राजपूत कालीन भारत MCQ: प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए राजपूत कालीन भारत के इतिहास पर 50 महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर दिए गए हैं। सही उत्तर के सामने हरे बॉक्स में सही टिकमार्क ✅ दिया गया है।
1. राजपूत काल में भारत की राजनीतिक दशा कैसी थी? a राजनैतिक एकता थी b सामाजिक संगठन की कमी थी ✅ c देश छोटे-छोटे राज्यों में बंटा था d केवल भौगोलिक अभिव्यंजना रह गया था
2. राजपूतों ने कितनी शताब्दियों तक देश की रक्षा की? a तीन b चार ✅ c लगभग साढ़े पांच d सात
3. राजपूतकाल में प्रमुख सामाजिक दोष क्या थे? a जाति-प्रथा का अभाव ✅ b कठोर जाति-प्रथा c स्त्रियों का सम्मान कम होना d शूद्रों की सम्माननीय स्थिति
4. किस धार्मिक आचार्य ने अद्वैतवाद का प्रतिपादन किया? a कुमारिल भट्ट ✅ b शंकराचार्य c रामानुजाचार्य d भगवान बुद्ध
5. राजपूतकालीन भारत में प्रजा की राजनीति में कैसा रुझान था? a प्रजा सक्रिय थी ✅ b उदासीनता थी c प्रजा विद्रोही थी d प्रजा राजा के समर्थन में थी
6. राजपूत काल में किस प्रथा का प्रचलन था? ✅ a सामन्ती प्रथा b लोकतांत्रिक प्रथा c गणराज्य प्रथा d पंचायत प्रथा
7. राजपूतों में किस गुण की प्रशंसा टॉड ने की है? ✅ a साहस b धैर्य c दया d चालाकी
8. राजपूतकालीन भारत में स्त्रियों का स्थान कैसा था? a तुच्छ b समान ✅ c आदरणीय d उपेक्षित
9. राजपूत योद्धा युद्ध में किस व्रत की रक्षा के लिए प्राण देते थे? a भिक्षा ✅ b कुलाभिमान c दान d शिक्षा
10. राजपूतकाल में पर्दा प्रथा कब आरम्भ हुई? a प्रारंभ से b अंग्रेजों के आगमन से ✅ c मुसलमानों के आगमन से d बाद में
11. राजपूत युग में शिक्षा का कैसा विकास हुआ था? a शिक्षा का अभाव ✅ b विश्वविद्यालयों की स्थापना c स्कूल नहीं थे d गुरु-शिष्य परंपरा समाप्त
12. राजपूत काल के दौरान किस भाषा की साहित्य में उन्नति हुई? a उर्दू b मराठी ✅ c संस्कृत d अरबी
13. विक्रमशिला विश्वविद्यालय किस युग में विकसित हुआ? ✅ a राजपूत काल b वैदिक काल c मौर्य काल d गुप्त काल
14. कन्नौज के राजा महेंद्रपाल के दरबार में कौन कवि था? a जयदेव ✅ b राजशेखर c भवभूति d कुमारिल भट्ट
15. जयदेव ने किस ग्रंथ की रचना की? ✅ a गीतगोविन्द b पंचतंत्र c कथा सरित सागर d राजतरंगिणी
16. कल्हण ने किस ग्रंथ की रचना की? ✅ a राजतरंगिणी b पृथ्वीराज रासो c उत्तर रामचरित d महावीर चरित
17. चंदबरदाई किस राजा के दरबार में रहते थे? a सम्राट अशोक ✅ b पृथ्वीराज चौहान c विक्रमादित्य d भूपति
18. किस राजपूत नाटककार ने ‘महावीर-चरित’ लिखा? a जयदेव b सोमदेव ✅ c भवभूति d भोज
19. किस ग्रंथ का लेखक राजशेखर है? ✅ a कर्पूर-मंजरी b गीतगोविन्द c महावीर-चरित d कथा-सरित-सागर
20. राजपूतकालीन भारत में किस प्रमुख धर्म का पतन हुआ? a जैन धर्म b हिन्दू धर्म ✅ c बौद्ध धर्म d शैव धर्म
21. शंकराचार्य ने भारत में कितने मठ स्थापित किए? a दो ✅ b चार c छह d आठ
22. दक्षिण भारत में किस सम्प्रदाय का अधिक प्रचार हुआ? a वैष्णव b बौद्ध ✅ c लिंगायत d जैन
23. किस काल में मूर्तिकला का प्राचुर्य था? a मौर्य काल ✅ b राजपूत काल c गुप्त काल d मुगल काल
24. ‘सती’ प्रथा किस समाज में अधिक प्रचलित थी? a वैश्य b ब्राह्मण ✅ c राजपूत d शूद्र
25. किस वजह से मुसलमानों को समाज में आत्मसात नहीं किया गया? a संपत्ति की वजह b रंग-रूप की वजह ✅ c धर्म और संस्कृति की वजह d न शिक्षा की वजह
26. राजपूतकालीन भारत के हिन्दू समाज में कौन सा मुख्य दोष था? ✅ a संकीर्णता b उदारता c सहिष्णुता d प्रगतिशीलता
27. उत्तर-पश्चिमी सीमा सुरक्षा की क्या स्थिति थी? ✅ a समुचित व्यवस्था नहीं थी b पूरी सुरक्षा थी c अंग्रेजों का किला था d बंदरगाह थी
28. किस कारण शिव और विष्णु की पूजा अधिक प्रचलित थी? a प्राचीन ग्रन्थ b शंकराचार्य ✅ c धार्मिक आंदोलन d युद्ध
29. राजपूत काल में किस प्रथा का उदय हुआ? a सामूहिक विवाह ✅ b जौहर c बंधुआ मजदूर d विदेश गमन
30. किस काल में शूद्रों की स्थिति अत्यंत शोचनीय हो गई थी? ✅ a राजपूत काल b वैदिक काल c मौर्य काल d गुप्त काल
31. किस युग के राजपूत राजा कलानुरागी थे? ✅ a राजपूत काल b वैदिक काल c मौर्य काल d गुप्त काल
32. निम्न में से कौन-सा प्रसिद्ध दुर्ग राजपूतकाल में बना? a लाल किला b आगरा किला ✅ c चितौड़ d अंबर किला
33. दक्षिण भारत में किस बौद्ध धार्मिक स्थल को क्षति पहुँची? ✅ a विक्रमशिला b नालन्दा c कोणार्क d तंजौर
34. राजपूत काल के किस कवि ने ‘पृथ्वीराज रासो’ लिखा? ✅ a चंदबरदाई b सोमदेव c कल्हण d वाक्पति
35. किस धर्म के अनुयायी जादू, टोना, मन्त्र-तन्त्र में विश्वास करते थे? a बौद्ध ✅ b तान्त्रिक c शैव d जैन
36. राजपूत काल में कुलपति किसे कहा जाता था? a शिक्षक ✅ b विश्वविद्यालय प्रमुख c कवि d सेनापति
37. किस प्रथा के कारण हिन्दू और मुसलमानों के बीच खाई बन गई? a दहेज प्रथा ✅ b जाति प्रथा c बेटियों का विवाह d धन संग्रह
38. किस राजा के महल का हवामहल प्रसिद्ध है? a ग्वालियर ✅ b उदयपुर c जयपुर d चितौड़
39. किस काल के राजाओं ने शिक्षण संस्थाएँ बनवाई? ✅ a राजपूत काल b वैदिक काल c मौर्य काल d मुगल काल
40. नार्मल हिन्दू समाज में किस प्रकार के विवाह अच्छे माने जाते थे? ✅ a स्वजातीय b अन्तर्जातीय c सामूहिक d पुश्तैनी
41. किस तिथि में ‘राजपूतकालीन भारत’ का लेख प्रकाशित हुआ? a 2018 b 2019 ✅ c 12 मई 2020 d 2021
42. राजपूत योद्धा युद्ध करते समय कौन रंग का वस्त्र पहनते थे? ✅ a केसरिया b सफेद c नीला d हरा
43. किस ग्रंथ के लेखक सोमदेव हैं? a गीतगोविन्द b पृथ्वीराज रासो ✅ c कथा-सरित-सागर d राजतरंगिणी
44. किस युग के संस्कृत साहित्य में उन्नति हुई? ✅ a राजपूत काल b वैदिक काल c मौर्य काल d गुप्त काल
45. राजपूत काल में किस देवता की पूजा अधिक होती थी? ✅ a शिव और विष्णु b गणेश c सूर्य d इंद्र
46. राजपूत रानियों के कौन से गुण का डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने उल्लेख किया? a डर b विद्रोह ✅ c अद्भुत साहस d निर्णायकता
47. राजपूतों का प्रमुख सामाजिक आदर्श क्या था? ✅ a कुलाभिमान b धन संग्रह c व्यापारी भावना d मृदुलता
48. राजपूतों में किस युद्ध प्रथा का प्रचलन था? ✅ a जौहर b धोखे से युद्ध c विष विषाक्त d नाव युद्ध
49. राजपूत काल में किस संप्रदाय की वृद्धि हुई? a बौद्ध ✅ b तन्त्र c मुस्लिम d नाथ
50. किस मन्दिर का निर्माण आबू पर्वत पर हुआ था? a कोणार्क b जगन्नाथ ✅ c जैन मन्दिर d कैलाश
त्रिकोणीय संघर्ष MCQ : प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए गुर्जर प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूट शासकों के त्रिकोणीय संघर्ष पर 60 महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर दिए गए हैं। सही उत्तर के सामने हरे बॉक्स में सही का टिकमार्क ✅ दिया गया है।
1. गुर्जर-प्रतिहारों का सर्वप्रथम उदय कहाँ हुआ था? a) अवंति में b) मण्डोर में ✅ c) कन्नौज में d) ग्वालियर में
2. गुर्जर-प्रतिहारों को यह नाम क्यों दिया गया? a) वे गुजरात के शासक थे b) गुर्जर प्रदेश का स्वामी होने के कारण ✅ c) वे गुर्जर जाति के थे d) वे प्रतिहार (द्वारपाल) थे
3. हरिवंश पुराण में प्रतिहार शासक वत्सराज को क्या कहा गया है? a) कन्नौज का राजा b) अवंति-भू-भृत (अवंति का राजा) ✅ c) मालवा का स्वामी d) गुजरात का शासक
4. ग्वालियर अभिलेख में प्रतिहार नरेशों को किस वंश का बताया गया है? a) चंद्रवंशी b) सूर्यवंशी (सौमित्र-लक्ष्मण से उत्पन्न) ✅ c) अग्निकुल d) नागवंशी
5. गुर्जर-प्रतिहार वंश का संस्थापक कौन था? a) वत्सराज b) नागभट्ट प्रथम ✅ c) मिहिरभोज d) रामभद्र
6. नागभट्ट प्रथम का शासनकाल क्या था? a) 700-730 ई. b) 730-760 ई. ✅ c) 760-780 ई. d) 780-805 ई.
7. पाल वंश की स्थापना किसने की? a) धर्मपाल b) गोपाल ✅ c) देवपाल d) नारायणपाल
8. गोपाल को राजा कैसे बनाया गया? a) युद्ध में विजय के बाद b) बंगाल की जनता ने चुनाव द्वारा ✅ c) वंशानुगत उत्तराधिकार d) सामंतों द्वारा
9. गोपाल का शासनकाल क्या था? a) 730-750 ई. b) 750-770 ई. ✅ c) 770-790 ई. d) 790-810 ई.
10. राजा बनने से पूर्व गोपाल क्या था? a) मंत्री b) सेनापति ✅ c) सामंत d) व्यापारी
11. राष्ट्रकूटों को किस अभिलेख में ‘लट्टलूरपुरवराधीश’ कहा गया है? a) संजन अभिलेख b) नानाघाट अभिलेख ✅ c) ऐहोल अभिलेख d) जूनागढ़ अभिलेख
12. राष्ट्रकूट किस वंश की संतान माने जाते हैं? a) सूर्यवंशी b) यदुवंशी क्षत्रिय ✅ c) चंद्रवंशी d) अग्निकुल
13. राष्ट्रकूट वंश का मूल पुरुष कौन था? a) दन्तिदुर्ग b) रट्ट ✅ c) कृष्णराज d) ध्रुवराज
14. राष्ट्रकूटों ने किस वंश के सामंत के रूप में शासन किया? a) पल्लव b) वातापी के चालुक्य ✅ c) राष्ट्रकूट d) चोल
15. दन्तिदुर्ग ने किस चालुक्य राजा को परास्त किया? a) पुलकेशिन द्वितीय b) कीर्तिवर्मन ✅ c) विक्रमादित्य d) सोमेश्वर
16. एलोरा का प्रसिद्ध कैलाश मंदिर किसके शासनकाल में बना? a) दन्तिदुर्ग b) कृष्णराज प्रथम ✅ c) ध्रुवराज d) इन्द्र तृतीय
17. राष्ट्रकूट वंश का दूसरा प्रतापी शासक कौन था? a) कृष्णराज प्रथम b) ध्रुवराज ✅ c) गोविन्दराज तृतीय d) अमोघवर्ष
18. ध्रुवराज का शासनकाल क्या था? a) 760-780 ई. b) 780-796 ई. ✅ c) 796-814 ई. d) 814-833 ई.
19. राष्ट्रकूट वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा कौन था? a) ध्रुवराज b) इन्द्र तृतीय ✅ c) कृष्ण तृतीय d) अमोघवर्ष
20. इन्द्र तृतीय का शासनकाल क्या था? a) 860-880 ई. b) 880-914 ई. ✅ c) 914-922 ई. d) 922-936 ई.
21. इन्द्र तृतीय ने किस उपाधि को धारण किया? a) परम-वैष्णव b) परम-माहेश्वर ✅ c) परम-भागवत d) परम-सौर
22. राष्ट्रकूट वंश का अंतिम प्रतापी शासक कौन था? a) इन्द्र तृतीय b) कृष्ण तृतीय ✅ c) अमोघवर्ष d) गोविन्द चतुर्थ
23. राष्ट्रकूट वंश का अंत किसने किया? a) महमूद गजनवी b) तैलप द्वितीय ✅ c) पृथ्वीराज चौहान d) मिहिरभोज
24. राष्ट्रकूट वंश का अंत किस वर्ष हुआ? a) 950 ई. b) 973 ई. ✅ c) 1000 ई. d) 1025 ई.
25. कान्यकुब्ज का आयुध वंश किसकी मृत्यु के बाद उदय हुआ? a) हर्षवर्धन b) यशोवर्मन ✅ c) पृथ्वीराज d) भोज
26. आयुध वंश में कितने राजा हुए? a) दो b) तीन ✅ c) चार d) पांच
27. आयुध वंश के तीन राजा कौन-कौन थे? a) वज्रायुध, इन्द्रायुध, चक्रायुध ✅ b) धर्मपाल, देवपाल, गोपाल c) नागभट्ट, वत्सराज, मिहिरभोज d) अमोघवर्ष, इन्द्र, कृष्ण
28. आयुध वंश का शासनकाल क्या था? a) 750-790 ई. b) 770-810 ई. ✅ c) 790-830 ई. d) 810-850 ई.
29. त्रिकोणीय संघर्ष किन तीन वंशों के बीच हुआ? a) चोल, पल्लव, चालुक्य b) गुर्जर-प्रतिहार, पाल, राष्ट्रकूट ✅ c) मौर्य, गुप्त, हर्ष d) राजपूत, तुर्क, मुगल
30. त्रिकोणीय संघर्ष को और किस नाम से जाना जाता है? a) द्विवंशीय संघर्ष b) त्रिवंशीय संघर्ष ✅ c) चतुर्वंशीय संघर्ष d) पंचवंशीय संघर्ष
31. प्रतिहार वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा कौन था? a) नागभट्ट प्रथम b) वत्सराज ✅ c) नागभट्ट द्वितीय d) मिहिरभोज
32. वत्सराज का शासनकाल क्या था? a) 760-780 ई. b) 780-805 ई. ✅ c) 805-833 ई. d) 833-836 ई.
33. वत्सराज ने कन्नौज पर आक्रमण कब किया? a) 770 ई. b) 783 ई. ✅ c) 790 ई. d) 800 ई.
34. वत्सराज ने कन्नौज के किस शासक को अपने प्रभाव में लिया? a) वज्रायुध b) इन्द्रायुध ✅ c) चक्रायुध d) धर्मपाल
35. वत्सराज के समय बंगाल में कौन सा पाल शासक था? a) गोपाल b) धर्मपाल ✅ c) देवपाल d) नारायणपाल
36. वत्सराज और धर्मपाल के युद्ध में कौन विजयी रहा? a) धर्मपाल b) वत्सराज ✅ c) कोई नहीं d) दोनों
37. वत्सराज को किस राष्ट्रकूट नरेश ने पराजित किया? a) कृष्णराज प्रथम b) ध्रुव ✅ c) इन्द्र तृतीय d) अमोघवर्ष
38. वत्सराज को पराजित होने के बाद कहाँ शरण लेनी पड़ी? a) पहाड़ों में b) मरुस्थल में ✅ c) जंगल में d) समुद्र तट पर
39. ध्रुव ने धर्मपाल को कहाँ परास्त किया? a) कन्नौज में b) गंगा-यमुना के दोआब में ✅ c) बंगाल में d) मगध में
40. उत्तर भारत की विजय के बाद ध्रुव कहाँ लौट गया? a) कन्नौज में रुका b) दक्षिण भारत ✅ c) बंगाल d) गुजरात
41. धर्मपाल ने कन्नौज के किस राजा को सिंहासन पर बैठाया? a) इन्द्रायुध b) चक्रायुध ✅ c) वज्रायुध d) महीपाल
42. सोढल ने धर्मपाल को क्या उपाधि दी? a) दिग्विजयी b) उत्तरापथस्वामिन् ✅ c) चक्रवर्ती d) परमेश्वर
43. वत्सराज के बाद प्रतिहार वंश का राजा कौन बना? a) मिहिरभोज b) नागभट्ट द्वितीय ✅ c) रामभद्र d) महीपाल
44. नागभट्ट द्वितीय का शासनकाल क्या था? a) 780-805 ई. b) 805-833 ई. ✅ c) 833-836 ई. d) 836-885 ई.
45. नागभट्ट द्वितीय को किस राष्ट्रकूट शासक ने पराजित किया? a) ध्रुव b) गोविंद तृतीय ✅ c) इन्द्र तृतीय d) कृष्ण द्वितीय
46. गोविंद तृतीय का शासनकाल क्या था? a) 780-796 ई. b) 793-814 ई. ✅ c) 814-878 ई. d) 878-914 ई.
47. गोविंद तृतीय के दक्षिण लौटने के बाद नागभट्ट ने किस नगर पर अधिकार किया? a) पाटलिपुत्र b) कन्नौज ✅ c) उज्जैन d) गुजरात
48. नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाने के बाद किसे पराजित किया? a) देवपाल b) धर्मपाल ✅ c) नारायणपाल d) गोपाल
49. नागभट्ट और धर्मपाल के बीच युद्ध कहाँ हुआ? a) कन्नौज में b) मुंगेर में ✅ c) पाटलिपुत्र में d) प्रयाग में
50. नागभट्ट द्वितीय के बाद कौन प्रतिहार शासक बना? a) मिहिरभोज b) रामभद्र ✅ c) महीपाल d) भोज द्वितीय
51. रामभद्र का शासनकाल क्या था? a) 805-833 ई. b) 833-836 ई. ✅ c) 836-885 ई. d) 885-910 ई.
52. मिहिरभोज प्रथम का शासनकाल क्या था? a) 805-833 ई. b) 833-836 ई. c) 836-885 ई. ✅ d) 885-910 ई.
53. मिहिरभोज ने राष्ट्रकूट राज्य के किस प्रदेश पर अधिकार किया? a) कर्नाटक b) उज्जैन ✅ c) गुजरात d) महाराष्ट्र
54. मिहिरभोज के समय पाल वंश का कौन सा शासक था? a) धर्मपाल b) देवपाल ✅ c) नारायणपाल d) राज्यपाल
55. ग्वालियर अभिलेख के अनुसार मिहिरभोज ने किसे परास्त किया? a) धर्मपाल b) देवपाल ✅ c) नारायणपाल d) गोपाल द्वितीय
56. अरब यात्री सुलेमान ने प्रतिहार शासकों को क्या कहा? a) बल्लहरा b) गुज (गुर्जर-प्रतिहार) ✅ c) रुहमी d) बऊर
57. सुलेमान के अनुसार किस वंश की सेना सबसे बड़ी थी? a) प्रतिहार b) पाल ✅ c) राष्ट्रकूट d) चोल
58. मिहिरभोज के बाद प्रतिहार शासक कौन बना? a) रामभद्र b) महेन्द्रपाल प्रथम ✅ c) महीपाल प्रथम d) भोज द्वितीय
59. महेन्द्रपाल प्रथम का शासनकाल क्या था? a) 836-885 ई. b) 885-910 ई. ✅ c) 910-913 ई. d) 913-945 ई.
60. महेन्द्रपाल प्रथम के समय पाल वंश का कौन सा शासक था? a) देवपाल b) नारायणपाल ✅ c) धर्मपाल d) राज्यपाल
इस्लाम का उत्कर्ष MCQ : प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए 80 महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर दिए गए हैं। सही उत्तर के सामने हरे बॉक्स में सही का टिकमार्क ✅ दिया गया है।
1. ‘इस्लाम’ शब्द किस अरबी शब्द से निकला है? a) सलीम b) सलम ✅ c) सलाम d) अस्लम
2. ‘इस्लाम’ शब्द का अर्थ क्या है? a) शांति b) आज्ञा का पालन करना ✅ c) प्रार्थना d) विश्वास
3. इस्लाम के मानने वाले क्या कहलाते हैं? a) अरब b) मुसलमान ✅ c) मोमिन d) खलीफा
4. ‘मुसलमान’ शब्द किन दो शब्दों से मिलकर बना है? a) मुसल्ला-इमान b) मुसल्लम-ईमान ✅ c) मुस-इमान d) मुसलम-आन
5. इस्लाम के उदय से पूर्व अरबवासी किस प्रकार के धर्म को मानते थे? a) एकेश्वरवाद b) मूर्तिपूजा ✅ c) नास्तिकता d) बौद्ध धर्म
6. मक्का में स्थित प्रसिद्ध धार्मिक स्थान का क्या नाम है? a) मदीना b) काबा ✅ c) बगदाद d) दमिश्क
7. काबा में कितनी मूर्तियों की पूजा होती थी? a) 200 b) 300 c) 360 ✅ d) 400
8. काबा की रक्षा का भार किस कबीले के ऊपर था? a) हाशिम b) कुरेश ✅ c) उमय्यद d) अब्बासी
9. हजरत मुहम्मद साहब का जन्म कब हुआ था? a) 560 ई. b) 570 ई. ✅ c) 580 ई. d) 590 ई.
10. मुहम्मद साहब का जन्म किस नगर में हुआ था? a) मदीना b) मक्का ✅ c) दमिश्क d) बगदाद
11. मुहम्मद साहब के पिता का क्या नाम था? a) अली b) अब्दुल्ला ✅ c) अबूबकर d) उमर
12. मुहम्मद साहब की माता का क्या नाम था? a) खदीजा b) आयशा c) अमीना ✅ d) फातिमा
13. मुहम्मद साहब की माता की मृत्यु कब हुई? a) जन्म के समय b) 6 वर्ष की आयु में ✅ c) 8 वर्ष की आयु में d) 10 वर्ष की आयु में
14. मुहम्मद साहब ने किस आयु से व्यापार करना शुरू किया? a) 10 वर्ष b) 12 वर्ष ✅ c) 15 वर्ष d) 18 वर्ष
15. मुहम्मद साहब को किस आयु मेंअल्लाह का संदेश प्राप्त हुआ? a) 30 वर्ष b) 35 वर्ष c) 40 वर्ष ✅ d) 45 वर्ष
16. मुहम्मद साहब के पास अल्लाह का संदेश लेकर कौन सा फरिश्ता आया था? a) मीकाईल b) जिबराइल ✅ c) इसराफील d) अजराईल
17. मुहम्मद साहब ने अपना पहला उपदेश किसे दिया? a) अपनी बेटी को b) अपनी पत्नी खदीजा को ✅ c) अबूबकर को d) अली को
18. मुहम्मद साहब ने मक्का को छोड़कर मदीना कब गए? a) 622 ई. ✅ b) 624 ई. c) 626 ई. d) 630 ई.
19. हिजरी संवत् किस घटना से प्रारंभ होता है? a) मुहम्मद का जन्म b) मक्का से मदीना जाना ✅ c) मुहम्मद की मृत्यु d) पहला युद्ध
20. ‘हिजरत’ का अर्थ क्या है? a) जुदा या अलग हो जाना ✅ b) प्रवास c) युद्ध d) शांति
21. मुहम्मद साहब मदीना में कितने वर्ष रहे? a) 5 वर्ष b) 7 वर्ष c) 9 वर्ष ✅ d) 10 वर्ष
22. मुहम्मद साहब की मृत्यु कब हुई? a) 630 ई. b) 632 ई. ✅ c) 634 ई. d) 636 ई.
