Monday, September 26, 2022

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में नरमपंथी कांग्रेस की भूमिका

उदारवादी नेतृत्व अथवा नरमपंथी कांग्रेस

भारत की आजादी के लिये संघर्ष अँग्रेजी राज्य की स्थापना के साथ ही आरम्भ हो गया था। 18वीं शती में प्रेस के उदय साथ ही भारतीयों को अपने अधिकारों की मांग करने के लिये मंच मिलना आरम्भ हो गया था। यही कारण है कि ई.1885 से ई.1947 तक कांग्रेस का इतिहास, भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन का ही इतिहास है। कांग्रेस के इतिहास को मुख्यतः दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) प्रथम चरण: स्थापना से लेकर रोलट एक्ट तक अर्थात् ई.1885 से 1919 तक। इस चरण में ई.1885 से 1905 तक कांग्रेस का नेतृत्व उदारवादियों ने किया और ई.1905 से 1919 तक इसका नेतृत्व उग्रवादी विचारधारा के नेताओं के हाथों में रहा।

(2) द्वितीय चरण: असहयोग आंदोलन से लेकर भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति तक अर्थात् ई.1920 से 1947 तक। इस काल में कांग्रेस का नेतृत्व दक्षिणपंथी मोहनदास कर्मचंद गांधी और उनके समाजवादी-वामपंथी सहयोगी जवाहरलाल नेहरू आदि नेताओं के हाथों में रहा।

उदारवादी युग

ई.1885 से 1905 तक कांग्रेस की बागडोर पूरी तरह से उदारवादियों अथवा नरम राष्ट्रवादियों के हाथों में रही जो अँग्रेजों तथा अँग्रेजी शासन के प्रति नरम रवैया रखते थे और बहिष्कार तथा असहयोग जैसे क्रान्तिकारी विचारों के विरुद्ध थे। इनमें से अधिकांश नेताओं के हृदय में ब्रिटिश राज के प्रति कृतज्ञता के भाव थे। वे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को वरदान समझते थे। उन्होंने अनेक सामाजिक संस्थाओं एवं रीति-रिवाजों में सामाजिक समानता तथा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की स्थापना के लिए परिवर्तन का सुझाव दिया। वे भारत में प्रतिनिधिमूलक संस्थाओं की स्थापना और नागरिक स्वतन्त्रता की मांग प्रस्तुत करते थे। राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए उदारवादियों ने संवैधानिक आन्दोलन का समर्थन किया। उनके द्वारा जो राजनीतिक आन्दोलन प्रारम्भ किया गया वह भारत की एकता, जातीय एवं साम्प्रदायिक समन्वय, आधुनिकीकरण, सामाजिक रूढ़ियों का विरोध एवं भेदभाव का निषेध, नवीन आर्थिक प्रगति तथा उद्योगीकरण का समर्थन करता था। उदारवादियों ने सेवाओं के भारतीयकरण, पाश्चात्य शिक्षा के विस्तार, व्यवस्थापिका सभाओं के चुने हुए सदस्यों की संख्या में वृद्धि, विधि का शासन, स्वतन्त्रता के अधिकारों का व्यापक प्रयोग आदि विषयों पर ध्यान केन्द्रित किया।

दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, फीरोजशाह मेहता, लालमोहन घोष, रासबिहारी, गोपालकृष्ण गोखले, श्रीनिवास शास्त्री, महादेव गोविंद रानाडे आदि नेता उदारवादी युग के प्रमुख स्तम्भ थे। कुछ उदारवादी अँग्रेज यथा- ए. ओ. ह्यूम, विलियम वेडरबर्न, जार्ज यूल, मेक्विन, स्मिथ आदि भी कांग्रेस के सदस्य थे। इन उदारवादी नेताओं ने ई.1885 से 1905 तक कांग्रेस का नेतृत्व किया। उदारवादी नेताओं ने भारत के ब्रिटिश शासकों को प्रसन्न रखते हुए उनकी दयालुता एवं न्यायप्रियता की दुहाई देकर स्वशासन की ओर बढ़ने का प्रयत्न किया। जेल जाने का कष्ट उठाना इन नेताओं के वश की बात नहीं थी। वे अपनी सामजिक स्थिति, पद, व्यवसाय आदि को यथावत् बनाये रखते हुए भारत में स्वराज्य की स्थापना का स्वप्न देखते थे।

