Monday, November 29, 2021

जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का षड़यंत्र (1)

16 जुलाई 1947 को वी. पी. मेनन ने इंगलैण्ड में भारत उपसचिव सर पैट्रिक को एक तार दिया कि वायसराय ने मैसूर, बड़ौदा, ग्वालियर, बीकानेर, जयपुर और जोधपुर के प्रतिनिधियों से भारत में विलय के विषय में बातचीत की। उन सबकी प्रतिक्रिया सकारात्मक थी। 2 अगस्त 1947 को मेनन ने पैट्रिक को सूचित किया कि भारत के लगभग समस्त राजा अपने राज्यों का भारतीय संघ में विलय करने के लिए तैयार हो गये हैं।

केवल हैदराबाद, भोपाल और इंदौर हिचकिचा रहे हैं। वायसराय ने देशी नरेशों से बात की है और इन राज्यों के नरेशों ने भारतीय संघ में सम्मिलित होने पर सहमति दर्शायी है- ग्वालियर, पटियाला, कोटा, जोधपुर, जयपुर, रामपुर, नवानगर, झालावाड़, पन्ना, टेहरी गढ़वाल, फरीदकोट, सांगली, सीतामऊ, पालीताना, फाल्टन, खैरागढ़, सांदूर।

यद्यपि जोधपुर राज्य 28 अप्रेल 1947 से संविधान सभा में भाग ले रहा था तथा जोधपुर के युवा महाराजा हनवंतसिंह दो बार भारत में मिलने की घोषणा कर चुके थे किंतु वे देश को स्वतंत्रता मिलने से ठीक 10 दिन पहले पाकिस्तान का निर्माण करने वाले मुहम्मद अली जिन्ना और उनका साथ देने वाले नवाब भोपाल एवं धौलपुर के महाराजराणा के चक्कर में आ गये।

जब राजपूताना के राज्यों का स्वतंत्र समूह गठित करने की योजना विफल हो गयी तो राजनीतिक विभाग के पाकिस्तान-परस्त सदस्यों ने राजपूताना के राज्यों को सलाह दी कि वे पाकिस्तान में मिल जायें क्योंकि भारत पाकिस्तान की सीमा पर स्थित होने के कारण कानूनन वे ऐसा कर सकते थे। इनमें से जोधपुर राज्य एक था। महाराजा हनवंतसिंह कांग्रेस से घृणा करते थे तथा जोधपुर की रियासत पाकिस्तान से लगी हुई थी। इसलिए हनवंतसिंह ने जिन्ना से भेंट करने की सोची।

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जिन्ना और मुस्लिम लीग के नेताओं की जोधपुर नरेश से कई बार भेंट हुई थी और अंतिम भेंट में वे जैसलमेर के महाराजकुमार को भी साथ ले गये थे। बीकानेर नरेश ने उनके साथ जाने से मना कर दिया था और हनवंतसिंह जिन्ना के पास अकेले जाने में हिचकिचा रहे थे। उन लोगों को देखकर जिन्ना की बांछें खिल गयीं। जिन्ना जानते थे कि अगर ये दोनों रियासतें पाकिस्तान में सम्मिलित हो गयीं तो अन्य राजपूत रियासतें भी पाकिस्तान में सम्मिलित हो जायेंगी।

इससे पंजाब और बंगाल के बंटवारे की कमी भी पूरी हो जायेगी तथा समस्त प्रमुख रजवाड़ों को हड़पने की कांग्रेसी योजना भी विफल हो जायेगी। जिन्ना ने एक कोरे कागज पर हस्ताक्षर करके अपनी कलम के साथ जोधपुर नरेश को दे दिया और कहा कि आप इसमें जो भी शर्तें चाहें, भर सकते हैं। इसके बाद कुछ विचार विमर्श हुआ। इस पर हनवंतसिंह पाकिस्तान में मिलने को तैयार हो गये।