23. मुहम्मद साहब के उत्तराधिकारी क्या कहलाए? a) सुल्तान b) खलीफा ✅ c) इमाम d) अमीर
24. मुहम्मद साहब के उपदेश किस ग्रंथ में संकलित हैं? a) हदीस b) कुरान ✅ c) सुन्ना d) शरिया
25. ‘कुरान’ शब्द किस अरबी शब्द से निकला है? a) किराअत b) किरन ✅ c) करीब d) करम
26. ‘कुरान’ का अर्थ क्या है? a) पवित्र पुस्तक b) ईश्वर के निकट ले जाने वाला ग्रंथ ✅ c) धार्मिक नियम d) उपदेश
27. ‘अल्लाह’ शब्द किस शब्द से बना है? a) अलह ✅ b) अली c) अलम d) अलीम
28. ‘अल्लाह’ का शाब्दिक अर्थ क्या है? a) महान b) पाक या पवित्र ✅ c) शक्तिशाली d) दयालु
29. ‘कयामत’ का अर्थ क्या है? a) स्वर्ग b) प्रलय या दुनिया का मिट जाना ✅ c) नरक d) पुनर्जन्म
30. ‘फरिश्ता’ का शाब्दिक अर्थ क्या है? a) देवदूत b) मिलाप या एक चीज का दूसरी से मेल ✅ c) पवित्र आत्मा d) संदेशवाहक
31. कुरान के अनुसार प्रत्येक मुसलमान के कितने कर्तव्य हैं? a) तीन b) चार c) पांच ✅ d) छह
32. मुसलमानों के पांच कर्तव्यों में कौन शामिल नहीं है? a) कलमा b) नमाज c) जिहाद ✅ d) हज
33. ‘कलमा’ का अर्थ क्या है? a) प्रार्थना b) ईश्वर वाक्य ✅ c) दान d) उपवास
34. ‘नमाज’ का अर्थ क्या है? a) प्रार्थना b) खिदमत या बंदगी ✅ c) दान d) तीर्थयात्रा
35. नमाज दिन में कितनी बार पढ़ी जाती है? a) तीन बार b) चार बार c) पांच बार ✅ d) छह बार
36. मुसलमान किस दिन इकट्ठे होकर नमाज पढ़ते हैं? a) सोमवार b) गुरुवार c) शुक्रवार ✅ d) रविवार
37. ‘जकात’ का शाब्दिक अर्थ क्या है? a) दान देना b) ज्यादा होना या बढ़ना ✅ c) धन d) भीख
38. प्रत्येक मुसलमान को अपनी आय का कौन सा हिस्सा दान देना चाहिए? a) बीसवां b) तीसवां c) चालीसवां ✅ d) पचासवां
39. ‘रमजान’ चाँद का कौन सा महीना होता है? a) सातवां b) आठवां c) नौवां ✅ d) दसवां
40. ‘रमजान’ शब्द किस शब्द से बना है? a) रमज ✅ b) रमत c) रमन d) रमस
41. रोजे में कब खाना-पीना वर्जित होता है? a) सुबह से शाम तक b) सूर्योदय से सूर्यास्त तक ✅ c) पूरे दिन d) रात में
42. ‘हज’ का शाब्दिक अर्थ क्या है? a) तीर्थयात्रा b) इरादा ✅ c) पवित्र स्थान d) प्रार्थना
43. ‘हज’ का व्यावहारिक अर्थ क्या है? a) मदीना जाना b) मक्का जाकर बंदगी करना ✅ c) दान देना d) रोजा रखना
44. इस्लाम के अनुयायी कितने सम्प्रदायों में विभक्त हैं? a) दो ✅ b) तीन c) चार d) पांच
45. इस्लाम के दो प्रमुख सम्प्रदाय कौन से हैं? a) सूफी और वहाबी b) शिया और सुन्नी ✅ c) अहमदिया और सूफी d) हनफी और शाफी
46. ‘शिया’ सम्प्रदाय किसे मुहम्मद का वास्तविक उत्तराधिकारी मानता है? a) अबूबकर b) उमर c) अली ✅ d) उस्मान
47. ‘सुन्नी’ शब्द किस शब्द से निकला है? a) सुन्नत ✅ b) सुन्ना c) सुनाह d) सुनत
48. शिया सम्प्रदाय का झण्डा किस रंग का होता है? a) हरा b) काला ✅ c) सफेद d) लाल
49. सुन्नी सम्प्रदाय का झण्डा किस रंग का होता है? a) हरा b) काला c) सफेद ✅ d) लाल
50. ‘खलीफा’ शब्द किस शब्द से निकला है? a) खलाफ b) खलफ ✅ c) खलीफत d) खलक
51. ‘खलीफा’ का अर्थ क्या है? a) राजा b) उत्तराधिकारी या जाँ-नशीन ✅ c) धार्मिक नेता d) सेनापति
52. मुहम्मद साहब के बाद प्रथम खलीफा कौन बने? a) उमर b) अबूबकर ✅ c) उस्मान d) अली
53. खलीफा अबूबकर मुहम्मद साहब के क्या लगते थे? a) चचेरे भाई b) ससुर ✅ c) दामाद d) मामा
54. द्वितीय खलीफा कौन बने? a) अबूबकर b) उमर ✅ c) उस्मान d) अली
55. खलीफा उमर ने इस्लाम का प्रचार किन देशों में किया? a) भारत और चीन b) फारस और मिस्र ✅ c) यूनान और रोम d) अफ्रीका और यूरोप
56. खलीफा उमर के बाद कौन खलीफा बना? a) अली b) उस्मान ✅ c) हसन d) मुआविया
57. खलीफा उस्मान की हत्या किस कारण से हुई? a) युद्ध में b) विलास प्रियता के कारण ✅ c) बीमारी से d) षड्यंत्र से
58. उस्मान के बाद चौथे खलीफा कौन बने? a) मुआविया b) अली ✅ c) हसन d) हुसैन
59. खलीफा अली की हत्या कैसे हुई? a) युद्ध में b) वध कर दिया गया ✅ c) बीमारी से d) दुर्घटना में
60. अली के बाद उनका कौन सा पुत्र खलीफा चुना गया? a) हुसैन b) हसन ✅ c) अब्बास d) जैद
अरबवासियों का भारत आक्रमण MCQ : प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए 80 महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर दिए गए हैं। सही उत्तर के सामने हरे बॉक्स में सही का टिकमार्क ✅ दिया गया है।
1. अरब प्रायद्वीप में कौन सा महासागर दक्षिण में स्थित है? a) प्रशांत महासागर b) हिन्द महासागर ✅ c) अटलांटिक महासागर d) आर्कटिक महासागर
2. अरबवासी मुख्यतः किस प्रकार के जीवन यापन करते थे? a) कृषक b) व्यापारी c) खानाबदोश ✅ d) शिकारी
3. अरबवासियों का भारत के साथ सम्बन्ध किस समय से स्थापित माना जाता है? a) मध्य काल b) प्राचीन काल ✅ c) आधुनिक काल d) किसी विशेष युग से नहीं
4. प्रारंभिक अरब-भारत सम्बन्ध किस मुख्य कारण से बना था? a) युद्ध b) व्यापार ✅ c) शिक्षा d) धर्म परिवर्तन
5. भारतीय समुद्री तटों पर अरबवासियों की बस्तियाँ बसने का मुख्य कारण क्या था? a) राजाओं का आमंत्रण ✅ b) धार्मिक प्रचार c) मौसम d) सुरक्षा
6. इस्लाम का प्रचार भारत में किसके माध्यम से प्रारंभ हुआ? a) सैनिकों b) व्यापारियों ✅ c) राजाओं d) पुजारियों
7. अरबवासियों के भारत पर आक्रमण का मुख्य उद्देश्य क्या था? a) व्यापार b) ज्ञान c) सम्पत्ति लूटना ✅ d) मैत्री
8. भारत पर अरब आक्रमण का पहला बड़ा अभियान किसने चलाया था? a) महमूद गजनवी b) हज्जाज c) मुहम्मद बिन कासिम ✅ d) अलाउद्दीन खिलजी
9. मुहम्मद बिन कासिम ने भारत पर आक्रमण कब किया था? a) 800 ई. b) 711 ई. ✅ c) 1192 ई. d) 1025 ई.
10. मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के समय इराक का गवर्नर कौन था? a) अलाउद्दीन b) हज्जाज ✅ c) दाहिर d) कासिम
11. मुहम्मद बिन कासिम ने किस बंदरगाह पर सबसे पहले आक्रमण किया? a) देबल ✅ b) सूरत c) कालीकट d) मुंबई
12. सिंध का राजा कौन था जब मुहम्मद बिन कासिम ने आक्रमण किया? a) पृथ्वीराज चौहान b) राजा दाहिर ✅ c) जयचंद d) हर्षवर्धन
13. राजा दाहिर किस वंश का शासक था? a) राजपूत वंश b) ब्राह्मण वंश ✅ c) मौर्य वंश d) गुप्त वंश
14. मुहम्मद बिन कासिम की उम्र आक्रमण के समय कितनी थी? a) 25 वर्ष b) 17 वर्ष ✅ c) 30 वर्ष d) 20 वर्ष
15. मुहम्मद बिन कासिम के साथ कितने सैनिक थे? a) 5000 b) 6000 ✅ c) 10000 d) 15000
16. देबल के किले पर विजय के बाद मुहम्मद बिन कासिम ने कहाँ आक्रमण किया? a) दिल्ली b) निरुन ✅ c) लाहौर d) कन्नौज
17. राजा दाहिर की मृत्यु कहाँ हुई थी? a) देबल में b) रावर के युद्ध में ✅ c) मुल्तान में d) अलोर में
18. मुल्तान पर विजय के समय वहाँ का शासक कौन था? a) दाहिर b) ब्राह्मण शासक ✅ c) राजपूत राजा d) बौद्ध शासक
19. मुल्तान के शासक ने आत्मसमर्पण क्यों किया? a) सेना की कमी b) जल की कमी ✅ c) भोजन की कमी d) भय के कारण
20. मुहम्मद बिन कासिम ने भारत में कितने समय तक शासन किया? a) 5 वर्ष b) 3 वर्ष ✅ c) 10 वर्ष d) 7 वर्ष
21. मुहम्मद बिन कासिम की मृत्यु कैसे हुई? a) युद्ध में b) खलीफा के आदेश पर मृत्युदंड ✅ c) बीमारी से d) दुर्घटना में
22. मुहम्मद बिन कासिम के बाद अरबों का शासन कहाँ तक सीमित रहा? a) पूरे भारत में b) केवल सिंध और मुल्तान तक ✅ c) उत्तर भारत में d) दक्षिण भारत में
23. अरबों के आक्रमण का भारतीय इतिहास पर क्या प्रभाव पड़ा? a) कोई प्रभाव नहीं b) राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभाव ✅ c) केवल आर्थिक प्रभाव d) केवल धार्मिक प्रभाव
24. किस शताब्दी में मुहम्मद बिन कासिम ने भारत पर आक्रमण किया? a) 6वीं शताब्दी b) 8वीं शताब्दी ✅ c) 10वीं शताब्दी d) 12वीं शताब्दी
25. अरबों का मुख्य उद्देश्य भारत में क्या था? a) ज्ञान प्राप्ति b) धन-संपत्ति और साम्राज्य विस्तार ✅ c) व्यापार d) पर्यटन
26. मुहम्मद बिन कासिम किसका भतीजा था? a) खलीफा का b) हज्जाज का ✅ c) दाहिर का d) सुलेमान का
27. अरबों के आक्रमण के समय भारत की राजनीतिक स्थिति कैसी थी? a) एकीकृत b) विभाजित और कमजोर ✅ c) शक्तिशाली d) संगठित
28. देबल का किला किस सागर के किनारे स्थित था? a) बंगाल की खाड़ी b) अरब सागर ✅ c) हिन्द महासागर d) प्रशांत महासागर
29. मुहम्मद बिन कासिम ने किस धर्म के लोगों को ‘जिम्मी’ का दर्जा दिया? a) बौद्धों को b) हिन्दुओं को ✅ c) जैनों को d) सिखों को
30. ‘जिम्मी’ का अर्थ क्या था? a) शत्रु b) संरक्षित व्यक्ति ✅ c) दास d) मित्र
31. मुहम्मद बिन कासिम ने हिन्दुओं से क्या कर वसूला? a) लगान b) जजिया ✅ c) चुंगी d) उपकर
32. अरबों के आक्रमण से पूर्व भारत में कौन सा धर्म प्रमुख था? a) इस्लाम b) हिन्दू और बौद्ध धर्म ✅ c) ईसाई धर्म d) जैन धर्म
33. मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण का तात्कालिक कारण क्या था? a) व्यापार b) समुद्री लुटेरों द्वारा अरब जहाज लूटना ✅ c) धर्म प्रचार d) राजनीतिक विस्तार
34. राजा दाहिर की पत्नी का क्या नाम था? a) पद्मिनी b) रानी लाड़ी ✅ c) रानी कर्णावती d) रानी दुर्गावती
35. मुहम्मद बिन कासिम ने किस नगर को अपनी राजधानी बनाया? a) देबल b) अलोर ✅ c) मुल्तान d) निरुन
36. रावर का युद्ध किस नदी के किनारे हुआ था? a) गंगा b) सिंधु ✅ c) यमुना d) ब्रह्मपुत्र
37. अरबों के आक्रमण के समय भारतीय शासकों की सबसे बड़ी कमजोरी क्या थी? a) सैन्य शक्ति की कमी b) आपसी फूट ✅ c) धन की कमी d) हथियारों की कमी
38. मुहम्मद बिन कासिम की सेना में कौन सा विशेष हथियार था? a) तोप b) मंजनीक (पत्थर फेंकने की मशीन) ✅ c) बंदूक d) तलवार
39. अरबों ने भारत में किस भाषा का प्रचार किया? a) अरबी ✅ b) फारसी c) उर्दू d) तुर्की
40. मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के समय भारत में कौन सा राजवंश सबसे शक्तिशाली था? a) गुप्त वंश b) कोई एक नहीं, विभिन्न क्षेत्रीय राजवंश ✅ c) मौर्य वंश d) मुगल वंश
41. देबल के किले को जीतने में मुहम्मद बिन कासिम को कितने समय लगा? a) 1 दिन b) कई दिन ✅ c) 1 महीना d) 1 वर्ष
42. अरबों के आक्रमण से भारत में किस धर्म का प्रवेश हुआ? a) ईसाई धर्म b) इस्लाम ✅ c) यहूदी धर्म d) पारसी धर्म
43. मुहम्मद बिन कासिम के बाद किस वंश ने भारत पर आक्रमण किया? a) मुगल b) गजनवी ✅ c) खिलजी d) लोदी
44. अरबों के आक्रमण का भारतीय व्यापार पर क्या प्रभाव पड़ा? a) व्यापार बंद हो गया b) नए व्यापारिक मार्ग खुले ✅ c) कोई प्रभाव नहीं d) व्यापार घट गया
45. मुहम्मद बिन कासिम की सेना में घोड़ों की संख्या कितनी थी? a) 1000 b) 2000 ✅ c) 5000 d) 10000
46. राजा दाहिर के विरुद्ध किसने मुहम्मद बिन कासिम का साथ दिया? a) सभी हिन्दू राजा b) कुछ स्थानीय प्रमुख और बौद्ध ✅ c) कोई नहीं d) सभी मुस्लिम
47. मुल्तान किस लिए प्रसिद्ध था? a) व्यापार केंद्र b) सूर्य मंदिर ✅ c) किला d) बंदरगाह
48. मुहम्मद बिन कासिम ने हिन्दू मंदिरों के साथ क्या व्यवहार किया? a) सभी को नष्ट किया b) कुछ को संरक्षण दिया ✅ c) सभी को बंद कर दिया d) सभी को मस्जिद बना दिया
49. अरबों के आक्रमण के समय सिंध की आर्थिक स्थिति कैसी थी? a) बहुत गरीब b) समृद्ध ✅ c) साधारण d) दिवालिया
50. मुहम्मद बिन कासिम को वापस बुलाने का आदेश किसने दिया? a) हज्जाज b) नए खलीफा सुलेमान ✅ c) दाहिर d) स्वयं कासिम ने
51. अरबों के शासन में हिन्दुओं को किस क्षेत्र में स्वतंत्रता थी? a) राजनीतिक b) धार्मिक ✅ c) सैन्य d) आर्थिक
52. देबल में कितने बौद्ध भिक्षु रहते थे? a) 500 b) 700 ✅ c) 1000 d) 200
53. मुहम्मद बिन कासिम ने किस नीति का पालन किया? a) कठोर दमन b) धार्मिक सहिष्णुता ✅ c) पूर्ण स्वतंत्रता d) अराजकता
54. अरबों के आक्रमण से भारतीय संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ा? a) कोई प्रभाव नहीं b) सांस्कृतिक मिश्रण ✅ c) संस्कृति नष्ट हो गई d) केवल नकारात्मक प्रभाव
55. सिंध में अरब शासन कब तक रहा? a) 50 वर्ष b) लगभग 300 वर्ष ✅ c) 100 वर्ष d) 500 वर्ष
56. मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के समय भारत में कौन सी लिपि प्रचलित थी? a) देवनागरी ✅ b) अरबी c) रोमन d) फारसी
57. अरबों ने भारतीय ज्ञान को किस भाषा में अनुवादित किया? a) फारसी b) अरबी ✅ c) उर्दू d) तुर्की
58. राजा दाहिर की सेना में कितने सैनिक थे? a) 5000 b) 20000 ✅ c) 50000 d) 10000
59. मुहम्मद बिन कासिम ने किस आयु में सेनापति का पद संभाला? a) 25 वर्ष b) 17 वर्ष ✅ c) 30 वर्ष d) 20 वर्ष
60. अरबों के आक्रमण के समय भारत में कौन सा शासन तंत्र था? a) लोकतंत्र b) राजतंत्र ✅ c) गणतंत्र d) तानाशाही
61. मुहम्मद बिन कासिम की मृत्यु के समय उसकी आयु कितनी थी? a) 25 वर्ष b) 20 वर्ष ✅ c) 30 वर्ष d) 35 वर्ष
62. अरबों के आक्रमण का मुख्य मार्ग कौन सा था? a) समुद्री और स्थलीय दोनों ✅ b) केवल समुद्री c) केवल स्थलीय d) हवाई
63. राजा दाहिर की सेना में कौन सा मुख्य हथियार था? a) तोप b) हाथी ✅ c) घोड़े d) रथ
64. मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण का उल्लेख किस पुस्तक में मिलता है? a) अकबरनामा b) चचनामा ✅ c) तबकात-ए-नासिरी d) तारीख-ए-फिरोजशाही
65. अरबों ने सिंध में किस प्रकार का प्रशासन स्थापित किया? a) लोकतांत्रिक b) केंद्रीकृत इस्लामी शासन ✅ c) हिन्दू प्रशासन d) मिश्रित शासन
66. मुहम्मद बिन कासिम के बाद सिंध का गवर्नर कौन बना? a) हज्जाज b) अरब अधिकारी ✅ c) दाहिर का पुत्र d) कोई स्थानीय राजा
67. अरबों के आक्रमण से भारतीय स्थापत्य कला पर क्या प्रभाव पड़ा? a) कोई प्रभाव नहीं b) इस्लामी स्थापत्य शैली का समावेश ✅ c) पूर्णतः नष्ट हो गई d) केवल मंदिर निर्माण बंद हुआ
68. देबल का किला किसने बनवाया था? a) अरबों ने b) हिन्दू राजाओं ने ✅ c) मुगलों ने d) अंग्रेजों ने
69. मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के समय बगदाद का खलीफा कौन था? a) हारून अल रशीद b) वलीद प्रथम ✅ c) अबू बक्र d) उमर
70. अरबों के आक्रमण से भारतीय साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा? a) कोई प्रभाव नहीं b) नई साहित्यिक परंपराओं का विकास ✅ c) साहित्य नष्ट हो गया d) केवल संस्कृत साहित्य बचा
71. राजा दाहिर के कितने पुत्र थे? a) एक b) दो ✅ c) तीन d) चार
72. मुहम्मद बिन कासिम ने युद्ध में किस रणनीति का प्रयोग किया? a) गुरिल्ला युद्ध b) घेराबंदी और सीधा हमला ✅ c) नौसैनिक युद्ध d) रक्षात्मक युद्ध
73. अरबों के आक्रमण के बाद सिंध में किस धर्म के लोगों की संख्या बढ़ी? a) हिन्दू b) मुस्लिम ✅ c) बौद्ध d) जैन
74. मुल्तान के सूर्य मंदिर में क्या विशेषता थी? a) बहुत ऊंचा था b) बहुत धनी था ✅ c) बहुत पुराना था d) विशाल था
75. अरबों के आक्रमण के समय भारतीय नौसेना की स्थिति कैसी थी? a) बहुत मजबूत b) कमजोर ✅ c) विश्व की सर्वश्रेष्ठ d) मध्यम
76. मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण का दीर्घकालिक परिणाम क्या था? a) कोई परिणाम नहीं b) भारत में इस्लाम की स्थापना का प्रारंभ ✅ c) अरबों का साम्राज्य विस्तार d) भारत का एकीकरण
77. राजा दाहिर की राजधानी कहाँ थी? a) देबल b) अलोर ✅ c) मुल्तान d) लाहौर
78. अरबों ने भारतीय गणित और विज्ञान को क्या नाम दिया? a) अरबी विज्ञान b) हिन्द के अंक ✅ c) इस्लामी गणित d) सिंधी विज्ञान
79. मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण का तात्कालिक प्रभाव क्या था? a) पूरे भारत पर अधिकार b) केवल सिंध और मुल्तान पर अधिकार ✅ c) कोई प्रभाव नहीं d) दक्षिण भारत पर अधिकार
80. अरबों के आक्रमण से भारतीय इतिहास में कौन सा नया युग प्रारंभ हुआ? a) प्राचीन युग b) मध्यकालीन युग ✅ c) आधुनिक युग d) उत्तर-वैदिक युग
महमूद गजनवी के आक्रमण MCQ : 80 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर। यहाँ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए महमूद गजनवी के भारत आक्रमणों पर 80 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर दिए गए हैं।
1. महमूद गजनवी ने भारत पर कितनी बार आक्रमण किया? a 12 b 15 c 17 ✅ d 21
2. महमूद गजनवी का जन्म कब हुआ था? a 997 ई. b 971 ई. ✅ c 1000 ई. d 1018 ई.
3. महमूद गजनवी के दरबारी इतिहासकार का नाम क्या था? a उत्बी ✅ b अलबरुनी c तबरारी d बदायुनी
4. महमूद गजनवी ने किस वर्ष गजनी के सिंहासन पर अधिकार किया? a 1005 ई. b 998 ई. ✅ c 1011 ई. d 1025 ई.
5. सोमनाथ के मंदिर पर महमूद का आक्रमण किस वर्ष हुआ? a 1022 ई. b 1014 ई. c 1025 ई. ✅ d 1018 ई.
6. महमूद गजनवी के आक्रमणों के मुख्य उद्देश्य क्या थे? a सम्पत्ति लूटना एवं इस्लाम प्रसार ✅ b व्यापार बढ़ाना c राज्य विस्तार d कृषि सुधार
7. किस शासक के शासन काल में गजनी राज्य स्थापित हुआ? a सुबुक्तगीन ✅ b जयपाल c महमूद d अलाउद्दीन
8. महमूद गजनवी के प्रथम प्रसिद्ध आक्रमण का शिकार कौन सा राज्य हुआ? a मुल्तान b कन्नौज c पंजाब ✅ d काश्मीर
9. थानेश्वर का प्रसिद्ध मंदिर महमूद ने कहाँ ले जाकर फेंका? a बगदाद b गजनी ✅ c कन्नौज d दिल्ली
10. महमूद ने किसके विरुद्ध नगरकोट का युद्ध लड़ा? a काश्मीर के राजा b जयपाल c आनंदपाल ✅ d महीपाल
11. गजनी का निर्माण किनके द्वारा किया गया था? a तुर्क b यदुवंशी भाटियों ✅ c अरब d हूण
12. महमूद गजनवी के कुल शासनकाल के वर्ष कितने थे? a 30 वर्ष b 32 वर्ष ✅ c 27 वर्ष d 20 वर्ष
13. मुल्तान के शासक का नाम क्या था जिस पर महमूद ने आक्रमण किया? a सेवकपाल b दाऊद ✅ c जयपाल d महीपाल
14. महमूद ने किस वर्ष अपने अंतिम भारत आक्रमण में सिंध के जाटों पर हमला किया? a 1025 ई. b 1020 ई. c 1027 ई. ✅ d 1018 ई.
15. गजनवी वंश के संस्थापक कौन थे? a महमूद b सुबुक्तगीन ✅ c जायपाल d अल्पतगीन
16. महमूद ने किस युद्ध में आनंदपाल को हराया? a कालिंजर b नगरकोट ✅ c थानेश्वर d मुल्तान
17. गजनी की ओर आकृष्ट होने का मुख्य कारण क्या था? a उपजाऊ भूमि b भारत की संपत्ति ✅ c व्यापार d रणनीतिक स्थिति
18. महमूद गजनवी के समय उत्तर-पश्चिम भारत में किस वंश का शासन था? a चौहान b पाल c हिन्दूशाही ✅ d चोल
19. भारत में इस्लाम के प्रसार का मुख्य आरंभ किसके आक्रमण से हुआ? a तुर्क ✅ b अरब c ईरान d हूण
20. महमूद ने किस शहर के मंदिर को सर्वाधिक लूटा? a मथुरा b कन्नौज c सोमनाथ ✅ d मुल्तान
21. महमूद गजनवी के समय भारत का सबसे समृद्ध राज्य कौन सा माना जाता था? a बंगाल b गुजरात c कन्नौज ✅ d कश्मीर
22. गजनवी सेना में सबसे अधिक कौन शामिल थे? a तुर्क ✅ b मंगोल c हिन्दू d फारसी
23. किस भारतीय राजा ने महमूद के आक्रमण के विरोध में सबसे प्रमुख भूमिका निभाई? a जयपाल ✅ b भोजराज c महीपाल d द्वारपाल
24. महमूद गजनवी ने किस साल मुल्तान पर विजय पाई थी? a 1005 ई. ✅ b 1011 ई. c 1020 ई. d 1000 ई.