 उदारवादी नेताओं का मानना था कि ब्रिटिश शासन ने ही भारत को आधुनिक सभ्यता के मार्ग पर अग्रसर किया, स्वतन्त्रता की भावना उत्पन्न की, राष्ट्रीय चेतना को जन्म दिया और देश की जनता को एकसूत्र में बांधने का काम किया। जस्टिस रानाडे का मानना था कि भारत में अँग्रेजी शासन भारतीयों को नागरिक एवं सार्वजनिक गतिविधियों का राजनैतिक शिक्षण देने की दृष्टि से उपयोगी सिद्ध हुआ था। उनका कहना था- ‘हिन्दुओं एवं मुसलमानों में वैज्ञानिक क्रियाकलाप, नवीन शिक्षण तथा व्यावसायिक दृष्टिकोण की कमी होने के कारण प्रगति शिथिल होती गयी। अँग्रेजों के आगमन ने यह स्थिति बदल दी। भारत को एक नवीन ज्योति दिखाई दी। आधुनिकीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ। अँग्रेजों के सम्पर्क में आने से हमें स्वतन्त्रता की महत्ता का आभास हुआ। सदियों की गुलामी एवं जड़ता को पाश्चात्य प्रभाव ने समाप्त कर दिया। भारतीय नवजागरण प्रारम्भ हुआ।’

दादाभाई नौरोजी की धारणा थी कि अँग्रेजों का शासन भारत के चहुँमुखी विकास के लिए दैविक वरदान का कार्य करेगा। उनका कहना था कि- ‘अँग्रेजों का उस समय तक भारत में बने रहना आवश्यक है जब तक कि भारतीयों को वे स्वावलम्बी बनाने सम्बन्धी अपना न्यासिता का उद्देश्य पूरा नहीं कर लेते।’ उदारवादियों ने भारतीयों की इंग्लैण्ड के प्रति वफादारी और उनकी देशभक्ति के बीच गहरा सम्बन्ध स्थापित करने में कभी असुविधा महसूस नहीं की। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कहा था- ‘ईश्वर भविष्य में हमारी वफादारी को और गहरा करे, हमारी देशभक्ति को और प्रोत्साहित करे और ब्रिटिश साम्राज्य के साथ हमारे सम्बन्धों को और अधिक दृढ़ करे।’

उदारवादी नेता देश की शासन व्यवस्था में क्रान्तिकारी परिवर्तनों के विरोधी थे। उनका मानना था कि भारत में सुधार कार्य एक साथ सम्भव नहीं है, इसलिए क्रमिक सुधार होने चाहिये। वे राजनीतिक एवं प्रशासकीय क्षेत्र में धीरे-धीरे सुधार लाना चाहते थे। वे सरकार में जनता की समुचित भागीदारी चाहते थे। आर. जी. प्रधान ने लिखा है- ‘कांग्रेस के प्रारम्भिक दिनों के प्रस्तावों से पता चलता है कि उनकी मांगें अत्यन्त साधारण थीं। कांग्रेस के नेता आदर्शवादी नहीं थे। वे हवाई किला नहीं बनाते थे। वे व्यावहारिक सुधारक थे तथा आजादी, क्रमशः कदम-कदम करके हासिल करना चाहते थे।’

फीरोजशाह जैसे नेता, अँग्रेजों के संरक्षण में भारत के राजनीतिक शिक्षण का मार्ग ढूँढ रहे थे और उनका विश्वास था कि किसी दिन अँग्रेज स्वयं ही, भारत की राष्ट्रीय मांगों को स्वीकार कर लेंगे। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी भी ब्रिटेन के मार्गदर्शन में भारत की प्रगति का स्वप्न देखते थे। उनका उद्देश्य भारत में राजनीतिक सुधारों की मांग प्रस्तुत करना तथा अँग्रेजी शासन से प्रार्थना एवं याचिकाओं के माध्यम से नवीन सुधारों को लागू करवाना था। गोपालकृष्ण गोखले भारत के राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं पुनर्जीवन के लिए क्रमिक विकास का सहारा लेना चाहते थे।

उदारवादी नेता, पाश्चात्य सभ्यता एवं विचारों के पोषक थे। उनकी मान्यता थी कि भारतीयों के लिए, भारत का ब्रिटेन से सम्बन्ध होना एक वरदान है। ब्रिटेन से सम्बन्धों के कारण पाश्चात्य साहित्य, आधुनिक शिक्षा पद्धति, यातायात के साधन, न्याय प्रणाली, स्थानीय स्वशासन आदि व्यवस्थाएँ भारत के लिए अमूल्य वरदान सिद्ध हुई हैं। पाश्चात्य विचार एवं दर्शन, लोगों में स्वतन्त्रता और लोकतन्त्र के प्रति आदर उत्पन्न करता है। अतः भारत के हित में यही उचित होगा कि ब्रिटेन से उसका अटूट सम्बन्ध बना रहे। श्रीमती एनीबीसेन्ट का माना था- ‘इस काल के नेता स्वयं को ब्रिटिश प्रजा मानने में गौरव का अनुभव करते थे।’ गोपालकृष्ण गोखले का कहना था- ‘हमारा भाग्य अँग्रेजों के साथ जुड़ा हुआ है। चाहे वह अच्छे के लिए हो अथवा बुरे के लिए।’ इसी प्रकार दादाभाई नौरोजी का कहना था- ‘कांग्रेस ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध विद्रोह करने वाली संस्था नहीं है, अपितु वह तो ब्रिटिश सरकार की नींव को दृढ़ करना चाहती है।’

