Tuesday, April 23, 2024
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अध्याय – 18 : चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (375-414 ई.)

चन्द्रगुप्त (द्वितीय) समुद्रगुप्त की रानी दत्तदेवी का पुत्र था। वह बड़ा ही वीर तथा पराक्रमी राजकुमार था। राजा बनने के बाद उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। विक्रम का अर्थ होता है पराक्रम अथवा प्रताप और आदित्य का अर्थ होता है सूर्य। अर्थात् विक्रमादित्य उस व्यक्ति को कहते हैं जो सूर्य के समान प्रतापी हो। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने अपने ऐश्वर्य तथा प्रताप को उसी प्रकार फैलाया जिस प्रकार सूर्य अपने आलोक को सम्पूर्ण विश्व में फैला देता है।

वैवाहिक सम्बन्ध

स्थायी मित्रों एवं शुभचिंतकों की संख्या में वृद्धि करने के लिये चंद्रगुप्त ने राजनीतिक रूप से शक्ति-सम्पन्न राजकन्याओं से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने की नीति का अनुसरण किया।

(1) धु्रवकुमारी से विवाह: धु्रवकुमारी सम्राट रामगुप्त की पत्नी थी तथा गुप्त साम्राज्य की साम्राज्ञी थी। रामगुप्त का वध करने के बाद राज्य में अपनी स्थिति को सुदृढ़़ बनाने के लिए चन्द्रगुप्त (द्वितीय) ने साम्राज्ञी से विवाह कर लिया।

(2) नाग राजकुमारी से विवाह: नागवंश के साथ गुप्तवंश का वैमनस्य बहुत दिनों से चला आ रहा था। इस वैमनस्य को समाप्त करने के लिए चंद्रगुप्त ने नाग-वंश की राजकुमारी कुबेर नाग के साथ विवाह कर लिया।

(3) राजकुमारी प्रभावती का वाकाटकों से विवाह: चंद्रगुप्त तथा महारानी कुबेर नाग के विवाह से प्रभावती नामक राजकन्या उत्पन्न हुई। जब यह राजकन्या बड़ी हुई तो चन्द्रगुप्त ने उसका विवाह बरार के वाकाटक राजा रुद्रसेन (द्वितीय) के साथ कर दिया। यह विवाह चन्द्रगुप्त ने गुजरात तथा सौराष्ट्र के शक क्षत्रपों पर विजय प्राप्त करने के पूर्व किया था। इसलिये डॉ. स्मिथ की धारणा है कि शकों पर विजय प्राप्त करने में चन्द्रगुप्त को रुद्रसेन से बड़ी सहायता मिली होगी। इसलिये राजनीतिक दृष्टि से इस विवाह का बड़ा महत्त्व था।

(4) राजकुमार का विवाह: चन्द्रगुप्त ने अपने पुत्र का विवाह महाराष्ट्र प्रान्त में स्थित कुन्तल राज्य के शक्तिशाली राजा काकुस्थवर्मन की कन्या के साथ किया। इस विवाह का भी बहुत बड़ा राजनीतिक महत्त्व था। इस प्रकार चन्द्रगुप्त ने वैवाहिक सम्बन्धों द्वारा अपनी स्थिति को सुदृढ़़ बनाया।

चन्द्रगुप्त द्वितीय की विजयें

चन्द्रगुप्त को अपने पिता से एक अत्यंत विशाल तथा सुसंगठित साम्राज्य प्राप्त हुआ। इसलिये उसे साम्राज्य-स्थापना के लिए कोई युद्ध नहीं करना पड़ा परन्तु अपने विशाल साम्राज्य की सुरक्षा करने, उसे सुसंगठित बनाये रखने और अपने साम्राज्य की वृद्धि करने के लिए उसे कई युद्ध करने पड़े। इन युद्धों का विवरण इस प्रकार से है-

