Saturday, May 25, 2024
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अध्याय – 29 : भारत के प्रमुख राजपूत-वंश

गुर्जर-प्रतिहार वंश

गुर्जर-प्रतिहार वंश का उदय राजस्थान के दक्षिण-पूर्व में गुर्जर प्रदेश में हुआ। इसी कारण इस वंश के नाम के पहले गुर्जर शब्द जोड़ दिया गया। प्राचीन क्षत्रियों के शासन काल में सम्राट के अंगरक्षक को प्रतिहार कहते थे। अनुमान है कि प्रतिहार वंश के संस्थापक, पूर्व में किसी राजा के प्रतिहार थे। इसी से इस वंश का नाम प्रतिहार वंश पड़ा। ग्वालियर अभिलेख के अनुसार प्रतिहार वंश सौमित्र (लक्ष्मण) से उत्पन्न हुआ। लक्ष्मण ने मेघनाद की सेना का प्रतिहरण किया था (भगा दिया था) इसी कारण उनका वंश प्रतिहार कहलाया। इस वंश के लोग स्वयं को सूर्यवंशी क्षत्रिय तथा लक्ष्मण के वंशज मानते हैं। डॉ. गौरीशंकर ओझा उन्हें ईक्ष्वाकु वंशी मानते हैं।

डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘यह कहना बहुत बड़ी मूर्खता होगी कि राजपूत लोग प्राचीन वैदिक काल के क्षत्रियों की शुद्ध सन्तान हैं। ऐसा सोचकर हम मिथ्याभिमान कर सकते हैं, परन्तु मिथ्याभिमान प्रायः तथ्य से दूर होता है। पाँचवी तथा छठीं शताब्दी ई. में भी विदेशी भारत में आये, वे प्रतिहार थे इसलिये उस वंश के लोग प्रतिहार कहलाये।’ कनिंघम ने प्रतिहारों को यूचियों की संतान माना है। स्मिथ आदि विद्वानों ने प्रतिहारों को हूणों की संतान माना है। आर.सी. मजूमदार आदि इतिहासकार प्रतिहारों को खिजरों की संतान मानते हैं तथा खिजर शब्द से ही गुर्जर शब्द की उत्पत्ति मानते हैं।

प्रतिहार वंश का उदय सर्वप्रथम राजस्थान में जोधपुर के निकट मण्डोर नामक स्थान पर हुआ। इस वंश की एक शाखा ने उन्नति करते हुए अवंति (उज्जैन) में अपनी प्रभुता स्थापित कर ली और वहीं पर शासन करने लगी।

नागभट्ट (प्रथम): इस शाखा का प्रथम शासक नागभट्ट (प्रथम) था। उसने जालोर को अपनी राजधानी बनाया। वह बड़ा प्रतापी शासक था। उसने सम्पूर्ण मालवा तथा पूर्वी राजस्थान पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। उसके शासनकाल में 725 ई. में अरब आक्रांताओं ने मालवा पर आक्रमण किया। नागभट्ट ने बड़ी वीरता तथा साहस के साथ विदेशी आक्रमणकारियों का सामना किया और उन्हें मार भगाया। इस प्रकार नागभट्ट (प्रथम) ने मुसलमानों से देश की रक्षा का प्रशंसनीय कार्य किया।

वत्सराज: नागभट्ट (प्रथम) के बाद नाममात्र के दो शासक हुए। इस वंश का चौथा शासक वत्सराज था। वह प्रतापी राजा था, उसने राजपूताना के भट्टी वंश के राजा को परास्त किया और गौड़ (बंगाल) के राजा धर्मपाल को परास्त कर बंगाल तक शक्ति बढ़ा ली परन्तु राष्ट्रकूट राजा ध्रुव ने वत्सराज को परास्त कर मरूभूमि में शरण लेने के लिए बाध्य किया।

नागभट्ट (द्वितीय): वत्सराज की मृत्यु के उपरान्त उसका पुत्र नागभट्ट (द्वितीय) प्रतिहारों के सिंहासन पर बैठा। वह साहसी तथा महत्त्वकांक्षी शासक था। उसने राष्ट्रकूट राजा से अपने पिता की पराजय का बदला लेने का प्रयत्न किया परन्तु सफल नहीं हो सका। उसने कन्नौज पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया तथा कन्नौज को राजधानी बनाकर वहीं से शासन करने लगा। उसका बंगाल के राजा धर्मपाल से भी संघर्ष हुआ, नागट्ट (द्वितीय) ने उसे मंुगेर के निकट परास्त किया। इससे नागभट्ट (द्वितीय) की प्रतिष्ठा में बड़ी वृद्धि हुई।

रामचन्द्र: नागभट्ट (द्वितीय) के बाद उसका पुत्र रामचन्द्र सिंहासन पर बैठा, परन्तु वह अयोग्य सिद्ध हुआ।

मिहिरभोज: रामचन्द्र के बाद उसका पुत्र मिहिरभोज शासक हुआ। वह बड़ा ही प्रतापी राजा सिद्ध हुआ। सिंहासन पर बैठते ही उसने बुन्देलखण्ड पर अधिकार कर लिया। मारवाड़ में भी उसने अपने वंश की सत्ता फिर से स्थापित की। बंगाल के शासक देवपाल के साथ भी उसका युद्ध हुआ परन्तु उसमें वह सफल नहीं हो सका। मिहिरभोज एक कुशल शासक था। मिहिरभोज की उपलब्धियों का वर्णन आगे के अध्याय में किया गया है।

