Monday, May 20, 2024
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अध्याय – 74 : उग्र वामपंथी आन्दोलन – 2

भारत में साम्यवाद का उदय एवं विकास

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद, 1917 ई. में घटित, रूस की महान् अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति ने अन्तर्राष्ट्रीय इतिहास में एक एक नया युग आरम्भ किया। भारत भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं रहा। रूस की समाजवादी क्रान्ति ने हमारे स्वाधीनता संग्राम पर गहरा प्रभाव डाला। इसी प्रभाव के करण भारत में ट्रेड यूनियन, किसान आन्दोलन, छात्र और नौजवान संघ तथा कई छोटे-बड़े संघों ने नई दिशा ग्रहण की और कांग्रेस ने भी व्यापक जन-आन्दोलनों का सहारा लिया।

साम्यवादियों की प्रारंभिक प्रवृत्तियाँ

ब्रिटिश शासकों ने भारत को साम्यवादी विचारधारा से दूर रखने का अथक प्रयास किया था, फिर भी यह विचारधारा भारत में प्रवेश कर गई। युद्ध काल में जो भारतीय क्रांतिकारी; जर्मनी, संयुक्त राज्य अमेरिका, तुर्की और अफगानिस्तान से अपनी गतिविधियां चलाते थे, वे रूस की अक्टूबर क्रांति से प्रभावित होकर साम्यवाद की ओर मुड़े। ऐसे क्रांतिकारियों में वी. चट्टोपाध्याय, एम. बरकतुल्ला, एम. एन. रॉय, अबनी मुखर्जी तथा आचार्य प्रमुख थे। प्रवासी सिक्खों और पंजाबी मजदूरों ने रतनसिंह और संतोष सिंह के माध्यम से मार्क्सवादियों एवं लेनिनवादियों से सम्पर्क स्थापित किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वाम पक्ष ने भी भारत में साम्यवाद को विकसित होने में सहयोग किया। फिर भी बीसवीं सदी के प्रारम्भिक दो दशकों में वामपंथी आंदोलन की गतिविधियां, एक-दो पत्र-पत्रिकाओं में छपे लेखों तक सीमित रहीं। इसी तरह अनेक प्रवासी भारतीय क्रांतिकारियों ने मास्को जाकर वहाँ के साम्यवादी नेताओं से सम्पर्क स्थापित किया। मई 1919 में भारतीय कार्यकर्त्ताओं का एक प्रतिनिधि मण्डल लेनिन से मिला। लेनिन की सलाह पर प्रवासी भारतीयों ने 17 अक्टूबर 1920 को ताशकन्द में हिन्दुस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया। एम. एन. राय, एवलिन ट्रेंट राय, ए. एन. मुखर्जी, रोजा फिटिगोफ, मोहम्मद अली (अहमद हसन), मोहम्मद शफीक सिद्दीकी और आचार्य एम. प्रतिवादी भंयकर इस पार्टी के प्रमुख नेता थे। हिन्दुस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी ने कलकत्ता, बम्बई, मद्रास और लाहौर के कम्युनिस्ट विचारों के लोगों से सम्पर्क स्थापित किया और भारत में कम्युनिस्ट समूहों को संगठित करने में सहयोग दिया।

हिन्दुस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी, पहले मास्को से और फिर बर्लिन से, एम. एन. राय व थर्ड इन्टरनेशनल के नेतृत्व में काम करने लगी। लेनिन ने भारतीय कम्युनिस्टों को यह संदेश दिया था कि वे अपने देश में चल रहे राष्ट्रीय आन्दोलन का समर्थन करें तथा उसमें भाग लें किन्तु सर्वहारा के आन्दोलन का स्वतंत्र अस्तित्त्व बनाये रखें।

भारत में साम्यवादी समूह

भारत में 1920 ई. के बाद से ही साम्यवादी गतिविधियाँ बढ़ने लगी थीं। 1923 ई. तक बहुत से पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से साम्यवादी विचारों का प्रचार होने लगा था। साम्यवादी विचारधारा में रुचि रखने वाले लोग एक-दूसरे के निकट आते गये और संगठित होते गये। इस प्रकार देश के विभिन्न हिस्सों में साम्यवादी समूहों का उदय हुआ। माना जाता है कि 1921-22 ई. की अवधि में बम्बई, कलकत्ता, मद्रास, लाहौर और कानपुर में साम्यवादी समूह अस्तित्त्व में आ चुके थे।