(1) गणराज्यों का विनाश: गुप्त साम्राज्य के पश्चिमोत्तर में गणराज्यों की एक पतली पंक्ति विद्यमान थी। समुद्रगुप्त ने इन राज्यों पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था परन्तु इन्हें गुप्त-साम्राज्य में सम्मिलित नहीं किया था। ये राज्य बड़े ही स्वतंत्रता-प्रेमी थे और स्वयं को स्वतंत्र बनाये रखने का प्रयास करते रहते थे। इन गणराज्यों में किसी बाह्य आक्रमण को रोकने की शक्ति नहीं थी। साम्राज्य की सीमा पर ऐसे कमजोर राज्यों की उपस्थिति, जिनमें गणतंत्रात्मक व्यवस्था विद्यमान थी, चन्द्रगुप्त को उचित प्रतीत नहीं हुई। उदयगिरि से प्राप्त अभिलेख से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त ने इन गणराज्यों पर आक्रमण करके उन्हें गुप्त-साम्राज्य में मिला लिया।

(2) शक-क्षत्रपों का अन्त: अब चन्द्रगुप्त का ध्यान उन शक-क्षत्रपों की ओर गया जो मालवा, गुजरात तथा सौराष्ट्र में शासन कर रहे थे। यद्यपि इन क्षत्रपों ने समुद्रगुप्त के प्रभुत्व को स्वीकार कर लिया था परन्तु चन्द्रगुप्त ने इस बात का अनुभव किया कि साम्राज्य की सीमा के निकट विदेशी शासन की स्थिति कभी भी घातक सिद्ध हो सकती है। इसलिये उसने उन पर आक्रमण कर दिया और शक राजा रुद्रसिंह को परास्त कर उसका वध कर दिया तथा उसके राज्य को गुप्त साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया। इस विजय के उपलक्ष्य में चन्द्रगुप्त ने चांदी की मुद्राएं चलवाईं। इसके पूर्व के गुप्त सम्राटों ने केवल स्वर्ण मुद्राएं चलवाई थीं। इस विजय से गुप्त साम्राज्य की सीमा पश्चिमी समुद्र तट तक पहुंच गई। इस कारण भारत का विदेशों के साथ व्यापारिक तथा सांस्कृतिक सम्बन्धों में विस्तार हुआ। इन विजयों से गुप्त साम्राज्य के आंतरिक व्यापार में भी वृद्धि हो गई। मालवा, गुजरात तथा सौराष्ट्र के प्रान्त बड़े उपजाऊ तथा धन-सम्पन्न थे। इसलिये न केवल गुप्त साम्राज्य की सीमाओं में वृद्धि हुई अपितु उसके कोष में भी वृद्धि हो गई।

(3) पूर्वी प्रदेश पर विजय: गुप्त साम्राज्य की पूर्वी सीमा पर कई छोटे-छोटे राज्य थे जो गुप्त साम्राज्य पर आक्रमण करने के लिए संगठन कर रहे थे। महरौली के स्तम्भ लेख से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त ने इन्हें परास्त कर यश प्राप्त किया था।

(4) वाह्लीक राज्य पर आक्रमण: भारत के पश्चिमोत्तर प्रदेश में कुषाणों के वंशज अब भी शासन कर रहे थे। महरौली के स्तम्भ लेख से ज्ञाता होता है कि चन्द्रगुप्त ने सिन्ध की सहायक नदियों को पार कर वाह्लीकों को परास्त किया और पंजाब तथा सीमान्त प्रदेश पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर वाह्लीकों को काबुल के उस पार भगा दिया। सम्भवतः इन समस्त विजयों के उपरान्त ही चन्द्रगुप्त ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।

(5) दक्षिणापथ पर पुनर्विजय: महरौली के स्तम्भ-लेख से ज्ञात होता है कि रामगुप्त के शासनकाल में दक्षिण-भारत के राज्यों ने गुप्त साम्राज्य की सत्ता को अस्वीकार कर दिया था परन्तु चन्द्रगुप्त ने अपने पराक्रम तथा प्रताप के बल से पुनः दक्षिण भारत के राज्यों में गुप्त साम्राज्य की सत्ता स्थापित की।

