Monday, September 20, 2021

अध्याय – 36 : मुगलों की मनसबदारी प्रथा

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मनसब प्रथा की आवश्यकता

अकबर के शासन के आरम्भिक वर्षों में शाही सेना में मंगोल, तुर्क, उजबेग, अफगान तथा ईरानी आदि विदेशी सैनिकों की भरमार थी। सैनिक दलों के मुखिया भी उसी जाति के होते थे। इन अधिकारियों को अपनी तथा अपने सैनिकों की सेवाओं के बदले में जागीरें प्रदान की जाती थीं। हुमायूँ के विलासी स्वभाव के कारण शासन में शिथिलता आ गई। इस कारण उसके शासनकाल में सैन्य अधिकारी केन्द्रीय सत्ता के पूर्ण नियंत्रण में नहीं रहे। उन्होंने जागीरोें के अनुरूप निर्धारित संख्या में सैनिक रखने भी बन्द कर दिये। इससे मुगलों की सैनिक शक्ति कमजोर पड़ गई। ये सैनिक अधिकारी अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये गैर-कानूनी काम तथा धोखाधड़ी भी करने लगे। वे सैन्य व्यवस्था में किसी भी प्रकार के सुधार का हमेशा विरोध करते थे। अकबर सैनिक सत्ता का केन्द्रीयकरण करना चाहता था ताकि अनियंत्रित सैन्य अधिकारियों पर अंकुश लगाया जा सके और सैनिक सत्ता सही अर्थों में बादशाह के हाथों में आ जाय। मनसबदारी प्रथा अकबर की इसी विचारधारा का परिणाम था।

मनसब का अर्थ

अकबर द्वारा आरम्भ की गई मनसबदारी प्रथा मुगल व्यवस्था की एक चारित्रिक विशेषता थी। मनसब एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ है- ‘निश्चित स्थान’। मनसबदारी प्रथा का उद्देश्य साम्राज्य के अधिकारियों में एक क्रमानुसार पद व्यवस्था स्थापित करना था। साम्राज्य के समस्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भर्ती सैनिक अधिकारी के रूप में की जाती थी, चाहे उनका काम कुछ भी हो। उनका पद एवं वेतन का निश्चय और शासन तथा दरबार में उनकी श्रेणी एवं मर्यादा का निर्धारण उनके मनसब के आधार पर तय होता था। अबुल फजल के अनुसार अकबर ने मनसबदारों को मनसब दहववाशी (10 के नायक) से दस हजारी (10,000 सैनिकों का अधिकारी) तक निर्धारित कर दिये परन्तु 5,000 से ऊपर के मनसब अपने श्रेष्ठ पुत्रों के लिये आरक्षित कर दिये। 1585 ई. में मनसब की सर्वोच्च सीमा को बढ़ाकर 12,000 कर दिया गया और अमीरों को 7,000 तक के मनसब दिये जाने लगे। 1605 ई. में राजा मानसिंह को 7,000 जात एवं 6,000 सवार का मनसब दिया गया।

मनसबदारों की किस्में

मनसबदार दो किस्म के थे- स्थायी और अस्थायी। स्थायी मनसब को गैर-मश्रूत कहा जाता था। इस किस्म के मनसबदार जीवनपर्यन्त अपने पद का उपभोग करते थे। परन्तु बादशाह इसमें रद्दोबदल कर सकता था। अस्थायी मनसब को मश्रूत कहा जाता था। यह मनसब किसी विशेष कार्य की पूर्ति तक के लिये प्रदान किया जाता था। कार्य की समाप्ति के साथ ही मनसब भी समाप्त हो जाता था। कई बार स्थायी मनसबदारों को अतिरिक्त कार्य के लिए मश्रूत प्रदान किया जाता था। कार्य समाप्ति के बाद यह समाप्त हो जाता था परन्तु गैर-मश्रूत यथावत् बना रहता था।

मनसबदारों की श्रेणियाँ

मनसबदारों की तीन श्रेणियाँ थीं- (1) मनसबदार, (2) अमीर और (3) उमरा-ए-आजम।

(1.) मनसबदार: एक विशेष पद अथवा कोटि से निम्न अधिकारियों को मनसबदार कहा जाता था।

(2.) अमीर: प्रारंभ में 200 अश्वारोहियों से ऊपर के अधिकारियों को अमीर की श्रेणी में रखा गया। बाद में इस सीमा को बढ़ाकर 500 अश्वारोही कर दिया गया। औरंगजेब ने इस सीमा को बढ़ाकर 1000 कर दिया।

