Monday, September 20, 2021

अध्याय – 35 : मुगलों की भू एवं भू-राजस्व सम्बन्धी व्यवस्थाएँ

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भारत पर अधिकार स्थापित करने वाले प्रारम्भिक तुर्क सुल्तानों के समक्ष यह समस्या थी कि वे विजित प्रदेशों में इस्लामी भू-राजस्व व्यवस्था को लागू करें अथवा भारत की प्राचीन भू-राजस्व व्यवस्था को जारी रखें या दोनों का समन्वय कर एक नई व्यवस्था बनायें! तत्कालीन परिस्थितियों में अन्तिम विकल्प ही उचित प्रतीत हुआ और उन्होंने भारतीय तथा इस्लामिक व्यवस्था को मिलाकर नयी व्यवस्था स्थापित की। इस व्यवस्था में हिन्दू और मुस्लिम कृषकों के लिये अलग-अलग भू-राजस्व की दरें निर्धारित की गईं।

दिल्ली सुल्तानों की नीति

दिल्ली सल्तनत की आय का सबसे बड़ा साधन भूमि-कर (लगान) था। मुस्लिम उलेमाओं ने भूमि को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा हैं- (1) उशरी, (2) खराजी, और (3) सुल्ही। उशरी भूमि मोटे तौर पर वह भूमि थी जो मुसलमानों के अधिकार में थी। खराजी वह भूमि थी जिस पर गैर-मुस्लिमों द्वारा काश्त की जाती थी। संधि के अंतर्गत प्राप्त होने वाली भूमि सुल्ही कहलाती थी। दिल्ली के सुल्तानों के पास सुल्ही भूमि नहीं थी। उशरी और खराजी भूमियां उपज के आधार पर पाँच श्रेणियों में विभक्त थीं। उशरी भूमि से उपज का 1/10वाँ भाग भूमिकर के रूप में लिया जाता था परन्तु यदि कृत्रिम साधनों से भूमि की सिंचाई की गई हो तो केवल 1/20 वाँ भाग ही वसूल किया जाता था। खराजी भूमि पर 1/2 से 1/5वाँ भाग तक लगान के रूप में वसूल किया जाता था। लगान नकद अथवा जिन्स, दोनों रूप में दिया जा सकता था।

बाबर और हुमायूँ की नीति

पानीपत के युद्ध के पश्चात् बाबर ने भारत में मुगल साम्राज्य की नींव डाली और एक विशाल क्षेत्र को अपने अधीन किया। उसने राजनीतिक व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन करते हुए अफगानों के स्थान पर मुगल, चगताई एवं मिर्जा अमीरों को प्रांतीय शासक बनाया। सल्तनत की समस्त बड़ी जागीरें उन्हें सौंप दी गईं किंतु बाबर ने देश की प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव करना उचित नहीं समझा। उसने लोदियों के समय में लागू मालगुजारी व्यवस्था को ज्यों का त्यों जारी रखा। मुगल अमीरों को दी गई जागीरों की आय से बाबर को एक निश्चित रकम वार्षिक कर के रूप में मिलने लगी। जिन प्रान्तों में खालसा भूमि की घोषणा की गई, वहाँ बाबर ने मालगुजारी वसूलने के लिए शिकदारों की नियुक्ति की। बाबर ने कुछ क्षेत्रों पर स्थानीय जमींदारों की सहायता से भी शासन किया। उसने इन जमींदारों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया। इसलिए ये जमींदार भी वार्षिक कर देते रहे।

हुमायूँ के शासनकाल में भू-राजस्व सम्बन्धी सुधार किये गये। सिकन्दरीगज को 41 से बढ़ाकर 42 कर दिया गया। उसके समय में एक खखार (आठ मन से कुछ अधिक) अनाज पर दो बाबरी तथा चार टंक कर लिया जाता था। कुछ विद्वानों का मत है कि हुमाँयू के समय में अकबर के समय से कम लगान लिया जाता था।