बम्बई के साम्यवादी समूह: बम्बई के साम्यवादी समूह की स्थापना में श्रीपाद अमृत डांगे की भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रही। डांगे और उनके साथियों ने कांग्रेस के असहयोग आन्दोलन में भाग लिया। बाद में इन लोगों ने बम्बई प्रादेशिक कांग्रेस कमेटी के अन्दर एक रेडिकल गु्रप बनाया। 1921 ई. में डांगे की पुस्तक गांधी बनाम लेनिन प्रकाशित हुई। लगभग इसी समय यह कम्युनिस्ट समूह अस्तित्त्व में आया। अगस्त 1922 से डांगे ने अग्रंेजी भाषा में सोशलिस्ट नामक साप्ताहिक का प्रकाशन आरम्भ किया। बम्बई के साम्यवादी समूह में के. एन. जोगलेकर और आर. एस. निम्बकर भी प्रमुख सदस्य थे। इस समूह का कार्यक्षेत्र भारतीय कांग्रेस के साथ-साथ बम्बई के कपड़ा मिल मजदूरों में भी था।

कलकत्ता के साम्यवादी समूह: कलकत्ता में मुजफ्फर अहमद और काजी नजरूल अहमद के प्रयासों से कम्युनिस्ट ग्रुप की स्थापना हुई। जुलाई 1920 से मुजफ्फर अहमद ने बंगला सांध्य दैनिक नवयुग का प्रकाशन आरम्भ किया। काजी नजरूल अहमद भी उनका हाथ बँटाने लगे। उन्होंने जहाजी मजदूरों की समस्याओं के सम्बन्ध में कई लेख प्रकाशित किये। 1921 ई. के अन्त में दोनों की भेंट नलिनी गुप्त से हुई जिन्हें एम. एन. राय ने भारत में साम्यवादी विचारधारा से जुड़े लोगों से सम्पर्क स्थापित करने के लिये भेजा था। इस प्रकार मुजफ्फर अहमद और काजी नजरूल अहमद का साम्यवादी विचारधारा से जुड़े लोगों से सम्पर्क स्थापित हो गया और कलकत्ता साम्यवादी समूह अस्तित्त्व में आया।

मद्रास के साम्यवादी समूह: मद्रास के वयोवृद्ध वकील मालयापुरम सिंगारावेलू चेट्टियार, मद्रास के साम्यवादी समूह के संस्थापक थे। वे असहयोग आन्दोलन के दौरान वकालत छोड़कर मजदूर आन्दोलन से जुड़ गये। उन्होंने कांग्रेस के गया अधिवेशन में भाग लिया तथा मद्रास में कम्युनिस्ट ग्रुप बनाया। एडवोकेट वेलायुधन ने भी इस कार्य में उनका सहयोग किया।

लाहौर के साम्यवादी समूह: ताशकन्द में स्थापित हिन्दुस्तान कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य मोहम्मद अली (अहमद हसन) के मित्र गुलाम हुसैन ने लाहौर के साम्यवादी समूह की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाई। गुलाम हुसैन ने इन्कलाब  शीर्षक से पत्र निकाला तथा मजदूरों को संगठित करके साम्यवादी समूह की स्थापना की। इस कार्य में शम्सुद्दीन अहमद और मुहम्मद सिद्दीकी ने भी उनकी सहायता की।

संयुक्त प्रांत के साम्यवादी समूह: संयुक्त प्रान्त के कुछ हिस्सों में भी साम्यवादी समूह काम करने लगे थे। कानपुर और बनारस उनके मुख्य केन्द्र थे।

महाराष्ट्र के साम्यवादी समूह: नागपुर में भी एक साम्यवादी समूह काम कर रहा था।

भारत में किसी भी साम्यवादी समूह को वैधानिक मान्यता नहीं दी गई थी। इनमें से कुछ समूहों ने कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से सम्पर्क स्थापित कर रखा था और अपने कार्यों के लिए वहाँ से दिशा-निर्देश प्राप्त करते थे। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने तीन कार्य निर्देशित किये थे-