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का साम्राज्य

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने अपनी विजयों के फलस्वरूप एक विशाल गुप्त साम्राज्य पर राज्य किया। उसका राज्य पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में बंगाल तक तथा उत्तर में हिमालय की तलहटी से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक विस्तृत था।

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का शासन प्रबंध

साम्राज्य विस्तार के साथ-साथ चन्द्रगुप्त ने अपने शासन को सुव्यवस्थित करने का प्रयत्न किया। अभिलेखों से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त का शासन बड़ा उदार तथा दयालु था। उसका शासन प्रबन्ध उस युग में किसी उपलब्धि से कम नहीं था।

(1) सम्राट: सम्राट राज्य का प्रधान था और अपनी राजधानी से ही सम्पूर्ण राज्य के शासन पर नियंत्रण रखता था। वह अपनी सेना का प्रधान सेनापति था और युद्ध के समय रण-क्षेत्र में उपस्थित रहता था। सम्राट न्याय विभाग का भी प्रधान था। उसका निर्णय अन्तिम समझा जाता था। इस प्रकार सेना, शासन तथा न्याय तीनों शक्तियों का केन्द्र-बिन्दु सम्राट स्वयं होता था।

(2) मंत्री: सम्राट को परामर्श देने तथा शासन में सहायता पहुंचाने के लिए कई मन्त्री नियुक्त किये जाते थे। सेना तथा शासन के अधिकारियों में कोई अंतर नहीं था। जो मन्त्री शासन को देखता था वही सैन्य-विभाग को भी संभालता था। (अ) मंत्रिन्: चन्द्रगुप्त का प्रधान परामर्शदाता मन्त्रिन कहलाता था। (ब) सन्धिविग्रहिक: सन्धि तथा विग्रह (युद्ध) आदि विषयों को देखने के लिये सन्धिविग्रहिक होता था। यह मन्त्री युद्ध के समय रण-स्थल में सम्राट के साथ उपस्थित रहता था। चन्द्रगुप्त का मन्त्री वीरसेन अपने स्वामी के साथ क्षत्रपों के विरुद्ध युद्ध करने के लिए गया था। (स) अक्षपटल अधिकृत: एक मन्त्री राज-पत्रों को रखता था। उसे अक्षपटल अधिकृत कहते थे।

(3) शासन की विभिन्न इकाइयाँ: चंद्रगुप्त द्वितीय का सम्पूर्ण साम्राज्य कई प्रान्तों में, प्रत्येक प्रांत कई जिलों में तथा प्रत्येक जिला कई ग्रामों में विभक्त था। (अ) प्रांतीय शासन: प्रत्येक प्रान्त ‘देश’ अथवा ‘भुक्ति’ कहलाता था। देश का शासक ‘गोत्री’ और भुक्ति का ‘उपरिक’ कहलाता था। कुछ प्रान्तों के शासक राजकुमार हुआ करते थे। (ब) जिलों का शासन: प्रत्येक प्रान्त कई जिलों में विभक्त रहता था। ये जिले ‘प्रदेश’ अथवा ‘विषय’ कहलाते थे। इनका शासक ‘विषयपति’ कहलाता था। (स) ग्राम्य शासन: प्रत्येक विषय कई ग्रामों में विभक्त रहता था। गांव का शासक ग्रामिक अथवा भोजक कहलाता था। इस पद पर गांव का चौधरी अथवा मुखिया ही नियुक्त किया जाता था। उसकी सहायता के लिए ग्राम-वृद्धों की पंचायतें हुआ करती थीं।

(4) दंड विधान: चन्द्रगुप्त उदार तथा दयालु शासक था। उसका दंड विधान कठोर नहीं था। दंड, अपराध की गुरुता के अनुसार दिया जाता था। साधारण अपराध के लिए साधारण शास्ति और बड़े-बड़े़ अपराधों के लिए बड़ी शास्ति आरोपित की जाती थी। अंग-भंग करने का दंड प्रायः नहीं दिया जाता था। केवल राजद्रोहियों का दाहिना हाथ काट दिया जाता था। किसी को भी प्राण दण्ड नहीं दिया जाता था।