25. महमूद द्वारा प्रथम आक्रमण किस क्षेत्र पर हुआ? a हिन्दूशाही राज्य ✅ b सोमनाथ c मुल्तान d कन्नौज
26. किस इतिहासकार ने महमूद गजनवी को महान विजेता कहा है? a उत्बी b अलबरुनी ✅ c राजतरंगिणी d नामज्ञात नहीं
27. महमूद के किस प्रसिद्ध आक्रमण में ‘मथुरा’ को लूटा गया था? a 1018 ई. ✅ b 1011 ई. c 1025 ई. d 1026 ई.
28. महमूद ने कितनी बार कन्नौज पर आक्रमण किया? a एक बार b दो बार ✅ c तीन बार d चार बार
29. आनंदपाल द्वारा महमूद को रोकने के लिए किस संगठन का निर्माण किया गया? a हिन्दू महासभा b हिन्दू धर्मसंघ c हिन्दू महासंघ ✅ d हिन्दू सेना दल
30. महमूद गजनवी का पिता कौन था? a जयपाल b सुबुक्तगीन ✅ c अल्पतगीन d बदायुनी
31. महमूद गजनवी ने किस वर्ष दिल्ली पर आक्रमण किया? a 1010 ई. b 1008 ई. c 1018 ई. ✅ d 1025 ई.
32. कौन सा मंदिर महमूद गजनवी की लूट का बड़ा केंद्र बना था? a सोमनाथ ✅ b अयोध्या c काशी d मथुरा
33. गजनवी वंश के किस शासक ने भारत पर सबसे अधिक आक्रमण किए? a महमूद ✅ b सुबुक्तगीन c अल्पतगीन d तुगलक
34. किसके शासनकाल में महमूद ने मुल्तान का किला जीता? a जयपाल b दाऊद ✅ c महीपाल d भोजराज
35. महमूद का दरबारी विद्वान ‘अलबरुनी’ किस देश से था? a तुर्की b ईरान ✅ c अरब d चीन
36. महमूद गजनवी ने किस राज्य पर सबसे विभीषिका पूर्ण आक्रमण किया था? a सोमनाथ ✅ b मुल्तान c ग्वालियर d कन्नौज
37. महमूद गजनवी की मृत्यु कब हुई थी? a 1030 ई. ✅ b 1018 ई. c 1025 ई. d 1020 ई.
38. कौन सा शासक महमूद के आक्रमणों के समय कमजोर था? a चोल b पाल c प्रतिहार ✅ d चालुक्य
39. महमूद के आक्रमणों का सबसे बड़ा सामाजिक प्रभाव क्या पड़ा? a कला का विकास b हिंदू समाज में भय ✅ c राज्य समाप्त d साक्षरता बढ़ी
40. महमूद गजनवी ने किस वर्ष अलबरुनी को भारत लाया? a 1017 ई. ✅ b 1025 ई. c 1027 ई. d 1030 ई.
41. महमूद के आक्रमणों के कारण किस राजवंश का पतन हुआ था? a हिन्दूशाही ✅ b पाल c चौहान d सिंध
42. महमूद गजनवी ने सिंध के जाटों को कब हराया? a 1018 ई. b 1025 ई. c 1027 ई. ✅ d 1005 ई.
43. किस नदी के पास भारत में महमूद व जयपाल का युद्ध हुआ था? a यमुना b सिन्धु ✅ c सरस्वती d घग्घर
44. महमूद गजनवी का शासन काल कितने वर्षों का था? a 25 b 32 ✅ c 20 d 17
45. महमूद ने कन्नौज पर कब आक्रमण किया? a 1018 ई. ✅ b 1011 ई. c 1025 ई. d 1005 ई.
46. महमूद ने जोधपुर पर किस वर्ष हमला किया? a 1024 ई. b 1025 ई. c 1026 ई. ✅ d 1027 ई.
47. महमूद गजनवी किस धर्म का था? a ईसाई b पारसी c इस्लाम ✅ d बौद्ध
48. किस शासक ने महमूद से बार-बार हारकर आत्महत्या कर ली? a जयपाल ✅ b भोजराज c महीपाल d सहदेव
49. कौन सा शहर महमूद के दरबार का प्रमुख केंद्र था? a बगदाद b गजनी ✅ c काबुल d कंधार
50. किस युद्ध में हिन्दू राजा सबसे संगठित दिखे? a थानेश्वर b सोमनाथ c वाहीन्द ✅ d मुल्तान
51. थानेश्वर का मंदिर किस देवता का था जिसे तोड़ा गया? a विष्णु b शिव ✅ c सूर्य d ब्रह्मा
52. जयपाल किस राज्य का शासक था? a हिन्दूशाही ✅ b कन्नौज c चोल d गुप्त
53. महमूद गजनवी ने बटेश्वर नामक मंदिर कहाँ ध्वस्त किया? a मथुरा ✅ b सोमनाथ c मुल्तान d कन्नौज
54. महमूद गजनवी के कुल भारत आक्रमणों की संख्या क्या थी? a 15 b 17 ✅ c 12 d 21
55. किस वर्ष महमूद ने बिहार पर हमला किया? a 1025 ई. b 1020 ई. c 1027 ई. d बिहार पर आक्रमण नहीं किया ✅
56. महमूद गजनवी ‘नारुन’ किस संबंध में प्रसिद्ध है? a अधिकार b धर्म c न्याय d युद्ध गान (गीत) ✅
57. किस राजा ने अपनी हार के बाद आग में कूदकर प्राण त्याग दिए? a जयपाल ✅ b भोजराज c महीपाल d जयचंद्र
58. कौन सा नगर महमूद के आक्रमण से बाल-बाल बचा? a गजनी b काशी c दिल्ली d उज्जैन ✅
59. ‘कन्नौज’ किस नदी के किनारे स्थित है? a यमुना b गंगा ✅ c सरस्वती d सिन्धु
60. महमूद गजनवी के किन आक्रमणों से मंदिर सर्वाधिक लूटे गए? a सोमनाथ ✅ b मथुरा c मुल्तान d नगरकोट
61. महमूद गजनवी ने किस भारतीय राज्य को “सोने की चिड़िया” कहा था? a बंगाल b कन्नौज c भारत ✅ d गुजरात
62. महमूद के समय गजनी का चरमोत्कर्ष किस कारण हुआ? a व्यापार b सेना c लूट व आक्रमण ✅ d साहित्य
63. महमूद गजनवी भारत में किसके विरुद्ध सबसे पहली बार विजयी हुआ था? a जयपाल ✅ b भोजराज c महीपाल d आनंदपाल
64. महमूद के किस आक्रमण में जाटों ने बड़े प्रतिरोध का प्रदर्शन किया? a मुल्तान b दिल्ली c सिंध ✅ d थानेश्वर
65. महमूद गजनवी के काल में भारत का कौन सा नगर प्रसिद्ध धार्मिक स्थल था? a काशी b अयोध्या c सोमनाथ ✅ d मथुरा
66. किस शासक ने महमूद का सर्वाधिक विरोध किया? a आनन्दपाल ✅ b महीपाल c जयपाल d भोजराज
67. महमूद ने नगरकोट के मंदिर को लूटकर कितना धन एकत्रित किया? a 50,000 रूपये b 70 लाख दीनार ✅ c 10 लाख रूपये d 5 करोड़ मुद्राएँ
68. किस ऐतिहासिक ग्रंथ में महमूद के आक्रमण का वर्णन प्रमुख है? a तारीख-ए-यामिनी ✅ b राजतरंगिणी c महाभारत d पद्मावत
69. महमूद ने कन्नौज के शासक से क्या उपहार पाया? a धन b आभूषण c हाथी ✅ d स्त्री
70. महमूद गजनवी द्वारा भसित मंदिरों की वस्तुएं कहाँ भेजी जाती थीं? a बगदाद b गजनी ✅ c सिंध d लाहौर
71. भारत के किस भाग में महमूद का आक्रमण कम हुआ? a दक्षिण ✅ b उत्तर c पश्चिम d पूर्व
72. महमूद गजनवी के आक्रमणों से भारत की किस सम्पत्ति को सर्वाधिक क्षति पहुँची? a जल-संसाधन b मंदिर ✅ c कृषि d व्यापारी
73. महमूद के कौन से आक्रमण के समय मथुरा के मंदिर को Jला दिया गया? a 1018 ई. ✅ b 1025 ई. c 1020 ई. d 1008 ई.
74. महमूद गजनवी ने कितनी बड़ी सेना के साथ सोमनाथ पर चढ़ाई की थी? a 10,000 b 1 लाख c 25,000 ✅ d 50,000
75. महमूद ने किसके शासनकाल में मुल्तान जीत लिया था? a जयपाल b सेवकपाल c दाऊद ✅ d भोजराज
76. महमूद के भारत आगमन के प्रमुख मार्ग का नाम क्या था? a खैबर दर्रा ✅ b बोलन दर्रा c नाथू ला d कर्नल दर्रा
77. महमूद गजनवी किस सभ्यता से संबंध रखता था? a तुर्क ✅ b मंगोल c हिन्दू d अरब
78. किसने महमूद के दरबार में भारत के बारे में पुस्तक लिखी? a उत्बी b अलबरुनी ✅ c दाऊद d बदायुनी
79. महमूद गजनवी के बाद गजनी के सिंहासन पर कौन बैठा? a मसूद ✅ b तुगलक c उत्बी d अल्पतगीन
80. महमूद के आक्रमणों का सबसे बड़ा प्रेरणा स्त्रोत क्या था? a धन संपत्ति ✅ b धार्मिक मत c प्रतिशोध d नीति
मुहम्मद गौरी के आक्रमण MCQ पोस्ट में 80 महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ) दिए गए हैं। ये प्रश्न विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी हैं।
शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी किस देश का शासक था? a) भारत b) अफगानिस्तान ✅ c) ईरान d) तुर्की
गौरी किस वंश से संबंधित था? a) गजनवी b) चघताई c) गौर ✅ d) लोदी
भारत पर मुहम्मद गौरी ने पहला आक्रमण कब किया? a) 1175 ई. ✅ b) 1191 ई. c) 1206 ई. d) 1100 ई.
किस राज्य पर मुहम्मद गौरी ने सबसे पहले आक्रमण किया? a) दिल्ली b) गुजरात c) मुल्तान ✅ d) अजमेर
मुहम्मद गौरी के आक्रमणों का मुख्य उद्देश्य क्या था? a) व्यापार b) धर्म प्रचार c) साम्राज्य विस्तार ✅ d) शिक्षा
मुहम्मद गौरी द्वारा तराइन का प्रथम युद्ध किस वर्ष लड़ा गया? a) 1186 ई. b) 1191 ई. ✅ c) 1192 ई. d) 1200 ई.
तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद गौरी की सेना को किसने पराजित किया? a) पृथ्वीराज चौहान ✅ b) जयचंद c) भीमदेव d) कुतुबुद्दीन ऐबक
तराइन का द्वितीय युद्ध कब हुआ? a) 1191 ई. b) 1192 ई. ✅ c) 1187 ई. d) 1206 ई.
पृथ्वीराज चौहान की राजधानी कौन सी थी? a) दिल्ली b) अजमेर ✅ c) लाहौर d) पटना
तराइन के द्वितीय युद्ध में विजय किसे प्राप्त हुई? a) पृथ्वीराज चौहान b) मुहम्मद गौरी ✅ c) जयचंद d) चंदेल
किसने जयचंद को आमंत्रित कर गठबंधन के लिए बुलाया था? a) पृथ्वीराज चौहान b) गौरी ✅ c) भीमदेव d) कुतुबुद्दीन ऐबक
जयचंद किस राज्य के राजा थे? a) दिल्ली b) कन्नौज ✅ c) अजमेर d) गुजरात
गौरी ने गुजरात पर कब आक्रमण किया? a) 1197 ई. ✅ b) 1191 ई. c) 1206 ई. d) 1186 ई.
गुजरात के किस राजा ने गौरी को पराजित किया था? a) मूलराज ✅ b) जयचंद c) पृथ्वीराज d) कदम्बवास
कुतुबुद्दीन ऐबक के संबंध किससे थे? a) चंद्रगुप्त b) गौरी ✅ c) पृथ्वीराज d) भीमदेव
भारत में गुलाम वंश की स्थापना किसने की? a) कुतुबुद्दीन ऐबक ✅ b) गौरी c) इल्तुतमिश d) बलबन
मोहम्मद गौरी की मृत्यु कब हुई? a) 1206 ई. ✅ b) 1192 ई. c) 1187 ई. d) 1210 ई.
कौन गौरी का उत्तराधिकारी बना? a) कुतुबुद्दीन ऐबक ✅ b) पृथ्वीराज c) जयचंद d) भीमदेव
गौरी के काल में किस धर्म का प्रभाव बढ़ा? a) हिंदू धर्म b) बौद्ध धर्म c) इस्लाम धर्म ✅ d) जैन धर्म
तराइन के युद्ध किस नदी के निकट लड़े गए? a) यमुना b) सरस्वती ✅ c) गंगा d) नर्मदा
गौरी का भारत में सेनापति कौन था? a) कुतुबुद्दीन ऐबक ✅ b) बख्तियार खिलजी c) इख्तियारुद्दीन d) नासिरुद्दीन
पृथ्वीराज चौहान की माता का नाम क्या था? a) कर्पूरदेवी ✅ b) संयोगिता c) पद्मावती d) रजवती
पृथ्वीराज रासो के रचनाकार कौन थे? a) चंद्रबरदाई ✅ b) विद्यापति c) कालिदास d) अमीर खुसरो
किसने पृथ्वीराज को बंदी बनाकर गौरी को सौंपा था? a) जयचंद ✅ b) भीमदेव c) कुतुबुद्दीन d) गुर्जर
गौरी ने प्रथम भारत आक्रमण कहां से किया? a) मुल्तान ✅ b) दिल्ली c) कन्नौज d) गुजरात
कुतुबुद्दीन ऐबक का मकबरा किस नगर में है? a) दिल्ली b) लाहौर ✅ c) अजमेर d) कन्नौज
किसने दिल्ली का किला बनवाया? a) पृथ्वीराज चौहान ✅ b) केशवदेव c) कुतुबुद्दीन ऐबक d) अलाउद्दीन
किस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु हुई? a) तराइन द्वितीय ✅ b) गुजरात युद्ध c) मुल्तान युद्ध d) कन्नौज
शहाबुद्दीन गौरी ने किसे भारत विजय का द्वार कहा? a) मुल्तान b) तराइन c) सिंध ✅ d) दिल्ली
गौरी के शासनकाल की महत्वपूर्ण भाषा कौन सी थी? a) हिंदी b) फारसी ✅ c) संस्कृत d) उर्दू
मुल्तान का प्रशासन कौन संभालता था? a) हिंदू b) मुस्लिम प्रशासन ✅ c) जैन d) बौद्ध
गौरी ने कहाँ की राजनीति को केंद्रित किया? a) मुल्तान b) पंजाब ✅ c) दिल्ली d) गुजरात
गौरी के भारत आक्रमण की नीति क्या थी? a) प्रत्यक्ष शासन b) धर्म प्रचार c) क्षेत्र विस्तार ✅ d) व्यापार
किसने गौरी के खिलाफ विद्रोह किया? a) मुल्तान के विद्रोही ✅ b) ऐबक c) जयचंद d) पृथ्वीराज
गौरी के सेनापति का नाम क्या था? a) ऐबक ✅ b) जयचंद c) पृथ्वीराज d) भीमदेव
लाहौर का विजय गौरी ने किस वर्ष प्राप्त किया? a) 1186 ई. ✅ b) 1191 ई. c) 1206 ई. d) 1175 ई.
तराइन प्रथम युद्ध के परिणामस्वरूप गौरी को क्या करना पड़ा? a) विजय b) हार ✅ c) बंदी होना d) संधि
तराइन द्वितीय युद्ध के परिणामस्वरूप किसका पराभव हुआ? a) पृथ्वीराज चौहान ✅ b) गौरी c) जयचंद d) गुजरात
जयचंद का संबंध किस वंश से था? a) गाहड़वाल ✅ b) चौहान c) चंदेल d) परमार
पृथ्वीराज के कितने मुख्य सेनापति थे? a) दो ✅ b) एक c) चार d) पांच
पृथ्वीराज चौहान के पिता का नाम? a) सोमेश्वर ✅ b) जयचंद c) केशवदेव d) गोविंदराज
गौरी के पिता का नाम क्या था? a) बहाउद्दीन ✅ b) इब्राहीम c) तैमूर d) महमूद
तराइन के युद्ध का महत्व क्या था? a) मुस्लिम शासन की स्थापना ✅ b) हिन्दू शासन की रक्षा c) व्यापारिक वृद्धि d) कृषि विस्तार
गौरी ने भारत में किसको अपना उत्तराधिकारी चुना? a) कुतुबुद्दीन ऐबक ✅ b) बख्तियार खिलजी c) इल्तुतमिश d) बलबन
किस युद्ध के बाद मुस्लिम शासन स्थायी रूप से स्थापित हुआ? a) तराइन द्वितीय युद्ध ✅ b) गुजरात युद्ध c) मुल्तान युद्ध d) कन्नौज युद्ध
गौरी की सेना में कोन प्रमुख था? a) ऐबक ✅ b) जयचंद c) भीमदेव d) नासिरुद्दीन
पृथ्वीराज चौहान ने किसके खिलाफ युद्ध किया? a) गौरी ✅ b) जयचंद c) ऐबक d) भीमदेव
पृथ्वीराज चौहान की रानी कौन थी? a) संयोगिता ✅ b) पद्मावती c) लाडी d) कर्पूरदेवी
गौरी के काल में किसका पतन हुआ? a) हिन्दू साम्राज्य ✅ b) मुस्लिम साम्राज्य c) मंगोल साम्राज्य d) मुगल साम्राज्य
तराइन युद्ध का स्थान किस प्रदेश में था? a) पंजाब ✅ b) दिल्ली c) गुजरात d) अवध
किस कारण गौरी ने तराइन युद्ध लड़ा? a) राज्य विस्तार ✅ b) धर्म प्रचार c) व्यापार d) कुप्रबंधन
पृथ्वीराज रासो किसकी जीवनी है? a) पृथ्वीराज चौहान ✅ b) गौरी c) जयचंद d) ऐबक
चंद्रबरदाई किसके समकालीन थे? a) पृथ्वीराज चौहान ✅ b) गौरी c) जयचंद d) ऐबक
भारत में मुहम्मद गौरी का शासनकाल कब तक रहा? a) 1175-1206 ई. ✅ b) 1200-1220 ई. c) 1150-1175 ई. d) 1191-1196 ई.
मुस्लिम विजय की शुरुआत किसने की? a) गौरी ✅ b) ऐबक c) बाबर d) अकबर
गौरी ने किस क्षेत्र में सबसे पहले विजय प्राप्त की? a) मुल्तान ✅ b) दिल्ली c) अजमेर d) गुजरात
गौरी ने किस वर्ष लाहौर पर अधिकार किया? a) 1186 ई. ✅ b) 1191 ई. c) 1206 ई. d) 1175 ई.
गौरी के अंतिम भारत आक्रमण का वर्ष क्या था? a) 1206 ई. ✅ b) 1192 ई. c) 1187 ई. d) 1210 ई.
गौरी किस राज्य के शासकों से प्रभावित था? a) हिन्दू ✅ b) मुसलमान c) मंगोल d) तुर्क
मुल्तान विजय किसने की? a) मुहम्मद गौरी ✅ b) पृथ्वीराज c) ऐबक d) जयचंद
गौरी का सैन्य संचालन कौन करता था? a) ऐबक ✅ b) बख्तियार c) जयचंद d) चंदेल
तराइन द्वितीय युद्ध का कारण क्या था? a) गद्दी परिवर्तन b) पुरानी हार ✅ c) व्यापार विवाद d) धर्म विवाद
पृथ्वीराज चौहान किस वंश से थे? a) चौहान ✅ b) परमार c) गहड़वाल d) चंदेल
गौरी ने किसके सहयोग से पृथ्वीराज को हराया? a) जयचंद ✅ b) ऐबक c) चंदेल d) भीमदेव
किस राजवंश का अंत हुआ गौरी के कारण? a) चौहान ✅ b) परमार c) चंदेल d) गहड़वाल
मुल्तान पर कब्जा करने के बाद गौरी का अगला लक्ष्य क्या था? a) लाहौर ✅ b) कन्नौज c) अजमेर d) गुजरात
गौरी ने कितनी बार भारत पर आक्रमण किया? a) 17 ✅ b) 10 c) 5 d) 20
भारत में गौरी की मृत्योपरांत किसका शासन हुआ? a) कुतुबुद्दीन ऐबक ✅ b) पृथ्वीराज c) जयचंद d) भीमदेव
पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद कौन प्रमुख हुआ? a) ऐबक ✅ b) गौरी c) जयचंद d) भीमदेव
गौरी के शासनकाल में कौन भाषा प्रचलित थी? a) फारसी ✅ b) हिंदी c) संस्कृत d) पंजाबी
पृथ्वीराज ने किसके खिलाफ संग्राम किया? a) गौरी ✅ b) जयचंद c) ऐबक d) मूलराज
गौरी के मृत्यु के बाद मुसलमानों का नेतृत्व किसके पास था? a) कुतुबुद्दीन ऐबक ✅ b) इल्तुतमिश c) बलबन d) अर्फुद्दीन
गौरी की मृत्यु कैसे हुई? a) हत्या ✅ b) बीमारी c) युद्ध d) आत्महत्या
दिल्ली सल्तनत की स्थापना किस आधार पर हुई? a) गौरी की विजय ✅ b) पृथ्वीराज की हार c) मुल्तान विजय d) गुजरात विजय
मुस्लिम शासकों ने सबसे अधिक किस पर बल दिया? a) प्रशासन ✅ b) धर्म प्रचार c) कृषि d) व्यापार
कौनसा युद्ध भारत के इतिहास में निर्णायक सिद्ध हुआ? a) तराइन द्वितीय युद्ध ✅ b) मुल्तान युद्ध c) गुजरात युद्ध d) कन्नौज युद्ध
गौरी ने भारत में कितने आक्रमण किए? a) 17 ✅ b) 10 c) 20 d) 30
पृथ्वीराज चौहान का काल कब था? a) 1178-1192 ई. ✅ b) 1200-1220 ई. c) 1150-1175 ई. d) 1191-1196 ई.
शहाबुद्दीन गौरी का जन्म किस वर्ष हुआ था? a) 1140 ई. ✅ b) 1206 ई. c) 1192 ई. d) 1178 ई.
