Thursday, May 30, 2024
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मुगलिया राजनीति में बड़ी चालाकी से सुलहकुल का प्रवेश हुआ!

सोलहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में मात्र साढ़े तेरह वर्ष की आयु में मुगलिया तख्त पर बैठने वाला जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर भले ही अपने पिता हुमायूं के लम्बे राजनीतिक निर्वासनों के कारण विधिवत् पढ़-लिख नहीं सका किंतु वह मुगलिया राजनीति में क्रांतिकारी परिवर्तन करने वाला सिद्ध हुआ।

अकबर का बचपन अपने चाचा कामरान, अस्करी और हिंदाल की मक्कारियों के बीच बीता था। उसने अपने चाचाओं, बुआओं, रिश्तेदारों और अपने ही कुल के शहजादों को बादशाह हुमायूं के खिलाफ भयानक षड़यंत्र रचते हुए देखा था।

अपने चाचाओं के बेरहम आचरणों को देखकर अकबर बहुत कम उम्र में ही यह समझने में सफल रहा था कि बादशाहत एवं सल्तनत के टिके रहने के लिए अपने ही कुल के शहजादों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता।

अकबर ने अपनी आंखों से देखा कि किस तरह उसका पिता हुमायूं जीवन भर अपने भाइयों के साथ उदारतापूर्ण व्यवहार करता रहा किंतु अंत में उसे अपने भाइयों कामरान, अस्करी और हिंदाल की आंखें फुड़वाकर उन्हें मक्का भिजवाना ही पड़ा।

अकबर जब मात्र साढ़े तेरह साल की उम्र में अपने संरक्षक बैराम खाँ द्वारा हुमायूं के तख्त पर बैठाया गया तब, पहले ही दिन से अकबर ने अपनी उम्र को पीछे छोड़कर समझदारी का दामन पकड़ा जिसे उसने जिंदगी भर नहीं छोड़ा।

इसी समझ के बल पर अकबर सोलहवीं शताब्दी की भारतीय राजनीति को बड़ी गहराई तक प्रभावित करने में सफल रहा। जिस समय पानीपत के मैदान में बैराम खाँ ने अकबर से कहा कि वह बेहोश पड़े विक्रमादित्य हेमचंद्र अर्थात् हेमू की गर्दन उड़ा दे तो अकबर ने निहत्थे एवं बेहोश शत्रु पर वार करने से मना कर दिया।

उस समय तक अकबर ढंग से मुगलों के तख्त पर बैठ भी नहीं पाया था तथा उसके कब्जे में भारत की इंच भर भी जमीन नहीं थी, किंतु अकबर की यह दृढ़ता देखकर उसका संरक्षक बैराम खाँ समझ गया कि अकबर को अपनी अंगुलियों पर नचाना संभव नहीं होगा। 

बैराम खां ने अकबर को उत्तरी भारत का बहुत बड़ा इलाका जीतकर दिया किंतु जैसे ही अकबर युवा हुआ, उसने बैराम खां को उसके पद से हटा दिया क्योंकि अकबर परम्परागत रूप से चले आ रहे, शासन के मध्य एशियाई मानदण्डों को स्वीकार करने को तैयार नहीं था। वह हिन्दुस्तान पर अपनी शर्तों पर शासन करना चाहता था।

अकबर ने अनुभव किया कि चंगेजी, मुगलाई, तुर्की, चगताई, ईरानी, तूरानी तथा उज्बेकी अमीरों एवं शहजादों के बल पर हिंदुस्तान के तख्त पर अधिक समय तक अधिकार नहीं रखा जा सकता है। वे स्वयं इतने महत्वाकांक्षी हैं कि हर समय बादशाह को उखाड़ फैंकना चाहते हैं और अपने-अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित करना चाहते हैं। इसलिए अकबर ने भारत के स्थानीय लोगों को शासन में भागीदारी देने का निर्णय लिया ताकि मुगलिया सल्तनत को शासन का नवीन, भरोसेमंद एवं सुदृढ़ आधार प्राप्त हो सके।

बहुत कम आयु में ही अकबर समझ चुका था कि वह हिन्दू शासकों से लड़कर लम्बे समय तक अपनी सल्तनत में बना नहीं रह सकता। उसे किसी न किसी प्रकार से हिन्दू शासकों को अपने अधीन करने का मार्ग ढूंढना था।