महेन्द्रपाल (प्रथम): मिहिरभोज के बाद महेन्द्रपाल (प्रथम) शासक हुआ। वह भी योग्य तथा प्रतापी शासक था। उसने मगध के बहुत बड़े भाग तथा उत्तरी बंगाल पर अधिकार कर लिया तथा दक्षिण-पश्चिम में सौराष्ट्र तक अपनी सत्ता स्थापित कर ली।

महिपाल: महेन्द्रपाल के बाद महिपाल कन्नौज का शासक हुआ। उसे भयानक विपत्तियों का सामना करना पड़ा। दक्षिण के राष्ट्रकूट राजा ने उसके राज्य पर आक्रमण कर दिया और उसे खूब लूटा। पूर्व में बंगाल के राजा ने भी अपना खोया हुआ राज्य फिर से छीन लिया। महिपाल ने धैर्य के साथ इन विपत्तियों का सामना किया परन्तु वह कन्नौज राज्य को गिरने से नहीं बचा सका। उसके जीवन के अन्तिम भाग में राष्ट्रकूट राजा ने कन्नौज पर आक्रमण किया जिसके फलस्वरूप वह पतनोन्मुख हो गया।

महमूद गजनवी का कन्नौज पर आक्रमण: महिपाल के बाद उस वंश में कई अयोग्य शासक हुए। इनमें राजपाल का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उसके शासन काल में 1018 ई. में महमूद गजनवी ने कन्नौज पर आक्रमण किया। राजपाल ने बड़ी कायरता दिखाई। वह कन्नौज छोड़कर भाग गया और अपने एक सामन्त के यहाँ शरण ली। महमूद ने कन्नौज तथा उसमें स्थित मन्दिरों को खूब लूटा।

प्रतिहारों के कन्नौज राज्य का अंत: यशपाल इस वंश का अन्तिम राजा था। 1058 ई. में गहड़वाल वंश के राजा चन्द्रदेव ने कन्नौज पर विजय प्राप्त कर उसे अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया। इस प्रकार कन्नौज के प्रतिहार वंश के शासन का अन्त हो गया।

गहड़वाल वंश

इस वंश का उदय ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में मिर्जापुर के पहाड़ी प्रदेश में हुआ था। गुहायुक्त पहाड़ी प्रदेश में रहने के कारण ही यह लोग गहड़वाल अर्थात् गुहावाले कहलाये।

चन्द्रदेव: इस वंश के संस्थापक का नाम चन्द्रदेव था जिसकी राजधानी वाराणसी थी। लगभग 1085 ई. में उसने कन्नौज पर अधिकार कर लिया और वहीं से शासन करने लगा। पूर्व की ओर उसने सेन राजाओं की प्रगति को रोका। लगभग 1100 ई. में चन्द्रदेव की मृत्यु हुई।

गोविन्दचन्द्र तथा विजयचन्द्र: चन्द्रदेव के बाद गोविन्दचन्द्र तथा उसके बाद विजयचन्द्र नामक दो प्रतापी शासक हुए जिन्होंने अपने पूर्वजों के राज्य तथा गौरव को सुरक्षित रखा।

जयचन्द: इस वंश का अन्तिम शक्तिशाली राजा जयचन्द था जो लगभग 1170 ई. में सिंहासन पर बैठा। कहा जाता है कि उसने मुस्लिम आक्रमणकारी शहाबुद्दीन को कई बार युद्ध में परास्त किया। दुर्भाग्यवश जयचन्द्र की दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान से शत्रुता हो गई। जयचन्द की पुत्री संयोगिता के विवाह ने इस शत्रुता को और बढ़ा दिया। जयचन्द ने अपनी पुत्री संयोगिता का स्वयंवर किया। इस स्वयंवर में जयचन्द ने पृथ्वीराज को अपमानित करने के लिए पृथ्वीराज की एक प्रतिमा स्वयंवर स्थल के द्वार पर द्वारपाल के रूप में रखवा दी। संयोगिता पृथ्वीराज की वीरता की कहानियाँ सुन चुकी थी। इसलिये उसने उसी के साथ विवाह करने का निश्चय कर लिया। फलतः उसने पृथ्वीराज की प्रतिमा के गले में जयमाला डाल दी। पृथ्वीराज अपने सैनिकों के साथ वहीं निकट ही छिपा हुआ था। उसने स्वयंवर स्थल पर पहुंचकर संयोगिता को अपने घोड़े पर बिठा लिया और उसे लेकर दिल्ली चला गया। इससे जयचन्द तथा पृथ्वीराज की शत्रुता और बढ़ गई। जयचन्द इस अपमान को नहीं भूल सका। जब मुहमद गौरी ने दिल्ली पर आक्रमण किया तब जयचन्द ने पृथ्वीराज का साथ नहीं दिया। पृथ्वीराज को परास्त करने के बाद मुहमद गौरी ने 1194 ई. में कन्नौज पर आक्रमण किया। जयचन्द युद्ध में परास्त होकर मारा गया।