शेरशाह की लगान व्यवस्था

शेरशाह ने सल्तनत की समस्त भूमि की नपाई करवाकर प्रत्येक श्रेणी की भूमि का क्षेत्रफल एक रजिस्टर में दर्ज करवाया। भूमि को तीन श्रेणियों में बाँटा गया- उत्तम, मध्यम, और निम्न। इन तीनों श्रेणियों की भूमि की उपज को जोड़कर, तीन से विभाजित कर प्रति बीघा भूमि की औसत पैदावार निकाली जाती थी। पैदावार का एक तिहाई हिस्सा लगान के रूप में लिया जाता था। किसानों को स्वतंत्रता थी कि वे लगान अनाज अथवा नकदी के रूप मे दें। प्रत्येक किसान को उसकी भूमि का पट्टा दिया जाता था जिसमें किसान की भूमि के क्षेत्रफल, भूमि की स्थिति और किसान द्वारा अदा किया जाने वाला लगान दर्ज होता था। प्रत्येक किसान को कबूलियत नामक दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने पड़ते थे, जिसमें किसान लगान के नियमों को स्वीकार करता था। भूमि-कर के अलावा किसानों से अन्य कर भी लिये जाते थे।

अकबर के भू-राजस्व सम्बन्धी प्रयोग

मुगलों की लगान व्यवस्था का ढाँचा मूल रूप में अकबर द्वारा किये गये प्रयोगों तथा सुधारों पर आधारित था। अकबर ने आरम्भ में शेरशाह द्वारा निर्धारित अनाज की दरें अपनायीं और इनको नकदी में बदल दिया। यह व्यवस्था असन्तोषजनक सिद्ध हुई। इसके निम्नलिखित कारण थे-

(1.) शेरशाह द्वारा स्थापित भूमि प्रबन्ध अस्त-व्यस्त हो चुका था। हुमायूँ ने दुबारा तख्त प्राप्त होते ही अपने विशाल क्षेत्रों को अपने अमीरों और अधिकारियों में बाँट दिया था परन्तु खालसा भूमि और जागीरी भूमि की स्पष्ट हदबन्दी न होने से अव्यवस्था फैली हुई थी।

(2.) लगान व्यवस्था दोषपूर्ण थी। केन्द्रीय सरकार प्रतिवर्ष उपज एवं परगनों में प्रचलित मूल्य के आधार पर लगान वसूल करती थी। उपज और मूल्यों में परिवर्तन के कारण सरकारी माँग की दर भी बदलती रहती थी। जब तक दर का निर्धारण नहीं हो जाता था तब तक लगान की वसूली भी नहीं हो पाती थी। किसान इस अनिश्चयपूर्ण स्थिति से परेशान थे।

(3.) उपर्युक्त प्रक्रिया के कारण लगान वसूली में काफी विलम्ब हो जाता था। इससे बकाया रकम भी चढ़ जाती थी जिसे वसूल करना कठिन कार्य था।

(4.) उपज और मूल्य का प्रतिवर्ष पता लगाने में सरकार का काफी धन अपव्यय हो जाता था।

(5.) जल्दबाजी में एकत्र की गई सूचनाएँ पूर्णतः विश्वसनीय नहीं होती थीं।

(6.) अमीरों और अधिकारियों को प्रसन्न करने रखने की दृष्टि से उन्हें दी जाने वाली जागीरों की आय को वास्तविक आय से काफी बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता था।

अकबर द्वारा किये गये सुधार

उपर्युक्त दोषों से खिन्न होकर अकबर ने राज्य की अर्थव्यवस्था और लगान व्यवस्था को सुधारने के लिये अनेक उपाय किये। 1560 ई. में अकबर ने ख्वाजा अब्दुल मजीद को आसफखाँ की उपाधि देकर भूमि व्यवस्था को संगठित करने के लिए नियुक्त किया परन्तु वह इस काम के लिए सर्वथा अयोग्य सिद्ध हुआ। उसने जागीरों से प्राप्त होने वाली आय के काल्पनिक आँकड़े लिख डाले। उसके इस कृत्य से सरकार, जागीरदारों और प्रजा की हानि हुई। इस पर उसने एतमाद खाँ को वित्तमंत्री नियुक्त किया जो बहलोल मलिक के नाम से भी जाना जाता है।