(3.) उमरा-ए-आजम: उमरा-ए-आजम के अन्तर्गत अश्वारोहियों की ठीक संख्या बताना कठिन है क्यांेकि यह सीमा लगातार घटती-बढ़ती रही। इतिहासकारों का मानना है कि 3,000 अथवा उससे ऊपर के जात वाले अमीरों को ‘उमरा-ए-आजम’ (अथवा अमीर-ए-आजम) कहा जाता था। जहाँगीर और शाहजहाँ के समय में यह सीमा बनी रही परन्तु औरंगजेब ने इसको घटाकर 2,000 जात कर दिया। 1682 ई. में इस सीमा को और कम करके 1,500 कर दिया गया। मनसबदारों के लिए अपने मनसब के हिसाब से सैनिक तथा पशु रखना आवश्यक नहीं था परन्तु उन्हें अपने अधीन अपनी मनसब की संख्या के एक निश्चित भाग तक सैनिक अवश्य रखने पड़ते थे। वस्तुतः ऐसा करके अकबर सेना में व्याप्त भ्रष्टाचार और घोड़ों सम्बन्धी धोखाधड़ी को समाप्त कर देना चाहता था।

मनसबदारों की नियुक्ति

मनसबदारों की नियुक्ति बादशाह द्वारा की जाती थी। उनकी पदोन्नति अथवा पदावनति बादशाह की प्रसन्नता अथवा अप्रसन्नता पर निर्भर थी। सामान्यतः बादशाह शुभ अवसरों पर या सैनिक अभियान के आरम्भ में अथवा अंत में मनसबदारों के मनसब में वृद्धि करता था परन्तु ऐसा करना बादशाह के लिए अनिवार्य नहीं था। 1505 ई. में जब राजा टोडरमल बंगाल के सफल अभियान से वापस लौटा तब बादशाह ने उपहार आदि देकर उसका सम्मान तो किया परन्तु उसके मनसब में वृद्धि नहीं की। अबुल फजल के अनुसार मनसबदारों की नियुक्ति सामान्यतः प्रतिदिन होती रहती थी और सम्भवतः ही कोई दिन जाता हो जब किसी को मनसब प्रदान न किया जाता हो अथवा किसी के मनसब में वृद्धि न होती हो। मनसब के उम्मीदवार बख्शी द्वारा बादशाह के सन्मुख प्रस्तुत किये जाते थे और उसकी स्वीकृति के बाद उसकी नियुक्ति का परवाना जारी किया जाता था।

जात और सवार मनसब

1594 ई. में अकबर ने सवार पद आरम्भ किया। इससे पूर्व मनसब के लिये केवल जात शब्द का प्रयोग किया जाता था। प्रत्येक मनसबदार से यह आशा की जाती थी कि वह अपने मनसब के अनुरूप अश्वारोही सैनिक रखेगा और इसी हिसाब से उसको जागीर भी दी जाती थी परन्तु व्यावहारिक रूप में मनसबदार मनसब के अनुरूप अश्वारोही सैनिक को रखे बिना ही उतने सैनिकों के वेतन तथा जागीर का उपभोग करते रहते थे। इस भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए मनसबदारों के मनसब में जात और सवार पद का उल्लेख किया जाने लगा। स्पष्ट है कि जात और सवार शब्द दो अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त किये जाते थे। दुर्भाग्यवश जात और सवार शब्दों की सही व्याख्या अभी तक नहीं हो पाई है। विभिन्न विद्वानों ने इन शब्दों के विभिन्न अर्थ निकाले हैं।

ब्लाकमैन के अनुसार जात सैनिकों की उस संख्या का बोधक था जिसके रखने की आशा मनसबदारों से की जाती थी और सवार मनसब उस संख्या को बताता है जो वास्तव में मनसबदार रखते थे। मनसबदार के वेतन का भुगतान जात संख्या के आधार पर किया जाता था। इरविन के मतानुसार ‘सवार पद’ एक अतिरिक्त सम्मान था और प्राप्तकर्त्ता को जात की संख्या के अतिरिक्त सवार पद से निश्चित सैनिकों को भी रखना पड़ता था। इरविन के मत में सबसे बड़ा दोष तो यह है कि यदि इस मत के आधार पर सैनिकों की गणना करें तो मुगल सेना की संख्या एक अविश्वसनीय अंक तक पहुँच जाती है। डॉ. रामप्रसाद त्रिपाठी के अनुसार सवार मनसब एक अतिरिक्त सम्मान मात्र था और उसमें जितने सवारों का उल्लेख होता, उन्हें रखने का मनसबदार का कोई बन्धन नहीं होता था। अब्दुल अजीज का मत है कि मनसब के अन्तर्गत मनसबदार एक निश्चित संख्या में हाथी, भारवाहक पशु आदि रखता था जबकि सवार मनसब यह बताता था कि उसके पास कितने सैनिक सवार होने चाहिए। सी. एम. के. राव का मत है कि जात पैदल और सवार मनसब घुड़सवारोें की संख्या को बताता था। जात और सवार सम्बन्धी इन विरोधी विचारों के आधार पर इनका सही अर्थ निकालना अत्यधिक कठिन है।