हरिश्चन्द्र: जयचन्द के बाद उसका पुत्र हरिश्चन्द्र राजा हुआ जो मुहम्मद गौरी के सामन्त रूप में शासन करता था। 1225 ई. में इल्तुतमिश ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार गहड़वाल वंश का अन्त हो गया।

चौहान वंश

चौहानों का उदय छठी शताब्दी ईस्वी के लगभग हुआ। उन्होंने सांभर झील के आसपास अपनी शक्ति बढ़ाई। राजशेखर द्वारा लिखित प्रबंधकोष के अनुसार चौहान शासकों में वासुदेव पहला शासक था जिसने 551 ई. में सपादलक्ष (सांभर) में शासन किया। बिजोलिया अभिलेख कहता है कि वासुदेव सांभर झील का प्रवर्तक था। उसका पुत्र सामंतदेव हुआ।

अजयपाल: सामंतदेव का वंशज अजयराज अथवा अजयपाल 683 ई. के आसपास अजमेर का राजा हुआ। उसने अजमेर नगर की स्थापना की। अपने अंतिम वर्षों में वह अपना राज्य अपने पुत्र को देकर पहाड़ियों में जाकर तपस्या करने लगा। अजयराज के वंशज प्रतिहार शासकों के अधीन रहकर राज्य करते थे किन्तु ईसा की ग्याहरवीं शताब्दी के लगभग उन्होंने स्वयं को प्रतिहारों से स्वतन्त्र कर लिया।

विग्रहराज (प्रथम) से गोविंदराज (प्रथम): अजयपाल के बाद उसका पुत्र विग्रहराज (प्रथम) अजमेर का शासक हुआ। विग्रहराज (प्रथम) के बाद विग्रहराज (प्रथम) का पुत्र चंद्रराज (प्रथम), चंद्रराज (प्रथम) के बाद विग्रहराज (प्रथम) का दूसरा पुत्र गोपेन्द्रराज अजमेर का राजा हुआ। इसे गोविंदराज (प्रथम) भी कहते हैं। यह मुसलमानों से लड़ने वाला पहला चौहान राजा था। उसने मुसलमानों की सेनाओं को परास्त करके उनके सेनापति सुल्तान बेग वारिस को बंदी बना लिया।

दुर्लभराज (प्रथम): गोविंदराज (प्रथम) के बाद दुर्लभराज (प्रथम) अजमेर का राजा हुआ। इसे दूलाराय भी कहते हैं। जब प्रतिहार शासक वत्सराज ने बंगाल के शासक धर्मपाल पर चढ़ाई की तब दुर्लभराज, प्रतिहारों के सेनापति के रूप में इस युद्ध में सम्मिलित हुआ। उसने बंगाल की सेना को परास्त कर अपना झण्डा बंगाल तक लहरा दिया। दुर्लभराय का गौड़ राजपूतों से भी संघर्ष हुआ। दुर्लभराज पहला राजा था जिसके समय में अजमेर पर मुसलमानों का सर्वप्रथम आक्रमण हुआ।

गूवक (प्रथम): दुर्लभराज प्रथम (दूलाराय) के बाद उसका पुत्र गूवक (प्रथम) अजमेर का शासक हुआ। संभवतः उसी ने आठवीं शताब्दी के किसी कालखण्ड में, मुसलमानों से अजमेर पुनः छीनकर अजमेर का उद्धार किया। वह सुप्रसिद्ध योद्धा हुआ। 805 ई. में कन्नौज के शासक नागावलोक (नागभट्ट द्वितीय) की राजसभा में गूवक को वीर की उपाधि दी गई। गूवक (प्रथम) ने अनंत प्रदेश (वर्तमान में राजस्थान का सीकर जिला) में अपने अराध्य हर्ष महादेव का मंदिर बनवाया।

चंद्रराज (द्वितीय) तथा गूवक (द्वितीय): गूवक (प्रथम) के बाद उसका पुत्र चंद्रराज (द्वितीय) अजमेर का शासक हुआ। उसके बाद गूवक (द्वितीय) अजमेर का राजा हुआ। उसकी बहिन कलावती का विवाह प्रतिहार शासक भोज (प्रथम) के साथ हुआ।

चंदनराज: गूवक (द्वितीय) के बाद चंदनराज अजमेर की गद्दी पर बैठा। चंदनराज ने दिल्ली के निकट तंवरावटी पर आक्रमण किया तथा उसके राजा रुद्रेन अथवा रुद्रपाल का वध कर दिया। चंदनराज की रानी रुद्राणी ने पुष्कर के तट पर एक सहस्र शिवलिंगों की स्थापना एवं प्राण प्रतिष्ठा की।

वाक्पतिराज: चंदनराज का उत्तराधिकारी वाक्पतिराज हुआ जिसे बप्पराज भी कहा जाता है। उसका राज्य समृद्ध था। उसने अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। उसके राज्य की दक्षिणी सीमा विंध्याचल पर्वत तक जा पहुँची। वह एक महान योद्धा था। उसने 188 युद्ध जीते।

