Monday, May 20, 2024
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अध्याय – 48 : अठारह सौ सत्तावन क्रांति की असफलता के कारण

अँग्रेजों को भारत से बाहर निकालने के लिए 1857 में जो क्रांति हुई, उसकी असफलता के कई कारण थे-

(1.) समय से पहले क्रांति का फूट पड़ना

क्रांति के लिये सम्पूर्ण भारत में 31 मई 1857 का दिन निर्धारित किया गया था। दुर्भाग्य से 29 मार्च 1857 को मंगल पाण्डे ने बैरकपुर में विद्रोह कर दिया। जब यह समाचार मेरठ पहुँचा तो 10 मई 1857 को मेरठ में भी विद्रोह हो गया। इस कारण क्रांति की योजना उसके पूर्णतः आरम्भ होने से पहले ही उजागर हो गई। इससे अँग्रेजों को संभलने का अवसर मिल गया। मेलीसन ने लिखा है- ‘यदि पूर्व निश्चय के अनुसार 31 मई 1857 को एक साथ समस्त स्थानों पर स्वाधीनता का व्यापक और महान् संग्राम आरम्भ हुआ होता तो कम्पनी के अँग्रेज शासकों के लिए भारत को फिर से विजय कर सकना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं होता।’

(2.) राजपूत सैनिकों की उदासीनता

यह सही है कि जोधपुर लीजियन ने अँग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया किंतु उनके ही अन्य राजपूत साथियों ने उनका साथ नहीं दिया जो जोधपुर दरबार की तरफ से भेजे गये। इस कारण आबू से दिल्ली जाने वाले क्रांतिकारी सैनिकों को लम्बे समय तक आउवा में रुकना पड़ गया और वे दिल्ली पहुंचकर अँग्रेज सेनाओं को दिल्ली की तरफ बढ़ने से नहीं रोक सके। जोधपुर दरबार की सेनाओं ने जंगलों में छिपे अँग्रेजों के परिवारों को ढूंढ निकाला और उन्हें जोधपुर में लाकर शरण दी। इस प्रकार अधिकांश राजपूत सैनिकों ने इस क्रांति के प्रति उदासीनता का प्रदर्शन किया। तात्या टोपे और रानी लक्ष्मी बाई को राजपूताने से कोई सहायता नहीं मिली।

(3.) सिक्खों व गोरखों द्वारा साथ नहीं दिया जाना

इस क्रांति के समय सिक्खों ने ब्रिटिश सरकार का समर्थन किया। वे किसी भी कीमत पर मुगल बादशाह का समर्थन करने को तैयार नहीं थे क्योंकि मुगल बादशाहों ने गुरु अर्जुनदेव सिंह तथा गुरु तेग बहादुर को मरवाया था। सिक्ख, उस बंगाल सेना से भी प्रतिशोध लेना चाहते थे जिसने पंजाब विलय के समय अँग्रेजों का साथ दिया था। इन दो कारणों से सिक्ख, अँग्रेजों के प्रति वफादार रहे। हालांकि उनका यह निर्णय बहुत आश्चर्यजनक था क्योंकि अँग्रेजों ने केवल 8 साल पहले 1849 में ही सिक्खों के स्वतंत्र राज्य को समाप्त करके ब्रिटिश क्षेत्र में मिलाया था। इस दृष्टि से सिक्खों को अँग्रेजों से बदला लेना चाहिये था किंतु सिक्खों ने अँग्रेजों के लिये दिल्ली और लखनऊ जीतकर सैनिक क्रांति की कमर तोड़ दी। सिक्खों ने इस बात पर भी विचार नहीं किया कि कुछ दिन पहले ही अँग्रेजों ने महाराजा रणजीतसिंह की महारानी जिंदां कौर की वार्षिक पेंशन अचानक 15,000 पौण्ड वार्षिक से घटाकार 1,200 पौण्ड कर दी थी। इतिहासकारों का आकलन है कि यदि पटियाला, नाभा व जीन्द ने ठीक समय पर अँग्रेजों की सहायता न की होती तो क्रांति का परिणाम कुछ और होता। इसी प्रकार गोरखों ने अपने सेनापति जंग बहादुर की अधीनता में अवध पर आक्रमण करके अँग्रेजों की सहायता की तथा क्रांति को विफल कर दिया।