एतमादखाँ (बहलोल मलिक) के सुधार: 1563 ई. में एतमादखाँ (बहलोल मलिक) को वित्त मंत्री नियुक्त किया गया। एतमादखाँ ने लगान व्यस्था सुधारने के लिये कई उपाय किये-

(1.) शाही भूमि (खालसा) को जागीरी भूमि से अलग किया।

(2.) सिक्कों को मोहर लगी कीमत के अनुसार मंजूर करने का आदेश दिया।

(3.) वित्तीय विभाग तथा खजाने का पुनर्गठन किया।

(4.) खालसा भूमि को इस प्रकार से बाँटा कि प्रत्येक इकाई से एक करोड़ दाम (2.5 लाख रुपया) वसूल हो।

(5.) प्रत्येक इकाई पर करोड़ी नामक अधिकारी नियुक्त किया और उसकी सहायता के लिए बितक्ची तथा एक खजांची रखा गया। इन समस्त अधिकारियों का काम मालगुजारी वसूल करके सरकारी खजाने में जमा कराने का था।

एतमादखाँ द्वारा किये गये उपाय सफल रहे। अबुल फजल ने लिखा है कि इन सुधारों से गबन करना सम्भव नहीं रहा। बदायूँनी के अनुसार इन सुधारों से सरकारी खर्च में काफी कमी आ गई। फिर भी, अभी तक भूमि की उपज का वास्तविक अनुमान लगाने का कोई सार्थक प्रयास नहीं किया गया।

मुजफ्फरखाँ के सुधार: 1564 ई. में मुजफ्फरखाँ को दीवान नियुक्त किया गया और राजा टोडरमल को उसका सहायक नियुक्त किया गया। डॉ. त्रिपाठी ने लिखा है- ‘मुजफ्फरखाँ, आसफखाँ (भूतपूर्व वित्त मंत्री) के फर्जी आँकड़ों से बहुत परेशान हुआ। उसने रजिस्टरों तथा स्थानीय कानूनगो अधिकारियों से वास्तविक उपज के आँकड़े जमा करने के लिए 10 कानूनगो नियुक्त किये। इन आँकड़ों के आधार पर मालगुजारी का जमाय हाल हासिल नामक नया खाता बना। यह खाता भी बहुत विश्वसनीय नहीं था क्योंकि वह स्थानीय कानूनगो द्वारा लोगों की इधर-उधर से सुनी सूचनाओं पर आधारित था जो स्वयं ही विश्वसनीय नहीं थे। इसके अलावा एक मुख्य दोष यह था कि सम्पूर्ण राज्य में लगान भुगतान की दर तो एक समान थी परन्तु विभिन्न सूबों में अनाज के भाव एक समान नहीं थे। इससे उन सूबों के किसानों को काफी हानि उठानी पड़ती थी जहाँ अनाज के भाव सस्ते थे। इस दोष को दूर करने के लिए मुजफ्फरखाँ ने आदेश दिये कि फसल तैयार होने पर अनाज के स्थानीय भाव राज्य को भेजे जायें और राज्य की स्वीकृति मिलने के बाद उन्हीं दरों के हिसाब से लगान वसूल किया जाय। इससे थोड़ा-बहुत सुधार हुआ।

शहाबुद्दीन अहमदखाँ के सुधार: अकबर ने अपने शासन के तेरहवें वर्ष (1568-69 ई.) में शहाबुद्दीन अहमदखाँ को दीवान नियुक्त किया। नये दीवान ने अनुभव किया कि प्रतिवर्ष उपज और बाजार भाव के आंकड़े जमा करना खर्चीला और दोषपूर्ण होने के साथ साम्राज्य विस्तार होते रहने के कारण असम्भव भी होने लगा है। अतः उसने प्रतिवर्ष मालगुजारी की रकम नियत की जानी बन्द कर दी और नस्क प्रणाली चालू की जिससे सरकार और जमींदार या भूमि के स्वामी के मध्य पारस्परिक बन्दोबस्त की व्यवस्था हुई। यह एक प्रकार की ठेकेदारी थी तथा सन्तोषप्रद नहीं थी। 1570-71 ई. में मुजफ्फर खाँ को पुनः वित्त मंत्री नियुक्त किया गया और उसने तुरन्त मालगुजारी को ‘नापें और उर्वरा शक्ति’ के आधार पर नियत करने का निर्णय लिया।