सिंहराज: सिंहराज महान राजा हुआ। तोमरों ने राजा लवण की सहायता से सिंहराज के राज्य पर आक्रमण किया। सिंहराज ने तोमरों को परास्त करके लवण को बंदी बना लिया। प्रतिहार शासक ने सिंहराज से प्रार्थना करके लवण को मुक्त करवाया। हम्मीर महाकाव्य कहता है कि जब उसके अभियान का डंका बजता तो कर्नाटक का राजा उसकी चापलूसी करने लगता। लाट का राजा अपने दरवाजे उसके लिये खोल देता। चोल नरेश (मद्रास नरेश) कांपने लगता, गुजरात का राजा अपना सिर खो देता तथा अंग (पश्चिमी बंगाल) के राजा का हृदय डूब जाता। उसने मुसलमानों के सेनापति हातिम का वध किया तथा उसके हाथियों को पकड़ लिया। उसने अजमेर तक आ पहुँची सुल्तान हाजीउद्दीन की सेना को खदेड़ दिया। सिंहराज ई.956 तक जीवित रहा। हर्ष मंदिर का निर्माण उसके काल में ही पूरा हुआ। इस अभिलेख में चौहानों की तब तक की वंशावली दी गई है।

विग्रहराज (द्वितीय): सिंहराज का पुत्र विग्रहराज (द्वितीय) ई.973 में उसका उत्तराधिकारी हुआ। उसने अपने राज्य का बड़ा विस्तार किया। उसने प्रतिहारों की अधीनता त्याग दी और पूर्ण रूप से स्वतंत्र हो गया। उसने 973 ई. से 996 ई. के बीच गुजरात पर आक्रमण किया। गुजरात का शासक मूलराज राजधानी खाली करके कच्छ में भाग गया। इस पर विग्रहराज अपनी राजधानी अजमेर लौट आया। उसने दक्षिण में अपना राज्य नर्बदा तक बढ़ा लिया। उसने भरूच में आशापूर्णा देवी का मंदिर बनवाया। चौदहवीं शताब्दी में लिखे गये हम्मीर महाकाव्य के अनुसार विग्रहराज (द्वितीय) ने गुजरात के राजा मूलराज का वध किया। यहाँ से चौहानों तथा चौलुक्यों का संघर्ष आरंभ हुआ जिसका लाभ आगे चलकर अफगानिस्तान से आये आक्रांताओं ने उठाया।

दुर्लभराज (द्वितीय) तथा गोविंदराज (द्वितीय): विग्रहराज (द्वितीय) के बाद दुर्लभराज (द्वितीय) तथा उसके बाद गोविंदराज (द्वितीय) अजमेर के शासक हुए।

वाक्पतिराज (द्वितीय): गोविंदराज (द्वितीय) का उत्तराधिकारी उसका पुत्र वाक्पतिराज (द्वितीय) हुआ। उसने मेवाड़ के शासक अम्बाप्रसाद का वध किया।

वीर्यराम: वाक्पतिराज (द्वितीय) के बाद वीर्यराम अजमेर का राजा हुआ। वह मालवा के राजा भोज का समकालीन था। वीर्यराम के शासन काल में ई.1024 में महमूद गजनवी ने अजमेर पर आक्रमण किया तथा गढ़ बीठली को घेर लिया किंतु घायल होकर अन्हिलवाड़ा को भाग गया। वीर्यराम ने मालवा पर आक्रमण किया किंतु भोज के हाथों परास्त होकर मारा गया।

चामुण्डराज: वीर्यराम का उत्तराधिकारी चामुण्डराज हुआ। उसने शक मुसलमानों के स्वामी हेजामुद्दीन को पकड़ लिया।

दुर्लभराज (तृतीय): चामुण्डराज के बाद 1075 ई. में दुर्लभराज (तृतीय) राजा हुआ जिसे दूसल भी कहते हैं। उसने मुस्लिम सेनापति शहाबुद्दीन को परास्त किया। 1080 ई. में मेवात के शासक महेश ने दूसल की अधीनता स्वीकार की। दूसल ने ई.1091 से 1093 के मध्य गुजरात पर आक्रमण किया तथा वहाँ के राजा कर्ण को मार डाला ताकि मालवा का शासक उदयादित्य, गुजरात पर अधिकार कर सके। मेवाड़ के शासक वैरिसिंह ने दूसल को कुंवारिया के युद्ध में मार डाला।

विग्रहराज (तृतीय): दुर्लभराज के बाद विग्रहराज (तृतीय) अजमेर का शासक हुआ। इसे बीसल अथवा वीसल भी कहा जाता था। उसने भी मुस्लिम आक्रांताओं के विरुद्ध एक संघ बनाया तथा हांसी, थाणेश्वर और नगरकोट से मुस्लिम गवर्नरांे को मार भगाया। इस विजय के बाद दिल्ली में एक स्तम्भ लेख लगावाया गया जिसमें लिखा है कि विन्ध्य से हिमालय तक म्लेच्छों को निकाल बाहर किया गया जिससे आयावर्त एक बार फिर पुण्यभूमि बन गया। वीसल ने अन्हिलवाड़ा पाटन के चौलुक्य राजा कर्ण को युद्ध में परास्त किया। कर्ण ने अपनी पुत्री का विवाह विग्रहराज के साथ कर दिया। विग्रहराज ने विजय स्थल पर अपने नाम से वीसलनगर नामक नगर की स्थापना की। यह नगर आज भी विद्यमान है।

