Monday, September 20, 2021

अध्याय – 33 (अ) : मुगल कला, स्थापत्य एवं साहित्य

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1221 ई. से लेकर 1526 ई. तक मंगोल आक्रमणकारियों की कई लहरें भारत में आईं। इस दौरान वे विदेशी आक्रांता बने रहे। वे विध्वंस के लिये कुख्यात थे। प्रारंभ के मंगोल आक्रांता इस्लाम के शत्रु थे। इस कारण प्रारम्भ में वे भारत के मुस्लिम शासकों को नष्ट करने के लिये उद्देश्य से प्रेरित होकर आक्रमण करते थे। बाद के काल में मंगोलों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। अब वे भी भारत से कुफ्र को नष्ट करने के लिये आक्रमण करने लगे। मंगोलों ने भारत आक्रमणों के दौरान भारत की कला, स्थापत्य, साहित्य एवं संस्कृति को भयानक क्षति पहुँचाई। 1526 ई. में जब बाबर ने दिल्ली एवं आगरा पर शासन स्थापित किया तो मंगोल विदेशी नहीं रह गये। अब उन्हें यहाँ से कहीं नहीं जाना था इसलिये उनके द्वारा किया जाने वाला विध्वंस बड़ी सीमा तक रुक गया किंतु विध्वंसकारी प्रवृत्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। बाबर के सेनापति मीर बांकी अथवा अबुलबकी ने अयोध्या में भगवान राम की जन्मभूमि पर स्थित अत्यंत प्राचीन राम मंदिर को नष्ट करके उस पर मस्जिद खड़ी की। विंध्वस का यह सिलसिला औरंगजेब तथा उसके बाद भी चलता रहा।

मुगलकालीन स्थापत्य कला

प्राचीन भारतीय स्थापत्य और मुस्लिम स्थापत्य के सम्मिश्रण से भवन निर्माण की जो शैली, सल्तनत काल में आरम्भ हुई, वह मुगलों के शासन काल में भी निरन्तर विकसित होती रही। इसलिये मुगलकालीन इमारतों पर हिन्दू और मुस्लिम वास्तुकलाओं के सम्मिश्रण का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। औरंगजेब को छोड़कर समस्त मुगल शासक स्थापत्य कला के प्रेमी थे। अकबर के समय में ईरानी तथा भारतीय कला के सम्मिश्रण से एक नई शैली विकसित हुई जिसे मुगल स्थापत्य शैली कहते हैं।

मुगल स्थापत्य कला पर भारतीय एवं ईरानी प्रभाव

बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि मुगल स्थापत्य शैली में भारतीय स्थापत्य की प्रधानता है। हेवेल ने लिखा है- ‘मुगल शैली विदेशी तथा देशी शैलियों का सम्मिश्रण प्रदर्शित करती है। भारतीय शैली अनुपम थी और उसमें विदेशी तत्त्वों को मिलाने की अलौकिक शक्ति थी।’

सर जान मार्शल ने लिखा है- ‘मुगल शैली के विषय में यह निश्चय करना कठिन है कि उस पर किन तत्त्वों का प्रभाव अधिक था।’ फर्ग्यूसन तथा कुछ अन्य विद्वानों का विश्वास है कि मुगल कला, पूर्व-मुगलकाल की कला का परिवर्तित और विकसित रूप थी।’ अर्थात् भारतीय कला को विदेशी कला से प्रेरणा प्राप्त हुई थी और विदेशी कला ने भारतीय कला को प्रभावित किया था।

निष्कर्ष

विदेशी विद्वान भले ही कुछ भी कहें किंतु वास्तविकता यह है कि मुगलकाल में अकबर के राज्यारोहण तक भारतीय कला पर ईरानी प्रभाव अधिक रहा किन्तु अकबर के काल में भारतीय कला परम्परा को ईरानी आदर्श के हित में अपना लिया गया। अकबर के शासन के अन्तिम वर्र्षोें में विदेशी तथा भारतीय तत्त्व ऐसे घुल-मिल गये कि भारतीय अथवा ईरानी कला के पृथक् अस्तित्त्व का पता लगाना कठिन हो गया।