(4.) योग्य नेताओं का अभाव

विद्रोही सैनिकों को ठीक तरह से संचालित कर सकने वाला कोई योग्य नेता उपलब्ध नहीं था। नाना साहब, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, आउवा ठाकुर कुशालसिंह, जगदीशपुर का जमींदार कुंवरसिंह जैसे नेता समग्र क्रांति का नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं थे। मेरठ और दिल्ली के विद्रोही सैनिकों ने बहादुरशाह जफर को अपना नेता बनाया किन्तु क्रांति और युद्ध जैसे शब्दों से अपरिचित, बूढ़े, निराश और थके हुए बहादुरशाह से सफल सैन्य-संचालन एवं क्रांति के नेतृत्व की आशा करना व्यर्थ था। वास्तव में इस गौरवमयी क्रांति की सबसे कमजोर कड़ी बहादुरशाह ही था। सिक्ख और अधिकांश हिन्दू उसे फिर से बादशाह बनाने को तैयार नहीं थे। उसकी बजाय तो उन्हें अँग्रेजों का राज ही अधिक अच्छा लगता था।

(5.) बड़े राजाओं का असहयोग

प्रायः समस्त प्रभावशाली भारतीय नरेशों ने विद्रोह का दमन करने में अँग्रेजों का साथ दिया, विशेषतः उन राजाओं ने जिनके राज्य एवं पेंशनें सुरक्षित थे। सिन्धिया के मन्त्री दिनकरराव तथा निजाम के मन्त्री सालारजंग ने अपने-अपने राज्य में क्रांति को फैलने से रोका। राजपूताना के लगभग समस्त नरेशों ने अँग्रेजों की भरपूर सहायता की। विद्रोह काल में स्वयं केनिंग ने कहा था- ‘यदि सिन्धिया भी विद्रोह में सम्मिलित हो जाये तो मुझे कल ही बिस्तर गोल करना पड़ जाये।’

मैसूर, पंजाब, महाराष्ट्र और पूर्वी बंगाल आदि प्रदेशों के शासक भी शान्त रहे। इनमें से कोई भी राजा, अँग्रेजों को भगाकर भारत को फिर से मुगलों और मराठों को समर्पित करने का इच्छुक नहीं था। इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि भारत के कुछ बड़े राजाओं ने मिलकर अँग्रेजों के विरुद्ध व्यूह-रचना की होती तो अँग्रेजों को भारत छोड़कर चले जाना पड़ता। जिन छोटे नरेशों ने तथा सामन्तों ने क्रांति का साथ दिया, वे अलग-अलग रहकर अपने क्षेत्रों में अँग्रेजों से लड़ते रहे। इस कारण अँग्रेजों ने उन्हें एक-एक करके परास्त किया।

(6.) नागरिकों का असहयोग

1857 की सैनिक क्रांति को देश के बहुत से हिस्सों में जनता का समर्थन मिला किंतु कृषक एवं श्रमिक जनता इससे प्रायः उदासीन रही। इस कारण यह क्रान्ति जन-क्रान्ति नहीं बन सकी। अनेक स्थानों पर क्रांतिकारियों ने लूट-पाट मचाकर जनसाधारण की सहानुभूति खो दी। विद्रोहियों द्वारा जेलों को तोड़ देने से पेशेवर चोर और लुटेरे बाहर निकल आये जिससे अराजकता फैल गई। इस कारण जन-सामान्य ने इस क्रांति को बहुत कम स्थानों पर सहयोग दिया। अँग्रेजी पढ़े लिखे युवकों का इस क्रांति से कोई लेना-देना नहीं था। ट्रेवेलियन ने लिखा है- ‘अँग्रेजों के गले काटने की बात सोचने की बजाये वे उनके साथ उच्च न्यायालय में या मजिस्ट्रेटों की कुर्सियों पर बैठने का स्वप्न देख रहे थे। वे पंजाब और नेपाल की राजनीति पर अटकल लड़ाने की बजाय प्रेस और मुक्त वाद-विवाद की भलाइयों पर सोच रहे थे और वे अपनी वाद-विवाद सभाओं में लच्छेदार अँग्रेजी में व्याख्यान देने का स्वप्न देख रहे थे।’