पृथ्वीराज (प्रथम): वीसलदेव का उत्तराधिकारी पृथ्वीराज (प्रथम) हुआ। उसके समय में चौलुक्यों की सेना पुष्कर को लूटने आई। इस पर पृथ्वीराज (प्रथम) ने चौलुक्यों पर आक्रमण करके 500 चौलुक्यों को मार डाला। उसने सोमनाथ के मार्ग में एक भिक्षागृह बनाया। शेखावटी क्षेत्र में स्थित जीणमाता मंदिर में लगे वि.सं.1162 (ई.1105) के अभिलेख में अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान (प्रथम) का उल्लेख है।

अजयदेव (अजयराज अथवा अजयपाल): पृथ्वीराज (प्रथम) के बाद अजयदेव अजमेर का राजा हुआ। अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार ई.1113 के लगभग अजयदेव ने अजमेर को राजधानी बनाया। उसके बाद ही अजमेर का विश्वसनीय इतिहास प्राप्त होता है। अजदेव ने चांदी तथा ताम्बे के सिक्के चलाये। उसके कुछ सिक्कों पर उसकी रानी सोमलवती का नाम भी अंकित है। उसने अजमेर पर चढ़कर आये मुस्लिम आक्रांताओं को परास्त कर उनका बड़ी संख्या में संहार किया। अजयराज ने चाचिक, सिंधुल तथा यशोराज पर विजय प्राप्त की तथा उन्हें मार डाला। ई.1123 में वह मालवा के प्रधान सेनापति सल्हण को पकड़ कर अजमेर ले आया तथा एक मजबूत दुर्ग में बंद कर दिया। उसने मुसलमानों को परास्त करके बड़ी संख्या में उनका वध किया। उसने उज्जैन तक का क्षेत्र जीत लिया। अजयराज को अजयराज चक्री भी कहते थे क्योंकि उसने चक्र की तरह दूर-दूर तक बिखरे हुए शत्रुदल को युद्ध में जीता था। अर्थात् वह चक्रवर्ती विजेता था। ई.1130 से पहले किसी समय अजयराज अपने पुत्र अर्णोराज को राज्य का भार देकर पुष्करारण्य में जा रहा।

अर्णोराज: अजयदेव का पुत्र अर्णोराज 1133 ई. के आसपास अजमेर का शासक हुआ। उसे आनाजी भी कहते हैं। वह 1155 ई. तक शासन करता रहा। उसने 1135 ई. में उन तुर्कों को पराजित किया जो मरुस्थल को पार करके अजमेर तक आ पहुँचे थे। उसने अजमेर में आनासागर झील बनाई। उसने मालवा के नरवर्मन को परास्त किया। उसने अपनी विजय पताका सिंधु और सरस्वती नदी के प्रदेशों तक फहराई तथा हरितानक देश तक युद्ध अभियान का नेतृत्व किया। उसने पंजाब के पूर्वी भाग और संयुक्त प्रांत के पश्चिमी भाग, हरियाणा, दिल्ली तथा वर्तमान उत्तरप्रदेश के बुलन्दशहर जिले (तब वराणा राज्य अथवा वरण नगर) पर भी अधिकार कर लिया। अर्णोराज के समय में चौहान-चौलुक्य संघर्ष अपने चरम को पहुँच गया। ई.1134 में सिद्धराज जयसिंह ने अजमेर पर आक्रमण किया किंतु अर्णोराज ने उसे परास्त कर दिया। इसके बाद हुई संधि के अनुसार सिद्धराज जयसिंह ने अपनी पुत्री कांचनदेवी का विवाह अर्णोराज से कर दिया। ई.1142 में चौलुक्य कुमारपाल, चौलुक्यों की गद्दी पर बैठा तो चाहमान-चौलुक्य संघर्ष फिर से तीव्र हो गया। ई.1150 में चौलुक्य कुमारपाल ने अजमेर पर अधिकार कर लिया। पराजित अर्णोराज को विजेता कुमारपाल के साथ अपनी पुत्री का विवाह करना पड़ा तथा हाथी-घोड़े भी उपहार में देने पड़े। इस पराजय से अर्णोराज की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचा फिर भी उसके राज्य की सीमाएं अपरिवर्तित बनी रहीं।