बाबर कालीन स्थापत्य कला

बाबर स्थापत्य कला का पारखी था। उसे तुर्की और अफगानी सुल्तानों द्वारा बनवाई गई दिल्ली और आगरा की इमारतें पसन्द नहीं आईं। वह ग्वालियर में राजा मानसिंह और विक्रमजीत के महलों की स्थापत्य शैली से अत्यधिक प्रभावित हुआ। बाबर का मानना था कि भले ही ये महल भिन्न-भिन्न टुकड़ों में तथा बिना किसी नियमित योजना के बने थे फिर भी वे बेजोड़ थे। ग्वालियर के महल हिन्दू कला के सुन्दर उदाहरण थे। जब बाबर ने अपने लिये महल बनवाये तब उसने ग्वालियर के महलों का अनुकरण किया। बाबर के महल बहुत कमजोर बने थे जो अधिक समय तक टिके नहीं रह सके। बाबर को मस्जिद तथा उपवन निर्माण में बड़ी रुचि थी। उसने अयोध्या में रामजन्म भूमि पर बाबरी मस्जिद, आगरा के लोदी किले में जामा मस्जिद तथा पानीपत में काबुली बाग मस्जिद बनवाई। बाबर ने कश्मीर में निशात बाग, लाहौर में शालीमार बाग तथा पंजाब में पिंजोर बाग बनवाया। वह राजपूताने की सीमा पर ऐसे भवन बनवाना चाहता था जो गर्मियों में भी ठण्डे रहें। उसके आदेश से आगरा, सीकरी, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर तथा अन्य नगरों में अनेक भवनों का निर्माण किया गया। बाबर के समय बनी इमारतों में से अब केवल दो शेष बची हैं- (1.) पानीपत के काबुली बाग की मस्जिद तथा (2.) संभल की जामा मस्जिद। 1526-27 ई. में निर्मित ये दोनों मस्जिदें काफी विशाल थीं किंतु इनमें कोई शिल्प-सौन्दर्य नहीं है। अयोध्या में रामजन्म भूमि पर निर्मित बाबरी मस्जिद को 1992 ई. में जन-आंदोलन के दौरान तोड़ दिया गया।

हुमायूँ कालीन स्थापत्य कला

हुमायूँ कला-प्रेमी शासक था। उसने दिल्ली में दीनपनाह नामक महल बनवाया। यह महल अत्यन्त शीघ्रता में बना था जिसमें सुन्दरता तथा मजबूती का ध्यान नहीं रखा गया। संभवतः शेरशाह सूरी ने इस महल को नष्ट कर किया। हुमायूँ ने आगरा तथा फतेहाबाद (हिसार) में फारसी शैली पर एक-एक मस्जिद बनवाई। इनमें कला तथा मौलिकता के कोई लक्षण नहीं थे। अब इनके खण्डहर ही शेष रह गये हैं। हुमायूँ के समय की कोई कलात्मक इमारत शेष नहीं बची है।

अकबरकालीन स्थापत्य कला

बाबर तथा हुमायूँ ने भविष्य के मुगल शासकों के लिये इमारतें बनवाने की परम्परा स्थापित की जिससे दिल्ली में अच्छी इमारतें बनने लगीं। अकबर का शासन काल जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के सम्मिश्रण और समन्वय का काल था। इस कारण उसके समय में स्थापत्य एवं भवन निर्माण में भी सम्मिश्रण की नई शुरुआत हुई। अकबर द्वारा निर्मित भवनों में ईरानी तथा भारतीय तत्त्व दृष्टिगोचर होते हैं पर इनमें प्रधानता भारतीय तत्त्वों की ही है। कुछ विद्वानों की धारणा है कि मुगल कला का आरम्भ अकबर से ही मानना चाहिये। अबुल फजल का कथन है- ‘बादशाह सुन्दर इमारतों की योजना बनाता है और अपने मस्तिष्क एवं हृदय के विचार को पत्थर और गारे का रूप देता है।’ अकबर ने तत्कालीन शैलियों की बारीकी को समझा और अपने शिल्पकारों को इमारतें बनाने के लिए नये-नये विचार दिये। अकबर के काल में स्थापत्य कला की जो नई शैली विकसित हुई, वह वास्तव में हिन्दू-मुस्लिम शैलियों का समन्वय थी।