(7.) केन्द्रीय संगठन का अभाव

क्रांति आरम्भ होने तथा विद्रोही सेनाओं के दिल्ली पहुँचने तक तो किसी पूर्व निश्चित योजना का स्वरूप दिखाई देता है किन्तु बाद में वह समाप्त होता दिखाई देता है। क्रांतिकारियों के पास कोई ऐसा केन्द्रीय संगठन नहीं था जो अँग्रेजों की गतिविधियों के ध्यान में रखकर विभिन्न स्थानों पर लड़ रहे सैनिक दलों में समन्वय स्थापित कर सके। उदाहरण के लिये झाँसी और बुन्देलखण्ड में विद्रोह उस समय आरम्भ हुआ, जब दिल्ली और कानपुर में अँग्रेजों को सफलता प्राप्त हो चुकी थी।

(8.) लॉर्ड केनिंग की उदारता

गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग की उदारता विद्रोहियों को शान्त करने में सफल हुई। अनेक अँग्रेज अधिकारियों ने केनिंग की उदार नीति की बड़ी आलोचना की तथा क्रान्ति का दमन करने में पाशविक प्र्रवृत्ति का परिचय देते रहे किन्तु केनिंग ने स्पष्ट घोषणा की कि जो हथियार डाल देगा, उसके साथ न्याय होगा तथा हिंसा करने वालों को छोड़कर समस्त लोगों को क्षमा कर दिया जायेगा। इस घोषणा का व्यापक प्रभाव पड़ा। बहुत से लोगों ने हथियार डाल दिये। केनिंग की इस उदार नीति से क्रांति बहुत कम समय में समाप्त हो गई। पी. ई. राबर्ट्स ने लिखा है- ‘उसकी नम्रता न केवल नैतिक रूप से विस्मयकारी थी, वरन् राजनीतिक रूप से औचित्यपूर्ण थी।’

(9.) ठोस लक्ष्य का अभाव

समस्त क्रांतिकारी अँग्रेजों से नाराज थे तथा अँग्रेजों को देश से भगाना चाहते थे किंतु उनके कारण अलग-अलग थे। भारतीय सैनिकों ने चरबी वाले कारतूसों के कारण विद्रोह किया था और वह भी निर्धारित समय से पहले। मुसलमान सैनिक मुगल बादशाह के प्राचीन गौरव को पुनर्जीवित करना चाहते थे। मराठा सैनिक नाना साहब और रानी लक्ष्मीबाई के राज्यों की पुनर्स्थापना के लिये लड़े। मेरठ आदि छावनियों के सैनिक अपने धर्म को बचाने की चिंता में लड़े। राजपूत ठिकानों के सैनिक अपने ठिकानेदारों के आदेश से लड़े। अधिकांश क्रांतिकारी सैनिकों ने अँग्रेजी शासन को समाप्त करने के लिये कुछ अँग्रेज अधिकारियों को मार डालना पर्याप्त समझा। उनके पास समस्त अँग्रेजों को भारत से बाहर निकालने की कोई योजना नहीं थी।

(10.) अँग्रेजों की अनुकूल परिस्थितियाँ

यदि क्रीमिया युद्ध समाप्त होने से पहले भारत में 1857 की क्रांति आरम्भ हो गई होती तो अँग्रेजों के पास भारत छोड़कर जाने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं बचता किन्तु जिस समय क्रांति आरम्भ हुई, तब तक विदेशी मोर्चों पर परिस्थितियाँ अँग्रेजों के अनुकूल हो गयी थीं। क्रीमिया का युद्ध समाप्त हो चुका था। डलहौजी के प्रयासों से सेना के पास रसद एवं युद्ध सामग्री पहुंचाने हेतु यातायात के साधनों का पर्याप्त प्रबन्ध हो चुका था। सेना के पास संचार व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी। भारत में बड़े देशी नरेश, प्रभावशाली सामन्त, व्यापारी वर्ग तथा अँग्रेजी पढ़ा-लिखा बुद्धिजीवी वर्ग अँग्रेजों का समर्थन कर रहा था। तात्या टोपे ने टोंक, झालावाड़ एवं बांसवाड़ा आदि राज्यों पर अधिकार करके राजपूतों को नाराज कर दिया। अंत में वह नरवर के जागीरदार मानसिंह द्वारा किये गये धोखे से ही पकड़ा गया। इन परिस्थितियों में अँग्रेजों के लिये विद्रोह का दमन करना सम्भव हो गया।