विग्रहराज चतुर्थ (वीसलदेव): कुमारपाल के हाथों अर्णोराज की पराजय के बाद ई.1150 अथवा ई.1151 में राजकुमार जगदेव ने अपने पिता अर्णोराज की हत्या कर दी और स्वयं अजमेर की गद्दी पर बैठ गया किन्तु शीघ्र ही ई.1152 में उसे उसके छोटे भ्राता विग्रहराज (चतुर्थ) द्वारा हटा दिया गया। विग्रहराज (चतुर्थ) को बीसलदेव अथवा वीसलदेव के नाम से भी जाना जाता है। वह ई.1152 से ई.1163 तक अजमेर का राजा रहा। उसका शासन न केवल अजमेर के इतिहास के लिये अपितु सम्पूर्ण भारत के इतिहास के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वीसलदेव ने ई.1155 से 1163 के बीच तोमरों से दिल्ली तथा हॉंसी छीन लिए। उसने चौलुक्यों और उनके अधीन परमार राजाओं से भारी युद्ध किये तथा उन्हें पराजित कर उनसे नाडोल, पाली और जालोर नगर एवं आसपास के क्षेत्र छीन लिए। उसने जालोर के परमार सामन्त को दण्ड देने के लिए जालोर नगर को जलाकर राख कर दिया। उसने चौलुक्य कुमारपाल को परास्त करके अपने पिता की पराजय का बदला लिया। उसने मुसलमानों से भी अनेक युद्ध लड़े। दिल्ली से अशोक का एक स्तंभ लेख मिला है जिस पर वीसलदेव के समय में एक और शिलालेख उत्कीर्ण किया गया। यह शिलालेख 9 अप्रेल 1163 का है तथा इसे शिवालिक स्तंभ लेख कहते हैं। इस शिलालेख के अनुसार वीसलदेव ने देश से मुसलमानों का सफाया कर दिया तथा अपने उत्तराधिकारियों को निर्देश दिया कि वे मुसलमानों को अटक नदी के उस पार तक सीमित रखें। वीसलदेव के राज्य की सीमायें शिवालिक पहाड़ी, सहारनपुर तथा उत्तर प्रदेश तक प्रसारित थीं। शिलालेखों के अनुसार जयपुर और उदयपुर जिले के कुछ भाग उसके राज्य के अंतर्गत थे।

अमरगंगेय: ई.1163 में विग्रहराज (चतुर्थ) की मृत्यु के बाद उसका अवयस्क पुत्र अमरगंगेय अथवा अपरगंगेय अजमेर की गद्दी पर बैठा। वह मात्र 5-6 वर्ष ही शासन कर सका और चचेरे भाई पृथ्वीराज (द्वितीय) द्वारा हटा दिया गया। पृथ्वीराज (द्वितीय), जगदेव का पुत्र था।

पृथ्वीराज (द्वितीय): पृथ्वीराज (द्वितीय) ने राजा वास्तुपाल को हराया, मुसलमानों को पराजित किया तथा हांसी के दुर्ग में एक महल बनवाया। उसने मुसलमानों को अपने राज्य से दूर रखने के लिये अपने मामा गुहिल किल्हण को हांसी का अधिकारी नियुक्त किया। उसका राज्य अजमेर और शाकम्भरी के साथ-साथ थोड़े (जहाजपुर के निकट), मेनाल (चित्तौड़ के निकट) तथा हांसी (पंजाब में) तक विस्तृत था। ई.1169 में पृथ्वीराज (द्वितीय) की निःसंतान अवस्था में ही मृत्यु हो गई।

सोमेश्वर: सोमेश्वर, चौलुक्य राजा सिद्धराज जयसिंह की पुत्री कंचनदेवी तथा चौहान शासक अर्णोराज का पुत्र था। ई.1169 में पृथ्वीराज (द्वितीय) के निःसंतान मरने पर, उसके पितामह अर्णोराज का अब एक पुत्र सोमेश्वर ही जीवित बचा था। अतः अजमेर के सामंतों द्वारा सोमेश्वर को अजमेर का शासक बनने के लिये आमंत्रित किया गया। सोमेश्वर अपनी रानी कर्पूरदेवी तथा दो पुत्रों पृथ्वीराज एवं हरिराज के साथ अजमेर आया। सोमेश्वर प्रतापी राजा हुआ। उसके राज्य में बीजोलिया, रेवासा, थोड़, अणवाक आदि भाग सम्मिलित थे। उसके समय में फिर से चौलुक्य-चौहान संघर्ष छिड़ गया जिससे उसे हानि उठानी पड़ी। ई.1179 में सोमेश्वर की मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका पुत्र पृथ्वीराज (तृतीय) अजमेर का शासक हुआ। उसका वर्णन आगे किया जायेगा।

चन्देल वंश

चंदेल वंश का उदय जयजाकभुक्ति (बुन्देलखण्ड) प्रदेश में हुआ था, जो यमुना तथा नर्मदा नदियों के बीच स्थित था। ये लोग स्वयं को चंदात्रेय नामक व्यक्ति का वंशज मानते हैं। इसी से ये चन्देल कहलाते हैं। प्रारम्भ में चंदेल, प्रतिहारों के सामन्त के रूप में शासन करते थे। बाद में स्वतन्त्र रूप से शासन करने लगे।

यशोवर्मन: इस वंश का प्रथम स्वतन्त्र शासक यशोवर्मन था। उसने कालिंजर पर अधिकार स्थापित कर लिया और महोबा को राजधानी बना कर वहीं से शासन करना आरम्भ किया। राजपूताना के इतिहास में कालिंजर दुर्ग का बहुत बड़ा महत्त्व है। यशोवर्मन ने कन्नौज के राजा को भी युद्ध में परास्त किया। उसका शासन काल 925 ई. से 950 ई. तक माना जाता है।