वेतन और भत्ता

मनसबदारों के वेतन का भुगतान नकदी अथवा जागीर के रूप में किया जाता था। कोई जागीर अथवा मनसब वंशानुगत नहीं थी। वैसे बादशाह बड़े मनसबदारों के पुत्रों को मनसब देकर उनके प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करता था परन्तु उन्हें निम्न मनसब ही दिये जाते थे। यदि उनमें प्रतिभा होती तो वे उन्नति करते-करते बड़े मनसबदार बन जाते थे। मनसबदारों को उनके मनसब के अनुसार वेतन दिया जाता था। कई बार मनसबदारों को वेतन के अलावा पुरस्कार स्वरूप धन भी दिया जाता था।

मनसबदारों को अपने समस्त प्रकार के सैनिकों के बदले में जो वेतन मिलता था उसे तलब कहा जाता था। जात पद के लिए जो वेतन मिलता था उसे खासा अथवा घात कहा जाता था। इस वेतन से मनसबदार अपने परिवार का पोषण करता था। सवार पद के लिए जो वेतन मिलता था उसे ताबीनाल कहा जाता था। इसका उपयोग मनसब के अनुरूप रखे जाने वाले घोड़ों, घुड़सवारों, बोझा ढोने वाले पशुओं आदि पर किया जाता था। अबुल फजल के अनुसार प्रथम श्रेणी के 5,000 के मनसबदार को 30,000 रुपये मासिक मिलते थे। इसी प्रकार, प्रथम श्रेणी के 500 के मनसबदार को 2,500 रुपये प्रतिमाह मिलते थे। 10 के मनसबदार को 100 रुपये प्रतिमाह मिलते थे परन्तु तृतीय श्रेणी के 5000, 500 एवं 10 के मनसबदार को क्रमशः 28,000; 2100 एवं 75 रुपये प्रतिमाह मिलते थे। शाहजादों को उनके मनसब की तुलना में कहीं अधिक वेतन मिलता था।

मनसब की श्रेणियाँ

1595 ई. से पूर्व मनसब की अलग-अलग श्रेणियाँ नहीं थी परन्तु 1595 ई. में मनसबदारों को तीन श्रेणियाँ में बाँटा गया। जिस मनसबदार के पास अपनी मनसब की संख्या के बराबर सैनिक होते थे, वह अपने मनसब का प्रथम श्रेणी का मनसबदार कहलाता था। यदि उसके पास सैनिकों की संख्या उसके मनसब की आधी संख्या से अधिक होती थी तो वह दूसरी श्रेणी का और आधी संख्या से भी कम सैनिक रखने वाला तीसरी श्रेणी का मनसबदार कहलाता था। इसी वर्गीकरण के आधार पर उन्हें वेतन भी दिया जाता था। यह आवश्यक नहीं था कि किसी उच्च मनसब प्राप्त मनसबदार को शाही दरबार में भी उच्च पद प्राप्त हो। उदाहरणार्थ, राजा मानसिंह को सात हजार मनसब प्राप्त था किन्तु उसको दरबार में कभी भी मंत्री पद प्राप्त नहीं हो सका जबकि उससे कम मनसब वाला अबुल फजल कई वर्षों तक मंत्री पद पर बना रहा। असैनिक विभागों के अधिकारी सैनिक नहीं रखते थे परन्तु आवश्यकता पड़ने पर उन्हें भी सैनिक सेवा देनी पड़ती थी। कोई भी मनसबदार समस्त मुगल सेना का नायक नहीं था। स्वयं बादशाह ही प्रधान सेनापति था। वह अलग-अलग मनसबदारों को विभिन्न अभियानों का मुख्य सेनापति नियुक्त करता था। उसकी सहायता के लिए उससे भी उच्च मनसब वाले मनसबदारों को नियुक्त कर दिया जाता था।

