Tuesday, June 25, 2024
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अध्याय – 30 : राजपूतकालीन भारत

राजपूत काल का भारत के इतिहास में बहुत बड़ा महत्त्व है। राजपूतों ने लगभग साढ़े पांच शताब्दियों तक अदम्य उत्साह के साथ मुस्लिम आक्रांताओं से देश की रक्षा की। यद्यपि वे अन्त में अपने देश की स्वतंत्रता की रक्षा न कर सके परन्तु उनके त्याग, उनके देशप्रेम, उनके साहस तथा उनके उच्चादर्श की कहानियां अमर हो गईं।

राजनीतिक दशा

राजपूत काल भारत की राजनीतिक विच्छिन्नता का युग था। उस काल में देश के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे राजपूत राज्यों की स्थापना हो गई थी। इन राजपूत राज्यों में अनेक ऐसे थे, जो बड़े ही शक्तिशाली थे परन्तु देश में ऐसी कोई सार्वभौम सत्ता नहीं थी जो सबको एक सूत्र में बांध सकती और संकट काल में विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा उपस्थित कर सकती। इस राजनैतिक एकता के अभाव में भारत अशक्त होता जा रहा था।

इस काल की राजनैतिक विच्छिन्नता पर प्रकाश डालते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘भारतवर्ष में राजनीतिक एकता और सामाजिक संगठन की कमी थी। उसके सैकड़ों नेता थे और आपस के छोटे-छोटे झगड़ों में वह अपनी शक्ति को नष्ट कर रहा था। वस्तुतः इस काल में वह केवल भौगोलिक अभिव्यंजना ही रह गया था। यह बड़ी ही दुःखद स्थिति थी, जिसमें वह उस समय असहाय हो गया जब उसे विदेशियों के साथ जीवन-मरण का युद्ध करना पड़ा, जिन्होंने बढ़ती हुई संख्या में उसकी सुन्दर और उपजाऊ भूमि पर आक्रमण किया।

राजपूतकाल में न केवल भारत की राजनैतिक एकता समाप्त हो गई अपितु पारस्परिक कलह तथा ईर्ष्या-द्वेष भी बहुत बढ़ गया था। प्रत्येक राज्य अपने पड़ौसी राज्य के विरुद्ध संघर्ष करता था और उसे नीचा दिखाना चाहता था। पारस्परिक संघर्ष के फलस्वरूप राजपूतों की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण हाती जा रही थी। उनके संघर्ष प्रायः आनुवांशिक हो जाते थे और संघर्ष कई पीढ़ियों तक चलता रहता था। आन्तरिक कलह के कारण विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा उपस्थित करना सम्भव न हो सका। इस काल की राजनीतिक दशा का चित्रण करते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘नेतृत्व के लिए एक राज्य दूसरे से लड़ रहा था और कोई ऐसी सार्वभौम सत्ता नहीं थी, जो उन्हें एकता के सिद्धान्त द्वारा संगठित रख सकती।’

राजपूत कालीन राज-संस्था राजतंत्रात्मक तथा आनुवंशिक थी। इससे प्रायः बड़े ही अयोग्य तथा निर्बल शासक सिंहासन पर आ जाते थे, जो न अपने पूर्वजों के राज्य को सुसंगठित रख पाते थे और न उनमें विदेशी आक्रमणकारियों से सफलतापूर्वक लोहा लेने की क्षमता होती थी। ऐसी दशा में उनका विध्वंस हो जाना अनिवार्य हो जाता था। राजपूतकालीन शासन व्यवस्था स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश थी। इसलिये जनसाधारण की राजनीति में कोई विशेष रुचि नहीं थी। प्रजा की राजनीतिक उदासीनता राज्य के लिए बड़ी हानिकारक सिद्ध हुई।

राजपूत युग में सामन्तीय प्रथा का प्रचलन था। प्रायः जब शक्तिशाली राज्य अपने पड़ौसी राज्यों पर विजय प्राप्त कर लेते थे तब उन्हें समाप्त नहीं कर देते थे वरन् उन्हें अपना सामन्त बनाकर छोड़ देते थे। ये सामन्त अपने राजा की अधीनता में शासन करते थे और युद्ध के समय धन तथा सेना में उसकी सहायता करते थे परन्तु इन सामन्तों की स्वामिभक्ति बड़ी संदिग्ध रहती थी और वे प्रायः स्वतंत्र होने का प्रयत्न करते रहते थे।