टोडरमल का बन्दोबस्त: 1573 ई. में गुजरात विजय के पश्चात् अकबर ने टोडरमल को वहाँ की राजस्व व्यवस्था में सुधार करने भेजा। टोडरमल ने गुजरात में भूमि की पैमाइश करवाई तथा उसका वर्गीकरण करके लगान निश्चित किया। किसानों को यह विकल्प दिया गया कि वे अनाज के रूप में या नकद रुपयों में लगान अदा करें। कुल उपज का मूल्य बाजार भाव से लगाकर उस पर लगान वसूल किया जाता था। टोडरमल ने भ्रष्ट कर्मचारियों को कठोर दण्ड दिये। गुजरात के बन्दोबस्त के आधार पर ही फिर टोडरमल ने सम्पूर्ण साम्राज्य का बन्दोबस्त किया। उसने 1579-80 ई. में सम्पूर्ण साम्राज्य को 12 सूबों में विभाजित किया और प्रत्येक सूबे को अनेक सरकारों में बाँट दिया गया। टोडरमल ने जो व्यवस्था स्थापित की उसे टोडरमल का बन्दोबस्त कहा जाता है। इस बन्दोबस्त की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार थीं-

(1.) भूमि की पैमाइश: सर्वप्रथम 1570-71 ई. से 1579-80 ई. तक की औसत वार्षिक आय का ब्यौरा तैयार किया गया। तत्पश्चात् किसी भूमि के क्षेत्रफल पर उत्पादित फसल के आधार पर लगान का निश्चय किया गया। अतः समस्त भूमि की पैमाइश करवाई गयी। टोडरमल ने शेरशाह के समय से प्रचलित भूमि नापने के लिए रस्सी का प्रयोग त्याग दिया और उसके स्थान पर सात गज लम्बी जरीब (बांॅसांे में लोहे के छल्ले ढलवाकर) द्वारा भूमि की पैमाइश करवाई। इस नाप को पटवारियों के पास लिखवा दिया गया और उसकी एक प्रति माल विभाग में रख ली गयी। 60 गज लम्बी एवं 60 गज चौड़ी भूमि को एक बीघा जमीन माना गया।

(2.) भूमि का वर्गीकरण: भूमि की उर्वरक शक्ति के आधार पर भूमि को चार श्रेणियों में बाँटा गया- (1) पोलज: यह सबसे अधिक उपजाऊ होती थी तथा इसमें एक ही साल में दो फसलें बोयी जाती थीं। (2) पड़ौती: यह पोलज से कम उपजाऊ होती थी तथा इसकी उर्वरा शक्ति बनाये रखने के लिए इसे एक या दो वर्ष खाली छोड़ा जाता था। (3) चाचर: यह बहुत कम उपजाऊ होती थी तथा तीन-चार वर्ष तक खाली छोड़ने के पश्चात् एक बार बोयी जाती थी। (4) बंजर: यह अनउपजाऊ भूमि थी जिसे पाँच वर्ष या इससे भी अधिक समय तक बिना काश्त के छोड़ दिया जाता था।

(3.) कर निर्धारण: 1580 ई. में आइने-दहसाला या दस-साल बन्दोबस्त लागू हुआ जिसमें भूमि की नाप-जोख और वर्गीकरण के अतिरिक्त कर-निर्धारण एवं वसूली के लिए विस्तृत नियमों का उल्लेख किया गया था। कर-निर्धारण के लिए प्रत्येक वर्ग की भूमि (बंजर को छोड़कर) को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया। तीनों प्रकार की भूमि की औसत पैदावार निकाली जाती थी, जो प्रत्येक प्रकार की भूमि की स्टेण्डर्ड पैदावार समझी जाती थी। पिछले दस वर्षों की पैदावार के आधार पर प्रत्येक फसल की प्रति बीघा पैदावार का औसत निकाला जाता था और औसत पैदावार का एक-तिहाई भाग लगान के रूप में वसूल किया जाता था। कर निर्धारण के लिए फसलों की किस्म को भी ध्यान में रखा जाता था। अबुल फजल ने लिखा है- ‘प्रत्येक परगने की पिछले दस साल की उपज और प्रचलित कीमतों को इकट्ठा किया गया और उसके दसवें भाग को वार्षिक मालगुजारी के रूप में निश्चित कर दिया गया।’ अनुमान होता है कि मालगुजारी के रूप में उपज का दसवां भाग जमींदार द्वारा केन्द्र सरकार को देने के लिये निश्चित किया गया था क्योंकि किसानों को अपनी उपज का एक तिहाई से आधा हिस्सा तक जमींदार को मालगुजारी के रूप में देना पड़ता था।