अपने इसी विचार के कारण अकबर ने बड़ी ही चालाकी से मुगलिया राजनीति में सुलह-कुल की नीति का प्रर्वत्तन किया। इसकी शुरुआत आम्बेर राज्य से हुई। अकबर के सौभाग्य से आम्बेर के कच्छवाहा राजा भयानक पारिवारिक कलह में डूब गए और उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए अकबर की ओर मैत्री का हाथ बढ़ाया। इतना ही नहीं, इस मैत्री को दृढ़ बनाने के लिए कच्छवाहों ने अपनी राजकुमारी हरखू बाई अथवा हीराकंवर का विवाह अकबर के साथ करना स्वीकार कर लिया।

इस विवाह के दूरगामी परिणाम हुए। अकबर को शक्तिशाली कच्छवाहों का साथ, विश्वास एवं समर्पण मिल गया और कच्छवाहों को अपने ही कुल के विद्रोही राजकुमारों पर नियंत्रण स्थापित करने में सफलता मिल गई।

कच्छवाहों एवं मुगलों की इस मैत्री के कारण अकबर का शासन भारत में हमेशा-हमेशा के लिए जम गया। अब उसे भारत की कोई शक्ति अचानक ही जड़ से उखाड़कर नहीं फैंक सकती थी जिस तरह अकबर के पिता हुमायूं को अफगानों ने उखाड़कर भारत की सीमाओं से बाहर धकेल दिया था।

जब भारत की अन्य स्थानीय शक्तियों ने देखा कि मुगलों से अपनी राजकुमारी के विवाह के बाद कच्छवाओं का राज्य मजबूती से जम गया है तो अन्य स्थानीय शासक भी अकबर से मैत्री करने एवं वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए आगे आए।

कच्छवाहों की राजकुमारी हरखूबाई की कोख से सलीम अर्थात् जहाँगीर का जन्म हुआ। जैसलमेर के शासक हरराज भाटी ने अपनी पुत्री नाथी बाई का विवाह अकबर के साथ कर दिया। जोधपुर के मोटा राजा उदयसिंह ने अपनी पुत्री जगत गुसाईंन का विवाह अकबर के बेटे सलीम के साथ कर दिया। उसकी कोख से खुर्रम अर्थात् शाहजहाँ का जन्म हुआ।

अकबर के पुत्र सलीम का एक विवाह एक पहाड़ी राजा दरिया मल लिबास की पुत्री से करवाया गया। सलीम का एक विवाह जैसलमेर की राजकन्या से हुआ जो मुगल हरम में प्रवेश के बाद मल्लिका-ए-जहाँ कहलाई।

ई.1576 में अकबर ने डूंगरपुर के सीसोदिया राजा आसकरण की पुत्री से विवाह किया। ई.1584 में अकबर ने अपने पुत्र सलीम का विवाह आमेर नरेश भगवंतदास की पुत्री से एवं ई.1586 में बीकानेर नरेश रायसिंह की पुत्री से किया। जब ई.1605 में सलीम जहांगीर के नाम से बादशाह बन गया तब उसका एक विवाह मेड़ता के शासक केशवदास राठौड़ की पुत्री से एवं ई.1608 में आम्बेर नरेश जगतसिंह की पुत्री से सम्पन्न हुआ था। जहांगीर ने रामचंद्र बुंदेला की पुत्री से भी विवाह किया था।

ई.1624 में जहांगीर के पुत्र परवेज का विवाह आमेर के राजा जगतसिंह की पुत्री से हुआ था। अर्थात् आम्बेर के राजा जगतसिंह की एक पुत्री जहांगीर से तथा दूसरी पुत्री जहांगीर से ब्याही गई थी।

हिन्दू राजकुमारियों की कोख से उत्पन्न ये शहजादे आगे चलकर न केवल दिल्ली एवं आगरा में मुगलों के तख्त पर बैठने में सफल रहे अपितु हिन्दुस्तान की अन्य जागीरों के शासक भी बन गए। इस कारण विदेशी आक्रांताओं के रूप में आए मुगलों एवं स्थानीय हिन्दू शक्तियों के बीच मजबूत गठजोेड़ स्थापित हो गया।

न केवल मुगलिया राजनीति में अपितु भारत की मध्यकालीन राजनीति में इतना बड़ा परिवर्तन अकबर से पहले कोई और करने में सफल नहीं हुआ था। इससे पहले भारतीय राजाओं ने मुसलमान शासकों की अधीनता अथवा मित्रता स्वीकार नहीं की थी। अकबर की मैत्री से पहले, भारतीय राजा मुसलमानों से लगातार लड़ते रहे थे और अपनी खोई हुई राज्यसत्ता को प्राप्त करने का प्रयास करते रहे थे। अकबर से मित्रता होने के बाद इन प्रयासों को बंद होने पर अधिक देर नहीं लगी। मेवाड़ के महाराणाओं और दक्खिन के मराठों को इसका अपवाद माना जा सकता है।