(5) व्यापार तथा वाणिज्य: चन्द्रगुप्त के शासन-काल में बाह्य तथा आन्तरिक व्यापार की बड़ी उन्नति हुई। उसका साम्राज्य पश्चिमी समुद्र तट तक विस्तृत था। इससे भारत का विदेशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध विस्तारित हो गया। उस काल में बंगाल से सूती तथा रेशमी वस्त्र, बिहार से नील, हिमालय प्रदेश से अंगराग तथा दक्षिण भारत से कपूर, चन्दन और मसाले पश्चिमी समुद्र-तट पर लाये जाते थे और रोम को भेजे जाते थे जहाँ से बहुत-सा सोना प्रतिवर्ष भारत आता था।

(6) मुद्राएं: साधारण व्यापार में कौड़ी का प्रयोग किया जाता था। परन्तु बड़े-बड़े व्यापारों में धातु मुद्राओं का प्रयोग होता था। चन्द्रगुप्त (द्वितीय) ने तीन प्रकार की मुद्राएं चलाई थी। उत्तर भारत में सोने तथा तांबे की मुद्राएं प्रचलित थीं परन्तु गुजरात तथा काठियावाड़ में चांदी की मुद्राओं का प्रयोग किया जाता था।

(7) धार्मिक सहिष्णुता: चन्द्रगुप्त भागवत धर्म का अनुयायी एवं परम वैष्णव था परन्तु अन्य संप्रदायों के साथ सहिष्णु था। वह राजकीय पदों पर योग्यता के आधार पर नियुक्तियां करता था। इसलिये राजकीय सेवाओं के द्वार किसी भी सम्प्रदाय को मानने वाली प्रजा के लिए खुले रहते थे। चन्द्रगुप्त का सेनापति बौद्ध और उसका एक मन्त्री वैश्य था।

(8) दान-व्यवस्था: सम्राट चन्द्रगुप्त बड़ा ही उदार तथा दानी था। वह अनाथों तथा दीन-दुखियों की सदैव सहायता करता था। उसने दान का अलग विभाग खोल दिया था और उसके प्रबन्ध के लिए एक पदाधिकारी नियुक्त कर दिया था।

चीनी यात्री फाह्यान का आगमन

चन्द्रगुप्त (द्वितीय) के शासनकाल में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया। उसका बचपन का नाम कुंड् था। जब वह दस वर्ष का था तब उसके पिता का निधन हो गया इसलिये कुंड् के पालन-पोषण का भार उसके चाचा पर पड़ा। उसका चाचा उसे गृहस्थाश्रम में प्रवेश कराना चाहता था, परन्तु कुंड् ने भिक्षु बनने का संकल्प लिया। कुंड् के पिता की मृत्यु के कुछ समय उपरान्त कुंड् की माता का भी निधन हो गया। माता तथा पिता के स्नेह से वंचित हो जाने के कारण कुंड् गृहस्थ-जीवन से विमुख हो गया। बड़े होने पर उसने सन्यास ले लिया और वह फाह्यान के नाम से प्रसिद्ध हुआ। फाह्यान दो शब्दों से मिलकर बना है- फा तथा हियान। चीनी भाषा में फा का अर्थ है धर्म और हियान का अर्थ है आचार्य। इसलिये फाह्यान का अर्थ हुआ धर्माचार्य। चीन में उस समय बौद्ध धर्म का प्रचार अपने चरम पर था। फाह्यान बौद्ध-धर्म में दीक्षित हो गया। जब उसने बौद्ध-ग्रन्थों ‘त्रिपिटक’ तथा ‘विनय-पिटक’ का अध्ययन किया तो वे ग्रंथ उसे अधूरे तथा क्रमहीन प्रतीत हुए। इसलिये उसने उनकी प्रामाणिक प्रतियां प्राप्त करने तथा बौद्ध धर्म की जन्मभूमि का दर्शन करने के लिए भारत आने का निश्चय किया।