(4.) कर वसूली: अकबर भूमि कर नकदी के रूप में वसूल करना पसन्द करता था। इसलिए उसने सूबोें में विभिन्न हलकों के लिए अनाज की नकद दर सूचियाँ तैयार करवायीं। इसके लिए प्रतिवर्ष फसल तैयार होने पर बाजार भाव का पता लगा लिया जाता था। बाजार भाव के आधार पर एक दर स्वीकृत करके इसकी सूचना राजस्व विभाग के कर्मचारियों को दे दी जाती थी। भविष्य में करों को घटाने-बढ़ाने के लिए सरकार प्रतिवर्ष उपज और फसल के मूल्य का ब्यौरा रखती थी। अकबर की इस व्यवस्था को रैयतवाड़ी प्रथा भी कहते हैं, क्योंकि जो किसान भूमि जोतता था, वही कर देता था। यह व्यवस्था अधिक सफल नहीं हुई। अकबर का कर-निर्धारण भी अत्यन्त सख्त था।

आइने अकबरी में लगान वसूली की तीन विधियाँ बताई गई हैं- (1) गल्लाबख्श अथवा बँटाई, नस्क अथवा कनकूत। (2) जब्ती और (3) नकदी। गल्लाबख्शी में जब फसल कट जाती थी तब अनाज को देखकर राजय सरकार और किसान का अलग-अलग भाग निश्चित कर बाँट लिया जाता था। नस्क के अन्तर्गत सारे ग्राम की फसल का अनुमान लगा कर उसके लिए एक साथ ही भूमि-कर निर्धारित कर दिया जाता था। गाँव का मुखिया अपनी इच्छानुसार कृषकों से भूमि-कर वसूल कर सकता था। जब्ती में भूमि का सर्वेक्षण, मालगुजारी निश्चित करने के लिए दस्तूरूल अमल का प्रवर्तन और जब्ती खसरे की तैयारी प्रमुख आधार था। अलग-अलग परगनों में अलग-अलग विधियाँ प्रचलित थीं, किन्तु अधिंकाशतः बँटाई प्रथा प्रचलित थी जिसके अनुसार खलिहान में अनाज का ढेर लगाने के बाद सरकार अपना हिस्सा तुलवाकर ले लेती थी। कभी-कभी भूमि-कर अधिक होने से किसान लगान नहीं दे पाता था और सख्ती के बाद भी सफलता नहीं मिलती थी। अतः प्रतिवर्ष सरकार को कर में छूट देनी पड़ती थी।

यद्यपि अकबर की राजस्व व्यवस्था पूर्णतः संतोषप्रद नहीं मानी जा सकती, फिर भी उसने भारतीयों को राजस्व की एक ऐसी प्रणाली प्रदान की जो न केवल स्थायी थी, अपितु लोगों की समझ में भी सरलता से आ जाती थी। अबुल फजल ने टोडरमल के इन सुधारों की प्रशंसा की है जबकि बदायूँनी ने इनकी आलोचना की है। वस्तुतः इसमें कुछ दोष थे। मालगुजारी की दर मध्यम श्रेणी के किसानों के लिए बोझिल थी क्योंकि भूमि के वर्गीकरण तथा उपज की तालिका के आधार पर औसत निकाल कर वसूली की जाती थी। ऐसी स्थिति में जिन किसानों के पास दूसरी और तीसरी श्रेणी की भूमि थी, उन्हें तुलनात्मक आधार पर प्रथम श्रेणी के किसानों से अधिक मालगुजारी देनी पड़ती थी। कुल मिलाकर उसकी व्यवस्था उत्तम थी।