(11.) क्रांतिकारियों के साधनों की सीमितता

क्रांतिकारियों के पास अँग्रेजों की अपेक्षा अत्यन्त सीमित साधन थे। उनका रणकौशल अँग्रेज सेनापतियों जैसा नहीं था। अँग्रेजों के पास यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित सैनिक थे, जो रणनीति एवं कूटनीति में दक्ष थे। क्रांतिकारी सैनिक वीरता से लड़ते हुए मरना जानते थे, जीतना नहीं। उन्हेंं धन का अभाव था। प्रारम्भ में तो कुछ सेठों ने उन्हें सहायता दी तथा उन्होंने सरकारी खजाने भी लूटे किन्तु आगे चलकर विद्रोहियों को धन, रसद और हथियारों की कमी का सामना करना पड़ा। जबकि अँग्रेजों की सहायता के लिए अधिकांश भारतीय नरेश और पंजाब, बंगाल, मद्रास, बम्बई आदि का राजस्व उपलब्ध था। इंग्लैण्ड से पर्याप्त सैन्य सामग्री भी उपलब्ध हो रही थी। साधनों की सीमितता के कारण वे अधिक समय तक मैदान में टिके नहीं रह सकते थे।

1857 की सशस्त्र क्रांति के परिणाम

यद्यपि 1857 की क्रांति अँग्रेजों को भारत से बाहर निकालने में सफल नहीं हुई तथापि इसके परिणाम अभूतपूर्व, व्यापक और स्थायी सिद्ध हुए। इतिहासकार ग्रिफिन ने लिखा है- ‘भारत में सन् 1857 की क्रान्ति से अधिक महत्त्वपूर्ण घटना कभी नहीं घटी।’

रशब्रुक विलियम ने लिखा है- ‘एक रक्त की नदी ने कम से कम उत्तरी भारत में दो जातियों को अलग-अलग कर दिया तथा उस पर पुल बाँधना एक कठिन कार्य ही था।’ डॉ. आर. सी. मजूमदार ने लिखा है- ‘सन् 1857 का महान् विस्फोट भारतीय शासन के स्वरूप और देश के भावी विकास में मौलिक परिवर्तन लाया।’ इन कथनों से स्पष्ट है कि इस क्रांति के परिणाम व्यापक, गहरे और दूरगामी थे।

(1.) कम्पनी के शासन का अन्त

1757 ई. में प्लासी विजय के बाद पहली बार ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भारत में राजनीतिक सत्ता प्राप्त हुई थी। तब से कम्पनी का शासन लगातार आगे बढ़ता जा रहा था। 1857 ई. की क्रांति से पूर्व कम्पनी को भारत पर शासन करने में अधिक कठिनाई नहीं हुई थी। 1857 ई. की सैनिक क्रांति ने इंग्लैण्ड की संसद को भारत का शासन अपने हाथों में लेने के लिये प्रेरित किया। 2 अगस्त 1858 को ब्रिटिश संसद ने एक अधिनियम पारित करके भारत में कम्पनी के शासन का अन्त कर दिया तथा ब्रिटिश ताज ने शासन का अधिकार ग्रहण कर लिया। बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल तथा बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स समाप्त कर दिये गये। इनके स्थान पर भारत सचिव और उसकी सहायता के लिए 15 सदस्यों की एक इण्डिया कौंसिल बनायी गयी। कम्पनी द्वारा भारत में तब तक किये गये समस्त समझौतों को मान्यता दे दी गई। इस अधिनियम के द्वारा गवर्नर जनरल को ब्रिटिश भारत में गवर्नर जनरल के नाम से तथा देशी राज्यों से सम्बन्ध स्थापित करते समय वायसराय के नाम से पुकारने की व्यवस्था की गई। इस प्रकार भारत से सौ साल पुराने युग का अवसान होकर नये युग का अवतरण हुआ।