हुमायूँ का मकबरा

 अकबर के शासनकाल की सबसे पहली इमारत दिल्ली में स्थित हुमायूँ का मकबरा है जिसे अकबर की सौतेली माँ हाजी बेगम ने बनवाया था। हाजी बेगम ईरानी आदर्शों से प्रभावित थी। इस मकबरे के निर्माण में अनेक भारतीय शिल्पकारों ने भी काम किया इसके कारण यह मकबरा ईरानी आदर्शों की भारतीय अभिव्यक्ति बन गया। इस इमारत का नीचे का भाग हिन्दू-मुस्लिम वास्तुकला शैली का तथा ऊपरी भाग ईरानी शैली का है। इस इमारत की कुर्सी ऊँची है जिसमें समरूपता का ध्यान रखा गया है। इसका मेहराबयुक्त विशाल मण्डप ईरानी शैली का तथा सुन्दर छतरियों वाले कलात्मक मण्डप भारतीय शैली के हैं। इसका गुम्बद सफेद संगमरमर का है जबकि शेष इमारत में सफेद और काले संगमरमर के साथ-साथ लाल बलुआ पत्थर का भी प्रयोग हुआ है।

आगरा का लाल किला

अकबर कालीन स्थापत्य शैली का सबसे सुन्दर एवं पहला नमूना आगरा का लाल किला है। इस किले की साधारण रूपरेखा मानसिंह द्वारा बनवाये गये ग्वालियर के किले से मिलती-जुलती है। आगरा का किला लगभग डेढ़ मील के घेरे में स्थित है। यह पूर्णतः लाल रंग के गढ़े हुए पत्थरों से निर्मित है। इसकी दीवारें लगभग 70 फुट ऊँची हैं। किले के दो मुख्य द्वार हैं जिनमें से एक पश्चिम की ओर स्थित है। इसका नाम दिल्ली द्वार या हाथी द्वार है क्योंकि यह दिल्ली जाने वाले मार्ग की तरफ खुलता था तथा इसके मेहराब पर हाथियों की दो आकृतियां थीं। दूसरा द्वार इससे छोटा है जो अमरसिंह द्वार कहलाता है। आजकल दर्शक किला देखने के लिये इसी द्वार से प्रवेश करते हैं। प्रवेश द्वार के ऊपरी भाग की सजावट बहुत अच्छी है। मेहराबों और पैनलों पर सफेद संगमरमर जड़कर सुन्दर डिजायनें बनाई गई हैं। दरवाजे की बनावट में कोई कलात्मकता नहीं है। किले की चारदीवारी के भीतर अकबर ने 500 से भी अधिक इमारतें बनवाई थीं। ये समस्त इमारतें लाल पत्थर से बनवाई गई थीं। अकबर की बनवाई हुई इन इमारतों में से कई इमारतों को शाहजहाँ ने गिरवाकर उनके स्थान पर सफेद संगमरमर के मण्डप बनवाये।

अकबरी महल और जहाँगीरी महल: आगरा के लाल किले में अकबर द्वारा निर्मित सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण इमारतें- अकबरी महल और जहाँगीरी महल हैं। ये दोनों महल बलुआ पत्थर से निर्मित हैं। अकबरी महल में बंगाली बुर्ज बने हुए हैं। जहाँगीरी महल शाहजादा सलीम के रहने के लिये बनवाया गया था। जहाँगीरी महल में कई स्तम्भ हैं। इनमें कड़ियों और जालियों द्वारा सजावट की गई है। यह पूर्णतः हिन्दू कला से प्रभावित है। दोनों महलों के बीच में चौकोर आँगन है तथा चारों ओर दुमंजिले कमरे बने हुए हैं।