अकबर की भू-राजस्व व्यवस्था के दोष: स्मिथ और मोरलैण्ड आदि विद्वानों ने अकबर की भू-राजस्व व्यवस्था की प्रशंसा की है। फिर भी मुगलों की भू-राजस्व व्यवस्था दोषमुक्त नहीं थी। इस व्यवस्था के नियम केवल खालसा भूमि पर ही सख्ती के साथ लागू किये जाते थे और खालसा भूमि का क्षेत्र काफी कम था। अधिकतर भूमि जमींदारी, जागीरदारी आदि के रूप में थी और वहाँ इन नियमों का अमल नहीं होता था। दूसरा प्रमुख दोष भूमि के वर्गीकरण के आधार पर उपज की तालिका में औसत निकालकर मालगुजारी वसूल करना था। इससे मध्यम एवं निम्न श्रेणी की भूमि वाले किसानों को अधिक लगान देना पड़ता था। राजकीय अधिकारी किसानों से लगान के साथ अनेक गैर-स्वीकृत कर भी वसूल करते थे। उन्हें रोकने के लिये विशेष प्रयत्न नहीं किया गया था।

जहाँगीर के समय में लगान व्यवस्था

जहाँगीर के समय में अकबर की लगान व्यवस्था बिना किसी विशेष परिवर्तन के जारी रही परन्तु उसका प्रबन्धन शिथिल पड़ गया। जागीरदारों के अधिकारों में वृद्धि हो गयी और किसानों की स्थिति खराब होने लगी जिससे राज्य की आय में कमी आने लग गई।

शाहजहाँ के समय में लगान व्यवस्था

शाहजहाँ के शासनकाल में भू-राजस्व व्यवस्था में और गिरावट आई। उसके शासनकाल में राज्य की 70 प्रतिशत भूमि जागीरदारों को दे दी गयी जिससे राज्य का जागीरी किसानों से सम्पर्क टूट गया। लगान की दर में वृद्धि कर दी गई। अब 33 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक लगान लिया जाने लगा। शाहजहाँ के समय में लगान वसूली का काम ठेके पर देने की प्रथा आरम्भ हुई। ठेकेदारी प्रथा से किसानों को काफी क्षति पहुँची क्योंकि ठेकेदार नियम से अधिक लगान वसूल करते थे।

औरंगजेब के समय में लगान व्यवस्था

औरंगजेब के समय उपर्युक्त समस्त दोष तो कायम रहे ही, साथ ही लगान वसूली में कठोरता बरती जाने लगी और किसानों से उनकी सम्पूर्ण भूमि से लगान लिया जाने लगा, चाहे सम्पूर्ण भूमि पर खेती की गयी हो अथवा नहीं। इससे किसानों की स्थिति शोचनीय हो गई।

औरंगजेब के बाद भू-राजस्व व्यवस्था

औरंगजेब के बाद मुगल शासन की भू-राजस्व व्यवस्था बुरी तरह से लड़खड़ा गई। अब भूमि को ठेकेदारों को देने के अलावा अन्य कोई उपाय नहीं किया गया। इससे राज्य की आर्थिक व्यवस्था बुरी तरह बिगड़ गई।