फाह्यान ने 400 ई. में चार अन्य भिक्षुओं के साथ भारत के लिए प्रस्थान किया। मार्ग की भयानक कठिनाइयों का सामना करते हुए वह गांधार पहुंचा। वहाँ से वह तक्षशिला गया और वहाँ से पुष्पपुर (पेशावर) पहुंचा। इस यात्रा में उसके साथी उसका साथ नहीं दे पाये और वे अपने देश लौट गये। केवल एक साथी उसके साथ रह गया। फाह्यान पुष्पपुर से मथुरा, कन्नौज, श्रावस्ती, कुशीनगर, वैशाली, पाटलिपुत्र, नालन्दा, राजगृह, काशी, सारनाथ आदि नगरों के दर्शन करता हुआ ताम्रलिप्ति पहुंचा। यहाँ पर उसने दो वर्ष तक निवास किया। ताम्रलिप्ति से वह सिंहलद्वीप अर्थात् श्रीलंका गया। वहाँ से वह जावा गया और जावा से फिर अपने देश को लौट गया। 414 ई. में वह चीन पहुंच गया।

फाह्यान ने 405 ई. में भारत में प्रवेश किया और 411 ई. में उसने भारत से प्रस्थान किया। इस प्रकार वह लगभग 6 वर्ष तक भारत में रहा और लगभग चौदह वर्ष तक यात्रा करता रहा। जब फाह्यान अपने देश पहुंचा तब उसने अपनी यात्रा का विवरण अपने एक मित्र को सुनाया। फाह्यान के मित्र ने इस विवरण को फो-को-की नामक ग्रंथ में लेखनी-बद्ध कर दिया। यह विवरण, प्रचीन भारत का इतिहास जानने का अच्छा साधन है।

फाह्यान का भारतीय विवरण: फाह्यान 405 से 411 ई. अर्थात् लगभग छः वर्षों तक भारतवर्ष में रहा। उसने भारत के विभिन्न भागों में भ्रमण किया। यद्यपि वह बौद्ध-ग्रन्थों को प्राप्त करने तथा तीर्थ स्थानों का दर्शन करने के लिये भारत आया था तथा इस कार्य में वह इतना तल्लीन रहा कि उसने पाटलिपुत्र में तीन वर्ष तक निवास करने के उपरांत अपने विवरण में एक बार भी चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का नाम नहीं लिखा। फिर भी उसके विवरण से तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक दशा पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।

(1) राजनीतिक दशा: फाह्यान लिखता है कि शासन का मुख्य उद्देश्य प्रजा के जीवन को सुखी बनाना था। चन्द्रगुप्त का शासन बड़ा अच्छा था। उसकी प्रजा बड़ी सुखी तथा सम्पन्न थी। प्रजा को अपना कार्य करने की पूरी स्वतंत्रता थी। राजा उसके कार्यों में बहुत कम हस्तक्षेप करता था। लोग स्वतंत्रतापूर्वक व्यवसाय करके धन कमा सकते थे। क्रय-विक्रय में कौड़ियों का प्रयोग होता था। बड़े-बड़े नगरों में राज्य की ओर से औषधालयों का प्रबंध रहता था, जहाँ प्रजा को निःशुल्क दवा मिलती थी। प्रजा पर राज्य की ओर से बहुत थोड़े कर लगाये गये थे। भूमि कर राज्य की आय का प्रधान साधन था। दण्ड-विधान कठोर न था। अपराधियों को प्रायः जुर्माने का दण्ड दिया जाता था। राजद्रोहियों का दहिना हाथ काट दिया जाता था। लोगों को चोरी तथा ठगी का बिल्कुल भय न था। राजा से उसकी प्रजा प्रेम करती थी। यात्रियों को बड़े आदर की दृष्टि से देखा जाता था। और उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। यात्रियों की सुविधा के लिए सड़कें बनी थीं और उनके किनारे पर छायादार वृक्ष लगे थे। स्थान-स्थान पर कुंए खुदे रहते थे और धर्मशालाएं बनी रहती थीं, जिनमें यात्रियों को निःशुल्क भोजन मिलता था।

