Thursday, February 19, 2026
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शामूगढ़ का युद्ध (20)

दारा शिकोह (Dara Shikoh) और औरंगजेब (Aurangzeb) की सेनाएं शामूगढ़ के मैदान में आमने-सामने खड़ी थी। शामूगढ़ का युद्ध (War of Shamugarh) शाहजहाँ (Shahjahan) के शहजादों के भाग्य पर अंतिम मुहर लागने वाला था।

महाराजा रूपसिंह राठौड़ (Maharaja Roopsingh Rathore) की तलवार औरंगजेब (Aurangzeb) की गर्दन तक पहुँच ही गई! महाराजा रूपसिंह के सिर पर आज जैसे रणचण्डी स्वयं आकर सवार हो गई थी। इसलिए महाराजा रूपसिंह का अप्रतिम रूप, युद्ध के उन्माद से ओत-प्रोत होकर और भी गर्वीला दिखाई देने लगा था।

महाराजा रूपसिंह राठौड़ (Maharaja Roopsingh Rathore) ने दारा शिकोह (Dara Shikoh) को सलाह दी कि वह शामूगढ़ का युद्ध (War of Shamugarh) प्रत्यक्ष रूप से न लड़े। अपितु अपना ध्यान औरंगजेब (Aurangzeb) पर केन्द्रित रखे तथा मौका मिलते ही उसके निकट जाकर उसे पकड़ ले। मैं अपने राजपूतों सहित आपकी पीठ दबाए हुए बढ़ता रहूंगा। मेरे पीछे राजा छत्रसाल (Maharaja Chhatrasal) रहेंगे। यदि भाग्य लक्ष्मी ने साथ दिया तो दुष्ट औरंगज़ेब का खेल आज शाम से पहले ही खत्म हो जाएगा।

महाराजा की बातों से दारा शिकोह (Dara Shikoh) को बड़ी तसल्ली मिली। दारा ने बलख और बदखशां में महाराजा की तलवार के जलवे देखे थे। इसलिए वह दूने उत्साह में भरकर एक ऊँची सी सिंहलद्वीपी हथिनी पर सवार हो गया जो हर प्रकार की बाधा के बावजूद भागने में बहुत तेज थी तथा दुश्मन के घोड़ों के पैर, अपने पैरों में बंधी तलवारों से गाजर-मूली की तरह काटती हुई चलती थी।

ज्यों ही शामूगढ़ का युद्ध (War of Shamugarh) शुरू हुआ, दोनों तरफ की मुगल सेनाओं ने आग बरसानी शुरू कर दी। राजपूत सेनाओं को इसीलिए शाही सेनाओं के बीच में रखा गया था ताकि वे तोपों की मार से दूर रहें। थोड़ी ही देर में मैदान में बारूद का धुआं छा गया और कुछ भी दिखाई देना मुश्किल हो गया।

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ठीक इसी समय महाराजा रूपसिंह राठौड़ (Maharaja Roopsingh Rathore) ने दारा शिकोह को आगे बढ़ने का संकेत किया और दारा शिकोह (Dara Shikoh) पहले से ही तय योजना के अनुसार औरंगजेब (Aurangzeb) के हाथी की दिशा को अनुमानित करके उसी तरफ बढ़ने लगा। महाराजा रूपसिंह उसकी पीठ दबाए हुए दारा के पीछे-पीछे औरंगजेब का काल बना हुआ चल रहा था।

बारूद के धुंए के कारण कोई नहीं जान पाया कि कब और कैसे दारा शिकोह (Dara Shikoh) की हथिनी, औरंगज़ेब के हाथी के काफी निकट पहुँच गई। सब कुछ योजना के अनुसार हुआ था। इस समय औरंगजेब (Aurangzeb) के चारों ओर उसके सिपाहियों की संख्या कम थी और दारा शिकोह तथा महाराजा रूपसिंह थोड़े सी हिम्मत और प्रयास से औरंगज़ेब पर काबू पा सकते थे किंतु विधाता को यह मंजूर नहीं था। उसने औरंगज़ेब के भाग्य में दूसरी ही तरह के अंक लिखे थे।

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दारा शिकोह (Dara Shikoh) और रूपसिंह अपनी योजना को कार्यान्वित कर पाते, उससे पहले ही आकाश से बारिश शुरू हो गई और मोटी-मोटी बूंदें गिरने लगी। इस बारिश का परिणाम यह हुआ कि धुंआ हट गया और मैदान में सारे हाथी-घोड़े तथा सिपाही साफ दिखने लगा। औरंगजेब ने दारा की हथिनी को बिल्कुल अपने सिर पर देखा तो घबरा गया लेकिन औरंगज़ेब के आदमियों ने औरंगजेब (Aurangzeb) पर आए संकट को भांप लिया और वे भी तेजी से औरंगज़ेब के हाथी की ओर लपके। उधर जब औरंगजेब के तोपखाने के मुखिया ने देखा कि बारिश के कारण उसकी तोपें बेकार हो गई हैं, तो उसने तोपखाने के हाथी खोलकर दारा की सेना पर हूल दिए। इससे दारा की सेना में भगदड़ मच गई। बहुत से सिपाही हाथियों की रेलमपेल में फंसकर कुचल गए। इधर महाराजा रूपसिंह हाथ आए इस मौके को गंवाना नहीं चाहता था। इसलिए जब उसने देखा कि दारा अपनी हथिनी को आगे बढ़ाने में संकोच कर रहा है तो महाराजा अपने घोड़े से कूद गया और हाथ में नंगी तलवार लिए हुए औरंगजेब की तरफ दौड़ा। दारा ने महाराजा रूपसिंह को तलवार लेकर पैदल ही औरंगजेब के हाथी की तरफ दौड़ते हुए देखा तो दारा शिकोह (Dara Shikoh) की सांसें थम सी गईं। उसे इस प्रकार युद्ध लड़ने का अनुभव नहीं था।

महाराजा रूपसिंह राठौड़ (Maharaja Roopsingh Rathore) तीर की तेजी से बढ़ता जा रहा था और दारा कुछ भी निर्णय नहीं ले पा रहा था। इससे पहले कि औरंगजेब (Aurangzeb) का रक्षक दल कुछ समझ पाता महाराजा उन्हें चीरकर औरंगज़ेब के हाथी के बिल्कुल निकट पहुँच गया। महाराजा ने बिना कोई क्षण गंवाए औरंगज़ेब के हाथी के पेट पर बंधी रस्सी को अपनी तलवार से काट डाला।

यह औरंगजेब (Aurangzeb) की अम्बारी की मुख्य रस्सी थी जिसके कटने से औरंगज़ेब नीचे की ओर गिरने लगा। महाराजा ने चाहा कि औरंगजेब के धरती पर गिरकर संभलने से पहले ही वह औरंगज़ेब की गर्दन उड़ा दे ताकि शामूगढ़ का युद्ध (War of Shamugarh) दारा शिकोह के माथे पर जीत का सेहरा बांध सके किंतु तब तक औरंगजेब (Aurangzeb) के सिपाही, महाराजा रूपसिंह के निकट पहुँच चुके थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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