(1.) कम्युनिस्टों को आवश्यक रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और स्वराज पार्टी के वाम पक्ष (जिनका नेतृत्व सी. आर. दास और मोतीलाल नेहरू के हाथों में था) के भीतर कार्य करना चाहिए।

(2.) यह प्रयास किया जाये कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (जिसके अन्तर्गत स्वराज पार्टी भी सम्मिलित है) साम्राज्यवाद विरोधी खेमे का रूप ग्रहण करे।

(3.) कम्युनिस्ट इन्टरनेशनल, भारतीय कम्युनिस्टों के लिए इस बात को उचित मानता था कि वे जनता की पार्टी अथवा मजदूर-किसान पार्टी का संगठन करें। यह पार्टी राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर कार्य करे। उसका कार्यक्रम सुस्पष्ट, साम्राज्यवाद विरोधी, सामन्तवाद विरोधी तथा जनतांत्रिक हो।

इस प्रकार, साम्यवादी समूह कांग्रेस के भीतर रहकर कार्य करने लगे और उनका आन्दोलन कांग्रेस तथा अन्य संगठनों के नेताओं की सहानुभूति प्राप्त करने लगा। सरकार का गुप्तचर विभाग उनकी गतिविधियों पर कड़ी निगाह रखे हुए था। उसने सरकार को सावधान किया कि इससे पहले कि भारत के साम्यवादी समूह, एक शक्तिशाली पार्टी के रूप में संगठित हों, उनकी शक्ति को तोड़ना उचित होगा। इसलिए 1922 से लेकर 1930 ई. तक सरकार ने कम्युनिस्टों के विरुद्ध सात मुकदमे चलाये। इनमें से पांच मुकदमे पेशावर में, एक कानपुर में और एक मेरठ में चलाया गया। सरकार द्वारा कम्युनिस्टों को कठोर सजा देकर भारत में कम्युनिस्ट प्रभाव को समाप्त करने का प्रयास किया गया।

कानुपर षड़यंत्र केस

1924 ई. के आरम्भ में ब्रिटिश सरकार ने एस. ए. डांगे, मुजफ्फर अहमद, नलिनी गुप्ता, शौकत उस्मानी, गुलाम हुसैन, रामचरण लाल शर्मा, सिंगारावेलू चेट्टियार, एम. एन. राय आदि कम्युनिस्टों के विरुद्ध कानुपर में एक मुकदमा चलाया जो कानुपर षड़यंत्र केस के नाम से प्रसिद्ध है। एम. एन. राय और रामचरण लाल शर्मा विदेश में थे, अतः पकड़ में नहीं आये। चेट्टियार अत्यधिक बीमार थे, अतः उनके विरुद्ध मुकदमा नहीं चलाया गया। गुलाम हुसैन सरकारी गवाह बन गये। शेष चार अभियुक्तों- एस. ए. डांगे, मुजफ्फर अहमद, नलिनी गुप्ता तथा शौकत उस्मानी को चार-चार साल का कठोर कारावास हुआ। इन लोगों के विरुद्ध मुख्य रूप से दो आरोप लगाये गये-

(1.) इन लोगों के माध्यम से कम्युनिस्ट इन्टरनेशनल, भारत में अपनी शाखा स्थापित करने का प्रयास कर रहा था।

(2.) ये लोग मजदूर-किसान पार्टी की स्थापना का प्रयास कर रहे थे।

न्यायालय में हुई बहस में यह भी कहा गया कि कम्युनिस्ट, भारत से ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए ही मजदूरों को संगठित कर रहे हैं तथा कांग्रेस के अन्दर से गरम दल और राष्ट्रवादी नेता, क्रांतिकारियों का साथ दे रहे हैं। देश-विदेश के समाचार पत्रों में इस अभियोग की बहुत चर्चा हुई। सरकार ने कम्युनिस्ट नेताओं को बंदी बनाकर लोगों में भय पैदा करने का प्रयास किया ताकि लोग कम्युनिस्ट पार्टी से दूर रहें परन्तु सरकार के इस प्रयास का परिणाम उल्टा हुआ तथा आम-जन कम्युनिस्टों के कार्य कलापों में पहले से अधिक रुचि लेने लगा।

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