(2) सामाजिक दशा: फाह्यान के विवरण से भारत की सामाजिक दशा का पर्याप्त परिचय मिलता है। उसने लिखा है कि उत्तरी भारत के लोग बड़े धर्मात्मा तथा धन सम्पन्न थे। वे सदाचारी, विद्या प्रेमी तथा एक दूसरे से सहानुभूति रखने वाले थे। लोग एक दूसरे की सहायता करने के लिए उद्यत रहते थे। वे सत्यवादी होते थे और अपने व्यवहार में सत्य का पालन करते थे। लोग अहिंसात्मक प्रवृत्ति के होते थे। सज्जन लोग न तो आखेट करते थे और न मांस, लहसुन, प्याज, मदिरा आदि का सेवन करते थे। नगरों में इन वस्तुओं की दुकानें तक नहीं थीं। इन वस्तुओं का प्रयोग केवल चाण्डाल लोग तथा नीच जातियां करती थीं। उन्हें नगर के बाहर रहना पड़ता था। वे समाज से बहिष्कृत समझे जाते थे। सूअर तथा मुर्गियों को केवल नीच लोग पालते थे।

(3) धार्मिक दशा: फाह्यान के विवरण से भारत की तत्कालीन धार्मिक दशा का भी पता चलता है। उसके विवरण से हमें ज्ञात होता है कि ब्राह्मण धर्म इस समय बड़ी उन्नत दशा में था और मध्य भारत में उसका बड़ा जोर था। सम्राट चन्द्रगुप्त स्वयं परमभागवत तथा वैष्णव धर्म का अनुयायी था। पंजाब, मथुरा तथा बंगाल में बौद्ध धर्म की प्रधानता थी। महायान तथा हीनयान दोनों ही सम्प्रदाय विद्यमान थे। फाह्यान ने देश के विभिन्न भागों में अनेक बौद्ध विहार देखे थे परन्तु बौद्ध-धर्म अब अधःपतन की ओर जा रहा था। मध्य-भारत में तो इसका प्रभाव समाप्त सा हो रहा था। यद्यपि गुप्त सम्राट ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था परन्तु अन्य धर्मों के साथ सहिष्णुता का व्यवहार करता था। वह बौद्ध-धर्म को मानने वालों के साथ किसी प्रकार का अत्याचार नहीं करता था। समस्त सम्प्रदायों वाली प्रजा मेल-जोल के साथ रहती थी। उनमें ईर्ष्या-द्वेष की भावना नहीं थी। सम्राट ब्राह्मणों के साथ-साथ बौद्धों को भी दान-दक्षिणा देता था।

(4) पाटलिपुत्र की दशा: फाह्यान गुप्त-साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र में तीन वर्ष तक रहा। इस अवधि में उसने संस्कृत भाषा सीखी। उसने लिखा है कि पाटलिपुत्र में दो बड़े ही सुन्दर बौद्ध-विहार थे। इनमें से एक हीनयान सम्प्रदाय का और दूसरा महायान सम्प्रदाय का था। इन विहारों में लगभग छः-सात सौ भिक्षु निवास करते थे। भिक्षु बड़े ज्ञानवान होते थे। समाज के विभिन्न भागों से लोग ज्ञान प्राप्त करने के लिए इन विद्वान भिक्षुओं के पास आया करते थे। फाह्यान ने पाटलिपुत्र में अशोक द्वारा बनवाये हुए सुन्दर भवन को देखा था। इस भवन की सुन्दरता से वह आश्चर्यचकित रह गया था। उसने विचार किया वह भवन देवताओं द्वारा बनाया गया है क्योंकि मनुष्य ऐसे भव्य भवन का निर्माण नही कर सकता था। फाह्यान लिखता है कि नगर में बड़े धनी तथा दानी लोग निवास करते थे। नगर में अनेक संस्थाएं थीं जहाँ दीन-दुखियों, अपाहिजों तथा असहायों को दान मिलता था। पाटलिपुत्र में एक बहुत बड़ा औषधालय था, जहाँ दीन-दुखियों को निःशुल्क औषधि मिलती थी। औषधालय का व्यय नगर के धनी-मानी तथा दानी व्यक्ति वहन करते थे।