अत्यंत प्रचीन काल से उत्तर-पश्चिम के पर्वतीय भागों से भारत पर विदेशियों के आक्रमण हो रहे थे परन्तु कभी भी उत्तर-पश्चिम सीमा की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं की गई। राजपूत युग में भी सीमान्त प्रदेश की सुरक्षा का कोई प्रबंध नहीं किया गया। न तो उस प्रदेश की किलेबन्दी की गई और न वहाँ पर स्थायी सेनाएं रखी गईं। पश्चिमोत्तर प्रदेश में अनेक छोटे-छोटे राज्य विद्यमान थे, जो विदेशी आक्रमणकारियों के आक्रमण की बाढ़ को रोकने में सर्वथा अशक्त थे। विदेशी आक्रमणकारियों को पर्वतीय भागों को पार कर भारत में प्रवेश करने में कोई कठिनाई नहीं होती थी और एक बार जब वे देश में घुस आते थे तब उनका मार्ग साफ हो जाता था।

सामाजिक दशा

राजपूतकालीन समाज में विभिन्न प्रकार के दोष उत्पन्न हो गये थे। अब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के अतिरिक्त अनेक उपजातियां उत्पन्न हो गई थीं और जाति-प्रथा के बन्धन अत्यंत कठोर हो गये थे। अब ऊँच-नीच का भेदभाव और अस्पृश्यता जैसी बुराइयां बहुत बढ़ गयी थीं। समाज में शूद्रों की दशा बड़ी शोचनीय हो गई। वे घृणा की दृष्टि से देखे जाते थे। इस कारण जब भारत पर मुसमानों के आक्रमण हुए और उनके पैर यहाँ जम गये तब उन्होंने बहुत बड़ी संख्या में निम्नवर्ग के हिन्दुओं को इस्लाम धर्म में सम्मिलित कर लिया क्योंकि इस्लाम धर्म में ऊँच-नीच तथा छुआछूत की भावना बहुत कम थी।

राजपूत कालीन समाज में हिन्दुओं का दृष्टिकोण उतना व्यापक तथा उदार नहीं था, जितना वैदिक एवं उत्तर वैदिक काल में था। जाति प्रथा के बंधन दृढ़ होने के कारण अब भारतीय समाज में विदेशियों को आत्मसात करने की क्षमता समाप्त हो गई थी। राजपूत युग के पूर्व यूनानी, शक, कुषाण, हूण आदि जितनी जातियां भारत में प्रविष्ट हुई थीं, उन सबको भारतीयों ने अपने में आत्मसात कर लिया था। वे सब कालान्तर में भारतीयों में घुल-मिल गई थीं और अपने अस्तित्त्व को खो बैठी थीं परन्तु हिन्दू, मुसलमानों को आत्मसात न कर सके। मुसलमानों के पूर्व जो जातियां भारत में आईं, उनका एक मात्र उद्देश्य भारत पर विजय प्राप्त कर अपना शासन स्थापित करना था। उनकी कोई निश्चित सभ्यता तथा संस्कृति नहीं थी और न वे उसका प्रचार करना चाहते थे। इसलिये वे भारतवर्ष की सभ्यता तथा संस्कृति से आकृष्ट हुए और उसके रंग में रंग गये। राजनीतिक सत्ता समाप्त हो जाने पर वे भारतीयों में घुल-मिल गये और अपने अस्तित्त्व को खो बैठे परन्तु मुसलमानों की अपनी निश्चित सभ्यता तथा संस्कृति थी और वे उसका प्रचार करने के लिए दृढ़ संकल्प थे।