धंग: यशोवर्मन के बाद उसका पुत्र धंग शासक हुआ। उसने उत्तर तथा दक्षिण के कई राज्यों पर विजय प्राप्त की। उसके शासन काल में खजुराहो में बहुत से मन्दिर बने।

गण्ड: धंग के बाद उसका पुत्र गण्ड शासक हुआ। 1008 ई. में उसने महमूद गजनवी के विरुद्ध आनन्दपाल शाही की सहायता की। चूंकि कन्नौज के राजा राज्यपाल ने महमूद की अधीनता स्वीकार कर ली थी इसलिये गण्ड ने राज्यपाल को दण्ड देने के लिए कन्नौज पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में राज्यपाल परास्त हुआ और मारा गया। राज्यपाल की मृत्यु का बदला लेने के लिए महमूद ने गण्ड पर आक्रमण कर दिया। विवश होकर गण्ड को महमूद की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी।

परमार्दी: परमार्दी इस वंश का अन्तिम शक्तिशाली शासक था। 1203 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने कालिंजर पर अधिकार कर लिया। विवश होकर परमार्दी को मुसलमानों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी। इस वंश के राजा सोलहवीं शताब्दी तक बुन्देलखण्ड के कुछ भाग पर शासन करते रहे।

परमार वंश

परमार वंश का उदय नौवीं शताब्दी के आरम्भ में आबू पर्वत के निकट हुआ था।

कृष्णराज (उपेन्द्र): इस वंश का संस्थापक कृष्णराज (उपेन्द्र) था। वह राष्ट्रकूटों का सामन्त था। प्रारम्भ में परमार लोग गुजरात में निवास करते थे परन्तु बाद में वे मालवा चले गये और वहीं पर स्वतन्त्र रूप से शासन करने लगे।

श्रीहर्ष: इस वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक श्रीहर्ष था। इस वंश का दूसरा प्रतापी शासक मुंज था। उसने 974 ई. से 995 ई. तक शासन किया। वह बड़ा ही विद्यानुरागी था। वह स्वयं उच्च कोटि का कवि तथा विद्वानों का आश्रयदाता था।

भोज: परमार वंश का सबसे प्रतापी तथा विख्यात राजा भोज था। उससे 1018 से 1060 ई. तक शासन किया। सर्वप्रथम उसने कल्याणी के चालुक्य राजा को परास्त किया। उसने अन्य राजाओं के साथ भी सफलतापूर्वक युद्ध किया। भोज अपनी विजयों के लिए उतना प्रसिद्ध नहीं है, जितना अपने विद्यानुराग तथा दानशीलता के लिए। कहा जाता है कि वह कवियों को एक-एक श्लोक की रचना के लिए एक-एक लाख मुद्राएँ दान में देता था। वह धारा नगरी के राजा के नाम से प्रसिद्ध है।

उदयादित्य: परमार वंश का अन्तिम शक्तिशाली शासक उदयादित्य था जिसने 1059 ई. से 1088 ई. तक शासन किया। चौदहवीं शताब्दी के आरंभ में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति ऐनुलमुल्क ने मालवा पर विजय प्राप्त कर उसे खिलजी साम्राज्य में मिला लिया।

गुजरात अथवा अन्हिलवाड़ा के चालुक्य

चालुक्यों की इस शाखा का उदय गुजरात में हुआ था। इन्हें चौलुक्य तथा सोलंकी भी कहा जाता है। दक्षिण के चालुक्यों तथा गुजरात के चालुक्यों के पूर्वज एक ही माने जाते हैं।

मूलराज: इस वंश का संस्थापक मूलराज था जिसने 941 ई. से 995 ई. तक शासन किया। सोलंकियों की राजधानी अन्हिलवाड़ा थी।

भीम (प्रथम): इस वंश का दूसरा शक्तिशाली राजा भीम (प्रथम) था। उसे महमूद गजनवी के आक्रमण का सामना करना पड़ा। 1025 ई. में महमूद गजनवी ने सोमनाथ के मन्दिर पर चढ़ाई की। भीम भयभीत होकर भाग खड़ा हुआ। महमूद ने मन्दिर को लूट लिया। महमूद के चले जाने पर भीम ने अपनी स्थिति सुधारने का प्रयत्न किया।

जयसिंह सिद्धराज: इस वंश का सबसे प्रतापी राजा जयसिंह सिद्धराज था। उसने 1096 ई. से 1143 ई. तक शासन किया। उसने सिहासंन पर बैठते ही पड़ौसी राज्यों को जीतना आरम्भ किया। उसने सौराष्ट्र को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। उसने चौहान शासक को भी युद्ध में परास्त किया। उसका परमार राजाओं के साथ बहुत दिनों तक संघर्ष चला। अंत में उसने सम्पूर्ण मालवा पर अधिकार कर लिया। सिद्धराज ने बुन्देलखण्ड पर आक्रमण किया परन्तु चंदेल राजा ने उसे परास्त कर दिया। सिद्धराज भगवान शिव का उपासक था। उसने बहुुत से मन्दिर बनवाये। साहित्य से भी उसे बड़ा प्रेम था।