लाहौर का किला

अकबर द्वारा निर्मित लाहौर का किला आगरा के किले के समान है। लाहौर के किले की इमारतें आगरा के किले के जहाँगीरी महल के समान हैं। अन्तर यह है कि लाहौर के किले की सजावट आगरा के किले की अपेक्षा अधिक घनी है। तोड़ों में हाथी और सिंहों की मूर्तियाँ और छत के नीचे कारनिस में मोरों के चित्रों को देखकर अनुमान लगाया जाता है कि इसके अधिकतर शिल्पकार हिन्दू थे और मुगल अधिकारियों का दृष्टिकोण सहिष्णुतापूर्ण था।

इलाहाबाद का किला

अकबर द्वारा निर्मित इलाहाबाद का किला खण्डहर प्रायः हो गया है। उसकी अनेक इमारतें नष्ट हो गई हैं। केवल जनाना भवन ही शेष बचा है।

फतेहपुर सीकरी की इमारतें

अकबर कालीन स्थापत्य की सफलतम इमारतें फतेहपुर सीकरी में देखी जा सकती हैं। फतेहपुर सीकरी, आगरा से 23 मील दक्षिण-पश्चिम में एक ढालू पहाड़ी पर स्थित है। इस नगर के तीन ओर दीवारें और एक ओर कृत्रिम झील थी। यह नगर 1569 ई. से 1580 ई. के बीच 11 वर्र्षोें में बनकर तैयार हुआ। अबुल फजल ने लिखा है- ‘चँूकि अकबर के श्रेष्ठ पुत्रों- सलीम और मुराद ने सीकरी में जन्म लिया था और शेख सलीम (एक मुस्लिम संत जिसके आशीर्वाद से सलीम का जन्म हुआ था) की दिव्य ज्ञान युक्त आत्मा उनमें प्रवेश कर गई थी, इसलिये अकबर के पवित्र हृदय में इस आध्यात्मिक वैभव से परिपूर्ण स्थान को भौतिक वैभव प्रदान करने की इच्छा थी……(इसीलिये) आदेश हुआ कि प्रमुख कारीगर बादशाह के निजी उपयोग के लिये अट्टालिकाओं का निर्माण करें।’ फतेहपुर सीकरी की इमारतों में जोधाबाई का महल, बीबी मरियम का महल, तुर्की सुल्ताना का महल, बीरबल का महल, पंचमहल, दीवाने खास, दीवाने आम, जामा मस्जिद, शेख सलीम चिश्ती की मजार, ख्वाबगाह, बुलंद दरवाजा आदि मुख्य हैं।

जोधाबाई का महल: जोधाबाई का महल फतहपुर सीकरी के महलों में सबसे पुराना है। इस महल की बनावट न तो मुस्लिम स्थापत्य शैली की है और न हिन्दू स्थापत्य के अनुसार। वास्तव में यह इमारत अपने समय की मिली-जुली शैलियों की है। इसकी बनावट आगरा के जहाँगीरी महल के समान है। इसकी छत बहुत सुन्दर एवं सजीव है और इसमें तराशे हुए पत्थरों का उपयोग हुआ है।

बीबी मरियम की कोठी: इसका असली नाम सुनहरी मकान है। इसकी भीतरी तथा बाहरी दीवारों पर सुनहरे पत्थर जड़े थे। इसमें संगतराशी का अच्छा काम किया गया था। महल के भीतरी भाग में मुगल शैली के कुछ सुन्दर चित्र बनाये गये थे जो अब नष्ट हो गये हैं। स्मिथ ने इन चित्रों को ईसाई धर्म की पवित्र पुस्तक बाइबिल पर आधारित बताया है परन्तु इसमें पंखवाली शवीहें दिखाई गई हैं, जो ईरानी देवमाला पर आधारित हैं। इनकी शक्ल फरिश्तों के समान हैं।