(2.) भारत के भावी शासन की नीतियों एवं सिद्धांतों की घोषणा

भारत का शासन अधिकार ग्रहण करने के बाद ब्रिटिश क्राउन की ओर से भारतीय जनता के प्रति शासन की नीति एवं सिद्धान्तों की घोषणा करने के लिए इलाहाबाद में बड़ी घूमधाम से एक दरबार का आयोजन किया गया। इस दरबार में लॉर्ड केनिंग ने महारानी विक्टोरिया  के 1 नवम्बर 1858 के घोषणा-पत्र को पढ़कर सुनाया। इस घोषणा पत्र को भारत के लगभग समस्त प्रमुख नगरों में भी पढ़कर सुनाया गया। इस घोषणा-पत्र की प्रमुख बातें निम्नलिखित थीं-

(क.) महारानी की सरकार को भारत में और अधिक अँग्रेजी राज्य विस्तार की इच्छा नहीं है। भविष्य में राज्य-विस्तार नहीं किया जायेगा।

(ख.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा देशी नरेशों व नवाबों के साथ जो समझौते और प्रबन्ध समय-समय पर किये गये हैं, ब्रिटिश सरकार उनका सदैव आदर करेगी तथा उनके अधिकारों की सुरक्षा करेगी।

(ग.) महारानी की सरकार द्वारा भारत में सदैव धार्मिक सहिष्णुता एवं स्वतन्त्रता की नीति का पालन किया जायेगा।

(घ.) भारतीयों के साथ स्वतन्त्रता का व्यवहार किया जायेगा तथा उनके कल्याण के लिए कार्य किये जायेंगे।

(ड़.) भारतीयों के प्राचीन रीति-रिवाजों, सम्पत्ति आदि का संरक्षण किया जायेगा।

(च.) समस्त भारतीयों को निष्पक्ष रूप से कानून का संरक्षण प्राप्त होगा।

(छ.) बिना किसी पक्षपात के शिक्षा, सच्चरित्रता और योग्यतानुसार सरकारी नौकरियाँ प्रदान की जायेंगी।

(ज.) उन समस्त विद्रोहियों को क्षमादान मिलेगा, जिन्होंने किसी अँग्रेज की हत्या नहीं की है।

महारानी की इस घोषणा को भारतीय स्वतन्त्रता का मेग्नाकार्टा कहा गया, यद्यपि इस घोषणा की बहुत-सी बातों को कभी लागू नहीं किया गया किन्तु यह घोषणा 1919 ई. तक भारतीय शासन की आधारशिला बनी रही। इस घोषणा ने भारत के देशी नरेशों के सन्देह को दूर कर दिया तथा भारतीय नरेशों को सनदें देकर उनके गोद लेने के अधिकार की पुनः स्थापना की। सर जॉन स्टीफन ने लिखा है- ‘विक्टोरिया का घोषणा-पत्र केवल दरबार में सुनाये जाने के लिए था। यह कोई सन्धि नहीं थी जिसके अनुसार कार्य करने के लिए अँग्रेजों पर किसी प्रकार का उत्तरदायित्व हो।’ परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि जिस उद्देश्य से यह घोषणा-पत्र प्रकाशित किया गया था, उसकी पूर्ति अवश्य हुई। भारत की भोली-भाली जनता पर इसका बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा।

(3.) अँग्रेज सैनिकों का विद्रोह

महारानी की 1858 ई. की घोषणा के बाद भारत के समस्त अँग्रेज सैनिकों को जो कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के नौकर थे, ब्रिटिश सरकार की सेना में ले लिया गया। इससे भारत में नियुक्त अँग्रेज सैनिकों में असंतोष हो गया और उन्होंने बगावत का बिगुल बजाया। भारतीय इतिहास में इसे श्वेत क्रांति कहा गया। इस विद्रोह को दबाने के लिये लॉर्ड केनिंग ने लगभग 10 हजार अंग्रेज सैनिकों को सेना से निकाल दिया।