पृथ्वीराज रासो किस भाषा में लिखी गई है? a) ब्रजभाषा ✅ b) फारसी c) संस्कृत d) हिंदी
प्राचीन भारत का इतिहास (पाषाण काल से ई.1200) - अनुक्रमणिका
इस पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक प्राचीन भारत का इतिहास की अनुक्रमणिका दी गई है।पाठक अनुक्रमणिका में दिए गए अध्यायों को क्लिक करके सीधे ही सम्बन्धित अध्याय तक पहुंच सकते हैं।
यह पुस्तक भारतीय विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों के लिये स्नातक एवं स्नातकोत्तर उपाधि पाठ्यक्रमों के अनुसार लिखी गई है तथा उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों में अत्यंत लोकप्रिय है। इस कारण इस पुस्तक के कई संस्करण एवं पुनर्मुद्रण प्रकाशित हो चुके हैं।
प्राचीन भारत का इतिहास काल खण्ड में भारत में विभिन्न सभ्यताओं का उदय होता है तथा भारतीय संस्कृति मूर्त रूप लेती है तथा इस काल खण्ड का अंत भारत पर इस्लाम के आक्रमण से होता है।
भारत की प्राचीन संस्कृतियाँ
प्राचीन भारत का इतिहास (पाषाण काल से ई.1200) – अनुक्रमणिका
प्राचीन भारत का इतिहास जानने के स्रोत दो हैं- (1.) साहित्यक स्रोत तथा (2.) पुरातात्विक स्रोत। इन दो स्रोतों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर ही भारत का प्राचीन इतिहास लिखा गया है।
इतिहासकारों को प्राचीन भारत का इतिहास जानने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है क्योंकि इस काल का कोई ऐसा ग्रन्थ नहीं मिलता जिसमें भारत का क्रमबद्ध इतिहास लिखा हो। प्राचीन भारत में लिखने-पढ़ने का काम ब्राह्मण करते थे जिनकी रुचि इतिहास में न होकर धर्म, दर्शन तथा अध्यात्म में अधिक थी। फिर भी प्राचीन भारत के निवासियों ने अपने पीछे अनगिनत भौतिक अवशेष छोड़े हैं जिन्हें जोड़कर इतिहासकारों ने प्राचीन भारतीय इतिहास का निर्माण किया है।
प्राचीन भारत का इतिहास जानने के स्रोत दो हैं- (1.) साहित्यक स्रोत तथा (2.) पुरातात्विक स्रोत।
साहित्यिक स्रोत
साहित्यिक स्रोतों को दो भागों में रखा जा सकता है (1) भारतीय साहित्यिक स्रोत तथा (2) विदेशी साहित्यिक स्रोत
(1.) भारतीय साहित्यिक स्रोत
भारतीयों को 2500 ई.पू. में लिपि की जानकारी हो चुकी थी परंतु सबसे प्राचीन उपलब्ध हस्तलिपियाँ ईसा पूर्व चौथी सदी की हैं। ये हस्तलिपियाँ मध्य एशिया से प्राप्त हुई हैं। भारत में ये लिपियाँ भोजपत्रों और ताड़पत्रों पर लिखी गई हैं, परन्तु मध्य एशिया में जहाँ भारत की प्राकृत भाषा का प्रचार हो गया था, ये हस्तलिपियाँ मेष-चर्म तथा काष्ठ-पट्टियों पर भी लिखी गई हैं। इन्हें भले ही अभिलेख कहा जाता हो, परन्तु ये हस्तलिपियाँ ही हैं।
चूँकि उस समय मुद्रण-कला का जन्म नहीं हुआ था इसलिए ये हस्तलिपियाँ अत्यधिक मूल्यवान समझी जाती थीं। समस्त भारत से संस्कृत की पुरानी हस्तलिपियाँ मिली हैं, परन्तु इनमें से अधिकतर हस्तलिपियाँ दक्षिण भारत, कश्मीर एवं नेपाल से प्राप्त हुई हैं। इस प्रकार के अधिकांश हस्तलिपि-लेख, संग्रहालयों और हस्तलिपि ग्रंथालयों में सुरक्षित हैं। ये हस्तलिपियां प्राचीन इतिहास को जानने के प्रमुख स्रोत हैं।
प्राचीन भारत के इतिहास को जानने के भारतीय साहित्यिक स्रोतों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है- (अ.) धार्मिक ग्रन्थ (ब.) अन्य ग्रन्थ।
(अ.) धार्मिक ग्रन्थ
अधिकांश प्राचीन भारतीय ग्रंथ, धार्मिक विषयों से सम्बन्धित हैं। वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, धर्म शास्त्र, बौद्ध-साहित्य, जैन साहित्य आदि धार्मिक ग्रंथों में ऐतिहासिक तथ्य मिलते हैं। बिम्बसार के पहले के राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक इतिहास को जानने के लिये ये ग्रंथ ही प्रमुख साधन हैं। इनमें धार्मिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक तथ्यों की प्रचुरता के साथ-साथ राजनैतिक तथ्य भी मिलते हैं।
(i) हिन्दू धर्म ग्रंथ
हिन्दुओं के धार्मिक साहित्य में वेदों, उपनिषदों, महाकाव्यों (रामायण और महाभारत) तथा पुराणों आदि का समावेश होता है। यह साहित्य, प्राचीन भारत की सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों पर काफी प्रकाश डालता है किंतु इनके देश-काल का पता लगाना काफी कठिन है।
वैदिक साहित्य
ऋग्वेद सबसे प्राचीन वैदिक ग्रंथ है। इसे 1500-1000 ई.पू. के बीच की अवधि का मान सकते हैं। अथर्ववेद, यजुर्वेद, ब्राह्मण ग्रंथ और उपनिषदों को 1000-500 ई.पू. के लगभग का माना जाता है। प्रायः समस्त वैदिक ग्रंथों में क्षेपक मिलते हैं जिन्हें सामान्यतः प्रारम्भ अथवा अंत में देखा जा सकता है। कहीं-कहीं ग्रंथ के बीच में भी क्षेपक मिलते हैं। ऋग्वेद में मुख्यतः प्रार्थनाएं मिलती हैं और बाद के वैदिक ग्रंथों में प्रार्थनाओं के साथ-साथ कर्मकांडों, जादू टोनों और पौराणिक व्याख्यानों का समावेश मिलता है। उपनिषदों में दार्शनिक चिंतन मिलता है।
पुराण
पुराणों का रचना काल 400 ई.पू. के लगभग का है। प्रमुख पुराण 18 हैं। इनमें विष्णु पुराण, स्कन्द पुराण, हरिवंश पुराण, भागवत पुराण, गरुड़ पुराण आदि प्रमुख हैं। पुराणों से प्राचीन काल के राज-वंशों की वंशावली का पता चलता है। पुराण, चार युगों का उल्लेख करते हैं- कृत, त्रेता, द्वापर और कलि। बाद में आने वाले प्रत्येक युग को पहले के युग से अधिक निकृष्ट बताया गया है और यह भी बताया गया है कि एक युग के समाप्त होने पर जब नए युग का आरम्भ होता है तो नैतिक मूल्यों तथा सामाजिक मानदण्डों का अधःपतन होता है।
महाकाव्य
दोनों महाकाव्यों को पौराणिक काल में अर्थात् 400 ई.पू. के लगभग संकलित किया गया। दोनों महाकाव्यों में से महाभारत की रचना पहले हुई। अनुमानतः इसमें दसवीं शताब्दी ई.पू. से चौथी ईस्वी शताब्दी ई.पू. तक की परिस्थितियों को चित्रित किया गया है। मूलरूप से इसमें 8,800 श्लोक थे और इसे यव संहिता कहा जाता था अर्थात् विजय सम्बन्धी संचयन।
आगे चलकर इसमें 24,000 श्लोक हो गए और इसका नाम प्राचीन वैदिक कुल- ‘भरत’ के नाम पर भारत हो गया। अंत में श्लोकों की संख्या बढ़ कर एक लाख तक पहुंच गई और इसे महाभारत अथवा शतसह संहिता कहा जाने लगा। इसमें व्याख्यान, विवरण और उपदेश मिलते हैं।
मुख्य व्याख्यान कौरव-पांडव संघर्ष का है जो उत्तर-वैदिक काल का हो सकता है। विवरण वाला अंश उत्तर-वैदिक काल का और उपदेशात्मक खण्ड उत्तर-मौर्य एवं गुप्तकाल का हो सकता है। इसी प्रकार रामायण में मूलरूप से 12,000 श्लोक थे जो आगे चलकर 24,000 हो गए। इस महाकाव्य में भी उपदेश मिलते हैं जिन्हें बाद में जोड़ा गया है। अनुमान है कि पूरा रामायण काव्य, महाभारत की रचना के बाद रचा गया।
उत्तर वैदिक धार्मिक साहित्य
उत्तर वैदिक काल के धार्मिक साहित्य में कर्मकाण्ड की भरमार मिलती है। राजाओं और तीनों उच्च वर्णों के लिए किए जाने वाले यज्ञों के नियम, स्रोतसूत्र में मिलते हैं। राज्याभिषेक जैसे उत्सवों का विवरण इसी में है। इसी प्रकार जन्म, नामकरण यज्ञोपवीत, विवाह, दाह आदि संस्कारों से सम्बद्ध कर्मकांड गृह्यसूत्र में मिलते हैं।
स्रोतसूत्र और गृह्यसूत्र- दोनों ही लगभग 600-300 ई.पू. के हैं। यहाँ पर शल्वसूत्र का भी उल्लेख किया जा सकता है जिसमें बलिवेदियों के निर्माण के लिए विभिन्न आकारों का नियोजन है। यहीं से ज्यामिति और गणित का प्रारम्भ होता है।
(ii) बौद्ध ग्रंथ
बौद्धों के धार्मिक ग्रंथों में ऐतिहासिक व्यक्तियों तथा घटनाक्रमों की जानकारी मिलती है। प्राचीनतम बौद्ध ग्रंथ पालि भाषा में लिखे गए हैं, यह भाषा मगध यानी दक्षिणी बिहार में बोली जाती थी। इन ग्रंथों को ईसा पूर्व दूसरी सदी में श्रीलंका में संकलित किया गया। यह धार्मिक साहित्य बुद्ध के समय की परिस्थितियों की जानकारी देता है।
इन ग्रंथों में हमें न केवल बुद्ध के जीवन के बारे में जानकारी मिलती है अपितु उनके समय के मगध, उत्तरी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ शासकों के बारे में भी जानकारी मिलती है। बौद्धों के गैर धार्मिक साहित्य में सबसे महत्त्वपूर्ण एवं रोचक हैं गौतम बुद्ध के पूर्वजन्मों से सम्बन्धित कथाएँ।
यह माना जाता है कि गौतम के रूप में जन्म लेने से पहले बुद्ध, 550 से भी अधिक पूर्वजन्मों में से गुजरे। इनमें से कई जन्मों में उन्होंने पशु-जीवन धारण किया। पूर्वजन्म की ये कथाएँ, जातक कथाएँ कहलाती हैं। प्रत्येक जातक कथा एक प्रकार की लोककथा है। ये जातक ईसा पूर्व पांचवी से दूसरी सदी तक की सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों पर बहुमूल्य प्रकाश डालते हैं। ये कथाएँ बुद्धकालीन राजनीतिक घटनाओं की भी जानकारी देती हैं।
(iii) जैन ग्रंथ
जैन ग्रंथों की रचना प्राकृत भाषा में हुई थी। ईसा की छठी सदी में गुजरात के वल्लभी नगर में इन्हें संकलित किया गया था। इन ग्रंथों में ऐसे अनेक ग्रंथ है जिनके आधार पर हमें महावीर कालीन बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास की रचना करने में सहायता मिलती है। जैन ग्रंथों में व्यापार एवं व्यापारियों के उल्लेख बहुतायत से मिलते हैं।
(ब.) धर्मशास्त्र
धर्मसूत्र और स्मृतियों को सम्मिलित रूप से धर्मशास्त्र कहा जाता है। धर्मसूत्रों का संकलन 500-200 ई.पू. में हुआ। प्रमुख स्मृतियों को ईसा की आरंभिक छः सदियों में विधिबद्ध किया गया। इनमें विभिन्न वर्णों, राजाओं तथा राज्याधिकारियों के अधिकारों का नियोजन है। इनमें संपत्ति के अधिकरण, विकल्प तथा उत्तराधिकार के नियम दिए गए हैं। इनमें चोरी, आक्रमण, हत्या, जारकर्म इत्यादि के लिए दण्ड-विधान की व्यवस्था है।
(स.) अन्य ग्रन्थ
अर्थशास्त्र, हर्षचरित, राजतरंगिणी, दीपवंश, महावंश तथा बड़ी संख्या में उपलब्ध तमिल-ग्रंथों से भी ऐतिहासिक तथ्य प्राप्त होते हैं। कौटिल्य का अर्थशास्त्र एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विधि-ग्रंथ है। इसमें मौर्य-वंश के इतिहास की जानकारी उपलब्ध होती है। यह ग्रंथ पन्द्रह अधिकरणों यानी खण्डों में विभक्त है। इनमें दूसरा और तीसरा अधिकरण अधिक प्राचीन हैं।
अनुमान है कि इन अधिकरणों की रचना विभिन्न लेखकों ने की। इस ग्रंथ को ईस्वी सन् के आरंभकाल में वर्तमान रूप दिया गया। इसके सबसे पुराने अंश मौर्यकालीन समाज एवं अर्थतंत्र की दशा के परिचायक हैं। इसमें प्राचीन भारतीय राजतंत्र तथा अर्थव्यवस्था के अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण सामग्री मिलती है।
प्राचीन साहित्य में भास, कालिदास और बाणभट्ट की कृतियाँ उपलब्ध हैं। इनका साहित्यिक मूल्य तो है ही, इनमें कृतिकारों के समय की परिस्थितियाँ भी प्रतिध्वनित हुई हैं। कालिदास ने अनेक काव्यों और नाटकों की रचना की, जिनमें अभिज्ञान शाकुंतलम सबसे प्रसिद्ध है।
कालिदास के इस महान सर्जनात्मक कृतित्त्व में गुप्तकालीन उत्तर तथा मध्य भारत के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की भी झलक मिलती है। बाणभट्ट के हर्ष चरित से हर्ष के शासन-काल का तथा कल्हण की राजतरंगिणी से काशमीर के इतिहास का पता चलता है। दीपवंश तथा महावंश से श्रीलंका के इतिहास का पता चलता है।
संगम साहित्य
संस्कृत स्रोतों के साथ-साथ, प्राचीनतम तमिल पाठ्य सामग्री भी उपलब्ध है जो संगम साहित्य के संकलन में निहित है। राजाओं द्वारा संरक्षित विद्या केन्द्रों में रहने वाले कवियों ने तीन-चार सदियों के काल में इस साहित्य का सृजन किया था। चूँकि ऐसी साहित्य सभाओं को संगम कहते थे, इसलिए यह सम्पूर्ण साहित्य, संगम साहित्य के नाम से जाना जाता है।
यद्यपि इन कृतियों का संकलन ईसा की प्रारंभिक चार सदियों में हुआ, तथापि इनका अंतिम संकलन छठी सदी में होना अनुमानित है। ईसा की प्रारंभिक सदियों में तमिलनाडु के लोगों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन के अध्ययन के लिए संगम साहित्य एकमात्र प्रमुख स्रोत है। व्यापार और वाणिज्य के बारे में इससे जो जानकारी मिलती है, उसकी पुष्टि विदेशी विवरणों तथा पुरातात्त्विक प्रमाणों से भी होती है।
चरित लेखन
चरित लेखन में भारतीयों ने ऐतिहासिक विवेक का परिचय दिया है। चरित लेखन का आरम्भ सातवीं सदी में बाणभट्ट के हर्षचरित के साथ हुआ। हर्षचरित अलंकृत शैली में लिखी गई एक अर्धचरित्रात्मक कृति है। बाद में इस शैली का अनुकरण करने वालों के लिए यह बोझिल बन गई।
इस ग्रंथ में हर्षवर्धन के आरंभिक कार्यकलापों का वर्णन है। यद्यपि इसमें अतिशयोक्ति की भरमार है, फिर भी इसमें हर्ष के राजदरबार की और हर्षकालीन सामाजिक एवं धार्मिक जीवन की अच्छी जानकारी मिलती है। इसके बाद कई चरित्र ग्रंथ लिखे गए। संध्याकर नंदी के रामचरित में पाल-शासक रामपाल और कैवर्त किसानों के बीच हुए संघर्ष का वर्णन है।
इस संघर्ष में रामपाल की विजय हुई। बिल्हण ने विक्रमांकदेवचरित में अपने आश्रयदाता कल्याण के चालुक्य नरेश विक्रमादित्य षष्ठ (1076-1127 ई.) की उपलब्ध्यिों का वर्णन किया है। बारहवीं और तेरहवीं सदियों में गुजरात के कुछ व्यापारियों के चरित लिखे गए।
बारहवीं सदी में रचित कल्हण की राजतरंगिणी ऐतिहासिक कृतित्त्व का सर्वोत्तम उदाहरण है। इसमें कश्मीर के राजाओं का क्रमबद्ध चरित प्रस्तुत किया गया हैै यह प्रथम कृति है जिसमें आधुनिक दृष्टि युक्त इतिहास की कई विशेषताएँ निहित हैं।
(2.) विदेशी साहित्यिक स्रोत
प्राचीन भारत के इतिहास निर्माण के लिये विदेशी विवरणों का भी उपयोग किया गया है। जिज्ञासु पर्यटक के रूप में अथवा भारतीय धर्म को स्वीकार करके तीर्थयात्री के रूप में, अनेक यूनानी, रोमन तथा चीनी यात्री भारत आए और उन्होंने भारत के सम्बन्ध में आंखों देखे विवरण लिखे।
विदेशी विवरणों से, भारतीय संदर्भों का कालक्रम एवं तिथि निर्धारण करना संभव हो पाया है। अध्ययन की सुविधा से विदेशी विवरण को दो भागों में बांट सकते हैं- (अ.) विदेशी लेखकों के विवरण तथा (ब.) विदेशी यात्रियों के विवरण।
(अ.) विदेशी लेखकों के विवरण
विदेशी लेखकों में यूनानी लेखक एरियन, प्लूटार्क, स्ट्रैबो, प्लिनी, जस्टिन आदि, चीनी लेखक सुमाचीन, तिब्बती लेखक तारानाथ आदि आते हैं। तारानाथ के द्वारा लिखे गये भारतीय वृत्तांत कंग्युर एवं तंग्युर नामक ग्रंथों में मिलते हैं।
(ब.) विदेशी यात्रियों के विवरण
विदेशी यात्रियों में यूनानी राजदूत मेगस्थनीज, चीनी यात्री फाह्यान, तथा ह्वेनसांग और मुसलमान विद्वान अल्बेरूनी प्रमुख हैं। यूनानी लेखकों से हमें सिकन्दर के भारतीय आक्रमण का, यूनानी राजदूत मेगास्थनीज की पुस्तक इण्डिका से चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन-काल का, चीनी लेखकों से शक पार्थियन और कुशाण जातियों के इतिहास का, फाह्यान के विवरण से चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासन काल का, युवान-च्वांड् के ग्रंथ- ‘सि-यू-की’ के विवरण से हर्षवर्धन के शासनकाल का और अल्बेरूनी की पुस्तक- ‘तहकीक-ए-हिन्द’ के विवरण से महमूद गजनवी के आक्रमण के समय के भारत के राजनीतिक वातावरण का ज्ञान होता है।
विदेशी विवरणों का मूल्यांकन
भारतीय स्रोतों में 324 ई.पू. में सिकंदर के भारत पर आक्रमण की कोई जानकारी नहीं मिलती। उसके भारत में प्रवास एवं उपलब्धियों के इतिहास की रचना के लिए यूनानी विवरण ही एकमात्र उपलब्ध स्रोत हैं। यूनानी यात्रियों ने, सिकंदर के एक समकालीन भारतीय योद्धा के रूप में सैण्ड्रोकोटस का उल्लेख किया है।
यूनानी विवरणों का यह राजकुमार सैण्ड्रोकोटस और भारतीय इतिहास का चन्द्रगुप्त मौर्य, जिसके राज्यारोहण की तिथि 322 ई.पू. निर्धारित की गई है, एक ही व्यक्ति थे। यह पहचान प्राचीन भारत के तिथिक्रम के लिए सुदृढ़़ आधारशिला बन गई है। इस तिथि क्रम के बिना भारतीय इतिहास की रचना करना सम्भव नहीं है।
चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में यूनानी दूत मैगस्थनीज की इण्डिका उन उद्धरणों के रूप में संरक्षित है जो अनेक प्रसिद्ध लेखकों ने उद्धृत किए हैं। इन उद्धरणों को मिलाकर पढ़ने पर न केवल मौर्य शासन-व्यवस्था के बारे में उपयोगी जानकारी मिलती है अपितु मौर्यकालीन सामाजिक वर्गों तथा आर्थिक क्रियाकलापों के बारे में भी जानकारी मिलती है। यह कृति आंखें मूँदकर मान ली गई बातों अथवा अतिरंजनाओं से मुक्त नहीं है।
अन्य प्राचीन विवरणों पर भी यह बात लागू होती है। ईसा की पहली और दूसरी सदियों के यूनानी तथा रोमन विवरणों में भारतीय बन्दरगाहों के उल्लेख मिलते हैं और भारत तथा रोमन साम्राज्य के बीच हुए व्यापार की वस्तुओं के बारे में भी जानकारी मिलती है।
यूनानी भाषा में लिखी गई टोलेमी की ‘ज्योग्राफी’और ‘पेरीप्लस ऑफ दि एरीथ्रियन सी’पुस्तकें, प्राचीन भारतीय भूगोल और वाणिज्य के अध्ययन के लिये प्रचुर सामग्री प्रदान करती हैं। पहली पुस्तक में मिलने वाली आधार सामग्री 150 ईस्वी की और दूसरी पुस्तक 80 से 115 ईस्वी की मानी जाती है। प्लिनी की ‘नेचुरलिस हिस्टोरिका’पहली ईस्वी शताब्दी की है। यह लैटिन भाषा में लिखी गई है और भारत एवं इटली के बीच होने वाले व्यापार की जानकारी देती है।
चीनी पर्यटकों में फाह्यान और युवान-च्वांड् प्रमुख हैं। दोनों ही बौद्ध थे। वे बौद्ध तीर्थों का दर्शन करने तथा बौद्ध धर्म का अध्ययन करने भारत आए थे। फाह्यान ईसा की पांचवी सदी के प्रारंभ में आया था और युवान-च्वांड् सातवीं सदी के दूसरे चतुर्थांश में। फाह्यान ने गुप्तकालीन भारत की सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक परिस्थितियों की जानकारी दी है, तो युवान-च्वांड् ने हर्षकालीन भारत के बारे में इसी प्रकार की जानकारी दी है।
पुरातात्विक स्रोत
इतिहास जानने के वे साधन जो गुफाओं, नदियों के किनारों, तालाबों के किनारों, टीलों तथा धरती में दबे हुए मिलते हैं उन्हें मोटे तौर पर पुरातात्विक स्रोत कहा जाता है। इन्हें चार भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1) अभिलेख (2) दानपत्र (3) मुद्राएँ और (4) प्राचीन स्मारक तथा भवनों के अवशेष।
(1.) अभिलेख
प्राचीन भारत का इतिहास जानने के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथा सर्वाधिक विश्वसनीय साधन अभिलेख हैं। ये प्रधानतः स्तम्भों, शिलाओं तथा गुफाओं पर मिलते हैं परन्तु कभी-कभी मूर्तियों, पात्रों तथा ताम्रपत्रों पर भी अंकित मिलते हैं। ये लेख देशी तथा विदेशी दोनों हैं।
देशी अभिलेखों में अशोक के अभिलेख, प्रयाग का स्तम्भ लेख तथा हाथीगुम्फा के अभिलेख सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। भारत के विभिन्न भागों में शिलांकित ग्रन्थ मिलते हैं। विदेशी अभिलेखों में एशिया माइनर में स्थित बोगजकोई के अभिलेख अधिक प्रसिद्ध हैं। अशोक के अभिलेखों से उसके धर्म तथा उसकी शिक्षाओं का परिचय मिलता है। अशोक के अभिलेख ही उसकी शिक्षाओं तथा राजाज्ञाओं को जानने का एकमात्र साधन हैं।
इसी प्रकार हाथीगुम्फा के अभिलेख खारवेल-नरेश के शासन काल का इतिहास जानने के एकमात्र साधन हैं। बोगजकोई के अभिलेख से भी भारतीय इतिहास पर यत्किंचित प्रकाश पड़ा है। अभिलेखों के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए वी. ए. स्मिथ ने लिखा है- ‘प्रारंभिक हिन्दू इतिहास में घटनाओं की तिथि का जो ठीक-ठीक ज्ञान अभी तक प्राप्त हो सका है वह प्रधानतः अभिलेखों के साक्ष्य पर आधारित है। ‘
पश्चिमी इतिहासकार फ्लीट ने अभिलेखों के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- ‘प्राचीन भारत के राजनीतिक इतिहास का ज्ञान हमें केवल अभिलेखों के धैर्यपूर्ण अध्ययन से प्राप्त होता है।’
पुरालेख
प्राचीन अभिलेखों को पुरालेख कहते हैं तथा प्राचीन अभिलेखों के अध्ययन को पुरालेखशास्त्र कहते हैं। पुरालेखों तथा अन्य प्राचीन लेखों की प्राचीन लिपियों के अध्ययन को पुरालिपिशास्त्र कहते हैं। मुद्राओं, मुहरों, प्रस्तरों, स्तंभों, चट्टानों, ताम्रपत्रों तथा मंदिरों की भित्तियों के साथ-साथ ईंटों और मूर्तियों पर भी पुरालेख उत्कीर्ण किए गए हैं।
ये पूरे देश में प्राप्त होते हैं। ईसा की आरंभिक सदियों में इस कार्य के लिए ताम्रपत्रों का उपयोग होने लगा था किंतु पत्थरों पर भी भारी संख्या में लेख उत्कीर्ण किये जाते रहे। सम्पूर्ण भारत में मंदिरों की दीवारों पर भी स्थायी स्मारकों के रूप में भारी संख्या में अभिलेख खोदे गए हैं।