तुर्की सुल्ताना का महल: तुर्की सुल्ताना का महल फतेहपुर सीकरी की इमारतों में सबसे अच्छा माना जाता है। इसकी निर्माण शैली तथा पत्थरों की बनावट सुन्दर एवं सजीव है। इसके बारे में रशब्रुक विलियम ने लिखा है- ‘यहाँ अकबर के शासनकाल की चित्रकारी बहुत ही सुन्दर है। इसके अतिरिक्त यह महल संगतराशी का अच्छा उदारहण है। इसकी दीवारों पर जंगल, पेड़-पौधे, झाड़ियों आदि के दृश्य बहुत ही सुन्दर ढंग से बने हैं। झाड़ियों में शेर और पेड़ों पर मोर बैठे दिखाई देते हैं।’

राजा बीरबल का महल: राजा बीरबल का महल भी स्थापत्य कला की विशेषताओं के कारण सुन्दर लगता है। यह महल काफी ऊँची कुर्सी पर बना हुआ है। सीकरी की समस्त इमारतों में यही इमारत ऐसी है जिसका गुम्बद सुन्दर दिखाई देता हैं। मुस्लिम स्थापत्य कला में इसका विशेष स्थान हैं।

पंचमहल: पंचमहल भी फतहपुर सीकरी की सबसे सुन्दर इमारतों में से है। इसकी नीचे की मंजिलें बड़ी और फिर उससे ऊपर की मंजिलें छोटी हैं। सबसे ऊपर चौखूंटे खम्भों पर टिकी हुई एक सुन्दर छतरी है। नीचे की मंजिल में 56 सतून हैं और उन पर नक्काशी का काम किया गया है परन्तु हर खम्भे की नक्काशी अलग है। कहीं पर जैन स्थापत्य कला शैली की विशेषतायें हैं, कहीं पर हिन्दू स्थापत्य कला शैली की विशेषतायें तो कहीं पर मुस्लिम स्थापत्य कला की विशेषतायें हैं। ये सुन्दरता के साथ-साथ समन्वय का अच्छा वातावरण भी प्रस्तुत करती हैं। नीचे की मंजिलों पर हिन्दू स्थापत्य कला शैली की छाप अधिक है। सजावट तथा सुन्दरता के लिये घण्टियों तथा जंजीरों की बेलों का ढंग से प्रयोग हुआ है।

दीवाने खास: फतेहपुर सीकरी में अकबर का दीवाने खास अनेक विशेषताओं से युक्त है। यहाँ न अच्छी संगतराशी है और न सुन्दर सजावट परन्तु सादा होने पर भी यह इमारत बहुत ही प्रभावशाली है। इस इमारत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बनावट है जो कलाकारी का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके मध्य का सतून अत्यन्त सुन्दर ढंग से बना है जिसकी नक्काशी देखने योग्य है। इसी सतून के ऊपर शाही तख्त रखा रहता था जिसको रोकने के लिए बहुत सी नक्शदार छतगीरियाँ हैं। सिंहासन तक पहुँचने के लिये चारों कोनों से छज्जों के रूप में चार मार्ग बनाये गये हैं। इसका निर्माण हिन्दू स्थापत्य के अनुसार हुआ है।

जामा मस्जिद: कुछ विद्वानों के अनुसार फतेहपुर सीकरी की जामा मस्जिद केवल दीन-ए-इलाही के अनुयायियों के लिये थी। मस्जिद के मध्य भाग में शेख सलीम चिश्ती की मजार बनी हुई है। इसको अकबर ने लाल पत्थर से बनवाया था। इसमें बहुत ही सुन्दर जालियों का प्रयोग हुआ है। इसे मुगल स्थापत्य कला का एक सुन्दर नमूना कहा जाता है। जहाँगीर ने इसे संगमरमर का बनवा दिया। इसमें सीप का बहुत अच्छा काम हुआ है।