मुसलमान आक्रमणकारियों का लक्ष्य राज्य तथा सम्पत्ति प्राप्त करने के साथ-साथ इस्लाम का प्रचार करना भी था। इसलिये मुसलमानों के हिन्दू संस्कृति में आत्मसात हो जाने का कोई प्रश्न ही नहीं था। यहाँ तो हिन्दू-धर्म तथा हिन्दू-सभ्यता स्वयं बहुत बड़े संकट में पड़ी थी और उसे अपनी रक्षा का उपाय ढँूढना था। फलतः हिन्दुओं ने जाति-प्रथा के बन्धनों को अत्यंत जटिल बना दिया और अपनी शुद्धता और पवित्रता पर बल देना आरम्भ किया। उन्होंने मुसलमानों को म्लेच्छ कहा और उन्हें स्पर्श करना महापाप बताया। हिन्दुओं की यह संकीर्णता अपनी परिस्थितियों के अनुकूल थी और अपने धर्म तथा अपनी सभ्यता एवं संस्कृति की रक्षा के लिए की गई थी परन्तु इसके भावी परिणाम अच्छे न हुए, क्योंकि हिन्दुओं तथा मुसलमानों के बीच एक ऐसी खाई उत्पन्न हो गई जो कभी पाटी न जा सकी।

राजपूत युग के भारतीय समाज में राजपूत जाति का एक विशिष्ट स्थान है। जिस प्रदेश में वे अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए चले गए और निवास करने लगे, उसका नाम राजपूताना पड़ गया। राजपूत जाति अपने विशिष्ट गुणों तथा उच्च आदर्शों के कारण समाज में आदर की दृष्टि से देखी जाती थी। राजपूतों में उच्चकोटि का आत्माभिमान था। वे अपनी आन पर सहर्ष जान दे देते थे। उनमें कुलाभिमान भी उच्चकोटि का था। अपने कुल की मर्यादा की रक्षा के लिए वे सर्वस्व निछावर करने के लिए उद्यत रहते थे। राजपूत योद्धा अपने वचन के बड़े पक्के होते थे और अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहते थे। रणप्रिय होते हुए भी वे उदार होते थे और तन-मन-धन से शरणागत की रक्षा करते थे। दान-दक्षिणा देने में उनकी उदारता तथा सहृदयता सीमा का उल्लंघन कर जाती थी। राजपूतों के गुणों की प्रशंसा करते हुए टॉड ने लिखा है- ‘उच्चकोटि का साहस, देशभक्ति, स्वामिभक्ति, आत्मसम्मान, अतिथिसत्कार तथा सरलता के गुण राजपूतों में पाये जाते हैं।’

राजपूत काल में स्त्रियों को बड़े आदर की दृष्टि से देखा जाता था। राजपूत रमणियों की प्रशंसा करते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘राजपूत लोग अपनी स्त्रियों का आदर करते थे। यद्यपि जन्म से मृत्यु तक उनका जीवन भयंकर कठिनाइयों का होता था तथापि संकट काल में वे अद्भुत साहस तथा दृढ़ संकल्प का प्रदर्शन करती थीं और ऐसी वीरता का कार्य सम्पन्न करती थीं जो विश्व के इतिहास में अद्वितीय है।’ राजपूत युद्ध काल में भी कभी स्त्रियों पर हाथ नहीं उठाता था और वह उसके सतीत्व को आदर की दृष्टि से देखता था। इस युग में पर्दे की प्रथा नहीं थी। स्त्रियों को बाहर जाने की स्वतन्त्रता थी परन्तु मुसलमानों के आगमन से पर्दा आरम्भ हो गया। स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा पर भी ध्यान दिया जाता था। इस काल की राजपूत स्त्रियों के आदर्श पुरुषों की भाँति बड़े ऊँचे थे। उनका पतिव्रत धर्म प्रशंसनीय था। वे अपने पति के मृत शरीर के साथ चिता में सहर्ष जल कर भस्म हो जाती थीं। इससे इस युग में सती-प्रथा का प्रचलन बहुत बढ़ गया था। राजपूतों में स्वयंवर की भी प्रथा थी परन्तु अन्य जातियों में माता-पिता ही कन्या दान करते थे। राजवंशों में भी बहु-विवाह की प्रथा का प्रचलन था, यद्यपि स्वजातीय विवाह अच्छे समझे जाते थे परन्तु यदा-कदा अन्तर्जातीय विवाह भी हो जाया करते थे।

राजपूत काल में राजपूतों में जौहर की प्रथा का प्रचलन था। जब राजपूत योद्धा अपने दुर्गों में शत्रुओं से घिर जाते थे और बचने की कोई आशा नहीं रह जाती थी तब वे केसरिया वस्त्र पहनकर और नंगी तलवार लेकर निकल पड़ते थे और शत्रु से लड़कर अपने प्राण खो देते थे। उनकी स्त्रियाँ चिता में बैठकर अपने को अग्नि में समर्पित कर देती थीं और इस प्रकार अपने सतीत्व की रक्षा करती थीं।