भीम (द्वितीय): इस वंश का अन्तिम शक्तिशाली शासक भीम (द्वितीय) था। उसके शासन काल में मुहम्मद गोरी ने गुजरात पर आक्रमण किया। 1197 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने अन्हिलवाड़ा पर अधिकार कर लिया। इसके एक सौ वर्ष बाद 1297 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने गुजरात को जीत कर अपने राज्य में मिला लिया।

कलचुरि वंश

इस वंश का उदय नर्मदा तथा गोदावरी नदियों के मध्य के प्रदेश में हुआ। ये लोग अपने को हैहय क्षत्रियों के वंशज मानते हैं। इनकी राजधानी त्रिपुरी थी जो वर्तमान जबलपुर के निकट स्थित है। प्रारम्भ में ये लोग प्रतिहार वंश की अधीनता में शासन करते थे परन्तु जब प्रतिहार वंश का पतन आरम्भ हुआ तब दसवीं शताब्दी के मध्य में इन लोगों ने अपने को स्वतन्त्र कर लिया। इस वंश का संस्थापक कोकल्ल नामक व्यक्ति माना जाता है। इस वंश का सर्वाधिक प्रतापी स्वतंत्र शासक लक्ष्मणराज था। वह महान् योद्धा तथा वीर विजेता था। मालवा के परमार तथा कालिंजर के चंदेल राजाओं के साथ इस वंश का निरन्तर संघर्ष चलता रहा। इससे यह राज्य अधिक उन्नति न कर सका और तेरहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में इसका अन्त हो गया।

पाल वंश

इस वंश का उदय बंगाल में आठवीं शताब्दी के प्रथम चरण में हुआ। चूँकि इस वंश के समस्त राजाओं के नाम के साथ पाल शब्द जुड़ा हुआ है, इसलिये इसे पाल वंश कहा जाता है। हर्ष की मृत्यु के उपरान्त, बंगाल में जब भंयकार अराजकता फैल गई तब उसे दूर करने के लिए जनता ने गोपाल नामक व्यक्ति को 725 ई. में अपना राजा चुन लिया। गोपाल सफल शासक सिद्ध हुआ। उसने बंगाल की अराजकता को दूर कर वहाँ पर शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित की और बिहार पर भी अधिकार कर लिया। उसने लगभग 45 वर्षों तक शासन किया।

धर्मपाल: गोपाल के बाद उसका पुत्र धर्मपाल शासक हुआ। उसे अपने शासन काल में प्रतिहारों तथा राष्ट्रकूटों के साथ कई बार युद्ध करने पड़े। धर्मपाल साहित्य तथा कला का बड़ा प्रेमी था। उसने भागलपुर के पास गंगा नदी के किनारे विक्रमशिला विहार बनवाया जो विख्यात विश्वविद्यालय बन गया।

 देवपाल: धर्मपाल के बाद 815 ई. में उसका पुत्र देवपाल राजा हुआ। वह शक्तिशाली शासक था। उसने आसाम तथा उड़ीसा पर अधिकार कर लिया। उसने बर्मा, सुमात्रा, जावा आदि के साथ भी कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित किया था।

अन्य शासक: देवपाल के बाद इस वंश में नारायणपाल, महिपाल, विग्रहपाल आदि कई शक्तिशाली राजा हुए। इस वंश का अन्तिम शक्तिशाली शासक रामपाल था। वह बड़ा ही उदार तथा दयालु शासक था। रामपाल के उत्तराधिकरी बड़े निर्बल सिद्ध हुए और वे पाल-वंश को पतनोन्मुख होने से नहीं बचा सके। पूर्व से सेनवंश ने और पश्चिम से गहड़वाल वंश ने इन्हें दबा लिया और इनका विनाश कर दिया।

सेन वंश

पाल वंश के विनाश के उपरान्त बंगाल में सेन वंश का उदय हुआ। इस वंश के राजाओं के नाम के साथ सेन शब्द जुड़ा है, इसलिये इस वंश को सेन वंश कहा जाता है।

सामंतसेन: इस वंश का संस्थापक सामन्त सेन था। उसने ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य में उड़ीसा में सुवर्ण रेखा नामक नदी के तट पर अपने राज्य की स्थापना की।

विजयसेन: इस वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक विजयसेन था जिसने 1095 ई. से 1158 ई. तक शासन किया। वह वीर विजेता था। उसने पाल वंश के मदनपाल को परास्त किया और पालों को उत्तरी भारत से मार भगाया। उसने पूर्वी बंगाल तिरहुत, आसाम तथा कंलिग पर भी अधिकार जमा लिया।

बल्लालसेन: विजयसेन के बाद उसका पुत्र बल्लालसेन शासक हुआ। वह भी वीर तथा साहसी शासक था। वह उच्चकोटि का विद्वान् तथा लेखक भी था।

लक्ष्मणसेन: इस वंश का अन्तिम शक्तिशाली शासक लक्ष्मणसेन था। उसके शासन काल के अन्तिम भाग में आन्तरिक उपद्रव के कारण दक्षिण तथा पूर्वी बंगाल में छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्य स्थापित हो गये। तुर्को के आक्रमणों ने भी सेन वंश की जड़ को हिला दिया। लगभग 1260 ई. तक लक्ष्मणसेन के वंशज बंगाल में शासन करते रहे। अन्त में मुसलमानों ने इस वंश का अन्त कर दिया।

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