उदारवादियों का विश्वास था कि अँग्रेज, संसार के सर्वाधिक ईमानदार, शक्ति सम्पन्न और प्रजातन्त्रवादी लोग हैं। वे भारत में भी प्रजातान्त्रिक संस्थाओं का विकास करेंगे। यदि ब्रिटिश संसद और जनता को भारतीय समस्याओं से अवगत कराया जाए तो वे निश्चित रूप से सुधार के कदम उठायेंगे। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का कहना था- ‘अँग्रेजों के न्याय, बुद्धि और दया भावना में हमारी दृढ़ आस्था है। संसार की इस महानतम प्रतिनिधि सभा, संसदों की जननी ब्रिटिश कॉमन सभा के प्रति हमारे हृदय में असीम श्रद्धा है; अँग्रेज स्वेच्छा से भारत से चले जायेंगे।’

कांग्रेस के उदारवादी नेता ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वशासन चाहते थे। कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कहा- ‘स्वशासन एक प्राकृतिक देन है, ईश्वरीय शक्ति की कामना है। प्रत्येक राष्ट्र को स्वयं अपने भाग्य का निर्णय करने का अधिकार होना चाहिए, यही प्रकृति का नियम है।’ ब्रिटिश साम्राज्य से सम्बन्ध विच्छेद की तो वे स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकते थे। इसलिए पूर्ण स्वतन्त्रता की बात उनके मस्तिष्क में नहीं थी। वे तो ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वशासन प्राप्त करना चाहते थे।

उदारवादी नेताओं को अँग्रेजों की न्यायप्रियता में अटूट विश्वास था। उन्होंने सरकार के साथ संघर्ष करने की बात कभी नहीं की। उनका पूर्ण विश्वास वैधानिक संघर्ष में था। वे अपने कार्यों से सरकार को असन्तुष्ट नहीं करना चाहते थे। उन्होंने प्रार्थनाओं, प्रार्थना-पत्रों, याचिकाओं, स्मरण-पत्रों और प्रतिनिधि-मण्डलों द्वारा सरकार से अपनी न्यायोचित मांगों को मानने का आग्रह किया। अनेक विद्वानों का मानना है कि इस समय कांग्रेस की नीति प्रार्थना करने की थी, अपनी मांगों के लिए संघर्ष करने की नहीं। इस रीति-नीति को कुछ लोगों ने राजनीतिक भिक्षावृत्ति कहा।

उदारवादियों की मांगें

कांग्रेस ने अपनी स्थापना के प्रारम्भिक बीस वर्षों में वार्षिक अधिवेशनों में विभिन्न प्रस्ताव पारित करके ब्रिटिश सरकार का ध्यान भारतीय जनता की समस्याओं की ओर आकर्षित किया तथा नागरिक प्रशासन में विभिन्न प्रकार के सुधार करने की मांग की। उनकी विभिन्न मांगें इस प्रकार से थीं-

1. प्रशासन व्यवस्था में भारतीयों की अधिक से अधिक भागीदारी हो।

2. विधायी परिषदों में सुधार हो।

3. केन्द्रीय तथा प्रान्तीय कौंसिलों का विस्तार हो तथा उनमें सरकार द्वारा नामित सरकारी सदस्यों की संख्या में कमी करके निर्वाचित और गैर-सरकारी भारतीय सदस्यों की संख्या में वृद्धि की जाये।

4. कार्यपालिका और न्यायपालिका का पृथक्करण हो तथा मुकदमों की सुनवाई में जूरी प्रथा को मान्यता दी जाये।

5. वित्तीय व्यवस्था का पुनर्गठन करके करों का बोझ कम किया जाये।

6. अँग्रेजी साम्राज्य की सुरक्षा और विस्तार के व्यय में ब्रिटिश सरकार भी भागीदारी निभाये।

7. सरकार के सैनिक व्यय में कमी की जाये।

8. किसानों की स्थिति सुधारने के लिए भू-राजस्व की दर कम की जाये तथा यह 20 से 30 वर्षों के लिये स्थाई की जाये।

9. भारतीय जनता की दशा सुधारने के लिए उचित कदम उठाए जाएँ। प्राथमिक शिक्षा का विस्तार हो, औद्योगिक एवं तकनीकी शिक्षा की सुविधा दी जाये, सफाई में सुधार के लिए अधिक अनुदान दिया जाए इत्यादि।

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

21,585FansLike
2,651FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -

Latest Articles

// disable viewing page source