विभिन्न स्थानों से लाखों की संख्या में प्राप्त अभिलेख देश के विभिन्न संग्रहालयों में सुरक्षित हैं, पर सर्वाधिक संख्या में अभिलेख, मैसूर के प्रमुख पुरालेख शास्त्री के कार्यालय में संगृहीत हैं। मौर्य, मौर्याेत्तर तथा गुप्तकाल के अधिकांश अभिलेख कार्पस् इंस्क्रिप्शओनम् इंडिकारम नामक ग्रंथमाला में संगृहीत करके प्रकाशित किए गए हैं।
गुप्तोत्तर काल के अभिलेख इस प्रकार सुव्यवस्थित रूप से संगृहीत नहीं हो पाए हैं। दक्षिण भारत के अभिलेखों की लिपि-शैलियों की सूचियां प्रकाशित हो चुकी हैं। फिर भी 50,000 से भी अधिक अभिलेखों का, जिनमें अधिकांश दक्षिण भारत के लेख हैं, प्रकाशन अभी शेष है।
पुरालेखों की भाषा
भारत के सर्वाधिक प्राचीन अभिलेख प्राकृत भाषा में हैं और ईसा पूर्व तीसरी सदी के हैं। ईसा की दूसरी सदी में अभिलेखों के लेखन के लिए संस्कृत भाषा को अपनाया गया। चौथी-पांचवीं सदी में संस्कृत भाषा का सर्वत्र प्रचार-प्रचार हुआ किंतु तब भी प्राकृत भाषा का उपयोग होता रहा। प्रादेशिक भाषाओं में अभिलेखों की रचना नौवीं-दसवीं सदियों से होने लगी।
पुरालेखों की लिपि
हड़प्पा संस्कृति के अभिलेख, जिनको अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है, सम्भवतः एक ऐसी भावचित्रात्मक लिपि में लिखे गए हैं जिसमें विचारों एवं वस्तुओं को चित्रों के रूप में व्यक्त किया जाता था। अशोक के शिलालेख ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण किये गये हैं, यह लिपि दायीं ओर से बायीं ओर लिखी जाती थी।
पश्चिमोत्तर भारत से प्राप्त अशोक के कुछ लेख खरोष्ठी लिपि में भी हैं जो दायीं ओर से बायीं ओर लिखी जाती थी। पश्चिमोत्तर भारत के अतिरिक्त शेष प्रदेशों में ब्राह्मी लिपि का ही प्रचार रहा। अफगानिस्तान में अशोक के शिलालेख के लिए यूनानी और ब्राह्मी लिपियों का भी उपयोग हुआ है। गुप्तकाल के अंत तक देश की प्रमुख लिपि ब्राह्मी लिपी ही बनी रही। गुप्तकाल के बाद ब्राह्मी लिपि की प्रादेशिक शैलियों में बड़ा अंतर आया और उन्हें अलग-अलग नाम दिए गए।
पुरालेखों का कालक्रम
भारत से प्राप्त सर्वाधिक प्राचीन लेख, हड़प्पा संस्कृति की मुहरों पर मिलते हैं। ये लगभग 2500 ई.पू. के हैं। इन पुरालेखों को पढ़ना अब तक सम्भव नहीं हो पाया है। सबसे पुराने जिन अभिलेखों को पढ़ना सम्भव हो पाया है वे ई.पू. तीसरी सदी के अशोक के शिलालेख हैं।
फिरोजशाह तुगलक ने मेरठ में अशोक के एक स्तम्भलेख का पता लगाया था। उसने यह अशोक-स्तंभ दिल्ली मंगवाया और अपने राज्य के पंडितों से इस पर उत्कीर्ण लेख को पढ़ने का आदेश दिया किन्तु किसी को भी इसमें सफलता नहीं मिली।
अठारहवीं सदी के अंतिम चरण में अंग्रेजों ने जब अशोक के अभिलेखों को पढ़ने का प्रयास किया तो उन्हें भी इसी कठिनाई का सामना कररना पड़ा। ई.1837 में जेम्स प्रिंसेप को इन अभिलेखों को पढ़ने में पहली बार सफलता मिली जो बंगाल में ईस्ट इंडिया कंपनी का सिविल अधिकारी था।
पुरालेखों के प्रकार
पुरालेख कई प्रकार के हैं। कुछ अभिलेखों में अधिकारियों और जन सामान्य के लिए जारी किए गए सामाजिक, धार्मिक तथा प्रशासनिक राज्यादेशों एवं निर्णयों की सूचनाएं हैं। अशोक के अभिलेख इसी कोटि के हैं। दूसरे वर्ग के अन्तर्गत वे आनुष्ठानिक अभिलेख हैं जिन्हें, बौद्ध, जैन, वैष्णव, शैव आदि सम्प्रदायों के अनुयायियों ने स्तंभों, प्रस्तर-फलकों, मंदिरों अथवा मूर्तियों पर उत्कीर्ण करवाया है।
तीसरे वर्ग में प्रशस्तियों के रूप में लिखे गये अभिलेख हैं जिनमें राजाओं तथा विजेताओं के गुणों और उनकी सफलताओं का विवरण रहता है, पर उनकी पराजयों तथा कमजोरियों का कोई उल्लेख नहीं रहता। चन्द्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति इसी कोटि की है। चौथे वर्ग में दान अभिलेख मिलते हैं। इनमें राजाओं, राजपरिवार के सदस्यों, कारीगरों तथा व्यापारियों के द्वारा, धार्मिक प्रयोजन से धन, स्वर्ण, रत्न, मवेशी, भूमि आदि के रूप में दिए गए विशिष्ट दान का उल्लेख रहता है।
(2.) दानपत्र
राजाओं और सामंतों द्वारा दिए गए भूमिदानों से सम्बन्धित अभिलेख विशेष महत्त्व के हैं। इनसे प्राचीन भारत के भूमिबन्दोबस्त के बारे में उपयोगी जानकारी मिलती है। अधिकांश दानपत्र, ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण हैं। इन अभिलेखों में भिक्षुओं, पुरोहितों, मंदिरों, विहारों, जागीरदारों तथा अधिकारियों को दिए गए गांवांे, भूमियों तथा राजस्व के दानों का उल्लेख रहता है।
(3.) मुद्राएँ
प्राचीन भारत के इतिहास के निर्माण में मुद्राओं से बड़ी सहायता मिली है। इनके महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए स्मिथ ने लिखा है- ‘सिकन्दर के आक्रमण के समय से मुद्राएँ प्रत्येक युग में इतिहास के अन्वेषण के कार्य में अमूल्य सहायता पहुँचाती रही हैं।’ वास्तव में 206 ई.पू. से 300 ई. तक के भारतीय इतिहास को जानने के प्रधान साधन मुद्राएँ ही हैं।
इण्डो-पार्थियन तथा बैक्ट्रियन लोगों के इतिहास का पता हमें मुद्राओं से ही लगता है। मुद्राओं से हमें राजाओं के नाम, उनकी वेष-भूषा, उनके शासन-काल तथा उनके राजनीतिक एवं धार्मिक विचारों के जानने में बड़ी सहायता मिली है। राज्य की सीमा निर्धारित करने में भी कभी-कभी मुद्राओं का सहारा लिया जाता है।
मुद्राओं से राज्य की आर्थिक दशा का भी ज्ञान प्राप्त हो जाता है। यदि मुद्राएँ शुद्ध सोने-चांदी की होती हैं तो उनसे देश की सम्पन्नता प्रकट होती है परन्तु यदि वे मिश्रित धातुओं की होती हैं तो उनसे राज्य की विपन्नता का पता लगता है। मुद्राओं के चित्रों तथा अभिलेखों से राज्य की कला तथा साहित्य की अवस्था का भी ज्ञान होता है।
गुप्तकालीन मुद्राएँ बड़ी ही सुन्दर तथा कलात्मक हैं और उन पर शुद्ध तथा गीतमय संस्कृत लेख लिखे हैं जिनसे पता लगता है कि गुप्त-सम्राट् साहित्य तथा कला के प्रेमी थे। प्राचीन भारत में सिक्कों पर धार्मिक चिह्न ओर संक्षिप्त लेख भी अंकित किए जाते थे जिनसे उस समय की कला एवं धार्मिक परिस्थितियों पर प्रकाश पड़ता है।
मुद्राशास्त्र
सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र कहते हैं। सबसे प्राचीन सिक्के आग में पकाई हुई मिट्टी के हैं। उसके बाद तांबा, चांदी, सोना और लेड (सीसा) धातुओं से सिक्के बनाये गये। पूरे देश से पकी हुई मिट्टी से बनाए गए सिक्कों के सांचे बड़ी संख्या में मिले हैं। इनमें से अधिकांश सांचे कुषाण काल के अर्थात् ईसा की आरंभिक तीन सदियों के हैं। गुप्तोत्तर काल में ये सांचे लगभग लुप्त हो गए।
प्राचीन काल में लोग अपना पैसा मिट्टी तथा कांसे के बर्तनों में जमा रखते थे। ऐसी अनेक निधियों, जिनमें न केवल भारतीय सिक्के हैं अपितु रोमन साम्राज्य जैसी विदेशी टकसालों में ढाले गए सिक्के भी हैं, देश के अनेक भागों में खोजी गई हैं। ये निधियां अधिकतर कलकत्ता, पटना, लखनऊ, दिल्ली, जयपुर, बम्बई और मद्रास के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं।
बहुत से भारतीय सिक्के इंगलैण्ड, नेपाल, बांगलादेश, पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान के संग्रहालयों में भी रखे गये हैं। ब्रिटेन ने भारत पर लम्बे समय तक शासन किया, इसलिए ब्रिटेन के सार्वजनिक संग्रहालयों के साथ-साथ ब्रिटिश अधिकारियों के निजी संग्रहालयों में भी भारतीय सिक्के संग्रहीत किये गये हैं।
विभन्न संग्राहलयों द्वारा भारत के प्रमुख राजवंशों के सिक्कों की सूचियां तैयार करके प्रकाशित करवाई गई हैं। कलकत्ता के इंडियन म्यूजियम तथा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम आदि के सिक्कों की सूचियां उपलब्ध हैं परन्तु अब भी सिक्कों के अनेक संग्रहों की सूचियां नहीं बन पायी हैं और न ही प्रकाशित हुई हैं।
हमारे देश के सबसे पुराने सिक्कों पर कुछ चिह्न देखने को मिलते हैं, पर बाद के सिक्कों पर राजाओं और देवी-देवताओं के नाम तथा तिथियाँ अंकित की गई हैं। जिन-जिन स्थानों पर ये सिक्के मिलते हैं उनके बारे में स्पष्ट हो जाता है कि उस प्रदेश में इनका प्रचलन रहा है।
इस प्रकार खोजे गए सिक्कों के आधार पर कई राजवंशों के इतिहास की पुनर्रचना सम्भव हुई है। विशेषतः उन हिन्द-यवन शासकों के इतिहास की जो उत्तरी अफगानिस्तान से भारत पहुंचे थे और जिन्होंने ईसा पूर्व दूसरी एवं पहली सदियों में भारतीय क्षेत्रों पर शासन किया।
सिक्कों से, क्षेत्र विशेष एवं काल विशेष के आर्थिक हतिहास के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। प्राचीन भारत में राजाओं की अनुमति से, बड़े व्यापारियों एवं स्वर्णकारों की श्रेणियों ने भी अपने सिक्के चलाए। इससे शिल्प और व्यापार की उन्नत व्यवस्था की सूचना मिलती है। सिक्कों के कारण बड़ी मात्रा मे लेन-देन करना सम्भव हुआ और व्यापार को बढ़ावा मिला।
सबसे अधिक सिक्के मौर्योत्तर काल के मिले हैं, विशेषतः तांबे, चादी एवं सोने के सिक्के। गुप्त शासकों ने सोने के सबसे अधिक सिक्के जारी किए। इससे पता चलता है कि गुप्तकाल में व्यापार और वाणिज्य खूब बढ़ा। गुप्तोत्तर काल के बहुत कम सिक्के मिले हैं, इससे उस समय में व्यापार और वाणिज्य की अवनति की सूचना मिलती है।
(4.) प्राचीन स्मारक तथा भवनों के अवशेष
प्राचीन काल के मन्दिरों, मूर्तियों, स्तूपों, खण्डहरों आदि के अध्ययन से भी प्राचीन भारत के इतिहास के निर्माण में बड़ी सहायता मिली है। यद्यपि इनसे राजनीतिक दशा का विशेष ज्ञान प्राप्त नहीं होता है परन्तु धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक दशा का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त होता है।
प्राचीन स्मारकों का अध्ययन कर विभिन्न कालों की कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया गया है। काल विशेष में किस सामग्री का प्रयोग किया जाता था और किस शैली में इसका निर्माण होता था आदि बातों की जानकारी प्राप्त हुई है। कला-कृतियों की प्राचीनता का अध्ययन कर कालक्रम को भी निर्धारित किया गया है।
मूर्तियों तथा मन्दिरों के अध्ययन से लागों के धार्मिक विचारों तथा विश्वासों का पता लगता है। गुप्तकाल की मूर्तियों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि उस काल में वैष्णव, शैव, बौद्ध आदि धर्मों का प्रचलन था और उनमें धार्मिक सहिष्णुता थी। मूर्तियों और चित्रों का अध्ययन करने से हमें सामाजिक दशा का भी पता लगता है क्योंकि इनसे लोगों की वेश-भूषा, खान-पान, वनस्पतियों तथा पालतू पशुओं आदि का पता लगता है।
प्राचीन स्मारकों के अध्ययन से हमें स्थानीय शासकों के परस्पर सम्बन्धों तथा विदेशी शासकों के साथ सम्बन्धों का भी ज्ञान होता है। दक्षिण-पूर्व एशिया के स्मारकों से ज्ञात होता है कि भारत का विदेशी शासकों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध था। पुराने खण्डहरों की खुदाइयों से इतिहास निर्माण में उपयोगी मूल्यवान सामग्री मिलती है। हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में जो खुदाइयॉं हुई हैं उनसे भारत की एक अत्यन्त प्राचीन सभ्यता का पता लगा है जिसे सिन्धु घाटी की सभ्यता कहा गया है।
टीलों का उत्खनन
पूरे भारत में प्राचीन समारक एवं भवनों के अवशेष देखने को मिलते हैं। इनमें से अधिकांश स्मारकों एवं भवनों के अवशेषों को मिट्टी के टीलों के नीचे से खोद कर निकाला गया है। दक्षिण भारत में पत्थर के मंदिर और पूर्वी भारत में ईटों से बने विहार, टीलों के नीचे मिले हैं। इनमें से जिन थोड़े से टीलों का उत्खनन हुआ है, उन्हीं से हमें प्राचीन काल के जन-जीवन के बारे में कुछ जानकारी मिली है।
टीलों का उत्खनन दो प्रकार से हो सकता है- (1.) लम्बरूप खुदाई तथा (2.) क्षैतिज खुदाई।
लम्बरूप खुदाई सस्ती पड़ती है। इसलिये भारत में अधिकांश स्थलों की खुदाई लम्बरूप में की गई है। इस खुदाई का लाभ यह है कि इससे एक क्षेत्र पर विभिन्न कालों में होने वाले क्रमिक सांस्कृतिक विकास का अध्ययन करने में सहायता मिलती है किंतु इस प्रकार के उत्खनन से प्राचीन भारतीय इतिहास के अनेक चरणों के भौतिक जीवन का पूर्ण और समग्र चित्र नहीं मिल पाता। किसी भी काल की समग्र जानकारी प्राप्त करने के लिये क्षैतिज खुदाई करना आवश्यक है किंतु अत्यधिक खर्चीली होने के कारण क्षैतिज खुदाईयां बहुत कम की गई हैं।
विभिन्न टीलों के उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष, विभिन्न अनुपातों में सुरक्षित रखे गए हैं। सूखी जलवायु के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिमोत्तर भारत के पुरावशेष अधिक सुरक्षित बने रहे, परन्तु मध्य गंगा घाटी और डेल्टाई क्षेत्रों की नम और आर्द्र जलवायु में लोहे के औजार भी संक्षारित हो गये। कच्ची मिट्टी से बने भवनों के अवशेषों का दिखाई देना कठिन होता है इस कारण पक्की ईटों और पत्थर के बने हुए भवनों के काल के अवशेष ही नम और जलोढ़ क्षेत्रों में प्राप्त होते हैं ।
पश्चिमोत्तर भारत में किए गए उत्खननों से ऐसे नगरों का पता चला है जिनकी स्थापना लगभग 2500 ई.पू. में हुई थी। इसी प्रकार के उत्खननों से हमें गंगा की घाटी में विकसित हुई भौतिक संस्कृति के बारे में जानकारी मिली है। इससे पता चलता है कि उस समय के लोग जिस प्रकार की बस्तियों में रहते थे उनका विन्यास क्या था, वे किस प्रकार के मृद्भांडों का उपयोग करते थे, किस प्रकार के घरों में रहते थे, किन अनाजों का उपयोग करते थे, और किस प्रकार के औजारों अथवा हथियारों का उपयोग करते थे।
दक्षिण भारत के कुछ लोग मृत व्यक्ति के शव के साथ औजार, हथियार, मिट्टी के बर्तन आदि चीजें भी रख देते थे और इसके ऊपर एक घेरे में बड़े-बड़े़ पत्थर खडे़ करते थे। ऐसे स्मारकों को महापाषाण कहते हैं। समस्त महापाषाण इस श्रेणी में नहीं आते।
जिस विज्ञान के आधार पर पुराने टीलों का क्रमिक स्तरों में विधिवत् उत्खनन किया जाता है उसे पुरातत्त्व कहते हैं। उत्खनन और गवशेषणा के फलस्वरूप प्राप्त भौतिक अवशेषों का विभिन्न प्रकार से वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है जिससे यह पता चलता है कि वे स्थान कहाँ हैं, जहाँ से ये धातुएँ प्राप्त की गईं। इनसे धातु विज्ञान के विकास की अवस्थाओं का पता लगाया जाता है। पशुओं की हड्डियों का परीक्षण कर पालतू पशुओं तथा उनसे लिये जाने वाले कामों के बारे में जानकारी एकत्रित की गई है।
भारतीयों में ऐतिहासिक विवेक
प्राचीन भारतीयों पर यह आरोप लगाया जाता है कि उनमें ऐतिहासिक बोध का अभाव था। यह स्पष्ट है कि प्राचीन भारतीय लेखकों ने वैसा इतिहास नहीं लिखा जैसा आजकल लिखा जाता है, न ही उन्होंने यूनानियों की तरह इतिहास ग्रंथ लिखे किंतु हमारे धर्मग्रंथों में, विशेषकर पुराणों में तत्कालीन इतिहास मिलता है जो वस्तु-तत्त्व की दृष्टि से विश्वकोशीय है और गुप्त साम्राज्य के प्रारंभ तक के राजवंशीय इतिहास को उपलब्ध कराता है।
काल-बोध, जो इतिहास का एक महत्त्वूपर्ण घटक है, अभिलेखों में देखने को मिलता है। इनमें महत्त्वपूर्ण घटनाओं से सम्बन्धित किसी शासक विशेष के शासन वर्षों का उल्लेख रहता है। प्राचीन भारत में कई संवत आरम्भ किये गये जिनके आधार पर घटनाओं को अंकित किया गया।
विक्रम संवत्, 58 ई.पू. में आरम्भ हुआ, शक संवत् 78 ई.पू. में और गुप्त संवत 319 ई.पू. में। अभिलेखों में स्थानों और तिथियों का उल्लेख रहता है। पुराणों और जीवन चरित्रों में घटनाओं के कारण तथा परिणाम दिए गए हैं। इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए ये सब चीजें अपरिहार्य हैं, परन्तु इनके बारे में सुव्यवस्थित जानकारी नहीं मिलती।
धरती पर जहाँ-जहाँ पाषाण-कालीन सभ्यता एवं संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं, वहाँ-वहाँ से इतिहास लेखन को विश्वसनीय सामग्री प्राप्त हो सकी है। इसलिए इस काल की सभ्यता एवं संस्कृति के अवशेषों का अध्ययन किया जाना अत्यंत आवश्यक है। प्रागैतिहासिक कालखण्ड के इतिहास जानने के स्रोतइसके अतिरिक्त और कोई नहीं हो सकते।
धरती का भूगोल एवं जलवायु, धरती पर जीव जगत का निवास संभव बनाते हैं। धरती का जन्म आग के गोले के रूप में हुआ जो धीरे-धीरे ठण्डा होता हुआ इतना ठण्डा हो गया कि उसमें जीव जगत का पनपना संभव हो गया। धरती पर मानव का पदार्पण एक लम्बी यात्रा है जो भू-पर्पटी के ठण्डे और पर्यावरण के गर्म होने के साथ-साथ आगे बढ़ी है।
पाषाण-कालीन मानव का विकास
आस्ट्रेलोपिथेकस
धरती पर मानव का आगमन हिमयुग अथवा अभिनूतन युग (प्लीस्टोसीन) में हुआ जो एक भूवैज्ञानिक युग है। कहा नहीं जा सकता कि अभिनूतन युग का आरम्भ ठीक किस समय हुआ। पूर्वी अफ्रीका के क्षेत्रों में पत्थर के औजारों के साथ लगभग 35 लाख वर्ष पुराने मानव अवशेष मिले हैं।
इस युग के मानव को आस्ट्रेलोपिथेकस कहते हैं। इस आदिम मानव के मस्तिष्क का आकार 400 मिलीलीटर था। यह दो पैरों पर तो खड़ा होकर चलता था किंतु चूंकि यह सीधा तन कर खड़ा नहीं हो सकता था और यह शब्दों का उच्चारण करने में असमर्थ था, इसलिये इसे आदमी एवं बंदर के बीच की प्रजाति कहा जा सकता है। यह पहला प्राणी था जिसने धरती पर पत्थर का उपयोग हथियार के रूप में किया। उसके द्वारा उपयोग में लाये गये पत्थरों की पहचान करना संभव नहीं है।
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होमो इरेक्टस
होमो इरैक्टस का अर्थ होता है सीधे खड़े होने में दक्ष। इस मानव के 10 लाख वर्ष पुराने जीवाश्म जावा से प्राप्त किये गये हैं। होमो इरैक्टस के मस्तिष्क का आकार 1,000 मिलीलीटर था। इस आकार के मस्तिष्क वाला प्राणी बोलने में सक्षम होता है। इनके जीवाश्मों के पास बहुत बड़ी संख्या में दुधारी, अश्रुबूंद के आकार की हाथ की कुल्हाड़ियां और तेज धारवाले काटने के औजार तथा कच्चे कोयले के अवशेष मिले हैं। अनुमान है कि यह प्राणी कच्चा मांस खाने के स्थान पर पका हुआ मांस खाता था। उसने पशुपालन सीख लिया था तथा वह अपने पशुओं के लिये नये चारागाहों की खोज में अधिक दूरी तक यात्रायें करता था। यह मानव लगभग 10 लाख साल पहले अफ्रीका से बाहर निकला। इसके जीवाश्म चीन, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा भारत में नर्मदा नदी की घाटी में भी मिले हैं। वह यूरोप तथा उत्तरी धु्रव में हिम युग होने के कारण उन क्षेत्रों तक नहीं गया। यूरोप में उसने काफी बाद में प्रवेश किया। लगभग 7 लाख साल पहले तक वह 20 या 30 अलग-अलग प्रकार के उपकरण बनाता था जो नोकदार, धारदार तथा घुमावदार थे।
होमो इरैक्टस से दो जातियों ने जन्म लिया- पहली निएण्डरतल और दूसरी होमो सेपियन।
निएण्डरतल
आज से लगभग ढाई लाख साल पहले निएण्डरतल नामक मानव अस्तित्व में आया जो आज से 30 हजार साल पहले तक धरती पर उपस्थित था। ये लम्बी-लम्बी भौंह वाले, ऐसे मंद बुद्धि पशु थे जिनकी विशेषतायें आदिम प्रकार की अधिक और मानवों जैसी कम थीं। अर्थात् ये भारी भरकम शरीर वाले ऐसे उपमानव थे जिनमें समझ कम थी।
चेहरे मोहरे से नीएण्डरतल आज के आदमी से अधिक अलग नहीं थे फिर भी वे हमसे काफी तगड़े थे। उनका मस्तिष्क भी आज के आदमी की तुलना में भी बड़ा था किंतु उसमें जटिलता कम थी, सलवटें भी कम थीं और वह उसके स्वयं के शरीर के अनुपात में काफी कम था। इस कारण निएण्डरतल अपने बड़े मस्तिष्क का लाभ नहीं उठा पाया। वस्तुतः निएण्डरतल आज की होमोसपियन जाति का ही सदस्य था। आज से 30 हजार साल पहले यह मानव धरती से पूरी तरह समाप्त हो गया।
होमो सेपियन
आज से पांच लाख साल पहले होमो इरेक्टस काफी कुछ हमारी तरह दिखाई देने लगा। इसे होमो सेपियन अर्थात् ‘हमारी जाति के’ नाम दिया गया। इस मानव के मस्तिष्क का औसत आकार लगभग 1300 मिलीलीटर था। भारत में मानव का प्रथम निवास, जैसा कि पत्थर के औजारों से ज्ञात होता है, इसी समय आरम्भ हुआ। इस युग में धरती के अत्यंत विस्तृत भाग को हिम-परतों ने ढक लिया था।
होमोसेपियन सेपियन
आज से लगभग 1 लाख 20 हजार साल पहले आधुनिक मानव अस्तित्व में आ चुके थे। ये होमो सेपियन जाति का परिष्कृत रूप थे। इन्हें होमो सेपियन सेपियन कहा जाता है।
क्रो-मैगनन मैन
