Monday, September 26, 2022

अंग्रेजों द्वारा स्थापित कांग्रेस का प्रारम्भिक स्वरूप एवं प्रभाव

कांग्रेस का स्वरूप

कांग्रेस के स्वरूप के सम्बन्ध में विद्वानों में जबर्दस्त मतभेद रहा। यद्यपि इसके निर्माण एवं विकास में मद्रासी, मराठी और पारसियों का उतना ही हाथ था जितना बंगालियों का किंतु कुछ लोग इसे बंगाली कांग्रेस कहते थे। कुछ लोग इसे हिन्दू कांग्रेस कहते थे। कुछ लोग इसे केवल पढ़े-लिखे भारतीयों की संस्था कहते थे और इसके राष्ट्रीय स्वरूप को नकारते थे। जबकि कुछ विद्वानों के अनुसार कांग्रेस के संगठन और उद्देश्यों पर दृष्टि डालने से सिद्ध हो जाता है कि कांग्रेस का जन्म राष्ट्रीय संस्था के रूप में हुआ। कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में सम्मिलित होने वाले प्रतिनिधि विभिन्न धर्मों, वर्गों, सम्प्रदायों एवं प्रांतों से थे।

कांग्रेस का विभिन्न क्षेत्रों पर प्रभाव

विशिष्ट बुद्धिजीवी वर्ग पर प्रभाव: कांग्र्रेस की स्थापना भले ही ए. ओ. ह्यूम के नेतृत्व में साम्राज्यवादी शक्तियों ने की थी किंतु भारत का बुद्धिजीवी वर्ग इसे सम्भालने के लिये आगे आया। दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, उमेश चन्द्र बनर्जी, फीरोजशाह मेहता, जस्टिस महादेव गोविंद रानाडे, पण्डित मदन मोहन मालवीय आदि बुद्धिजीवी भारतीय नेताओं ने कांग्रेस को खड़ा करने में सक्रिय सहयोग दिया।

भारत में रहने वाले अँग्रेजों पर प्रभाव: ई.1907 तक अनेक प्रतिष्ठित अंग्रेज किसी न किसी रूप में कांग्रेस से जुड़ गये थे। ए. ओ. ह्यूम, विलियम वेडरबर्न, सर हेनरी कॉटन, एण्ड्रिल यूल और नार्टन जैसे उदारवादी आंग्ल-भारतीय भी कांग्रेस में सम्मिलित हो गये थे।

जनसामान्य पर प्रभाव: कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों में ब्रिटिश-भारत में रहने वाले विभिन्न धार्मिक समुदायों एवं जातियों के शिक्षित प्रतिनिधि भाग लेते थे। ये लोग परस्पर स्नेह और विश्वास की भावना प्रकट करते थे। यही कारण था कि कांग्रेस की स्थापना के बाद देश में राष्ट्रीय चेतना, राष्ट्रीय एकता तथा जनसेवा के उच्चादर्शों का तेजी से विकास हुआ। कांग्रेस के उस काल के उच्चादर्श उसके राष्ट्रीय स्वरूप को प्रकट करते हैं। प्रारम्भ में कांग्रेस की लोकप्रियता शिक्षित वर्ग तक सीमित रही किंतु बाद में इसके द्वारा राजनीतिक अधिकारों की मांग किये जाने के कारण सामान्य लोगों का ध्यान भी इसकी तरफ आकर्षित होने लगा।

विभिन्न धर्मों पर प्रभाव: कांग्रेस के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता उमेशचंद्र बनर्जी ने की जो हिन्दू थे। दूसरे अधिवेशन की अध्यक्षता दादाभाई नौरोजी ने की जो पारसी थे और तीसरे अधिवेशन की अध्यक्षता बदरुद्दीन तैयबजी ने की जो मुसलमान थे। कांग्रेस के चौथे अधिवेशन की अध्यक्षता प्रसिद्ध अँग्रेज व्यवसायी जार्ज यूल ने की जो ईसाई थे। आगे भी यह क्रम जारी रहा। इस प्रकार विभिन्न धर्मों के नेताओं को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाये जाने से यह संस्था किसी एक धर्म के प्रभाव वाली संस्था न बनकर राष्ट्रीय व्यापकता वाली संस्था के रूप में विकसित हुई।

मुसलमानों पर प्रभाव: आरम्भ में कांग्रेस में मुस्लिम प्रतिनिधियों की संख्या कम थी किन्तु धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ती गई। सर सैय्यद अहमद ने मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रखने का भरसक प्रयास किया। उन्होंने ब्रिटिश राजभक्तों की एक संस्था यूनाइटेड पौट्रियाटिक एसोसिएशन और मुसलमानों के लिए मोहम्मडन एजूकेशन कांग्रेस बनाई। इन मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर कांग्रेस पूर्णतः लोक प्रतिनिधि संस्था थी और इसके प्रतिनिधि राष्ट्रीय विचारों का प्रतिनिधत्व करते थे। कांग्रेस के चौथे सम्मेलन में 1248 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए थे जिनमें से 221 मुसलमान तथा 220 ईसाई थे।