मनसबदारों द्वारा सैनिकों की भर्ती

मनसबदार अपने सैनिकों की भर्ती करने के लिए स्वतंत्र थे तथा प्रत्येक मनसबदार प्रायः अपनी जाति के लोगों को ही अपनी सेना में भर्ती करता था। उन्हें अपने घोड़े तथा व्यवस्था सम्बन्धी अन्य सामान भी स्वयं जुटाना पड़ता था। मीरबख्शी के विभाग द्वारा मनसबदारों के सैनिकों तथा घोड़ों का निरीक्षण किया जाता था। प्रथम निरीक्षण के समय मनसबदार के घोड़ों तथा सैनिकों की जाँच कर उनकी एक सूची बनाई जाती थी और उनके घोड़ों को दागा जाता था। दो प्रकार के दाग लगाये जाते थे। घोड़े के सीधे पुट्ठे पर सरकारी निशान और बायें पुट्ठे पर मनसबदार का निशान दागा जाता था। निरीक्षण के समय सही संख्या में घोड़े तथा सैनिक प्रस्तुत करने वाले मनसबदारों को पदोन्नति जल्दी मिलती थी। मनसबदारों को पुरस्कृत तथा दण्डित करने की भी व्यवस्था थी ताकि उन्हें अनुशासन में रखा जा सके।

जब्ती प्रथा

मनसबदारी से सम्बन्धित जब्ती प्रथा के बारे में विद्वान एकमत नहीं हैं। इस प्रथा के अंतर्गत मनसबदार अथवा अमीर की मृत्यु के बाद उसकी सम्पत्ति को राज्य जब्त कर लेता था। इसका एक कारण तो यह माना जाता है कि मनसबदार हमेशा ही राज्य के ऋणी रहा करते थे और मनसबदार की मृत्यु के बाद राज्य अपने ऋण की वसूली के लिए उसकी सम्पत्ति को कुर्क कर लेता था। दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि राज्य की सेवा में रहते हुए मनसबदार समस्त धन अर्जित करता था। इसलिए उसकी मृत्यु के बाद उसकी सम्पत्ति पर राज्य का अधिकार माना जाता था। इस प्रथा के कारण मुगल काल में कुलीन वर्ग का उत्कर्ष नहीं हो सका। मनसबदार के पुत्रों को नये सिर से अपना जीवन आरम्भ करना पड़ता था।

अबुल फजल ने जब्ती प्रथा के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है परन्तु इतिहासकारों का मानना है कि अकबर के शासनकाल में भी यह प्रथा किसी न किसी रूप में प्रचलित थी तथा यह प्रथा कुछ विशेष परिस्थितियों में ही लागू की जाती थी जैसे कि- (1) यदि किसी मनसबदार का कोई उत्तराधिकारी नहीं होता था (2) यदि उस पर राज्य का बकाया, निकलता था और (3) जागीर का हिसाब साफ किया हुआ नहीं होता था। ऐसी स्थितियों में मनसबदार की सम्पत्ति जब्त कर ली जाती थी परन्तु जिन मनसबदारों के उत्तराधिकारी होते थे, उन्हें मनसबदार की सम्पत्ति में से काफी कुछ दे दिया जाता था। उन्हें कितना हिस्सा दिया जाये, यह बादशाह की इच्छा पर निर्भर करता था। इस सम्बन्ध में कोई निश्चित नियम नहीं थे। बर्नियर ने इस प्रथा को ‘जंगली’ कहा है।