धार्मिक दशा

प्राचीन क्षत्रियों की भांति राजपूत, ब्राह्मण धर्म में पूर्ण विश्वास रखते थे। अधिकांश राजपूत राजवंशों ने ब्राह्मण धर्म को प्रश्रय दिया। इस काल में कुमारिल, शंकराचार्य, रामानुज आदि आचार्यों ने ब्राह्मण धर्म का खूब प्रचार किया। कुमारिल भट्ट ने वेदों की प्रामाणिकता को न मानने वाले बौद्ध धर्म का खण्डन किया। शंकराचार्य ने अद्वैतवाद अर्थात् ‘जीवात्मा तथा परमात्मा एक है, के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। शंकराचार्य ने उपनिषदों को आधर बनाकर वैदिक-धर्म का खूब प्रचार किया और बौद्ध धर्म के प्रभाव को समाप्त सा कर दिया। शंकराचार्य ने भारत के चारों कोनों अर्थात् बद्रीनाथ, द्वारिका, रामेश्वरम् तथा जगन्नाथपुरी में चार मठ स्थापित किये। रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वेतवाद का समर्थन किया जिसका यह तात्पर्य है कि ब्रह्म, जीव तथा जगत् मूलतः एक होने पर भी क्रियात्मक रूप में एक-दूसरे से भिन्न हैं और कुछ विशिष्ट गुणों से युक्त हैं। इस युग के प्रमुख देवता विष्णु तथा शिव थे। इस युग में वैष्णव तथा शैव धर्म का खूब प्रचार हुआ। दक्षिण भारत में लिगांयत सम्प्रदाय का खूब प्रचार हुआ। ये लोग शिवलिंग की पूजा किया करते थे। इस काल में शक्ति की भी पूजा प्रचलित थी। शक्ति के पूजक दुर्गा तथा काली की पूजा किया करते थे। तान्त्रिक सम्प्रदाय की भी इस युग में अभिवृद्धि हुई। ये लोग जादू-टोना भूत-प्रेत तथा मन्त्र-तन्त्र में विश्वास करते थे। इस प्रकार अन्धविश्वास का प्रकोप बढ़ रहा था।

राजपूत राजाओं के युद्ध प्रिय होने के कारण राजपूत काल बौद्ध धर्म के पतन का काल था। इस धर्म का तान्त्रिक धर्म से बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध हो गया था। इसका भिक्षुओं पर बड़ा प्रभाव पड़ा। कुमारिल तथा शंकराचार्य ने भी बौद्ध धर्म का खण्डन करके उसे बड़ी क्षति पहुँचाई। विदेशी आक्रमणकारियों ने तो बौद्ध धर्म को बिल्कुल नष्ट-भ्रष्ट कर दिया और वह अपनी जन्मभूमि में उन्मूलित प्रायः हो गया।

राजपूत काल में जैन धर्म बड़ी ही अवनत दशा में था। इसका प्रचार दक्षिण भारत में सर्वाधिक था। इसे पश्चिम में चौलुक्य राजाओं का संरक्षण प्राप्त था परन्तु वहां भी बारहवीं शताब्दी में लिंगायत सम्प्रदाय का प्रचार हो जाने से जैन धर्म को बड़ी क्षति पहुँची परन्तु जैन धर्म का समूल विनाश नहीं हुआ। वह धीरे-धीरे ब्राह्मण धर्म के सन्निकट आता गया और आज भी अपने अस्तित्त्व को बनाए हुए है।

साहित्य

राजपूत काल में साहित्य की बड़ी उन्नति हुई। इस काल में संस्कृत भाषा की भी बड़ी उन्नति हुई। इस काल में वह साहित्य की भाषा बनी रही परन्तु संस्कृत के साथ-साथ प्रान्तीय भाषाओं का भी विकास हुआ। हिन्दी, बँगला, गुजराती आदि भाषाओं में भी साहित्य की रचना होने लगी। इस युग में देश में कई शिक्षण संस्थाओं की स्थापना हुई। विक्रमशिला विश्वविद्यालय का विकास इसी युग में हुआ।