आज से लगभग 40 हजार वर्ष पहले होमो सेपियन सेपियन जाति के कुछ मनुष्य यूरोप में जा बसे। वे बौद्धिक रूप में अपने समकालीन नीएण्डरतलों से अधिक श्रेष्ठ थे। उनमें नये काम करने की सोच थी। वे अधिक अच्छे हथियार बना सकते थे जिनके फलक अधिक बारीक थे। वे शरीर को ढकना सीख गये थे।
उनके आश्रय स्थल अच्छे थे और उनकी अंगीठियां खाना पकाने में अधिक उपयोगी थीं। वे बोलने की शक्ति रखते थे। इन्हें क्रो-मैगनन मैन कहा जाता है। यह मानव लगभग 10 हजार वर्षों तक नीएण्डरतलों के साथ रहा जब तक कि नीएण्डरतल समाप्त नहीं हो गये। क्रो-मैगनन का शरीर निएण्डरथल के शरीर से बड़ा था।
इसके मस्तिष्क का औसत आकार लगभग 1600 मिलीलीटर था। आज से 30 हजार साल पहले जब नीएण्डरतल समाप्त हो गये तब पूरी धरती पर केवल क्रो-मैगनन मानव जाति का ही बोलबाला हो गया जो आज तक चल रहा है। वस्तुतः क्रो-मैगनन मानव ही प्रथम वास्तविक मानव है जो आज से लगभग 40 हजार साल पहले अस्तित्व में आया। इस समय धरती पर उत्तरवर्ती हिमयुग आरम्भ हो रहा था तथा लगभग पूरा यूरोप हिम की चपेट में था।
गर्म युग
आज से 12 हजार वर्ष पहले धरती पर होलोसीन काल आरंभ हुआ जो आज तक चल रहा है। यह गर्म युग है तथा वर्तमान हिमयुग के बीच में स्थित अंतर्हिम काल है। इस गर्म युग में ही आदमी ने तेजी से अपना मानसिक विकास किया और उसने कृषि, पशुपालन तथा समाज को व्यवस्थित किया।
आज तक धरती पर वही गर्म युग चल रहा है और मानव निरंतर प्रगति करता हुआ आगे बढ़ रहा है। आज से लगभग 10 हजार साल पहले आदमी ने कृषि और पशु पालन आरंभ किया। यह इस गर्म युग की सबसे बड़ी देन है। पश्चिम एशिया से मिले प्रमाणों के अनुसार आज से लगभग 8000 साल पहले अर्थात् 6000 ई.पू. में आदमी ने हाथों से मिट्टी के बर्तन बनाना और उन्हें आग में पकाना आरंभ कर दिया था।
पाषाण काल
पाषाण-काल मानव सभ्यता की उस अवस्था को कहते हैं जब मनुष्य अपने दिन प्रतिदिन के कामों में पत्थर से बने औजारों एवं हथियारों का प्रयोग करता था तथा धातु का प्रयोग करना नहीं जानता था। मनुष्य ने प्रथम बार पृथ्वी पर आखें खोलीं तथा पत्थर को अपना हथियार बनाया। उस काल का मनुष्य, नितांत अविकसित अवस्था में था और जंगली जीवन व्यतीत करता था। जैसे-जैसे उसके मस्तिष्क का विकास होता गया, वह पत्थरों के हथियारों तथा औजारों को विकसित करता चला गया। इसी के साथ वह सभ्य जीवन की ओर आगे बढ़ा।
मानव की इस अवस्था के बारे में सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है कि मनुष्य औजार प्रयुक्त करने वाला पशु है। निःसंदेह संस्कृति की समस्त उन्नति, जीवन को सुखी एवं आरामदायक बनाने के लिये प्रकृति के साथ चल रहे युद्ध में, औजारों तथा उपकरणों के बढ़ते हुए उपयोग के कारण हुई है। मनुष्य का भौतिक इतिहास, मनुष्य के औजार विहीन अवस्था से निकलकर वर्तमान में पूर्ण मशीनी अवस्था में पहुँचने तक का लेखा जोखा है।
अध्ययन की दृष्टि से पाषाण युग को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-
(1.) पूर्व-पाषाण काल
(2.) मध्य-पाषाण काल
(3.) नव-पाषाण काल
संस्कृति के ये तीनों काल एक के बाद एक करके अस्तित्व में आये किंतु ऐसे स्थल बहुत कम मिले हैं जहाँ तीनों अवस्थाओं के अवशेष देखने को मिलते हैं। विंध्य के उत्तरी भागों तथा बेलन घाटी में पूर्व-पाषाण-काल, मध्य-पाषाण-काल और नव-पाषाण-काल की तीनों अवस्थाएं क्रमानुसार देखने को मिलती हैं।
पूर्व-पाषाण काल (पेलियोलिथिक पीरियड)
मानव-सभ्यता के प्रारम्भिक काल को पूर्व-पाषाण-काल के नाम से पुकारा गया है। इसे पुरा पाषाण काल तथा उच्च पुरापाषाण युग भी कहते हैं। मानव की ‘होमो सेपियन’ प्रजाति इस संस्कृति की निर्माता थी।
काल निर्धारण
भारत में इस काल का आरम्भ आज से लगभग पाँच लाख वर्ष पहले हुआ। भारत में मानव आज से लगभग दस हजार साल पहले तक संस्कृति की इसी अवस्था में रहा। आज से लगभग दस हजार वर्ष पहले अर्थात् 8000 ई.पू. में, पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का अन्त हुआ।
पूर्व-पाषाण-कालीन स्थल
पूर्व-पाषाण-कालीन स्थल कश्मीर, पंजाब की सोहन नदी घाटी (अब पाकिस्तान), मध्यभारत, पूर्वी भारत तथा दक्षिणी भारत में पाये गये हैं। इस संस्कृति के औजार छोटा नागपुर के पठार में भी मिले हैं। ये 1,00,000 ई.पू. तक पुराने हो सकते हैं। बिहार के सिंहभूमि जिले में लगभग 40 स्थानों पर पूर्व पाषाण कालीन स्थल मिले हैं।
बंगाल के मिदनापुर, पुरुलिया, बांकुरा, वीरभूम, उड़ीसा के मयूरभंज, केऊँझर, सुंदरगढ़ तथा असम के कुछ स्थानों से भी इस काल के पाषाण निर्मित औजार प्राप्त हुए हैं। आन्ध्र प्रदेश के कुर्नूल नगर से लगभग 55 किलोमीटर की दूरी पर ऐसे औजार मिले हैं जिनका समय 25,000 ई.पू. से 10,000 ई.पू. के बीच का है।
इनके साथ हड्डी के उपकरण और जानवरों के अवशेष भी मिले हैं। आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले से भी इस युग के औजार मिले हैं। कर्नाटक के शिमोगा जिले तथा मालप्रभा नदी के बेसिन से भी इस युग के औजार मिले हैं। नागार्जुन कोंडा से भी पत्थर के फाल एवं अन्य उपकरण मिले हैं।
लिखित उल्लेख
पुराणों में पूर्व पाषाण कालीन मानवों के उल्लेख मिलते हैं जो कंद-मूल खाकर गुजारा करते थे। ऐसी पुरानी पद्धति से जीविका चलाने वाले लोग पहाड़ी क्षेत्रों में और गुफाओं में आधुनिक काल तक मौजूद रहे हैं।
शैल चित्र
विंध्याचल की पहाड़ियों में भीमबेटका नामक स्थान है जहाँ 200 से अधिक गुफाएं पाई जाती हैं। इन गुफओं में पूर्व-पाषाण कालीन मानव द्वारा बनाये गये कई प्रकार के शैल चित्र प्राप्त हुए हैं। इन चित्रों की संख्या कई हजार है। इनका काल एक लाख वर्ष पूर्व माना जाता है। इन गुफाओं में वे औजार भी मिले हैं जिनसे ये गुफाएं बनाई गई होंगी तथा इन चित्रों को उकेरा गया होगा। इन गुफाओं से 5000 से भी अधिक वस्तुएं मिली हैं जिनमें से लगभग 1500 औजार हैं।
जीवाश्म
कुर्नूल जिले की गुफाओं से बारहसिंघे, हिरन, लंगूर तथा गेंडे के जीवाश्म भी मिले हैं। ये जीवाश्म पूर्व-पाषाण युग के हैं। इन जीवाश्मों के पाये जाने वाले क्षेत्र में पूर्व-पाषाण कालीन औजार भी मिले हैं।
पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति एवं उसकी विशेषताएं
इस काल का मानव पूर्णतः आखेटक अवस्था में था। वह कृषि, पशुपालन, संग्रहण आदि मानवीय कार्यकलापों से अपरिचित था। इस काल के मानव ने जिस संस्कृति का निर्माण किया उसकी विशेषताएं इस प्रकार से हैं-
निवासी
इतिहासकारों, पुरातत्ववेत्ताओं एवं समाजशास्त्रियों की धारणा है कि पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के लोग हब्शी जाति के थे। इन लोगों का रंग काला और कद छोटा था। इनके बाल ऊनी थे और नाक चिपटी थी। ऐसे मानव आज भी अण्डमान एवं निकोबार द्वीपों में पाये जाते हैं।
औजार
पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव, पत्थर के अनगढ़ और अपरिष्कृत औजार बनाता था। वह कठोर चट्टानों से पत्थर प्राप्त करता था तथा उनसे हथौड़े एवं रुखानी आदि बनाता था जिनसे वह ठोकता, पीटता तथा छेद करता था। ये औजार अनगढ़ एवं भद्दे आकार के होते थे। पत्थर के औजारों से वह पशुओं का शिकार करता था। पत्थर के इन औजारों में लकड़ी तथा हड्डियों के हत्थे लगे रहते थे, लकड़ी तथा हड्डियों के भी औजार होते थे परन्तु अब वे नष्ट हो गये हैं।
आवास
पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव किसी एक स्थान पर स्थिर नहीं रहता था वरन् जहाँ कहीं उसे शिकार, कन्द, मूल, फल आदि पाने की आशा होती थी वहीं पर चला जाता था। प्राकृतिक विषमताओं एवं जंगली जानवरों से बचने के लिये वह नदियों के किनारे स्थित जंगलों में ऊँचे वृक्षों एवं पर्वतीय गुफाओं का आश्रय लेता था। समझ विकसित होने पर इस युग के मानव ने वृक्षों की डालियों तथा पत्तियों की झोपड़ियां बनानी आरम्भ कीं।
आहार
पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के लोग अपनी जीविका के लिये पूर्ण रूप से प्रकृति पर निर्भर थे। भोजन प्राप्त करने के लिये जंगली पशुओं का शिकार करते थे और नदियों से मछलियाँ पकड़ते थे। वनों में मिलने वाले कन्द-मूल एवं फल भी उनके मुख्य आहार थे।
कृषि
पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव कृषि करना नहीं जानता था।
पशुपालन
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले की बेलन घाटी में मिले घरेलू पशुओं के अवशेषों से अनुमान होता है कि 25,000 ई.पू. के आसपास बकरी, भेड़ और गाय-भैंस आदि पाले जाते थे।
वस्त्र
पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव पूर्णतः नंगे रहते थे। प्राकृतिक विषमताओं से बचने के लिये उन्होंने वृक्षों की पतियों, छाल तथा पशुओं की खाल से अपने शरीर को ढंकना प्रारम्भ किया होगा।
सामाजिक संगठन
पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव टोलियां बनाकर रहते थे। प्रत्येक टोली का एक प्रधान होता होगा जिसके नेतृत्व में ये टोलियॉं आहार तथा आखेट की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान को जाया करती होंगी।
शव-विसर्जन
अनुमान है कि पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के आरंभिक काल में शवों को जंगल में वैसे ही छोड़ दिया जाता था जिन्हें पशु-पक्षी खा जाते थे। बाद में शवों के प्रति दायित्व की भावना विकसित होने पर वे शवों को लाल रंग से रंगकर धरती में गाड़ देते थे।
मध्य-पाषाण काल (मीजोलिथिक पीरियड)
8000 ई.पू. में धरती पर अब तक के अंतिम हिमयुग की समाप्ति हुई। इसी के साथ धरती की जलवायु शुष्क तथा उष्ण हो गई जलवायु में हुए परिवर्तनों के साथ-साथ वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं में भी परिवर्तन हुए। इस काल में धरती पर क्रो-मैगनन मानव का बोलबाला था। उसका मस्तिष्क पूर्वपाषाण कालीन मानव से काफी विकसित था।
इस कारण इस मानव ने तेजी से सभ्यता एवं संस्कृति का विकास किया जिससे उसके जीवन में पहले की अपेक्षा बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया। यह मानव अपने अधिवास के लिये अधिक अनुकूल एवं नये क्षेत्रों की तरफ बढ़ा तथा इसने एक नई संस्कृति को जन्म दिया। इस संस्कृति को मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति अथवा उत्तर-पाषाण-कालीन संस्कृति कहते हैं।
काल निर्धारण
मध्य-पाषाण-काल, पूर्व-पाषाण-काल और नव-पाषाण- काल के बीच का संक्रांति काल है। इसे उत्तर पाषाण युग भी कहते हैं। भारत में इस संस्कृति का आरम्भ 8000 ई.पू. के आसपास हुआ और लगभग 4000 ई.पू. तक चला।
मध्य-पाषाण-संस्कृति स्थल
मध्य-पाषाण-संस्कृति के कई स्थल छोटा- नागपुर, मध्य भारत और कृष्णा नदी के दक्षिण में मिले हैं। मध्य भारत में नर्मदा के तटों पर, गोदावरी के नदीमुख-क्षेत्र में और तुंगभद्रा तथा पेन्नार के बीच के क्षेत्र में भी मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति स्थल मिले हैं। बेलन की घाटी में भी इस युग के मानव के आवास मिले हैं। इस संस्कृति के स्थल सोहन नदी घाटी में भी मिले हैं। यहाँ हिमालय क्षेत्र के तृतीय हिमाच्छादन के समकालीन स्तर में हम एक अनगढ़ प्रस्तर उपकरण उद्योग को देखते हैं।
मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति की विशेषताएं
औजार
मध्य-पाषाण-संस्कृति के विशिष्ट औजार लघु-पाषाण हैं। इस संस्कृति के मानव ने प्रमुखतः शल्क औजारों का उत्पादन किया। ये शल्क समस्त भारत में पाए गए हैं और इनमें क्षेत्रीय भेद भी देखने को मिले हैं। इनमें मुख्य औजार शल्कों से निर्मित विभिन्न प्रकार की खुरचनियां हैं। बरमे और धार वाले उपकरण भी भारी संख्या में मिले हैं।
हाथ की कुल्हाड़ियों का उपयोग इस काल की प्रमुख विशेषता है। भारत में प्राप्त ऐसी कुल्हाड़ियाँ काफी सीमा तक वैसी ही हैं जैसी की पश्चिमी एशिया, यूरोप और अफ्रीका में मिली कुल्हाड़ियाँ हैं। पत्थरों के औजारों का उपयोग मुख्यतः काटने एवं छीलने के लिए होता था। भोपाल से 40 किलोमीटर दक्षिण में स्थित भीमबेटका से हाथ की कुल्हाड़ियाँ, विदारक, पत्तियां और खुरचनियां तथा कुछ तक्षणियाँ पायी गयी हैं।
गुजरात के टिब्बों के ऊपरी स्तरों में पत्तियां, तक्षणियां, खुरचनियां आदि मिले हैं। हाथ की कुल्हाड़ियां हिमालय के दूसरे हिमनद निक्षेप में भी मिली हैं। नर्मदा तट के अनेक स्थानों पर और तुंगभद्रा के दक्षिण में भी अनेक स्थानों पर इस युग के औजार मिले हैं।
औजारों का विकास
मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव भी अपने औजार पत्थर से ही बनाता था परन्तु उसके औजार पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के औजारों की अपेक्षा अधिक साफ तथा सुन्दर होते थे। अब वे उतने भद्दे नहीं रह गये थे। इन औजारों को रगड़ एवं घिस कर चिकना कर लिया जाता था। इससे वे सुडौल तथा चमकीले हो जाते थे।
इस काल में औजार एवं हथियार बनाने के लिये लकड़ी तथा हड्डियों का प्रयोग पहले से भी अधिक होने लगा। इससे औजारों में विविधता आ गई और धनुष, बाण, भाले, चाकू, कुल्हाड़ी के अतिरिक्त हल, हँसिया, घिरनी, सीढ़ी, डोंगी, तकली आदि भी बनायी जाने लगी।
आवास
बेलन घाटी में गुफाओं और चट्टानों से बने शरण-स्थल पाये गये हैं जो विशेष मौसमों में मनुष्यों द्वारा शिविर के रूप में उपयोग किये जाते रहे होंगे। भोपाल से 40 किलोमीटर दक्षिण में भीम बेटका में भी मनुष्यों के उपयोग में आने वाली गुफाएं और चट्टानों से बने शरण-स्थान पाये गये हैं।
जलवायु
हिम काल की समाप्ति के बाद धरती पर शुष्क एवं उष्ण जलवायु आरंभ हुआ था। मध्य-पाषाण काल में धरती की जलवायु कम आर्द्र थी। इस काल के आरंभ होने के बाद से धरती की जलवायु की परिस्थितियों में अब तक कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ है।
कृषि का आरम्भ
मध्य-पाषाण-काल के मानव ने हल तथा बैलों की सहायता से कृषि करना आरम्भ कर दिया। वह पौधों को काटने के लिए हँसिया तथा अनाज पीसने के लिए चक्कियों का प्रयोग करने लग गया। इस काल का मानव गेहूँ, जौ, बाजरा आदि की खेती करता था।
पशु-पालन
पशु पालन पूर्व-पाषाण-काल में आरम्भ हो गया था। मध्य-पाषाण-काल के मानव ने पशुओं की उपयोगिता को अनुभव करके पशु-पालन का काम बड़े स्तर पर आरम्भ कर दिया। इस काल का मानव गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी, कुत्ता, घोड़ा आदि जानवरों को पालता था।
मिट्टी के बर्तनों का निर्माण
मध्य-पाषाण-काल के मानव ने मिट्टी के बर्तन बनाना आरम्भ किया। कृषि तथा पशु-पालन का काम आरम्भ हो जाने से इस संस्कृति के मानव के पास सामान अधिक हो गया। अपने सामान को सुरक्षित रखने के लिए इस युग के मानव ने मिट्टी के छोटे-बड़े बर्तन बनाने आरम्भ किये। इस काल का मानव चाक का अविष्कार नहीं कर पाया था। अतः बर्तन हाथ से ही बनाये जाते थे।
वस्त्र-निर्माण
मध्य-पाषाण-काल के मानव ने पौधों के रेशों तथा ऊन के धागों की कताई आरम्भ की। इन धागों को बुनकर वह वस्त्र बनाने लगा। खुदाई में बहुत-सी तकलियाँ तथा करघे मिले हैं। इस संस्कृति का मानव वस्त्रों को रंगना भी सीख गया था।
गृह-निर्माण
मध्य-पाषाण-काल के मानव ने अपने निवास के लिये स्थाई घर बनाना आरम्भ किया। इस काल के घरों की दीवारें लट्ठों तथा नारियल के तनों से बनी होती थीं और उन पर मिट्टी का लेप लगाया जाता था। इनकी छतें लकड़ी, पत्ती, छाल आदि से बनती थी और फर्श कच्ची मिट्टी से बनता था।
कार्य-विभाजन तथा वस्तु-विनिमय
मध्य-पाषाण-काल के मानव ने भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यों को करना आरम्भ कर दिया था। कोई खेती करता था तो कोई मिट्टी के बर्तन बनाता था और कोई लकड़ी के काम किया करता था। इस प्रकार सबका काम अलग-अलग बंट गया। इससे वस्तु-विनिमय आरम्भ हो गया। एक गाँव के लोग अपनी विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं को पूरा करने लिए चीजों की अदली-बदली किया करते थे। बढ़ई तथा कुम्हार अपनी वस्तुएँ किसान को देकर उनसे अन्न प्राप्त कर लेते थे।
युद्ध का प्रारम्भ
पुरा-पाषाण-काल का मानव झुण्डों में रहता था जिनमें प्रायः संघर्ष हो जाया करता था। मध्य-पाषाण-काल में विभिन्न मानव बस्तियों के बीच युद्ध होने आरम्भ हो गए। इसलिये आत्म-रक्षा के लिए गांव के चारों और खाई बनाई जाने लगी ताकि शत्रु अचानक गांव में न घुस सकें। इस काल का मानव, युद्ध में पत्थर के हथियारों का प्रयोग करता था।
धर्म
खुदाई में कुछ नारी-मूर्तियाँ मिली हैं जिनसे अनुमान लगाया गया है कि मध्य-पाषाण-संस्कृति का मानव मातृदेवी का उपासक था। देवी को प्रसन्न करने के लिए वह सम्भवतः पशुओं की बलि भी देता था। उसका विश्वास था कि ऐसा करने से पृथ्वी माता प्रसन्न होती है और पशु तथा कृषि में वृद्धि होती है।
शव-विसर्जन
मध्य-पाषाण-काल का मानव भी शवों को धरती में गाड़ता था। इस कार्य के लिये अलग से स्थान निर्धारित किया जाता था। कभी-कभी घर के भीतर अथवा उनके निकट ही शव को गाड़ा जाता था। शव के साथ उपयोगी वस्तुएँ रखी जाती थीं। इस काल में शव को जलाने की प्रथा भी आरम्भ हो गई थी। शव दहन के पश्चात् उसकी राख को मिट्टी के बर्तन में रख कर आदरपूर्वक भूमि में गाड़ा जाता था।
निष्कर्ष
मध्य-पाषण-कालीन संस्कृति में मानव जीवन में आये परिवर्तन अत्यंत क्रान्तिकारी थे। इस काल का मानव, सभ्यता की दौड़ में बहुत आगे बढ़ गया था। कृषि तथा पशु-पालन का कार्य आरम्भ हो जाने के कारण उसमें सहकारिता की भावना विकसित हो गई थी जिससे वह एक स्थान पर गाँवों में स्थायी रूप से निवास करने लगा था। उसे अपनी धरती से प्रेम होने लगा था। इस कारण मध्य-पाषण-कालीन संस्कृति के मानव में मातृभूमि की धारणा विकसित हो गई।
मानव के पास भूमि, घर, पशु, अन्न तथा अन्य उपयोगी वस्तुएँ होने से व्यक्तिगत सम्पत्ति का उदय हो गया और लोगों में सम्पन्नता तथा दरिद्रता का भाव भी जन्म लेने लगा था। अपनी सम्पत्ति की रक्षा के लिए विभिन्न प्रकार की व्यवस्थाएँ भी की जाने लगीं। सारांश यह है कि मध्य-पाषाण-काल, पूर्व-पाषाण-काल की अपेक्षा सभ्यता तथा संस्कृति के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ गया था।
नव-पाषाण-काल (निओलिथिक पीरियड)
पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति से निकलकर मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति तक पहुंचने में मानव को लगभग 35 लाख वर्ष लगे। भारत में यह कार्य लगभग 5 लाख साल में हुआ। इतने लम्बे समय तक मानव का संस्कृति के एक ही चरण में बने रहने का कारण यह है कि पूर्वपाषाण कालीन संस्कृति को जन्म देने वाले होमो सेपियन मानव का मस्तिष्क अधिक विकसित नहीं था। जबकि मध्यपाषाण कालीन संस्कृति को जन्म देने वाले क्रोमैगनन मानव अधिक बड़े एवं विकसित मस्तिष्क का स्वामी था। इस कारण उसने लगभग दो से पांच हजार साल में ही मध्यपाषाण-कालीन संस्कृति को त्यागकर नव-पाषाण कालीन संस्कृति को जन्म दिया।
काल निर्धारण
पश्चिमी एशिया के इतिहास में 9000-3000 ई.पू. के बीच की अवधि में पहली प्रौद्योगिक क्रंाति घटित हुई, क्योंकि इसी अवधि में कृषि, कपड़़ा बुनाई, गृह-निर्माण आदि कलाओं का आविष्कार हुआ परन्तु भारतीय प्रायद्वीप में नवपाषाण युग का आरम्भ ईसा पूर्व चौथी सहस्राब्दि के लगभग हुआ। इसी युग में प्रायद्वीप में चावल, गेहूँ और जौ जैसे कुछ महत्त्वपूर्ण अनाजों की खेती आरम्भ हुई। इस भूभाग में आरंभिक गांवों की स्थापना भी इसी युग में हुई। मानव अब सभ्यता की देहली पर पैर रखने जा रहा था। दक्षिणी भारत और पूर्वी भारत में ऐसी कुछ बस्तियों की स्थापना 1000 ई.पू. में भी होती रही।
नव-पाषाण-कालीन संस्कृति की विशेषताएं
नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव का जीवन: नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव का जीवन पर्याप्त कष्टमय था। उसे पत्थरों के औजारों और हथियारों पर ही पूर्णतः आश्रित रहना पड़ता था, इसलिए वह पहाड़ी क्षेत्रों से अधिक दूरी पर अपनी बस्तियों की स्थापना नहीं कर पाया। बहुत अधिक परिश्रम करने पर भी वह केवल अपने निर्वहन भर के लिए अनाज पैदा कर पाता था।
नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के औजार: नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव ने पॉलिशदार पत्थर के औजारों का उपयोग किया। पत्थर की कुल्हाड़ियां उसका प्रमुख औजार थीं जो प्रायः समस्त भारत में बड़ी संख्या में मिली हैं। उस युग के लोगों ने काटने के इस औजार का कई प्रकार से उपयोग किया। कुल्हाड़ी चलाने में प्रवीण वीर परशुराम का प्रचीन आख्यान प्रसिद्ध है। इस युग के पॉलिशदार औजारों में लघुपाषाणों के फलक भी हैं।
नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के स्थल
नवपाषाण युग के निवासियों की बस्तियों को, उनके द्वारा प्रयुक्त कुल्हाड़ियों की किस्मों के आधार पर, तीन महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में बांटा जा सकता है- (1.) उत्तर दिशा में बर्जेहोम, (2.) पूर्व दिशा में चिरंड तथा (3.) दक्षिण दिशा में गोदावरी नदी के दक्षिण में।
(1.) बुर्जहोम
कश्मीर की घाटी में श्रीनगर से 20 किलोमीटर दूर बर्जेहोम नामक स्थान है। यहाँ के नव-पाषाण-कालीन मानव, एक प्लेट पर, गड्ढे वाले घरों में रहते थे। पशुओं और मछलियों के आखेट पर ही उनका जीवन आश्रित था। अनुमान होता है कि वे कृषि अथवा पालतू पशुओं से परिचित नहीं थे। वे पत्थर के पॉलिशदार औजारों का उपयोग करते थे, उनके बहुत से औजार और हथियार हड्ड्यिों से बने हुए हैं।
बुर्जहोम के लोग अपरिष्कृत धूसर मृद्भाण्डों का उपयोग करते थे। बुर्जहोम में पालतू कुत्ते भी स्वामियों के शवों के साथ शवाधानों में गाढ़े जाते थे। गड्ढों वाले घरों में रहने और स्वामी के शव के साथ उसके पालतू कुत्ते को गाढ़ने की प्रथा भारत में नवपाषाण युगीन लोगों में अन्यत्र कहीं भी देखने को नहीं मिलती। बुर्जहोम की बस्ती 2400 ई.पू. की है।
(2.) चिरंड
भारत में दूसरा स्थान चिरंड है जहाँ से पर्याप्त मात्रा में हड्डियों के औजार मिले हैं। यह स्थल पटना से 40 किलोमीटर पश्चिम में गंगा के उत्तर में स्थित है। ये औजार उत्तर नवपाषाण युगीन स्तरों वाले एक ऐसे क्षेत्र में मिले हैं जहाँ लगभग 100 सेंटीमीटर वर्षा होती है। यहाँ पर चार नदियों- गंगा, सोन, गंडक और घाघरा का मिलन-स्थल होने के कारण खुली धरती उपलब्ध थी। इस कारण यहाँ बस्ती की स्थापना सम्भव हुई। चिरंड से प्राप्त हड्डियों के औजार 1600 ई.पू. के लगभग के हैं।
(3.) गोदावरी नदी
नवपाषाण युगीन लोगों के एक समूह का निवास दक्षिण भारत में गोदावरी नदी के दक्षिण में निवास करता था। इन्होंने अपनी बस्तियां सामान्यतः ग्रेनाइट की पहाड़ियों के ऊपर अथवा नदी तट के समीप के टीलों पर स्थापित कीं। ये लोग पत्थर की कुल्हाड़ियों के साथ-साथ एक प्रकार के प्रस्तर-फलकों का भी उपयोग करते थे। आग में पकायी गयी लघु मृण्मूर्तियों को देखने से अनुमान होता है कि वे कई पशुओं को पालते थे। वे गाय-बैल, भेड़ और बकरियां रखते थे। वे सिलबट्टे का उपयोग करते थे, जिससे ज्ञात होता है कि वे अनाज पैदा करने की कला जानते थे।
(4.) अन्य स्थल
भारत के पूर्वोत्तर में स्थित असम की पहाड़ियों से नवपाषाण युगीन औजार प्राप्त हुए हैं। भारत के मेघालय की गारो पहाड़ियों में भी नव-पाषण-संस्कृति के औजार मिले हैं। इनका काल निर्धारित नहीं किया जा सका है। इनके अतिरिक्त विंध्याचल के उत्तरी भागों में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर और इलाहाबाद जिलों से भी अनेक नवपाषाण युगीन स्थल मिले हैं। इलाहाबाद जिले के नवपाषाण युगीन स्थलों की विशेषता यह है कि यहाँ ईसा पूर्व की छठी सहस्राब्दी में भी चावल की खेती की जाती थी। बिलोचिस्तान में भी नवपाषाण युग के कुछ स्थल मिले हैं जो सबसे प्राचीन अनुमानित होते हैं।
नव-पाषाण युगीन स्थलों का उत्खनन
भारत में अब तक जिन नवपाषाण युगीन स्थलों अथवा स्तरों का उत्खनन हुआ है, उनमें प्रमुख हैं- कर्नाटक में मास्की, ब्रह्मगिरी, हल्लुर, कीड़कल, संगनकल्लु, टी. नरसीपुर तथा तैक्कलकोट, तमिलनाडु में पेयमपल्ली, आन्ध्रप्रदेश में पिकलीहल और उतनूर। यहाँ नवपाषाण अवस्था का चरण लगभग 2500 ई.पू. से 1000 ई.पू. तक रहा, यद्यपि उतनूर के लिए प्राचीनतम कार्बन-तिथि 2300 ई.पू. है।
आवास
नव-पाषाण युगीन मानव ने प्राकृतिक आवासों अर्थात् पर्वतीय गुफाओं एवं पेड़ों का आश्रय त्यागकर नदी तटों एवं पर्वतों के समतल स्थानों पर पेड़ों की टहनियों, तनों, सूखी लकड़ियों, घास एवं पशुओं की हड्डियों तथा खालों आदि से आवास बनाने आरम्भ किये। ये आवास झुण्ड में बनते थे।
औजार
इस युग के औजार एवं हथियार पत्थर से ही बनाये जाते थे किंतु अब उनमें पहले की अपेक्षा अधिक वैविध्य, कौशल एवं सौन्दर्य का समावेश किया गया। नव-पाषाण-कालीन औजारों एवं हथियारों पर पॉलिश की जाने लगी। इनके निर्माण के लिये अच्छे दाने के गहरे हरे रंग के ट्रप का उपयोग किया जाने लगा। इस युग के औजारों में कुल्हाड़ियाँ, चाकू, तीर, ओखली, मूसल, पीसने के औजार, स्क्रैपर तथा पॉइण्टर उपलब्ध हुए हैं।
कृषि
नवपाषाण युग की कुल्हाड़ियां उड़ीसा के पहाड़ी क्षेत्रों में भी मिली हैं। देश के इस भाग में चावल की खेती और छोटे पैमाने की बस्तियों की शुरूआत काफी पहले हुई थी। बाद के नवपाषाण युगीन अधिवासी ऐसे कृषक थे जो मिट्टी और सरकंडों से बनाए गए गोलाकार अथवा चौकोर घरों में रहते थे। गोलाकार घरों में रहने वाले लोगों की सम्पत्ति सामूहिक होती थी। यह निश्चित है कि ये लोग स्थायी अधिवासी बन गए थे। ये रागी और कुलथी पैदा करते थे।
पशुपालन
पिकलीहल के नवपाषाण युगीन अधिवासी पशुपालक थे। उन्होंने गाय-बैल, भेड़-बकरी आदि को पालतू बना लिया था। ये लोग मौसमी पड़ाव डालकर इनके इर्द-गिर्द खंभेे और खूँटे गाड़कर गौशालाएं खड़ी करते थे। ऐसे बाड़ों के भीतर वे गोबर का ढेर लगाते थे। फिर इस समस्त पड़ाव स्थल को आग लगाकर आगामी मौसम के पड़ाव के लिए इसे साफ करते थे। पिकलीहल में ऐसे राख के ढेर ओर पड़ावस्थल दोनों ही मिले हैं।
बर्तन
चूँकि नवपाषाण अवस्था के कई अधिवासी समूह अनाजों की खेती से परिचित हो गए थे और पालतू पशु भी रखने लगे थे, इसलिए उन्हें अनाज और दूध आदि रखने के लिए बर्तनों की आवश्यकता थी। पकाने और खाने के लिए भी उन्हे बर्तनों की आवश्यकता थी। चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाना इस युग का महत्त्वपूर्ण अविष्कार था। इसी युग में मानव ने मिट्टी के बर्तनों को आग में पकाकर मजबूत बनाना सीखा।
धर्म
नव-पाषाण-काल में धार्मिक अनुष्ठान प्रारंभ हो गये। चूंकि शवों के साथ दैनिक आवश्यकता की वस्तुएं भी शवाधानों से प्राप्त हुई हैं इसलिये अनुमान होता है कि इस काल का मानव पुर्नजन्म में अथवा मृत्यु के बाद के किसी विशेष तरह के जीवन में विश्वास करता था।
तीनों सभ्यताओं का तुलनात्मक अध्ययन
काल का अंतर
पूर्व पाषाण काल आज से लगभग पांच लाख साल पहले आरंभ होकर आज से लगभग 10 हजार साल पहले तक अर्थात् 8000 ई.पू. तक चला। मध्य-पाषाण-काल आज से 10 हजार साल पहले आरम्भ होकर आज से लगभग 6 हजार साल पहले तक अर्थात् 4000 ई.पू. तक चला। नव-पाषाण-काल आज से लगभग 6 हजार साल पहले आरंभ हुआ तथा लगभग 1000 ई.पू. तक चलता रहा।
स्थल
पूर्व पाषाण कालीन स्थल कश्मीर, पंजाब, सोहन नदी घाटी, छोटा नागपुर के पठार, विंध्याचल की पहाड़ियों में भीम बेटका, बिहार का सिंहभूम जिला, बंगाल, असम, आंध्र प्रदेश कर्नाटक मालप्रभा नदी बेसिन आदि विस्तृत क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं। मध्य पाषाण कालीन स्थल हिमालय के द्वितीय हिमनद निक्षेप, बेलन घाटी, भीम बेटका, गुजरात, नर्मदा तट तथा तुंगभद्रा के दक्षिण में मिले हैं।
नवपाषाण काल के स्थल कश्मीर की घाटी में बुर्जहोम, पटना के निकट चिरंड, गोदावरी नदी के दक्षिणी क्षेत्र, असम की पहाड़ियां, मेघालय की गारो पहाड़ियां, उड़ीसा, कर्नाटक में मास्की, ब्रह्मगिरि, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश आदि स्थानों पर पाये गये हैं।
औजार
पूर्व-पाषाण-कालीन औजार क्वार्टजाइट से बनते थे। मध्य-पाषाण- कालीन औजार कैल्सेडोनी, जेस्पर, चर्ट और ब्लडस्टोन से बनते थे। नव-पाषाण-काल के औजार अच्छे दाने के गहरे हरे रंग के ट्रप से बनते थे। पूर्व-पाषाण-कालीन औजारों पर किसी तरह की पॉलिश नहीं है। वे अनगढ़, भद्दे और स्थूल हैं।
मध्य-पाषाण-कालीन औजार बहुत छोटे हैं इसलिये इन्हें लघुपाषाण, अणुपाषाण तथा लघु औजार भी कहा जाता है। इनका आकार आधा इंच से पौने दो इंच तक पाया गया है। नव-पाषाण-कालीन औजारों पर पॉलिश पाई गई है। अधिकांशतः पूरे औजारों पर पॉलिश की गई है। कुछ औजारों पर ऊपर तथा नीचे की ओर पॉलिश की गई है।
आवास
पूर्व-पाषाण-कालीन मानव पर्वतीय कंदराओं, वृक्षों एवं प्राकृतिक आवासों में आश्रय लेता था। मध्य-पाषाण- कालीन मानव भी आवास बनाने की कला से लगभग अपरिचित था। वह भी प्राकृतिक आवासों पर निर्भर था। नव-पाषाण-कालीन मानव पेड़ों की टहनियों एवं पशुओं की हड्डियों की सहायता से झौंपड़ियां बनाना सीख गया था।
कृषि
पूर्व-पाषाण-कालीन मानव कृषि करना नहीं जानता था। मध्य-पाषाण- कालीन मानव बैलों एवं मानवों की सहायता से कृषि करना सीख गया था। वह पौधों को काटने के लिये हँसिया तथा अनाज को पीसने के लिये चक्कियों का प्रयोग करता था। वह गेहूँ, जौ बाजरा आदि की खेती करता था। नव-पाषाण-काल का मानव चावल, रागी और कुलथी भी पैदा करने लगा था। इनके पॉलिशदार औजारों में लघुपाषाणों के फलक भी हैं।
पशुपालन
पूर्व-पाषाण-कालीन मानव ने 25,000 ई.पू. के आसपास बकरी, भेड़ और गाय-भैंस आदि पालना आरंभ किया। मध्य-पाषाण-काल का मानव गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी, कुत्ता, घोड़ा आदि जानवरों को पालता था। पशुओं पर उसकी निर्भरता बढ़ गई। नव-पाषाण काल का मानव पशुपालन पर और अधिक निर्भर हो गया। बोझा ढोने से लेकर हल खींचने तक के काम पशुओं से लिये जाने लगे।
बर्तन
पूर्व-पाषाण-कालीन मानव बर्तन बनाना नहीं जानता था। मध्य पाषाण-काल के मानव ने मिट्टी के बर्तन बनाना आरम्भ किया किंतु इस काल के बर्तन न तो चाक पर बनाये जाते थे और न उन्हें आग में पकाया जाता था। नव-पाषाण काल के मानव ने बर्तन बनाने के लिये चाक का अविष्कार किया तथा उन्हें पक्का बनाने के लिये आग में पकाना आरंभ किया।
सामाजिक संगठन
पूर्व-पाषाण-कालीन मानव टोलियां बनाकर रहता था। उसमें परिवार की भावना विकसित नहीं हुई थी। उनका नेतृत्व एक प्रधान मानव करता था। मध्यपाषाण कालीन मानव में सहकारिता की भावना विकसित हो चुकी थी। उसने परिवार का निर्माण कर लिया था। इसलिये वह कार्य विभाजन एवं वस्तु विनिमय की समझ विकसित कर सका।
अल्मोड़ा के निकट दलबंद की एक गुफा में मिले एक चित्र में दो वयस्क और दो बालक पांव से पांव एवं हाथ से हाथ मिलाकर चलते हुए दिखाये गये हैं। यह चित्र परिवार की एकता एवं सुबद्धता का परिचायक है। नव-पाषाण-काल में दूर-दूर रहने वाले मानवों ने समुदायों का गठन कर लिया जिससे कबीलाई संस्कृति का जन्म हुआ। एक कबीले में कई परिवार एक साथ रहते थे। कबीले का एक मुखिया होता था, जिसने आगे के युगों में चलकर राजा का रूप ले लिया।
कार्य विभाजन
पूर्व-पाषाण-कालीन मानव आखेटजीवी था इसलिये कार्य विभाजन नहीं हुआ था। वह आवास बनाना तथा खेती करना नहीं जानता था। मध्य-पाषाण-काल का मानव आवास निर्माण, कृषि, पशुपालन एवं मिट्टी के बर्तन बनाने से परिचित हो चुका था इसलिये इस युग के मानव ने कार्य विभाजन आरंभ किया। नव-पाषाण काल में कार्य विभाजन और सुस्पष्ट हो गया।
शव विसर्जन
पूर्व-पाषाण-कालीन सभ्यता के आरंभिक चरण में शवों को जंगल में छोड़ दिया जाता था जहाँ वह पशु-पक्षियों द्वारा खा लिया जाता था। बाद में शवों को लाल रंग से रंगकर धरती में गाढ़ना आरंभ किया गया। मध्य-पाषाण-काल का मानव भी शवों को धरती में गाड़ता था। इस कार्य के लिये अलग से स्थान निर्धारित किया जाता था।
कभी-कभी घर के भीतर अथवा उनके निकट ही शव को गाड़ा जाता था। शव के साथ उपयोगी वस्तुएँ रखी जाती थीं। इस काल में शव को जलाने की प्रथा भी आरम्भ हो गई थी। शव दहन के पश्चात् उसकी राख को मिट्टी के बर्तन में रख कर आदरपूर्वक भूमि में गाड़ा जाता था। नव पाषाण काल में भी शव विसर्जन की यही परम्पराएं अपनाई गई।
धर्म
पूर्व-पाषाण-कालीन सभ्यता के बाद के वर्षों में शवों को लाल रंग से रंगकर धरती में गाढ़ना आरंभ कर दिया गया था। इसलिये अनुमान होता है कि उस काल से ही मानव में धार्मिक भावना पनपने लगी। मध्य-पाषाण-संस्कृति का मानव मातृदेवी का उपासक था। देवी को प्रसन्न करने के लिए वह सम्भवतः पशुओं की बलि भी देता था। उसका विश्वास था कि ऐसा करने से पृथ्वी माता प्रसन्न होती है और पशु तथा कृषि में वृद्धि होती है। नव पाषाण काल में धार्मिक भावना और पुष्ट हो गई।
ताम्राश्म संस्कृतिका अर्थ है मानव सभ्यता का वह चरण जिसमें दैनिक उपयोग की वस्तुओं एवं औजारों के निर्माण के लिए ताम्बे एवं पत्थर दोनों का प्रचुरता से उपयोग हो रहा था। जब पाषाण युगीन मानव ने ताम्बे की खोज की तब वह अचानक ही ताम्राश्म संस्कृति में प्रविष्ट हो गया।
धातु काल
पाषाण-काल के बाद धातु-काल आरम्भ हुआ। कुछ विद्वानों का विचार है कि धातु-काल के लोग पाषाणकाल के लोगों से भिन्न थे और उत्तर पश्चिम के मार्गों से भारत में आये थे। कतिपय अन्य विद्वानों का मत है कि धातु-काल के लोग नव-पाषाण-काल के लोगों की ही सन्तान थे।
इस मत के समर्थन में दो बातें कही जाती हैं। पहली बात यह है कि धातु-काल के प्रारम्भ में, पाषाण तथा धातुओं का प्रयोग साथ-साथ होता था और दूसरी यह है कि इस सन्धि-काल की वस्तुओं के आकार तथा बनावट में बड़ी समानता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि नवपाषाणकाल की सभ्यता धीरे-धीरे उन्नति कर धातु-काल की सभ्यता में बदल गयी।
धातु की खोज
अनुमान होता है कि मनुष्य द्वारा भोजन पकाने के लिये बनाये गये चूल्हों में लगे पत्थरों के गर्म होने से उनमें से धातु पिघलकर अलग हो गई होगी, जब यह घटना कई बार हुई होगी तो नव पाषाण कालीन मानव ने धातु की खोज का कार्य सम्पन्न कर लिया होगा। बहुत से विद्धानों का मानना है कि मानव ने सबसे पहले सोने की खोज की, उसके बाद ताम्बे की खोज हुई। चूंकि सोना अत्यंत अल्प मात्रा में मिलता था इसलिये औजार एवं हथियार बनाने में ताम्बे का उपयोग किया गया।
धातु-काल का अर्थ
धातु-काल से तात्पर्य उस कालावधि से है जब मनुष्य ने पत्थर के स्थान पर धातु का प्रयोग करना आरम्भ किया। सबसे पहले ताम्बे का, उसके बाद काँसे का और अन्त में लोहे का प्रयोग आरम्भ हुआ। चूँकि इन धातुओं का प्रयोग निरन्तर आधुनिक काल तक होता चला आ रहा है इसलिये नव-पाषाण-काल के पश्चात् से लेकर आज तक के काल को धातु-काल कहा जाता है।
इस लम्बे काल में मानव-सभ्यता का विकास तेज गति से होता गया है। धातुकाल का मानव, विज्ञान के बल पर इतने आश्चर्यजनक कार्य कर रहा है जो पाषाणकाल में सम्भव नहीं थे।
धातु-काल का विभाजन
धातु-काल को तीन भागों में बांटा जाता है- (1.) ताम्र-काल, (2.) कांस्य-काल तथा (3.) लौह-काल। ताम्र-कांस्य सम्यता का विकास उत्तर भारत में ही हुआ। दक्षिण भारत में ताम्रकाल के बाद सीधे ही लोहे का प्रयोग आरम्भ हो गया।
ताम्र काल
मानव द्वारा, धातुओं में सबसे पहले ताम्बे का प्रयोग आरम्भ हुआ। ताम्र-काल उस काल को कहते है जब मनुष्य ने अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ ताम्बे से बनाना आरम्भ किया। ताम्र-काल का आरम्भ नव-पाषाण काल के अंतिम चरण में हुआ। ताम्बे को प्रयोग में लाने के कई कारण थे। पत्थर को गलाया नहीं जा सकता परन्तु ताम्बे को गलाया जा सकता है। इसलिये ताम्बे को गला कर उससे छोटी बड़ी कई तरह की वस्तुएँ बनाई जा सकती थीं।
पत्थर की अपेक्षा ताम्बे की बनी हुई वस्तुएँ अधिक सुन्दर, सुडौल, सुदृढ़़ तथा चिकनी होती थीं। ताम्बे में यह सुविधा भी थी कि उससे चद्दरें भी बनाई जा सकती थीं और उसके टुकड़़े भी किये जा सकते थे। टूट जाने पर ताम्बे को जोड़ा भी जा सकता था।
छोटा नागपुर के पठार से लेकर उत्तरी गंगा-द्रोणी तक फैले हुए विशाल क्षेत्र में ताम्र-वस्तुओं की चालीस से अधिक निधियां मिली हैं परन्तु इनमें से लगभग आधी निधियां केवल गंगा-यमुना के दोआब से प्राप्त हुई हैं। दूसरे क्षेत्रों से छुटफुट निधियां ही मिली हैं। इन निधियों में कुल्हाड़े, मत्स्यभाले, खड्ग और पुरुषसम आकृतिवाली वस्तुएं हैं।
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इन वस्तुओं का उपयोग न केवल मछली मारने, आखेट करने और लड़ाई करने अपितु दस्तकारी, कृषि आदि अनेक कामों के लिए भी होता था। इन ताम्र-वस्तुओं के निर्माता कुशल शिल्पकार थे। ये वस्तुएं आखेटकों अथवा घुमन्तू लोगों द्वारा निर्मित नहीं हो सकतीं। ऊपरी गंगा की घाटी में कई स्थलों पर ये वस्तुएं गेरुए रंग के बर्तनों और कच्ची मिट्टी के ढांचों के साथ मिली हैं। इससे पता चलता है कि ताम्र-निधियों का उपयोग करने वाले लोग स्थायी बस्तियों में रहते थे। दोआब के काफी बड़े भाग में बसने वाले ये सबसे पुराने आदिम कृषक और कारीगर लोग थे। गेरुए रंग के बर्तनों वाले अधिकांश स्थल दोआब के उत्तरी भाग से मिले हैं परन्तु ताम्र-निधियां प्रायः समस्त दोआब और इसके परे भी मिली हैं। गेरुए रंग के मृदभाण्डों की इस संस्कृति का काल मोटे तौर पर 2000 ई.पू. और 1800 ई.पू. के बीच का है। ताम्र-वस्तुओं का उपयोग करने वाले गेरुए रंग के बर्तनों वाले लोगों की बस्तियां जब गायब हो गईं, तो लगभग 1000 ई.पू. तक दोआब वीरान ही रहा। इस बात का कुछ संकेत मिलता है कि काले और लाल बर्तनों को उपयोग में लाने वाले लोगों की छुटफुट बस्तियां थीं परन्तु अब तक उनके सांस्कृतिक अंतर के सम्बन्ध में सुस्पष्ट धारणा नहीं बन सकी है।
जो भी हो दोआब के उत्तरी भाग तथा ऊपरी गंगा की घाटी में धातु युग का वास्तविक आरम्भ ताम्र वस्तुओं और गेरुए रंग के बर्तनों का उपयोग करने वाले लोगों के साथ ही हुआ परन्तु किसी भी स्थल पर इनकी बस्ती लगभग सौ साल से अधिक समय तक टिकी नहीं रही।
न ही ये बस्तियां बड़ी थीं और न काफी बडेे़ क्षेत्र में फैली हुई थीं। इन बस्तियों का अंत क्यों और कैसे हुआ यह स्पष्ट नहीं है। हिन्दू धर्म में तांबे के बर्तनों और पात्रों आदि को पवित्र तथा धार्मिक दृष्टि से शुद्ध माना जाता है तो इसका कारण सम्भवतः यह है कि तांबा मानव द्वारा खोजी गई प्रथम धातु थी।
ताम्राश्म संस्कृति की विशेषताएँ
ताम्राश्म संस्कृति मानव के बारे में यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि इस संस्कृति के लोग पशुपालक थे, कृषि करते थे, साधारण किस्म के ताम्बे का प्रयोग करते थे और ग्रामीण परिवेश में रहते थे।
ताम्राश्म संस्कृति का काल निर्धारण
कालक्रम के अनुसार ताम्र-पाषाण संस्कृति, सिंधु सभ्यता की कांस्य संस्कृति के बाद आती है। वैज्ञानिक विधि से निर्धारित की गई तिथियों से पता चलता है कि इस संस्कृति का प्रारंभ 2150 ई.पू. के पश्चात् हुआ था। कुछ क्षेत्रों में इस संस्कृति का चरण 1000 ई.पू. तक चला, तो कुछ अन्य क्षेत्रों में 800 ई.पू.तक अथवा उसके बाद 600 ईस्वी (गुप्तकाल) तक भी चलता रहा। जब तक लोहे के औजारों का प्रचलन नहीं हुआ, तब तक पुराने औजारों का उपयोग होता रहा परन्तु अनेक क्षेत्रों में काले-लाल मृदभाण्डों का उपयोग ईसा पूर्व दूसरी सदी तक होता रहा।
ताम्र एवं पाषाण का एक साथ उपयोग
इस काल के मानवों द्वारा ताम्र एवं पाषाण उपकरणों का उपयोग एक साथ किया जाता रहा इसलिये इस संस्कृति को ताम्र-पाषाण संस्कृति भी कहते हैं। इस अवस्था में तांबे का उत्पादन सीमित था। तांबे की भी अपनी सीमाएं थी। केवल तांबे से बनाया गया औजार नरम होता था। तांबे के साथ टिन मिलाकर एक अधिक मजबूत और उपयोगी कांसे की मिश्र धातु बनाने की कला लोगों को ज्ञात नहीं थी। कांसे के औजारों ने कीट, मिò और मेसोपोटामिया में प्राचीनतम सभ्यताओं के उदय में सहायता दी, परन्तु भारत के प्रमुख भाग की ताम्र-पाषाणिक अवस्था में कांसे के औजारों का प्रायः अभाव ही है।
प्रस्तर फलकों का प्रयोग
ताम्र-पाषाण संस्कृतियों के लोगों ने पत्थर के जिन छोटे औजारों और हथियारों का उपयोग किया उनमें प्रस्तर-फलकों का स्थान महत्त्वपूर्ण था। यद्यपि कई स्थलों पर प्रस्तर-फलक उद्योग ने खूब उन्नति की तथापि पत्थर की कुल्हाड़ियों का भी उपयोग होता रहा। ऐसे स्थल पहाड़ियों से अधिक दूर नहीं होते थे, परन्तु ऐसे ही अनेक स्थल नदी मार्गों पर भी खोजे गए हैं।