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के कार्यों का मूल्यांकन

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की गणना भारत के अत्यंन्त योग्य तथा सफल शासकों में होती है। उसने अपने पिता के साम्राज्य को न केवल सुरक्षित तथा सुसंगठित रखा अपितु उसकी सीमाओं में वृद्धि भी की।

महान विजेता: चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने शक-क्षत्रपों को परास्त कर मालवा, गुजरात तथा सौराष्ट्र को गुप्त-साम्राज्य में मिलाया। उसने वाह्लीकों को पश्चिमोत्तर प्रदेश से मार भगाया और गणराज्यों को अपने राज्य में सम्मिलित करके गुप्त-साम्राज्य की सीमा में वृद्धि की। उसने दक्षिण भारत पर भी गुप्त-साम्राज्य की सत्ता को फिर से स्थापित किया। इस प्रकार एक विजेता के रूप में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का स्थान बड़ा ऊँचा है।

महान कूटनीतिज्ञ: चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य अपने समय का बहुत बड़ा कूटनीतिज्ञ था। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह समस्त प्रकार के साधनों का प्रयोग कर सकता था। उसने नारी का वेश धारण कर शक-राजा की हत्या की और अपने भाई रामगुप्त का वध कर पाटलिपुत्र का सिंहासन प्राप्त किया। उसने नाग-वंश तथा वाकाटक वंश के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर अपनी स्थिति को अत्यंत सुदृढ़़ बनाया। इन सबसे सिद्ध होता है कि वह राजनीति का बहुत बड़ा पंडित था।

कुशल प्रशासक: चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य कुशल प्रशासक था। फाह्यान के विवरण से ज्ञात होता है कि उसकी प्रजा बड़ी सुखी थी और उससे प्रेम करती थी। उसका शासन उदार था। वह न्याय-प्रिय राजा था। उसका दंड-विधान कठोर नहीं था। मृत्यु दंड का सर्वधा निषेध था।

धार्मिक सहिष्णुता: चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, भागवत धर्म का उपासक था जिसे वैष्णव धर्म भी कहते हैं। उसके अभिलेखों में उसे परम भागवत कहा गया है। उसमें उच्च-कोटि की धार्मिक सहिष्णुता विद्यमान थी। उसके राज्य में राजकीय नौकरियों के द्वार समस्त प्रजा के लिए खुले रहते थे। उसके मंत्री ‘वीरसेन’ तथा ‘शिखर स्वामी’ शैव धर्म के अनुयायी थे। उसका सेनापति ‘आम्रकार्दव’ बौद्ध था।

महान साहित्य प्रेमी: चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य अपने समय का महान साहित्य प्रेमी तथा साहित्यकारों का आश्रयदाता था। उसकी महानता उसके साम्राज्य निर्माण में नहीं अपितु बौद्धिक पुनरुत्थान में निहित थी। उसकी सभा में नौ महान् विद्वान रहते थे जो नवरत्न कहलाते थे। इनमें कालिदास सर्वश्रेष्ठ थे। चन्द्रगुप्त के शासन-काल में संस्कृत भाषा की बड़ी उन्नति हुई और अनेक उच्च कोटि के ग्रंथ लिखे गए। कला एवं संस्कृति की उन्नति, प्रजा की सम्पन्नता तथा राज्य में शांति के वातावरण के कारण ही गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहते हैं।

उपर्युक्त विवरण से इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य योग्य तथा सफल शासक था और भारत के इतिहास में राजनीतिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक दृष्टिकोणों से उसका बड़ा महत्व है।

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