फिर वे जैसलमेर के महाराजकुमार की ओर मुड़े और उनसे पूछा कि क्या वे भी हस्ताक्षर करेंगे? महाराजकुमार ने कहा कि वे एक शर्त पर हस्ताक्षर करने को तैयार हैं कि यदि कभी हिंदू और मुसलमानों में झगड़ा हुआ तो जिन्ना हिन्दुओं के विरुद्ध मुसलमानों का पक्ष नहीं लंेगे। यह एक बम के फटने जैसा था जिसने महाराजा हनवंतसिंह को अचंभे में डाल दिया। जिन्ना ने हनवंतसिंह पर बहुत दबाव डाला कि वे दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दें।

जब महाराजकुमार जैसलमेर ने पाकिस्तान में विलय से मना कर दिया तो महाराजा डांवाडोल हो गये। इस अवसर का लाभ उठाकर महाराजा के ए. डी. सी. कर्नल केसरीसिंह ने महाराजा को सलाह दी कि वे अंतिम निर्णय लेने से पहले अपनी माताजी से भी सलाह ले लें। महाराजा को यह बहाना मिल गया और उन्होंने यह कह कर जिन्ना से विदा ली कि वे इस विषय में सोच समझ कर अपने निर्णय से एक-दो दिन में अवगत करायेंगे।

कर्नल केसरीसिंह ने जोधपुर लौटकर प्रधानमंत्री सी. एस. वेंकटाचार को तथ्यों से अवगत करवाया। षड़यंत्र की गंभीरता को देखकर वेंकटाचार ने 6 अगस्त 1947 को बीकानेर राज्य के प्रधानमंत्री सरदार पन्निकर के पास पत्र भिजवाया। पत्र में लिखा था कि भोपाल नवाब महाराजा जोधपुर को जिन्ना से मिलाने ले गये थे। जिन्ना ने पेशकश की थी कि वे जोधपुर को स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता देकर संधि करने को तैयार हैं।

उन्होंने यह भी पेशकश की कि जोधपुर राज्य को जो हथियार चाहिये वे पाकिस्तान के बंदरगाह से बिना ‘सीमांत-कर’ दिए, लाये जा सकते हैं। जिन्ना ने महाराजा जोधपुर को राजस्थान का सर्वेसर्वा बनाने की पेशकश की जिससे जोधपुर महाराजा चकित रह गये और उनके मन में इच्छा जागी कि वे राजस्थान के सम्राट बन जायेंगे। महाराजा के सेक्रेटरी कर्नल केसरीसिंह जिन्ना के निवास पर महाराजा के साथ गये थे किंतु उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया।

अतः उन्हें पूरी शर्तों के बारे में पता नहीं था। जब महाराजा दूसरे दिन भोपाल नवाब के साथ जिन्ना से मिलने गये तो संधि का प्रारूप हस्ताक्षरों के लिए तैयार था। उस समय महाराजा ने केसरीसिंह से कहा कि मैं संधि पर हस्ताक्षर करके राजस्थान का बादशाह हो जाउंगा। केसरीसिंह ने उन्हें समझाया कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिये और ऐसा करने से पहले अपनी माता व अन्य सम्बन्धियों से विचार विमर्श करना चाहिये।

इस पर महाराजा ने यह आश्वासन देकर जिन्ना से विदा ली कि वे अपने परिवार के अन्य सदस्यों से सलाह करके 8 अगस्त को संधि पर हस्ताक्षर करेंगे। केसरीसिंह ने भी इस आश्वासन को दोहराया। जोधपुर लौटकर हनवंतसिंह ने सरदार समंद पैलेस में राज्य के जागीरदारों की एक बैठक बुलायी तथा उनकी राय जाननी चाही। दामली ठाकुर के अतिरिक्त और कोई जागीरदार भारत सरकार से संघर्ष करने के लिए तैयार नहीं हुआ।

महाराजा तीन दिन जोधपुर में रहे। पाकिस्तान में मिलने के प्रश्न पर जोधपुर के वातावरण में काफी क्षोभ था। जब हनवंतसिंह तीन दिन बाद दिल्ली लौटे तो मेनन को बताया गया कि यदि मेनन ने महाराजा को शीघ्र नहीं संभाला तो वे पाकिस्तान में मिल सकते हैं। मेनन ने माउंटबेटन से निवेदन किया कि वे जोधपुर महाराजा को भारत में सम्मिलित होने के लिए सहमत करें।

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