रियासती जनता पर प्रभाव: कांग्रेस ने ब्रिटिश-भारत में राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर लिया था फिर भी ई.1938 के हरिपुरा अधिवेशन से पहले तक कांग्रेस ने देशी रियासतों को अपने कार्यक्षेत्र से पूरी तरह अलग रखा। इस कारण रियासती-भारत की जनता पर ई.1885 से 1938 तक की अवधि में कोई विशेष प्रभाव नहीं था।

साम्राज्यवादियों पर प्रभाव: कांग्रेस की स्थापना साम्राज्यवादियों के प्रयासों से हुई थी। फिर भी अनेक साम्राज्यवादी अँग्रेज आरम्भ से ही कांग्रेस को घृणा की दृष्टि से देखते थे।

मई 1886 में सर हेनरी मेन ने डफरिन को एक पत्र लिखकर ह्यूम के विरुद्ध गंभीर टिप्पणी की- ‘ह्यूम नामक एक दुष्ट व्यक्ति है जिसे लॉर्ड रिपन ने बहुत सिर चढ़ाया था और जिसके सम्बन्ध में ज्ञात होता है कि वह भारतीय होमरूल आंदोलन के मुख्य भड़काने वालों में है। यह बहुत ही चालाक, पर कुछ सिरफिरा, अहंकारी और नैतिकताहीन व्यक्ति है…. जिसे सत्य की कोई परवाह नहीं है।

दिसम्बर 1886 में लॉर्ड डफरिन ने कांग्रेस के प्रतिनिधियों के लिये कलकत्ता में एक स्वागत समारोह आयोजित किया किंतु जब कांग्रेस की मांगें सामने आईं तो वे कांग्रेस के सचिव ए. ओ. ह्यूम से बुरी तरह नाराज हो गये। डफरिन ने ह्यूम के विरुद्ध अत्यंत उग्र शब्दों में नाराजगी व्यक्त की।

इंग्लैण्ड वासियों पर प्रभाव: ई.1890 में कांग्रेस ने एक प्रतिनिधि मण्डल इंग्लैण्ड भेजा, जिसने इंग्लैण्ड, वेल्स और स्कॉटलैंण्ड के निवासियों में कांग्रेस का प्रचार किया। इस प्रतिनिधि मण्डल की यात्रा के बाद ब्रिटिश संसद के सदस्यों की एक समिति बनाई गई जिसका उद्देश्य भारतीय समस्याओं पर विचार करना था। ब्रिटिश जनमत को आकर्षित करने के लिए लंदन में इण्डिया नामक समाचार पत्र प्रकाशित किया जाने लगा। इन प्रचार कार्यों के कारण इंग्लैण्ड के लोग भी कांग्रेस के कार्यों में रुचि लेने लगे। ई.1890 में स्वयं लॉर्ड लैंन्सडाउन ने स्वीकार किया कि कांग्रेस देश की एक शक्तिशाली उत्तरदायी राजनैतिक संस्था है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि निश्चित रूप से कांग्रेस अपनी स्थापना के समय से ही राष्ट्रीय संस्था थी। इसमें समाज के हर वर्ग, धर्म, जाति का व्यक्ति सदस्य हो सकता था। इसका प्रभाव भी भारत के किसी एक कोने तक सीमित न होकर राष्ट्रव्यापी था। आरम्भ में इसे जनसामान्य का समर्थन कम मिला किंतु समय के साथ कांग्रेस का राष्ट्रीय स्वरूप विस्तृत होता चला गया तथा इसकी लोकप्रियता में वृद्धि होने लगी। कांग्रेस ने सम्पूर्ण देश की राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक उन्नति के लिए संवैधानिक उपायों से प्रयास करना आरम्भ किया।

कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में पं. मदनमोहन मालवीय ने कहा- ‘इस महान संस्था के द्वारा भारतीय जनता को एक जीभ मिल गई है जिसके द्वारा हम इंग्लैण्ड से कहते हैं कि वह हमारे राजनैतिक अधिकारों को स्वीकार करे।’ कांग्रेस के प्रारम्भिक कार्यों का ही परिणाम था कि देश में प्रबल जनमत का विकास हुआ।

सर हेनरी कॉटन ने लिखा है- ‘कांग्रेस के सदस्य किसी भी स्थिति में सरकारी नीति में परिवर्तन लाने में सफल नहीं हुए किन्तु अपने देश के इतिहास के विकास में तथा देश वासियों के चरित्र निर्माण में निश्चित रूप से उन्होंने सफलता प्राप्त की।’

यह कहना अतिश्योक्ति-पूर्ण नहीं होगा कि कांग्रेस का जन्म भारत के राजनैतिक इतिहास की अभूतपूर्व घटना थी। इसका जन्म ऐसे समय में हुआ, जब ब्रिटिश साम्राज्य अपनी सफलता के सर्वोच्च शिखर पर था। उसकी शक्ति को चुनौती देना सरल नहीं था फिर भी कांग्रेस ने कुछ ही वर्षों में व्यापक राष्ट्रीय स्वरूप प्राप्त कर लिया।

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