ख्वाबगाह: ख्वाबगाह के नाम से प्रसिद्ध इमारत दो मंजिली है। ऊपर की मंजिल में एक छोटा कमरा है जो अकबर का शयनागार था। इसकी दीवारों पर अनेक चित्र अंकित थे। इन चित्रों में महात्मा बुद्ध, मेरी तथा शिशु रूप में ईसा मसीह के चित्र थे तो आखेट तथा नदी-नालों के दृश्य भी बने हुए थे जो अब धूमिल हो गये हैं। अबुल फजल और फैजी के भवन भी सुन्दर रहे होंगे परन्तु अब वे अच्छी दशा में नहीं हैं।

बुलन्द दरवाजा: फतहपुर सीकरी की जामा मस्जिद में जनसाधारण के प्रवेश के लिये बना दक्षिण दिशा का द्वार बुलन्द दरवाजा कहलाता है। यह भारत में बना सबसे ऊँचा दरवाजा है। यह भी माना जाता है कि विश्व में इतना बड़ा दरवाजा और कहीं नहीं है। कहा जाता है कि यह दरवाजा अकबर की दक्षिण विजय के उपलक्ष्य में बनाया गया था परन्तु ऐतिहासिक तथ्य इसकी पुष्टि नहीं करते। स्थापत्य कला के विद्वानों की दृष्टि में यह दरवाजा हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य कला शैलियों का सुन्दर सम्मिश्रण है। यह दरवाजा लाल पत्थर से बनाया गया जिस पर कोई रंग नहीं चढ़ाया गया। इस पर नक्काशी का बहुत सुन्दर काम हुआ है तथा संगमरमर की सुन्दर एवं सजीव पच्चीकारी की गई है। पर्सा ब्राउन के शब्दों में- ‘बुलन्द दरवाजा एक प्रभावशाली निर्माण कार्य है, विशेषकर तब जबकि यह जमीन पर खड़ा होकर देखा जाये। तब यह उत्तेजक एवं विस्मयकारक शक्ति का रूप दिखाई देता है किन्तु इसका प्रभाव भार-स्वरूप तथा दिखावटी नहीं प्रतीत होता।’

अकबर द्वारा निर्मित अन्य भवन

अकबर ने अटक का किला, मेड़ता और अजमेर की मस्जिदें तथा अन्य स्थानों के किले इत्यादि अनेक सुन्दर इमारतें बनवाई थीं। सिकन्दरा में स्थित अकबर का मकबरा का नक्शा अकबर ने बनाया था। इसे जहाँगीर ने पूरा करवाया।

राष्ट्रीय स्थापत्य कला शैली

फतेहपुर सीकरी की अकबर कालीन समस्त इमारतें हिंदू-मुस्लिम मिश्रित स्थापत्य शैली की हैं। इनमें हिन्दू कला की प्रधानता है। इनमें से कुछ की सजावट, जैसे- दीवाने खास में लगे हुए खम्भों की शोभा बढ़ाने वाले तोड़े, पंचमहल और जोधाबाई के महल में लगे हुए उभरे घण्टे तथ जंजीर और मरियम के महल में पत्थर खोदकर बनाये गये पशुओं के चित्र इत्यादि हिन्दू और जैन मन्दिरों की ही नकल हैं। संगमरमर और बलुआ लाल पत्थर के बने हुए बुलन्द दरवाजे में शिल्प कला का उत्कृष्ट नमूना दिखाई पड़ता है। डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘फतेहपुर सीकरी की स्थापत्य कला की शैली भारतीय प्राचीन संस्कृति के विभिन्न तत्त्वों को समन्वित करने और मिलाने की अकबर की नीति को ही जैसे पाषाण रूप में प्रस्तुत करती हैं।’ डा. श्रीवास्तव ने अकबर की इस समन्वित स्थापत्य शैली को राष्ट्रीय स्थापत्य कला शैली कहा है। अकबर ने स्थापत्य की जो नई शैली विकसित की, उसका प्रभाव सारे देश पर और राजस्थान के राजपूत राजाओं पर पड़ा। अकबर के शासनकाल में अजमेर, बीकानेर, जोधपुर, आम्बेर, ओरछा और दतिया में जो महल बने, उन पर मुगल कला का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। यहाँ तक कि हिन्दुओं के मन्दिर भी इस शैली के प्रभाव से नहीं बच सके। हिन्दू राजाओं के महलों के बारे में पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘राजपूत भवनों को देखकर कोई भी कल्पना कर सकता है कि उनमें प्रारम्भिक मुगली कला, जैसे-कटोरेदार मेहराबें, काँच की पच्चीकारी, दरीखाना, पलस्तर की रँगाई किस प्रकार हिन्दू राजाओं की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये अपना लिये गये थे।’

