Saturday, February 24, 2024
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85. औरंगजेब की पुत्रवधू जहांजेब ने अनिरुद्धसिंह को बेटा बनाया!

औरंगजेब के बागी बेटे अकबर को मराठों के राजा शंभाजी के राज्य में रहते हुए अठारह माह बीतने को आए। शंभाजी ने उसे आश्वासन दिया था कि मराठों और राजपूतों की संयुक्त सेना द्वारा औरंगजेब पर आक्रमण करके अकबर को दिल्ली एवं आगरा के तख्त पर बिठाया जाएगा किंतु शंभाजी जंजीरा के सिंधियों, मैसूर के चिक्कादेव राय तथा गोआ के पुर्तगालियों के हमलों में इतना घिर गया था कि वह अपने राज्य से निकलने के लिए सोच ही नहीं पाता था।

अकबर की निराशा दिन पर दिन बढ़ती जाती थी। इसलिए अकबर ने भारत छोड़कर ईरान जाने की योजना बनाई ताकि वह खुली हवा में सांस ले सके। यहाँ उसे शंभाजी के राज्य में औरंगजेब के गुप्तचरों के भय से छिपकर रहना पड़ता था। इसलिए ई.1682 में अकबर चुपचाप अपने साथी राजपूत सैनिकों को लेकर गोआ के लिए रवाना हो गया।

गोआ के निकट विंगुर्ला में उसने ईरान जाने के लिए एक जहाज किराए पर लिया और उस पर सवार हो गया किंतु शंभाजी के मंत्री कवि कलश को इस बात का पता लग गया। वह वीर दुर्गादास को लेकर अकबर के जहाज पर पहुंचा और उसे समझा-बुझा कर जहाज से नीचे उतार लाया। अकबर फिर से इस आशा में भारत में रुकने को तैयार हो गया कि एक दिन मराठों और राजपूतों की सेना की सहायता से दिल्ली और आगरा के लाल किलों का स्वामी हो जाएगा।

शंभाजी निश्चित रूप से औरंगजेब को समाप्त करके अकबर को नया बादशाह बनाना चाहता था किंतु शंभाजी अपने शत्रुओं से घिरा ही रहा। यहाँ तक कि एक बार पुर्तगालियों ने शंभाजी को बुरी तरह से घेर लिया तथा शंभाजी का बच निकलना कठिन हो गया। इस पर शहजादे अकबर ने दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता करके शंभाजी को छुड़वाया।

इस घटना के बाद फरवरी 1685 तक शहजादा अकबर शंभाजी के राज्य में स्थित रत्नागिरि जिले में ठहरा रहा तथा अपनी सहायता के लिए कवि कलश को बुलाता रहा किंतु कवि कलश भी अपने शत्रुओं से इतना घिरा हुआ था कि वह भी अकबर की सहायता के लिए नहीं आ सका।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

कवि कलश इलाहाबाद का रहने वाला कन्नौजिया ब्राह्मण था तथा शंभाजी के परिवार का परम्परागत पण्डा था। उसने ही शिवाजी के निधन के बाद शंभाजी का भव्य राज्याभिषेक करवाया था और शंभाजी ने उसे कवि कलश की उपाधि देकर अपना मंत्री बना लिया था। इस समय शंभाजी के राज्य का सारा भार कवि कलश पर था और शंभाजी हर समय आमोद-प्रमोद में डूबा रहता था।

अकबर यद्यपि शंभाजी के राज्य में किसी अज्ञात गांव में रहता था तथापि वह अपनी जीवन शैली एक बादशाह की तरह दिखाने का प्रयास करता था और निकटवर्ती जंगलों में शिकार खेलकर अपना समय व्यतीत करता था। एक दिन शंभाजी, अकबर से मिलने के लिए आया। उस समय वीर दुर्गादास राठौड़ भी अकबर के पास ही था।

शंभाजी ने अकबर को आश्वासन दिया कि वह थोड़ा और इंतजार करे, जैसे ही परिस्थितियां अनुकूल होंगी, औरंगजेब के विरुद्ध कार्यवाही की जाएगी किंतु शंभाजी की ओर से कुछ नहीं किया गया यहाँ तक कि औरंगजेब स्वयं अपने तीन शहजादों आजम, मुअज्जम और कामबख्श को लेकर अकबर, शंभाजी और दुर्गादास को पकड़ने या मार डालने के लिए दक्खिन में आ पहुंचा।

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औरंगजेब स्वयं तो अपनी पुरानी राजधानी औरंगाबाद में आकर ठहर गया तथा अपने सेनापतियों को मराठों पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया। उसने शहजादे आजम को आदिलशाही राज्य पर हमला करने के लिए भेजा। आजम ने अपनी सेना लकर धरूर पर धावा बोला। इस दौरान उसने अपनी बेगम जहांजेब बानू को अपने सैनिक शिविर में ही छोड़ दिया तथा बूंदी के राव अनिरुद्धसिंह हाड़ा को जहांजेब बानू की रक्षा पर नियुक्त किया।