अकबर के बाद मनसबदारी व्यवस्था

अकबर के बाद मनसब की सीमा में तेजी के साथ वृद्धि होती गई। जहाँगीर के शासनकाल में मनसब की सीमा 40,000 तक पहुँच गई। 1617 ई. में शाहजादा खुर्रम (शाहजहाँ) को 30,000 जात एवं 20,000 सवार तथा शाहजादा परवेज को 20,000 जात एवं 10,000 सवार का मनसब दिया गया। इसी प्रकार, नगरयार को 12,000 जात एवं 8,000 सवार का मनसब मिला। जब शाहजहाँ ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह किया तब परवेज का मनसब बढ़ाकर 40,000 जात एवं 30,000 सवार कर दिया गया। शाहजहाँ के शासनकाल में मनसबों की सीमा और अधिक बढ़ाने का प्रयास किया गया। दारा शिकोह को 60,000 जात एवं 40,000 सवार का मनसब दिया गया था। शुजा को 20,000 जात एवं 15,000 सवार, औरंगजेब को 20,000 जात एवं 15,000 सवार और मुराद को 15,000 जात एवं 12,000 सवार के मनसब दिये गये। औरंगजेब ने भी अपने पुत्रों को उच्च मनसब दिये। शाहजादा मुअज्जम को 40,000 जात एवं 40,000 सवार, कामबख्श को 40,000 जात एवं 40,000 सवार, मुहम्मद सुल्तान को 20,000 जात एवं 10,000 सवार, मुहम्मद आजम को 20,000 जात एवं 9,000 सवार के मनसब दिये गये। इसी प्रकार, उसने अपने पौत्रों को भी उच्च मनसब प्रदान किये। मनसब की वृद्धि केवल बादशाह के पुत्र-पौत्रों के मनसबों में ही की गई थी। साम्राज्य के किसी भी अमीर को इतने उच्च मनसब नहीं दिये गये थे।

अकबर के बाद मनसबदारों की संख्या में निरन्तर वृद्धि होती गई। औरंगजेब के समय में तो विशेष वृद्धि हुई। मनसब की सीमा में तो वृद्धि हुई परन्तु मनसबदारों के वेतन में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं हुई। उल्टे उनके वेतन तथा भत्ते कम होते गये। शाहजहाँ के समय से ही यह गिरावट आरम्भ हो गई। औरंगजेब के समय में अर्थव्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाने से स्थिति और भी विकट हो गई। समय पर वेतन चुकाना भी सम्भव नहीं रहा। अकबर के समय में एक साधारण अश्वारोही को 9,600 दाम (240 रुपये) प्रतिवर्ष वेतन मिलता था। जहाँगीर के समय में यही वेतन बना रहा परन्तु शाहजहाँ के शासनकाल के अन्तिम वर्षों में तथा औरंगजेब के शासनकाल में 8,000 दाम (200 रुपये) प्रतिवर्ष वेतन दिया जाता था। वेतन में कटौती के साथ रसद-ए-खुराकी में भी कटौती की गई।

मनसबदारी प्रथा की सफलता

जागीरदारी प्रथा के दोषों को दूर करने तथा राजपूतों पर अंकुश रखने के लिए अथवा उनमें प्रतिस्पर्धा की भावना को उत्पन्न कर एक का दूसरे के विरुद्ध उपयोग करने और अपने विद्रोही उमरावों के विरुद्ध कबीला भावना का उपयोग कर उनको दबाने की दृष्टि से अकबर ने जिस मनसबदारी प्रथा का सूत्रपात किया, वह कई दृष्टियों से सफल रही। इससे मनसबदारों में बादशाह के प्रति स्वामिभक्ति और कर्त्तव्यनिष्ठा की भावना भी बढ़ी क्योंकि उनकी पदोन्नति बादशाह की कृपा पर निर्भर करती थी। इस व्यवस्था से योग्य व्यक्तियों को दायित्वपूर्ण काम सौंपने में सरलता हो गई।

मनसबदारी प्रथा के दोष

उपरोक्त समस्त सफलताओं के उपरान्त भी मनसबदारी प्रथा में कुछ जन्मजात दोष थे, जो इस प्रकार थे-

(1.) मनसबदारों को अपने मनसब के अनुसार जो वेतन मिलता था, वे उसका प्रायः दुरुपयोग करते थे। वे लोग साधारण लोगों को फौजी वर्दी पहनाकर और उनके घोड़ों को अपना बताकर सैनिक निरीक्षण के लिए ले जाते थे और उन्हें मुक्त कर उनके वेतन का स्वयं उपभोग करते रहते थे। इरविन ने लिखा है- ‘झूठी सेना संग्रह एक ऐसी बुराई थी जो मुगल सेना में सबसे अधिक पाई जाती थी। इन सबके हिस्से को पूरा करने के लिए मनसबदार एक-दूसरे को अपने सैनिक उधार दे देते थे अथवा बाजार से लोगों को पकड़ कर उन्हें किसी टट्टू पर बैठाकर दूसरों के साथ उनकी भी गिनती योग्य सैनिकों में करा देते थे।’ इस प्रकार, राज्य जितना खर्च करता था, उतनी योग्य एवं शिक्षित सेना उसे नहीं मिल पाती थी।

(2.) मनसबदार के सैनिक, बादशाह की तुलना में अपने मनसबदार के प्रति अधिक स्वामिभक्त होते थे। सैनिकों को भुगतान यद्यपि शाही खजाने से दिया जाता था परन्तु मनसबदार और बादशाह में संघर्ष छिड़ जाने की स्थिति में वे प्रायः मनसबदार के पक्ष से लड़ते थे।