जहाँगीर कालीन इमारतें

जहाँगीर की रुचि शिल्प कला की अपेक्षा छोटी चित्रकारी और बागवानी में अधिक थी। अतः उसके समय में बहुत कम इमारतें बनीं और जो इमारतें बनीं, उनमें शिल्प कला का उत्कृष्ट रूप नहीं था।

एतमादुद्दौला का मकबरा: जहाँगीर के काल में नूरजहाँ द्वारा आगरा में बनवाया गया एतमादुद्दौला का मकबरा उस काल की इमारतों में सबसे अच्छा है। यह सफेद संगमरमर से निर्मित है और इसमें संगमरमर के टुकड़ों के बराबर बहुमूल्य पत्थर लगे हुए हैं। यह मुगलकाल की प्रथम इमारत है जो श्वेत संगमरमर से निर्मित है और जिसमें पच्चीकारी का काम है। यह मकबरा उत्कृष्ट स्नेह का प्रतीक है और मुगल कला का बेजोड़ नमूना है। पर्सी ब्राउन के अनुसार यह मकबरा अकबर और शाहजहाँ की शैलियों को जोड़ने वाली कड़ी के रूप में माना जा सकता है।

अकबर का मकबरा: जहाँगीर के काल की दूसरी उल्लेखनीय इमारत सिकन्दरा में स्थित अकबर का मकबरा है। इसका नक्शा अकबर ने तैयार किया था किन्तु इसका निर्माण जहाँगीर की देखरेख में हुआ था। इस इमारत से अकबर और उसके पुत्र जहाँगीर की अभिरुचि का अन्तर स्पष्ट हो जाता है। अकबर की ठोस और विशाल इमारतों की तुलना में यह इमारत आडम्बरपूर्ण तथा नाजुक शैली में बनी है। मुसलमानों के समस्त मकबरों में गुम्बद बनाने की प्रथा प्राचीन समय से प्रचलित थी किन्तु इस मकबरे पर कोई गुम्बद नहीं है। इसकी बनावट बौद्ध विहार जैसी है। इसलिये आलोचकों की मान्यता है कि यह कट्टर मुसलमानी ढंग का मकबरा नहीं है। इसके मुख्य प्रवेश-द्वार पर सुन्दर जड़ाऊ काम किया हुआ है तथा इसके चारों कोनों पर बनी हुई सफेद संगमरमर की सुन्दर मीनारें इसकी सुन्दरता में वृद्धि करती हैं।

जहाँगीर का मकबरा

जहाँगीर का मकबरा लाहौर के पास शाहदरा में स्थित है। इसका नक्शा जहाँगीर ने बनाया था तथा इस मकबरे का निर्माण उसकी बेगम नूरजहाँ ने करवाया था। इसके ऊपर संगमरमर का एक मण्डप था जिसे बाद में सिक्खों ने उतार लिया था। मकबरे का भीतरी भाग संगमरमर की पच्चीकारी से सुशोभित है। चिकने और रंगीन खपरैल इसकी सुन्दरता को अधिक बढ़ा देते हैं। पर्सी ब्राउन का कथन है कि सारी इमारत प्रभावशाली प्रतीत नहीं होती है।

जहाँगीर की अन्य इमारतें

उपर्युक्त इमारतों के अतिरिक्त लाहौर में बना अनारकली का मकबरा तथा ख्वाबगाह और मोती मस्जिद जहाँगीर की ही बनवाई हुई हैं।

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