अनेक राजपूत शासक साहित्यानुरागी थे। वे साहित्यकारों के आश्रयदाता भी थे। वे कवियों तथा विद्वानों को दान तथा पुरस्कार देने में बड़े उदार तथा सहृदय थे। इस युग में ऐसे अनेक राजा हुए जो स्वयं उच्चकोटि के विद्वान् तथा कवि थे। इनमें वाक्पतिराज, मंुज, भोज, विग्रहराज आदि प्रमुख हैं। राजपूत राजाओं के दरबार में अनेक कवियों को आश्रय प्राप्त था। कन्नौज के राजा महेन्द्रपाल के दरबार में राजशेखर नामक कवि रहता था जिसने प्राकृत भाषा में ‘कर्पूर-मंजरी’ नामक ग्रन्थ लिखा था। बंगाल के राजा लक्ष्मणसेन के दरबार में जयदेव नामक कवि को आश्रय प्राप्त था, जिसने ‘गाीतगोविन्द’ नामक ग्रन्थ की रचना की। काश्मीर में कल्हण ने ‘राजतरंगिणी’ की और सोमदेव ने ‘कथा-सरित-सागर’ की रचना की। चारण कवियों में चन्दबरदाई का नाम अग्रगण्य है, जो पृथ्वीराज चौहान के दरबार में रहता था। उसने ‘पृथ्वीराज रासो’ नामक ग्रन्थ की रचना की। भवभूति इस काल का सबसे प्रसिद्ध नाटककार था, जिसने ‘महावीर-चरित’, ‘उत्तर-रामचरित’ तथा ‘मालती-माधव’ नामक नाटकों की रचना की। कुमारिल भट्ट, शंकराचार्य तथा रामानुजाचार्य इस काल के प्रसिद्ध दार्शनिक थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं में तत्त्वों की विवेचना की। इस प्रकार राजपूत युग यद्यपि प्रधानतः संघर्ष तथा युद्धों का युग था परन्तु उनमें साहित्य की पर्याप्त उन्नति हुई ।

कला

राजपूत राजा कलानुरागी थे। राजपूत काल प्रधानतः युद्ध तथा संघर्ष का काल था इसलिये राजपूत राजाओं ने आत्मरक्षा के लिए अनेक सुदृढ़़ दुर्गों का निर्माण करवाया। रणथम्भौर, चितौड़, ग्वालियर आदि दुर्ग इसी काल में बने थे। राजपूत राजाओं को भवन बनवाने का भी बड़ा शौक था। इनमें ग्वालियर का मानसिंह का राजमहल, उदयपुर का हवामहल तथा जयपुर के अन्य महल प्रसिद्ध हैं। इस प्रकार इस युग में वास्तुकला की बड़ी उन्नति हुई। इस काल में मन्दिरों का खूब निर्माण हुआ। इस काल में उत्तरी भारत में जो मन्दिर बने उसके शिखर बड़े ऊँचे तथा नुकीले हैं। इनमें अंलकार तथा सजावट की अधिकता है परन्तु सुदूर दक्षिण में रथ तथा विमान के आकार के मन्दिर बने। ये अपेक्षाकृत सरल हैं। इस काल के बने हुए मन्दिरों में खजुराहो के मन्दिर, उड़ीसा में भुवनेश्वर का मन्दिर, काश्मीर का मार्त्तण्ड मन्दिर, अजन्ता के गुहा मन्दिर, एलोरा का कैलाश मन्दिर, आबू पर्वत के जैन मन्दिर, तंजौर, काँची, मथुरा आदि के मन्दिर प्रसिद्ध हैं।

मन्दिर निर्माण के साथ-साथ इस काल में मूर्ति-निर्माण कला की भी उन्नति हुई। ब्राह्मण-धर्म के अनुयायियों ने शिव, विष्णु शक्ति, सूर्य, गणेश आदि की मूर्तियों का, बौद्ध धर्मावलम्बियों ने बुद्ध तथा बोधिसत्वों की मूर्तियों का और जैनियों ने तीर्थंकरों की मूर्तियों का निर्माण कराया। चित्रकारी का भी कार्य उन्नत दशा में था। गायन, वादन, अभिनय तथा नृत्य आदि कलाओं का भी इस युग में पर्याप्त विकास हुआ।

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