पाठकों को स्मरण होगा कि बेगम जहांजेब बानू, मरहूम शहजादे दारा शिकोह की पुत्री थी तथा अपने चाचा औरंगजेब की बड़ी लाड़ली थी। मुगलों के इतिहास में इसे जानी बेगम कहा जाता था। फ्रैंच इतिहासकार निकोलस मनूची ने लिखा है कि जानी बेगम अपने पिता की तरह बुद्धिमान, दयालु तथा बहुत सुंदर थी।

जब मराठों को ज्ञात हुआ कि शहजादा आजमशाह अपनी सेना को लेकर धरूर पर आक्रमण करने के लिए गया है तो उन्होंने मुगलों के डेरे लूटने के लिए शाह आजम के शिविर पर हमला किया। जब बेगम जहांजेब बानू को ज्ञात हुआ कि उनके शिविर को मराठों ने घेर लिया है तो उसने राव अनिरुद्धसिंह हाड़ा को अपने डेरे में बुलाया तथा उससे फारसी भाषा में बड़े भावपूर्ण शब्दों में कहा- ‘शर्म ए चगताइया या राजपूतिया एकस्त’ अर्थात्- राजपूतों के लिए चगताइयों यानि मुगलों की मान-प्रतिष्ठा उनकी अपनी ही है। मैं तुम्हें अपना बेटा बनाती हूं। तुम मेरे साथ ही रहना और मेरा ध्यान रखना।

जानी बेगम द्वारा कहे गए इन शब्दों का आशय यह था कि जब मैं मराठों से युद्ध करूं तो तुम मेरे साथ रहना तथा यदि हम हारने लगें तो तुम मराठों को कुछ देर के लिए रोकना ताकि मैं अपने पेट में तलवार भौंककर देह छोड़ सकूं और मराठे मुझे पकड़ न सकें। इसके बाद जानी बेगम तलवारें और भाले लेकर एक हाथी पर चढ़ गई ताकि मराठों से मुकाबला किया जा सके।

बेगम जहांजेब बानू और मराठों के इस दल के बीच भयंकर युद्ध हुआ जिसमें वीर अनिरुद्धसिंह हाड़ा बुरी तरह घायल हो गया किंतु उसने मराठों को बेगम के हाथी तक नहीं पहुंचने दिया। बेगम भी पूरे समय तक रणक्षेत्र में टिकी रही और अपने भाले से मराठा वीरों का सामना करती रही। अंत में अनिरुद्धसिंह की मोर्चाबंदी और बहादुरी काम आई तथा मराठे वहाँ से भाग गए।

जहांजेब बेगम के साथ भी किस्मत ने बड़ा मजाक किया था। उसके पिता दारा शिकोह को शाहजहाँ ने वली-ए-अहद अर्थात् भावी बादशाह घोषित किया था किंतु औरंगजेब ने दारा शिकोह का सिर कटवा दिया। जानी बेगम का पति आजमशाह ई.1707 में तीन महीनों के लिए मुगलों का बादशाह हुआ किंतु उसके बादशाह बनने से दो साल पहले ही ई.1705 में जानी बेगम की अकस्मात् मृत्यु हो गई। इस प्रकार जानी बेगम अपने पिता और पति को बादशाह बनते हुए नहीं देख सकी।

अकबर को शंभाजी की शरण में आए हुए अब पांच साल से कुछ अधिक हो गए थे। जब उसका पिता औरंगजेब औरंगाबाद में आकर बैठ गया तो शहजादा अकबर समझ गया कि मराठे और राजपूत चाहे कितने ही वीर क्यों न हों, वे अकबर को उसके बलशाली पिता औरंगजेब के हाथों में पड़ने से बचा नहीं पाएंगे। इसलिए सितम्बर 1686 में अकबर चुपचाप ईरान भाग गया।

अकबर का पहला विवाह अपने ताऊ दारा शिकोह के सबसे बड़े पुत्र सुलेमान शिकोह की सबसे बड़ी पुत्री सलीमा बानू बेगम से हुआ था जिसके पेट से नेकूसियर का जन्म हुआ था। जब अकबर ईरान भागा तो उसके दोनों पुत्र तथा दोनों पुत्रियां भारत में ही छूट गए जिनमें से एक पुत्र तथा एक पुत्री मुगल हरम में थे और दूसरा पुत्र तथा दूसरी पुत्री दक्खिन में थे। इन दोनों को राजपूतों ने पाल-पोस कर बड़ा किया। इनमें से नेकूसियर जो इस समय केवल 9 साल का था, आगे चलकर ई.1719 में कुछ महीनों के लिए मुगलों के तख्त पर बैठने में सफल हुआ।

जब अकबर ईरान पहुंच गया तो ईरान के शाह ने अकबर से कहा- ‘वह नित्य प्रतिदिन अल्लाह से प्रार्थना किया करे कि उसका पिता मर जाए ताकि अकबर को एक दिन मुगलों का बादशाह बनने का अवसर मिल सके।’

इस पर अकबर ने शाह से कहा- ‘देखते हैं, पहले कौन मरता है, मैं या मेरा पिता।’ अंत में ई.1706 में अकबर की मृत्यु हो गई जबकि औरंगजेब ई.1707 में मृत्यु को प्राप्त हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohan Lal Gupta is a renowned historian from India. He has written more than 100 books on various subjects.

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