(4.) भारतीय सेनाओं का पुनर्गठन

1857 ई. की क्रांति सैनिक असंतोष से उत्पन्न विद्रोह के रूप में आरम्भ हुई थी। आंदोलन आरम्भ होने के समय बंगाल में सैनिकों की संख्या 1,28,000 थी जिनमें से 1,20,000 सैनिक या तो मर गये थे या घायल हो गये थे। केवल 11 ऐसी रेजीमेंटें थीं जिन्होंने क्रांति में भाग नहीं लिया था। अतः सेना का पुनर्गठन करना आवश्यक हो गया था। अँग्रेजों ने भारत में अधिक से अधिक ब्रिटिश सैनिकों को लाने का निर्णय लिया ताकि भविष्य में होने वाले विद्रोहों का दमन कर सकें। तोपखाना पूर्णतः यूरोपियन सैनिकों के हाथ में दे दिया गया। अँग्रेज सैनिकों की संख्या क्रांति आरम्भ होने से पहले 45,322 थी जो 1862 ई. में दो-गुनी करके 91,897 कर दी गई। भारतीय खर्चे पर इंग्लैण्ड में 16,427 सैनिक अलग से रखे गये जिन्हें आवश्यकता पड़ने पर भारत में युद्ध करने के लिये भेजा जा सकता था। 1857 की क्रांति आरम्भ होने से पहले भारतीय सैनिकों की संख्या 2,38,000 थी जो 1862 ई. में आधी करके 1,40,000 कर दी गई। भारतीय सैनिकों के पुनर्गठन में जातीयता एवं साम्प्रदायिकता आदि तत्त्वों का ध्यान रखा गया। सैनिकों को अपने स्थानीय क्षेत्रों से हटाकर दूरस्थ क्षेत्रों में भेज दिया गया, ताकि स्थानीय लोगों के सहयोग से वे पुनः विद्रोह न कर सकें। भारतीय सैनिकों को घटिया किस्म के हथियार दिये गये। सैनिकों की भर्ती के लिए एक रॉयल कमीशन की नियुक्ति की गई।

(5.) साम्प्रदायिकता एवं जातीय भेदभाव को बढ़ावा

1857 ई. के संघर्ष में हिन्दू-मुसलमानों ने संयुक्त रूप से भाग लिया था किन्तु मुसलमानों ने हिन्दुओं से अधिक उत्साह दिखाया था। अतः अब अँग्रेजों ने हिन्दुओं का अधिक पक्ष लेना आरम्भ कर दिया जिससे हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच वैमनस्य में वृद्धि हो सके। आगे चलकर अँग्रेजों ने अनुसूचित जातियों को हिन्दुओं से दूर करने के लिये कई कार्य किये तथा भेदभावपूर्ण कानून बनाये। अँग्रेजों की इस नीति से भारतीयों के बीच जाति एवं धर्म को लेकर नये सिरे से खाई उत्पन्न हो गई। क्रांति के बाद अँग्रेजों व भारतीयों के बीच स्थायी कटुता उत्पन्न हो गई।

(6.) निम्न प्रशासनिक पदों पर भारतीयों की नियुक्ति एवं उसके कुप्रभाव

महारानी की घोषणा में यह आश्वासन दिया गया था कि बिना किसी पक्षपात के शिक्षा, सच्चरित्रता एवं योग्यतानुसार सरकारी नौकरियों में भारतीयों को स्थान दिया जायेगा किन्तु इसका पालन कभी नहीं किया गया। कोई भी भारतीय सैनिक रॉयल कमीशन के सामने जाने के लिए उपयुक्त नहीं समझा जाता था और यदि वह वायसराय का कमीशन प्राप्त कर भी लेता तो उसे एक नये अँग्रेज रंगरूट से अधिक योग्य नहीं समझा जाता था। भारतीयों को प्रशासन में क्लर्कों तथा सहायकों के निम्न पदों पर लिया जाता था। ये सरकारी कर्मचारी, ब्रिटिश अधिकारियों तथा जनता के बीच बिचौलिये बन गये। अँग्रेज चाहते थे कि भारतीय कर्मचारी, अँग्रेज अधिकारियों की चापलूसी करें और उनके आज्ञाकारी बने रहें। कर्मचारी वर्ग ने अपनी नौकरी सुरक्षित रखने के लिये अँग्रेजों के प्रति अंत तक वफादारी दिखाई जिससे आगे चलकर देश की आजादी की लड़ाई अत्यंत दुरूह हो गई।