(3.) मनसबदारों को अपने सैनिक भर्ती करने की स्वतंत्रता थी। धीर-धीरे मनसबदारों का नैतिक पतन होता चला गया और सैनिक भर्ती में भ्रष्टाचार को रोकना असम्भव हो गया। मनसबदार को अपने सैनिक दस्ते का नेतृत्व करना पड़ता था, अतः उसे विभिन्न प्रकार के सैनिकों का नेतृत्व करने के अनुभव से वंचित रह जाना पड़ता था।

(4.) मनसबदारों के लिए यद्यपि नियम बनाये गये परन्तु उनको लागू करना बादशाह की इच्छा पर निर्भर था जो किसी भी मनसबदार को ऊँचे मनसब दे सकता था अथवा महत्त्वपूर्ण सैनिक अभियान का प्रधान सेनापति नियुक्त कर सकता था। इससे मनसबदारों में एक-दूसरे के प्रति प्रतिद्वंद्विता एवं द्वेष भावना पनप गई। वे प्रायः शत्रु का मिलकर सामना करने की अपेक्षा आपस में ही एक-दूसरे को नाकामयाब बनाने में लग जाते थे। मनसबदारों के बीच में बढ़ता हुआ द्वेष मुगल साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुआ।

(5.) मनसबदार की मृत्यु के पश्चात उसका मनसब समाप्त हो जाता था और सरकार उसकी सम्पत्ति भी जब्त कर लेती थी। इसलिए प्रत्येक मनसबदार अपने जीवनकाल में ही समस्त धन को खर्च करने का प्रयत्न करता था ताकि मरने पर राज्य को कुछ न मिले। इस मनोवृत्ति ने एक तरफ तो उन्हें अत्यधिक विलासी बना दिया और दूसरी तरफ वे हमेशा कर्ज में डूबे रहने लगे। अनेक मनसबदार तो युद्ध क्षेत्र की ओर कूच करते समय भी अपने साथ अनेक सेवक, नर्तकियाँ और हरम की स्त्रियों को ले जाते थे। इससे सेना की गति बहुत धीमी पड़ जाती थी।

(6.) मनसबदारी व्यवस्था में केन्द्रीयकरण न होने से उसमें एकता की भावना विकसित नहीं हो पाई जो एक राष्ट्रीय सेना के लिए आवश्यक होती है। विभिन्न मनसबदारों के अन्तर्गत विभिन्न सैन्य-दलांे के रख-रखाव और रणकौशल का स्तर भी भिन्न-भिन्न होता था। इसीलिए उनमें अनुशासन एवं योग्यता की समानता नहीं थी।

(7.) मनसबदार अपने सैनिकों को प्रशिक्षण देने की व्यवस्था नहीं करते थे। मुगल बादशाहों ने भी इसके लिए उन पर दबाव नहीं डाला।

मुगल सेना के अन्य दोष

मनसबदारी प्रथा के अलावा मुगलों की सैन्य व्यवस्था में कुछ अन्य दोष भी थे-

(1.) मुगल शासकों ने पैदल सेना की तरफ विशेष ध्यान नहीं दिया। इससे पैदल सेना का स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता चला गया।

(2.) मुगलों का तोपखाना समय की रफ्तार से काफी पीछे रह गया। बड़ी-बड़ी तोपों के होते हुए भी अकबर असीरगढ़ जैसे किले पर कोई सक्रिय प्रभाव नहीं डाल सका। शाहजहाँ के समय में कन्धार में मुगल सेना अपनी तोपों के होते हुए भी असफल रही। औरंगजेब के समय में जब मराठों ने छापामार युद्ध पद्धति का सहारा लिया, तब तोपों की रही-सही उपयोगिता भी समाप्त हो गई।

(3.) मुगलों ने नौ-शक्ति की उपेक्षा कर भारतीय समुद्रों का द्वार यूरोपीय राष्ट्रों के लिए खुला छोड़ दिया जिससे यूरोपीय लोग भारत के समुद्र तटों पर ऐसे जम गये कि बाद में उन्हें हटाना असम्भव हो गया।

(4.) मुगल सेना की धीमी गति भी उनका एक मुख्य दोष थी। औरंगजेब के जीवन के अंतिम भाग में मुगल सेना अपनी शक्ति और साख खो बैठी।

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