अकबर ने सुलह-कुल की नीति के तहत भारतीय राजाओं को मित्रता के बहाने से अधीन बनाया। वही राजा अपनी रियासत पर शासन कर सकता था जो बादशाह की नौकरी स्वीकार करे। यदि कोई राजा अथवा राजकुमार ऐसा नहीं करता था तो उसका राज्य छीनकर उसके किसी भाई अथवा पुत्र को दे दिया जाता था।

जिस तरह अकबर ने अपने हरम में तुर्की, चगताई एवं मुगल औरतों के साथ-साथ भारत के स्थानीय हिन्दू सरदारों की पुत्रियों को जगह दी तथा स्थानीय हिन्दू सरदारों को अजमेर, गुजरात, पंजाब आदि बड़े-बड़े सूबों का सूबेदार बनाया, उसी प्रकार उसने अपने शासन में मुगल अमीरों के साथ-साथ अनेक ऐसे हिन्दू युवकों को अपना मंत्री बनाया जो किसी शासक परिवार से न होकर जन-सामान्य के बीच से आए थे।

अकबर के हिन्दू मंत्रियों में राय पुरुषोत्तम, राय जगन्नाथ, राजा बीरबल, राजा टोडरमल आदि प्रमुख थे। इनमें से कोई कायस्थ था जो कोई वैश्य, जबकि कुछ युवक ब्राह्मण परिवारों में उत्पन्न हुए थे। अकबर किसी भी व्यक्ति को उसकी योग्यता भांपकर मंत्री पद दे देता था और मुगल अधिकारियों के ऊपर स्थापित कर देता था।

किसी शासक परिवार से सम्बन्धित न होने के कारण इन हिन्दू युवकों की निष्ठा केवल अकबर के प्रति रहती थी। वे स्वयं तो कभी विद्रोह करते ही नहीं थे, साथ ही यदि कोई मुगल, तुर्क, चंगेजी  या चगताई अमीर बगावत करता था तो ये हिन्दू मंत्री बड़ी कठोरता से उनका दमन करते थे। इस उपाय से अकबर न केवल अपनी सल्तनत का तेजी से विस्तार कर पाया अपितु उसने दूर-दूर तक फैलते जा रही अपनी सल्तनत पर बड़ी कड़ाई से नियंत्रण स्थापित कर लिया। मुगलिया राजनीति में यह बहुत बड़ा बिंदु क्रांतिकारी मोड़ था।

अकबर की सुलहकुल की नीति उसके निजी जीवन में भी दिखाई देती थी। उसने अपने दिमाग के दरवाजे केवल इस्लाम तक सीमित नहीं कर लिए थे अपितु वह सभी धर्मों के मर्म तक पहुंचना चाहता था। यही कारण था कि उसके दरबार में जेजुइट पादरी से लेकर हिन्दू पण्डित, बौद्ध, जैन, पारसी तथा अन्य धर्मों के विद्वान भी उपस्थित रहते थे।

अकबर इन लोगों को धर्म के सिद्धांतों पर बहस करने के लिए कहता था। अकबर ने इन विद्वानों के बहस-मुसाहिबों को बड़े ध्यान से सुना और शीघ्र ही पता लगा लिया कि सभी धर्मों के मूल में कुछ निश्चित सिद्धांत ही काम कर रहे हैं और वे सिद्धांत मानवता की भलाई के सिद्धांत पर टिके हैं। मुल्ला-मौलवी, पण्डित और पादरी अपने-अपने धर्म को बड़ा बताकर जन-सामान्य को धर्म के मूल तक पहुंचने में बाधा पहुंचाते हैं।

इसलिए अकबर ने दीन-ए-इलाही नामक नया धर्म चलाने का प्रयास किया जिसमें सभी धर्मों के सिद्धांतों को स्थान दिया गया था। विभिन्न धर्मों के लोगों द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाने के कारण उसके द्वारा चलाया गया धर्म लोकप्रियता प्राप्त नहीं कर सका और अकबर के मरते ही स्वयं भी मिट गया।

यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि मुगलिया राजनीति में अकबर को मुल्ला-मौलवियों का जितना विरोध सहन करना पड़ा, अन्य धर्म के लोगों की ओर से नहीं।

मुगलिया राजनीति में समन्यवादी नीतियों का समावेश करके अकबर ने ई.1556 से ई.1605 तक भारत के विशाल भू-भाग पर सफलता पूर्वक शासन किया तथा अनके बगावतों का सामना करने पर भी उसके राज्य का कोई हिस्सा कभी भी पूरी तरह उसकी सल्तनत से बाहर नहीं निकल सका। इसलिए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने अशोक महान् के साथ-साथ अकबर को भी भारत के दो महान् पुत्रों से एक बताया है।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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