(7.) आर्थिक प्रभाव

अँग्रेजों ने अब केवल ब्रिटिश पूँजीपतियों को भारत में पूँजी लगाने हेतु प्रोत्साहित किया तथा उन्हें सुरक्षा प्रदान की। चाय, कपास, जूट, कॉफी, तम्बाकू आदि के व्यापार को अत्यधिक बढ़ावा दिया गया। इन वस्तुओं का अधिकांश व्यापार अँग्रेजों के नियन्त्रण में चला गया। भारतीय उद्योगों का सरंक्षण बंद कर दिया गया। नई ईस्ट इण्डिया कॉटन कम्पनी स्थापित की गई जो भारत से रुई खरीदकर इंग्लैण्ड में कपड़ा तैयार करवाती थी और बिकने के लिये फिर से भारत भेजती थी। रेलवे एवं सड़क यातायात तथा संचार के साधनों का तेजी से विकास किया गया ताकि विद्रोह की स्थिति में सैनिकों तथा युद्ध सामग्री को तेजी से युद्ध क्षेत्र में भेजा जा सके। ईस्ट इण्डिया कम्पनी, भारत सरकार पर 3 करोड़ 60 लाख पौण्ड का कर्ज छोड़ गई थी, जिसकी पूर्ति भारत सरकार, भारतीयों का शोषण करके कर रही थी। अँग्रेजों द्वारा किये गये इस आर्थिक शोषण से जन-सामान्य और अधिक निर्धन हो गया।

(8.) भारतीयों को लाभ

यद्यपि यह क्रांति अँग्रेजों को भारत से बाहर निकालने में असफल रही तथापि इस क्रांति से भारतीयों को कुछ लाभ भी हुए। सरकार ने देश की आन्तरिक दशा सुधारने के लिये तथा लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाने के प्रयास आरम्भ किये। 1858 ई. के अधिनियम के बाद भारत में संवैधानिक विकास की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। भारतीयों को शासन में भाग लेने का अवसर मिलने लगा जिससे उनमें नई चेतना आने लगी। भारतीयों के मन में फिर से राष्ट्रीय भावना तीव्र होने लगी। इसी भावना ने देश में राष्ट्रीय आन्दोलनों को जन्म दिया तथा देश को स्वतंत्रता मिली। अनेक इतिहासकार 1857 की क्रांति को मध्य युग का अन्त तथा आधुनिक युग का आरम्भ मानते हैं। 

निष्कर्ष

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि 1857 ई. में भारत में असफल रक्त-रंजित क्रांति हुई। इसके बहुत से आयाम थे। इस कारण अँग्रेजों ने इसे गदर, बगावत तथा सैनिक विद्रोह कहा। भारतीयों ने इसे सैनिक क्रांति कहा तथा वीर सावरकर ने इसे भारत का प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम कहकर इसका अभिनंदन किया। ब्रिटिश राजनेता डिजराइली ने इसे राष्ट्रीय विद्रोह कहा। तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग ने इसे ब्राह्मणों का षड़यंत्र कहा तो अधिकांश यूरोपीय इतिहासकारों ने इसे मुसलानों द्वारा मुस्लिम राज्य की पुनर्स्थापना के लिये किया गया प्रयास कहा। वास्तविकता यह है कि यह भारतीय इतिहास की सबसे गौरवमयी घटनाओं में से एक थी। इसके क्रांतिकारी युगों तक भारतीयों को स्वाभिमान से जीने एवं स्वतंत्र बने रहने की प्रेरणा देते रहेंगे।

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