कुछ स्थलों से तांबे की कई वस्तुएं मिली हैं। आहड़ और गिलूँड ऐसे ही स्थल हैं जो राजस्थान की बनास घाटी के शुष्क क्षेत्र में स्थित हैं। आहड़ से पत्थर की कोई कुल्हाड़ी या फलक नहीं मिला है। इसके विपरीत, यहाँ से तांबे की कई कुल्हाड़ियां और दूसरी वस्तुएं मिली हैं, क्योंकि तांबा स्थानीय रूप से उपलब्ध था। गिलूँड में प्रस्तर-फलक उद्योग मिलता है। महाराष्ट्र के जोर्वे तथा चंदोली स्थानों से तांबे की सपाट तथा आयताकार कुल्हाड़ियां मिली हैं, चंदोली से तांबे की छेनियां भी मिली हैं।
यातायात के साधनों में वृद्धि
पाषाण-काल के आरंभिक चरण में बोझा ढोने का काम मनुष्य स्वयं करता था परन्तु पशुपालन आरंभ होने के साथ-साथ बोझा ढोने का काम पशुओं द्वारा किया जाने लगा। बोझा ढोने के लिए सबसे पहले बैलों का प्रयोग किया गया परन्तु बाद में गधों, घोड़ों तथा ऊँटों का प्रयोग होने लगा। ताम्रकाल में यह कार्य पशुओं के साथ-साथ पशुओं द्वारा खींची जाने वाली पहियेदार गाड़ियों से भी किया जाने लगा। जल यात्राओं के लिये नावों का निर्माण भी आरम्भ हो गया।
कृषि में उन्नति
कृषि का काम मध्य-पाषाण-काल में ही आरम्भ हो गया था परन्तु अब कृषि बहुत बड़े परिमाण में की जाने लगी। पशुओं की संख्या में वृद्धि हो जाने के कारण अब उनके चारे तथा रखने की व्यवस्था करनी पड़ी। पशुओं के लिये मोटे अन्न की खेती की जाने लगी। अनुमान है कि इस काल का मानव कृषि कार्य में हल का उपयोग नहीं करता था।
ये लोग लकड़ी के डण्डे में पत्थर फंसा कर उससे धरती खोदते थे। इस संस्कृति की बस्तियों से हल नहीं मिला है। ये लोग चावल, गेंहूँ, बाजरा, मसूर, उड़द तथा मूँग जैसी कई दालें और मटर पैदा करते थे। महाराष्ट्र में नर्मदा तट पर स्थित नवदाटोली में इन समस्त अनाजों के अवशेष मिले हैं।
सम्भवतः भारत के किसी भी अन्य स्थल के उत्खनन में इतने अधिक अनाज प्राप्त नहीं हुए हैं। नवदाटोली के लोग बेर और अलसी पैदा करते थे। दक्खन की काली मिट्टी में कपास की पैदावार होती थी। निचले दक्खन में रागी, बाजरा और इसी कोटि के दूसरे कई अनाजों की खेती होती थी।
पशुपालन
विद्धानों का मत है कि ताम्र-पाषाणिक काल का मानव पशुओं को दूघ या घी प्राप्त करने के लिये नहीं पालता था अपितु मांस प्राप्ति, बोझा ढोने, कृषि करने तथा यातायात के लिये करता था। दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश और पश्चिमी महाराष्ट्र में रहने वाले ताम्र-पाषाण काल के लोगों ने पशुओं को पालतू बनाया था और वे खेती भी करते थे।
वे गाय, बकरी, सूअर और भैंस पालते थे और हिरन का आखेट करते थे। इस काल की बस्तियों से ऊंट के अवशेष भी मिले हैं। पशुओं के कुछ ऐसे अवशेष मिले हैं जो घोड़े या पालतू गधे या जंगली गधे के हो सकते हैं। ये लोग निश्चय ही गोमांस खाते थे, सूअर के मांस का बहुत उपयोग नहीं होता था।
मछली एवं चावल का भोजन: बिहार और पश्चिमी बंगाल से, जहाँ चावल की खेती होती थी, मछली पकड़ने के कांटे भी मिले हैं। इससे पता चलता है कि पूर्वी प्रदेशों में रहने वाले ताम्र-पाषाण के लोग मछली और चावल खाते थे। देश के इस भाग में आज भी मछली और चावल लोकप्रिय भोजन हैं।
ताम्राश्म संस्कृति की हस्तकलायें
इस काल का मानव तांबे की वस्तुएं और पत्थर के औजार बनाने में निपुण था। इस काल के छोटे आकार के बहुत सारे पत्थर के औजार मिले हैं, जिन्हें लघुपाषाण कहते हैं। वे कताई और बुनाई की कला भी जानते थे, क्योंकि मालवा से उस काल की तकली की चक्रियां मिली हैं। महाराष्ट्र से कपास, सन और रेशम के तन्तु मिले हैं। इससे पता चलता है कि वे लोग कपड़ा भी तैयार करते थे।
विभिन्न प्रकार के मृद्भाण्डों का उपयोग: ताम्र-पाषाण काल के लोग विभिन्न प्रकार के मृदभाण्डों का उपयोग करते थे। इनमें से एक प्रकार के बर्तन काले-लाल रंग के थे। अनुमान होता है कि इनका प्रचलन दूर-दूर तक था। इन बर्तनों को चाक पर बनाया जाता था। कभी-कभी इन पर सफेद रैखिक आकृतियां भी चित्रित की जाती थीं।
यह तथ्य न केवल राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की बस्तियों के सम्बन्ध में है अपितु बिहार और पश्चिमी बंगाल में खोजी गई बस्तियों के सम्बन्ध में भी है। मध्य प्रदेेश और महाराष्ट्र में रहने वाले इस काल के लोगों ने टोंटी वाले लोटे, धरनी-युक्त तश्तरियां और धरनी-युक्त कटोरे बनाए थे।
यह सोचना गलत होगा कि जिन भी लोगों ने काले-लाल बर्तनों का उपयोग किया उनकी संस्कृति भी एक ही थी। उनके बर्तनों और औजारों की बनावट में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। इस काल के लोगों ने लोटों तथा तश्तरियों का उपयोग तो किया किंतु थालियों का उपयोग नहीं किया।
कार्य-कुशलता में वृद्धि
धातु के काम में कुशलता की बड़ी आवश्यकता होती है। अतः अपने कार्य में निपुणता प्राप्त करने के लिये अब लोग पूरे समय अपने ही कार्य में लगे रहते थे। इस प्रकार विभिन्न प्रकार के कार्यों में विशेषज्ञता प्राप्त करने लगे। अब कार्य-विभाजन का सिद्धान्त बहुत आगे बढ़ गया और लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये दूसरों पर निर्भर रहने लगे। इस प्रकार मनुष्य स्वावलम्बी से परावलम्बी हो गया।
पक्के भवनों का निर्माण
इस काल से पहले के लोग आम तौर से पकी हुई ईटों से परिचित नहीं थे। धूप में सुखाई तथा आग में पकाई हुई ईटों के भवनों का निर्माण इसी काल में आरम्भ हुआ किंतु इनका उपयोग विरले ही होता था। इस काल में अधिकतर घर टट्टर को लीपकर बनाए जाते थे और इन पर संभवतः छप्पर भी डाले जाते थे।
ये मकान बड़े सुविधाजनक होते थे और इनमें सुरक्षा की पूरी व्यवस्था रहती थी। इन आवासों में मनुष्य, पशु तथा भण्डारण के लिये अलग-अलग प्रबन्ध रहता था। पश्चिमी महाराष्ट्र के इनामगांव स्थान पर आरंभिक ताम्र-पाषाण काल के चूल्हों सहित मिट्टी के बड़े भवन और गोलाकार गड्ढों वाले भवन खोजे गए हैं। बाद की अवस्था (1300-1000 ई.पू.) का पांच कमरों का एक कमरा गोलाकार है। इससे पता चलता है कि इस युग के परिवार बड़े होते थे।
नगरीय सभ्यता के जनक
ताम्र-पाषाणिक अर्थ-व्यवस्था वस्तुतः ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था थी। जैसे कि इनामगांव तथा पश्चिमी मध्य प्रदेश की एरण तथा कयथ बस्तियों की किलेबंदी करके इनके चहुंओर खाइयां खोदी गई थीं जिससे अनुमान होता है कि ताम्राश्म संस्कृति के मानव ने नगरीय सभ्यता को जन्म दिया था।
धार्मिक भावना का सुढ़ढ़ीकरण
इस युग में कृषि कार्य विस्तृत हो जाने के कारण मानव पर प्रकृति की अनुकूलता एवं प्रतिकूलता अधिक प्रभाव डालने लगी। इस कारण इस काल के मानव ने प्राकृतिक शक्तियों को देवी-देवता के रूप में पूजना आरम्भ किया। पूजा के लिये मन्दिरों का निर्माण आरम्भ हो गया।
धार्मिक भावना के उदय के साथ-साथ इस युग के मानव में अन्धविश्वास भी उत्पन्न हो गया और वह जादू-टोना में विश्वास करने लगा। स्त्रियों की लघु मृण्मूर्तियों से पता चलता है कि ताम्र-पाषाण काल का मानव मातृदेवियों की उपासना करता था। कच्ची मिट्टी की नग्न लघु मूर्तियों की भी पूजा होती थी। इनामगांव से मातृदेवी की एक मूर्ति मिली है जो पश्चिमी एशिया से मिली मातृदेवी की मूर्ति जैसी है। मालवा और राजस्थान से प्राप्त वृषभ की रूढ़ शैली की मृण्मूर्तियों से पता चलता है कि वृषभ की अनुष्ठानिक पूजा होती थी।
ताम्राश्म संस्कृति में शवाधान
ताम्र-पाषाणिक सभ्यता के लोगों के शव-संस्कारों और धार्मिक अनुष्ठाानों के बारे में भी जानकारी मिलती है। इस काल में महाराष्ट्र क्षेत्र में मृतक के शव को अपने भवन के फर्श के नीचे उत्तर-दक्षिण स्थिति में गाढ़ा जाता था। हड़प्पा के लोगों की तरह उनके पृथक समाधि क्षेत्र नहीं होते थे।
कब्र में मिट्टी की हंडिया और तांबे की कुछ वस्तुएं भी रखी जाती थीं, जो परलोक में मृतक के उपयोग के लिए होती थीं। पश्चिमी महाराष्ट्र में चंदोली और नेवासा के शवाधानों में कुछ बच्चों को उनके गलों में तांबे की मणियों की मालाएं पहनाकर गाढ़ा गया था परन्तु दूसरे बच्चों के शवाधानों में केवल मिट्टी के बर्तन देखने को मिलते हैं। इनामगांव के एक वयस्क व्यक्ति को मिट्टी के बर्तनों और कुछ तांबे के साथ गाढ़ा गया है।
ताम्राश्म संस्कृति की दुर्बलताएं
ताम्राश्म संस्कृति में सामाजिक असमानताएं
ताम्र-पाषाण काल में सामाजिक असमानताएं आरंभ होने के प्रमाण मिलते हैं। कायथा के एक भवन से तांबे की 29 चूड़ियां और दो विशिष्ट कुल्हाड़ियां मिली हैं। उसी स्थान से मिट्टी के घड़ों में से सेलखड़ी और कार्नेलियन-जैसे कुछ मूल्यवान पत्थरों की मणियों की मालाएं मिली हैं। अनुमान है कि ये वस्तुएं समृद्ध लोगों की थीं।
ताम्राश्म संस्कृति काकष्टमय जीवन
पश्चिमी महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में गाढ़े गए बच्चों के शवावशेषों से इस ताम्र-पाषाणिक संस्कृति की दुर्बलता स्पष्ट हो जाती है। अन्न-उत्पादक अर्थव्यवस्था के उपरांत भी बच्चों की मृत्यु-दर बहुत ऊंची थी। इसके कारणों का पता लगाना कठिन है। कुपोषण अथवा महामारी के कारण इतनी बड़ी संख्या में बच्चे मरे होंगे। उस काल के ताम्र-पाषाणिक समाज तथा अर्थव्यवस्था में दीर्घायु प्राप्ति को बढ़ावा मिलना सम्भव नहीं था।
हड़प्पा सभ्यता से तकनीकी आदान-प्रदान का अभाव
ताम्र-निधियों वाले ये लोग हड़प्पा सभ्यता के समकालीन थे, और ये लोग गेरुए रंग के बर्तनों वाले जिस प्रदेश में रहते थे वह भी हड़प्पा संस्कृति के क्षेत्र से अधिक दूर नहीं था। इसलिए दोनों सभ्यताओं में सम्पर्क होना तथा तकनीकी कौशल का आदान प्रदान होना स्वाभाविक था किंतु ताम्र-पाषाणिक सभ्यता के लोगों ने हड़प्पा सभ्यता के लोगों के ज्ञान का लाभ नहीं उठाया। इसलिये वे कांसे के बारे में नहीं जान सके।
भारत में ताम्र बस्तियों की खोज
भारत में ताम्र निर्मित सामग्री सबसे पहले गंगा-यमुना के दोआब में उपलब्ध हुई थी। गुनेरियां नामक स्थान से ताम्बे एवं कांसे की वस्तुओं का विशाल भण्डार मिला है। इस सामग्री में कुल्हाड़ियां, तलवारें, कटारें, हार्पून एवं छल्ले प्रमुख हैं। इतिहासकार मि. पिगट ने इस क्षेत्र से प्राप्त कुल्हाड़ियों को पांच भागों में बांटा है।
तलवारें प्रायः एक जैसी हैं। इन तलवारों के ब्लेड पत्ती के समान हैं एवं मुठिया तथा धार के साथ समूची तलवार एक ही सांचे में ढाली गई है। कटार का निर्माण भी इसी प्रकार से किया गया है। यह समग्र सामग्री सिंधु घाटी से प्राप्त सामग्री से भिन्न है।
प्रमुख ताम्र-पाषाणिक बस्तियाँ
भारत में प्रमुख ताम्र-पाषाणिक बस्तियों का प्रसार लगभग 2150 ई.पू. से 600 ईस्वी (गुप्तकाल) तक रहा। दक्षिण भारत में नवपाषाणिक अवस्था एकाएक ताम्र-पाषाणिक अवस्था में बदल गई। इसलिए इन संस्कृतियों को नवपाषाणिक ताम्र-पाषाणिक नाम दिया गया है।
दूसरे भागों, विशेषतः पश्चिमी महाराष्ट्र और राजस्थान के लोग सम्भवतः उपनिवेशिक थे परन्तु तिथिक्रमानुसार, मालवा और मध्य भारत की कुछ बस्तियां, जैसे कि कायथा और एरण की बस्तियां, सबसे पुरानी थीं, पश्चिमी महाराष्ट्र में कालांतर में स्थापित हुईं। पश्चिमी बंगाल की बस्तियों की स्थापना सम्भवतः सबके अंत में हुई।
1. कायथा संस्कृति (2150 ई.पू. से 1400 ई.पू.)
कायथा संस्कृति की बस्तियां मध्यप्रदेश में कालीसिंध नदी के किनारे स्थित हैं। कायथा टीले से 12 मीटर मोटा सांस्कृतिक जमाव मिला है जिसमें ताम्रपाषाणिक संस्कृति से लेकर गुप्त राजवंश के काल तक के पुरावशेष प्राप्त हुए हैं।
यहाँ से मृदभाण्ड बनाने की तीन परम्परायें मिली हैं। प्रथम पात्र परम्परा हल्के गुलाबी रंग की है जिस पर बैंगनी रंग की चित्रकारी मिलती है। दूसरी पात्र परम्परा पाण्डुरंग की है। बर्तनों पर लाल रंग से चित्रण अभिप्राय संजोये गये हैं। तीसरी परम्परा अलंकृत लाल रंग की मृद्भाण्ड परम्परा है जिन पर कंघी की तरह के किसी उपकरण से आरेखण किया गया है।
2. आहड़ संस्कृति (1900 ई.पू. से 1200 ई.पू.)
यह बस्ती राजस्थान के उदयपुर नगर से 4 किलोमीटर दूर आहड़ नामक स्थान पर मिली है। आहड़ का प्राचीन नाम ताम्रवती है। इस स्थान को अब धूलकोट कहते हैं। यहाँ पर कायथा की तुलना में ताम्र उपकरण अधिक मिले हैं। इस संस्कृति के लोग सुखाई गई कच्ची ईंटों की सहायता से भवन बनाते थे।
मकानों में दो-तीन मुंह वाले चूल्हे भी मिले हैं। यहाँ से बड़े-बड़े भाण्ड तथा अन्न पीसने के पत्थर मिले हैं। कपड़़ों पर छपाई के ठप्पे भी प्राप्त हुए हैं। इस संस्कृति में शवों को गाड़ते समय शव का मस्तक उत्तर की ओर तथा पैर दक्षिण की ओर रखे गये हैं। आहड़ संस्कृति को बनास संस्कृति भी कहते हैं क्योंकि इस सभ्यता का प्रसार सम्पूर्ण बेड़च, बनास एवं चम्बल के कांठे में पाया गया है।
3. गिलूण्ड संस्कृति (1700 ई.पू. से 1300 ई.पू.)
आहड़ के निकट गिलूण्ड से भी ताम्रपाषाणिक बस्ती मिली है। यहाँ से चूने के प्लास्टर एवं कच्ची दीवारों के प्रयोग की जानकारी मिलती है। यहाँ से लाल एवं काले मृदभाण्डों की ही संस्कृति प्राप्त हुई है। यहाँ से 100 गुणा 80 फुट आकार के ईंटों से बने विशाल भवन के अवशेष प्राप्त हुए हैं। ऐसे भवन आहड़ में देखने को नहीं मिलते।
4. नवदाटोली संस्कृति (1500 ई.पू. से 1200 ई.पू.)
मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में मिलने के कारण इसे मालवा संस्कृति भी कहा जाता है। यह नर्बदा नदी के बायें किनारे पर स्थित है। यहाँ से मिले मृदभाण्ड गुलाबी रंग के हैं। इन पात्रों पर काले रंग से चित्रण किया गया है। यहाँ से ताम्र उपकरण बहुत कम संख्या में प्राप्त हुए हैं। यहाँ से स्वर्ण, ताम्र, मृदा, शंख एवं सेलखड़ी पत्थर से बने आभूषण प्राप्त हुए हैं। कुछ अग्निकुण्ड भी मिले हैं जिनसे अनुमान होता है कि इस संस्कृति में अग्नि पूजा भी होती थी।
5. जोरवे संस्कृति (1400 ई.पू. से 700 ई.पू.)
पश्चिमी महाराष्ट्र में प्रवर नदी तट पर स्थित जोरवे नामक गांव से इस संस्कृति के अवशेष मिले हैं। बाद में नासिक, नेवासा, इनामगांव, दैमाबाद आदि स्थलों से भी इस संस्कृति के अवशेष मिले। इस संस्कृति में बस्तियां बसाने का काम योजनाबद्ध तरीके से होता था।
जोर्वे संस्कृति का प्रत्येेक गांव 35 से भी अधिक गोलाकार अथवा आयताकार भवनों की एक सुगठित बस्ती होती थी। घरों के बीच एक से दो मीटर चौड़ी गलियां छोड़ी गई हैं। यहाँ से कुम्हार, सुनार, हाथीदांत के शिल्पकारों के औजार मिले हैं जो बस्ती की पश्चिमी सीमा पर रहते थे।
समृद्ध किसान गांव के बीच में रहते थे। दस्तकारों के मकानों का आकार, समृद्ध किसानों के घरों के आकार की तुलना में छोटा है। यहाँ से अल्प मात्रा में ताम्बे के उपकरण पाये गये हैं। मृण्मूर्तियां मिली हैं जिनमें मातृदेवी एवं वृषभ की मूर्तियां विशेष हैं। इस संस्कृति में खेती के लिये नहरों एवं बांधों का निर्माण किये जाने के प्रमाण मिले हैं। दैमाबाद से कांसे की वस्तुएं बड़ी संख्या में मिली हैं। दैमाबाद से ताम्बे से निर्मित- रथ चलाते हुए मनुष्य, सांड, गैंडे तथा हाथी की मूर्तियां मिली हैं।
6. पूर्वी भारत की बस्तियां (2000 ई.पू.)
पूर्वी भारत से चावल पर आधारित एक विस्तृत ताम्र-पाषाणिक ग्राम संस्कृति का पता चला है। यह 2000 ई.पू. के आसपास अस्तित्व में रही होगी। उड़ीसा तथा बंगाल प्रांत के वीरभूम, बर्दवाद, मिदनापुर, बांकुरा, पांडु राजार ढिबी, महिषदल आदि में इस संस्कृति की बस्तियां मिली हैं। यहाँ गारे और सरकण्डे से निर्मित घरों के साथ-साथ चावल तथा मंूग सहित तरह-तरह की फसलों का समृद्ध संग्रह देखने को मिलता है।
7. ऊपरी गंगा घाटी और गंगा-यमुना दो-आब की बस्तियां (1500 ई.पू. से 1000 ई.पू.)
इन क्षेत्रों से गेरुए रंग के मृदभाण्डों वाली बस्तियां मिली हैं। उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के बसौली तथा बिजनौर जिले के राजपुर परसू से नई किस्म के बर्तन प्राप्त हुए हैं। ये दोनों ही स्थान ताम्र भण्डार क्षेत्र में स्थित हैं। इस संस्कृति में अतरंजीखेड़ा का प्रमुख स्थान है। यहाँ से धूसर भाण्ड वाली बस्तियां मिली हैं। सहारनपुर से लेकर इटावा तक लगभग 110 स्थल इस संस्कृति के हैं जिन्हें गेरुए रंग के मृदभाण्डों की संस्कृति कहते हैं।
8. ऐतिहासिक कालों की बस्तियां
उत्तर भारत में ताम्र पाषाणिक संस्कृति, जनपद युग एवं मगधीय साम्राज्य (600 ई.पू. से 300 ई.पू.) तथा शुंग, कुषाण एवं गुप्त काल (300 ई.पू. से 600 ई.) तक अस्तित्व में रहीं जबकि पश्चिमी भारत में 4000 ई.पू. के आसपास ताम्रकांस्य संस्कृति जन्म ले चुकी थी।
9. सिंधु नदी घाटी क्षेत्र में ताम्र-पाषाण-कालीन बस्तियाँ
सिंधु नदी घाटी में भी ताम्बे एवं कांसे की अनेक वस्तुएं प्राप्त हुई हैं किंतु यहाँ पर तलवार एवं हार्पून का अभाव है। इस क्षेत्र से मिले इस काल के हथियार साधारण कोटि के हैं। यहाँ पर धातु के साथ-साथ पाषाण सामग्री का उपयोग भी चलता रहा।
कांस्य की खोज
पाषाण की तुलना में ताम्बा अधिक उपयोगी था किंतु मुलायम होने के कारण इससे कठोर कार्य नहीं लिया जा सकता था। इसलिये मनुष्य ताम्बे से अधिक कठोर धातु की खोज में जुटा तथा उसने कांसे को खोज निकाला। यह मिश्रित धातु थी जो ताम्बे में टिन के मिश्रण से तैयार की जाती थी। दो धातुओं के मिश्रण से तीसरी धातु बनाने की क्षमता अर्जित कर लेना, इस युग के मानव की बौद्धिक परिपक्वता का प्रमाण है।
ताम्र-कांस्य युगीन बस्तियाँ
आज से कुछ हजार वर्ष पहले, सिंध और बिलोचिस्तान के जो प्रदेश आज की तरह रेगिस्तान नहीं थे। इन क्षेत्रों में अच्छी वर्षा होती थी तथा घने जंगलों से परिपूर्ण थे। जल और जंगल के कारण इन क्षेत्रों में मानव सभ्यता ने अच्छा विकास किया। 4000 ई.पू. में भी इस क्षेत्र में ग्रामीण बस्तियां थीं।
इन बस्तियों में पाषाण युग के बाद ताम्र युग का विकास हुआ। इन बस्तियों के लोगांे का पश्चिम एशिया में स्थित मानव बस्तियों से सम्पर्क होने का भी अनुमान है। क्योंकि सिंध एवं बिलोचिस्तान जैसे उपकरण पश्चिम एशियाई बस्तियों में भी प्राप्त हुए हैं।
इतिहासकार मि. पिगट ने इन बस्तियों को चार भागों में विभक्त किया है- (1) क्वेटा संस्कृति (बोलन के दर्रे में प्राप्त अवशेषों के आधार पर), (2) अमरी-नल संस्कृति (सिंध में अमरी नामक स्थान पर तथा बिलोचिस्तान में नल नदी की घाटी में उपलब्ध अवशेषों के आधार पर), (3) कुल्ली संस्कृति (बिलोचिस्तान में कोल्बा नामक स्थान से प्राप्त अवशेषों के आधार पर) तथा (4) झोब संस्कृति (उत्तरी बिलोचिस्तान की झोब घाटी में उपलब्ध अवशेषों के आधार पर)।
राजस्थान की ताम्र-कांस्य युगीन बस्तियाँ
राजस्थान में भी पाषाण काल के अंतिम वर्षों में ताम्रकाल आरंभ हो गया था। राजस्थान के पुरातत्व विभाग ने भारत सरकार के पुरातत्व विभाग के सहयोग से कालीबंगा, आहड़, बागौर, रंगमहल, बैराठ, गिलूण्ड, नोह आदि स्थानों पर उत्खनन किया। इन उत्खननों में हमें सिंधु सभ्यता से भी प्राचीन एवं सिंधु सभ्यता के समकक्ष सभ्यताओं के अवशेष प्राप्त हएु हैं।
ताम्र-पाषाणिक एवं ताम्र-कांस्य संस्कृति में अंतर
ताम्र-पाषाणिक संस्कृति का मानव पकी हुई ईंटों से घर बनाना नहीं जानता था जबकि एवं ताम्र-कांस्य संस्कृति का मानव पकी हुई ईटों से घर बनाता था। ताम्र-पाषाणिक संस्कृति का मानव ताम्र औजारों के साथ-साथ प्रस्तर निर्मित औजारों का प्रयोग करता था जबकि ताम्र-कांस्य संस्कृति का मानव ताम्र एवं कांस्य से बने औजारों का प्रयोग करता था।
ताम्र-पाषाणिक बस्तियां पूर्वी भारत, उत्तरी भारत, मध्य भारत एवं महाराष्ट्र में नासिक तक प्राप्त हुई हैं जबकि ताम्र-कांस्य बस्तियां बिलोचिस्तान एवं सिंध क्षेत्र में अधिक प्राप्त हुई हैं। ताम्र-पाषाण-कालीन मानव धातुओं के मिश्रण की कला अर्थात् कांसा बनाने की विधि से अपरिचित था जबकि ताम्र-कांस्य कालीन मानव धातुओं के मिश्रण की कला से अच्छी तरह परिचित हो गया था।
यह एक आश्चर्य की ही बात है कि सिंधु सभ्यता जो कि ताम्र-पाषाण काल से भी पुरानी है, में कांसे का प्रयोग होता था। इससे अनुमान होता है कि ताम्र-पाषाणिक अवस्था में जी रहे लोगों का उन क्षेत्रों से सम्पर्क नहीं था जो उनके समकालीन होते हुए भी कांस्य का उपयोग कर रहे थे।
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...