मुगलों की भू-राजस्व व्यवस्था का मूल्यांकन

मुगलों की भू-राजस्व व्यवस्था को ठोस आधार प्रदान करने का श्रेय अकबर को है। उसके द्वारा स्थापित व्यवस्था थोड़े-बहुत परिवर्तनों के साथ उसके उत्तराधिकारियों के काल में भी बनी रही। अकबर के शासनकाल में एक तरफ तो कृषि भूमि के क्षेत्र को बढ़ाने का प्रयास किया गया और दूसरी तरफ किसानों को अच्छी फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इस सम्बन्ध में उन्हें उचित सुविधाएँ भी दी गईं। भूमि की पैमाइश के माप गज, बिस्वा और बीघा में निश्चित किये गये। भूमि की पैमाइश के लिए बाँस के टुकड़ों को लोहे के कड़ों से जोड़कर जरीब बनाई गई। भूमि का वर्गीकरण किया गया। मालगुजारी वसूल करने वाले अधिकारियों को निर्धारित मात्रा से अधिक कर वसूल नहीं करने के आदेश दिये गये। पट्टा तथा कबूलियत के द्वारा किसान के अधिकारों को सुरक्षित किया गया और देय मालगुजारी को निश्चित किया गया। किसान को जब्ती, बँटाई अथवा नस्क में से किसी एक प्रथा को चुनने का विकल्प दिया गया। अकबर को मालगुजारी नकद में लेना पसन्द था, फिर भी किसानों को उपज के रूप में मालगुजारी चुकाने की छूट थी। प्राकृतिक प्रकोपों के समय किसान को भू-राजस्व में छूट दी जाती थी और तकाबी ऋण भी दिया जाता था।

किसानों की स्थिति

मुगलकाल में किसानों के भूमि सम्बन्धी अधिकार क्या थे और उनकी आर्थिक स्थिति कैसी थी? इन सवालों पर इतिहासकारों में काफी मतभेद हैं। बर्नियर समस्त भूमि का मालिक बादशाह को बताता है। प्रो. इरफान हबीब के अनुसार भूमि का स्वामी न तो बादशाह ही था और न किसान। कुछ परिस्थितियों में उसका अधिकार मिलकियत का था, पर सामान्य रूप से किसान न तो अपनी भूमि से अलग हो सकता था और न उसे बेच सकता था। किसान यदि भूमि छोड़कर चला जाता तो सरकारी कर्मचारी उसे समझा-बुझाकर वापस ले आते थे। डॉ. सिद्दीकी का यह भी मानना है कि उस युग में किसान इच्छाहीन किरायेदार नहीं था क्योंकि वह कुछ समझौते और प्रतिबन्धों के अनुसार खेती करता था। किसान जो भूमि-कर चुकाता था उसका विवरण सरकारी लेखों में स्पष्ट था। यद्यपि किसानों को जमीन बेचने अथवा बन्धक रखने का अधिकार नहीं था, किसानों का एक वर्ग मोरूसी कहलाता था जो भूमि को बेचने एवं बंधक रखने के अधिकारों का दावा करता था। अधिकांश विद्वानों का मत है कि सामान्यतः किसानों को अपनी भूमि से बेदखल नहीं किया जाता था और उनके वंशजों को उनके खेतों पर उत्तराधिकार का हक होता था। किसानों का एक वर्ग ऐसा भी था जो जमींदारों की अनुमति से उनकी भूमि पर खेती करता था। ऐसे किसानों को बेदखल भी किया जा सकता था। जिन किसानों को पट्टा और कबूलियत का लाभ मिला हुआ था, उनको कम शोषण और यंत्रण का सामना करना पड़ता था।

जहाँ तक किसानों की आर्थिक स्थिति का प्रश्न है उन्हें अपनी पैदावार का एक-तिहाई से लेकर आधा हिस्सा तक भू-राजस्व के रूप में देना पड़ता था। भूमि-कर के अलावा उन्हें चुँगियों और अनुलाभों के रूप में भी कुछ चुकाना पड़ता था। उन्हें जमींदारों और जागीरदारों द्वारा सरकार को चुकाये जाने वाले करों का कुछ बोझ भी सहन करना पड़ता था। फिर भी, डॉ. सिद्दीकी का मत है कि मुगलकाल में किसान खुशहाल थे क्यांेकि आवश्यकता की अन्य वस्तुएँ सस्ती थीं और सरलता से उपलब्ध होती जाती थीं। अन्य इतिहासकार उनके मत से सहमत नहीं हैं क्योंकि अधिक लगान एवं अधिकारियों की लूटखसोट के कारण किसानों की दशा अत्यंत शोचनीय थी। औरंगजेब के शासनकाल में तो वे जैसे-तैसे अपना जीवन निर्वाह कर रहे थे। पैलसर्ट ने लिखा है कि किसानों की स्थिति बहुत खराब थी। उनके भाग्य में केवल दुःखों और विपत्तियों का स्थान था।

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