता।

(2.) इल्तुतमिश ने अपने सैनिक गुणों के बल से दिल्ली के पश्चिम तथा पूर्व में विद्रोहों का दमन करके, नये हिन्दू राज्यों को जीत कर तथा यल्दूज और कुबाचा जैसे प्रतिद्वन्द्वियों को समाप्त करके नये सिरे से दिल्ली सल्तनत का निर्माण किया तथा उसे स्थायित्व प्रदान किया।

(3.) इल्तुतमिश ने मंगोलों के आक्रमण से दिल्ली सल्तनत की रक्षा की।

(4.) इल्तुतमिश ने बंगाल तथा बिहार फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन कर लिये और दोआब के विद्रोहियों का दमन करके राजधानी दिल्ली को सुरक्षित बनाया।

(5.) उसने न केवल राजपूतों को दिल्ली की सत्ता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जिन्हें मुहम्मद गौरी तथा कुतुबुद्दीन ऐबक ने परास्त किया था और जो ऐबक की मृत्यु के उपरान्त स्वतन्त्र हो गये थे, वरन् उसने अन्य राजपूतों को भी परास्त कर साम्राज्य की सीमा में वृद्धि की।

(6.) इल्तुतमिश ने दिल्ली पर न केवल राजनीतिक सत्ता की स्थापना की अपितु खलीफा से सुल्तान की उपाधि प्राप्त करके दिल्ली सल्तनत को इस्मालिक जगत में नैतिक आधार दिलवाया।

(7.) इल्तुतमिश ने मनुष्य की चारित्रिक कमजोरियों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। इस कारण शासन निरंतर मजबूत होता चला गया।

(8.) इल्तुतमिश को अपने 25 साल के दीर्घ शासनकाल में अपने साम्राज्य को संगठित तथा सुरक्षित बनाने का अवसर प्राप्त हो गया। उसने एक सुदृढ़़ तथा सुव्यवस्थित राज्य स्थापित करने में पूर्ण सफलता प्राप्त की।

(9.) इल्तुतमिश ने जिस दिल्ली सल्तनत का निर्माण किया, वह स्थायी सिद्ध हुई। इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद इस सल्तनत पर लगभग 300 वर्षों तक विभिन्न वंशजों द्वारा शासन किया गया।

(10.) इल्तुतमिश ने उत्तराधिकार की समस्या को सुलझा कर उत्तराधिकार की निरन्तरता स्थापित की।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए मुहम्मद बिन कासिम, महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, कुतुबुद्दीन ऐबक तथा आरामशाह में से किसी को भी भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक होने का श्रेय नहीं दिया जा सकता। यह श्रेय यदि किसी को दिया जा सकता है तो वह सुल्तान इल्तुतमिश ही हो सकता है। वास्तविकता यह है कि मुहम्मद बिन कासिम तथा महमूद गजनवी ने भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना के लिये उर्वर भूमि तैयार की। मुहम्मद गौरी ने उसमें बीजारोपण किया, ऐबक ने उसे सींच कर प्रस्फुटित किया तथा इल्तुतमिश ने उसे खाद-पानी देकर मजबूत पौधा बना दिया। यह पौधा आगे चलकर खिलजी सल्तनत के समय विशाल वृक्ष बन गया जिसकी जड़ें हिलाना हिन्दुओं के वश की बात नहीं रही।

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