Saturday, May 25, 2024
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101. लाल किले को बंदासिंह बैरागी के रूप में नया दुश्मन मिल गया!

हम पूर्व में चर्चा कर आए हैं कि औरंगजेब ने गुरु गोविंदसिंह को समझौते के लिए दक्षिण भारत में आमंत्रित किया था किंतु जब गुरु गोविंदसिंह दक्षिण में पहुंचे तो उन्हें ज्ञात हुआ कि 3 मार्च 1707 को औरंगजेब की मृत्यु हो गई है। अतः गुरु की औरंगजेब से भेंट नहीं हो सकी।

औरंगजेब की मृत्यु के बाद 18 जून 1707 को उसके पुत्र मुअज्जमशाह एवं आजमशाह के बीच जजाऊ का युद्ध हुआ। इस लड़ाई में गुरु गोविन्द सिंह ने मुअज्जमशाह अर्थात् बहादुरशाह का साथ दिया जिसके कारण मुअज्जमशाह विजयी रहा। जब मुअज्जमशाह बहादुरशाह के नाम से बादशाह बन गया तब उसने गुरु गोविन्दसिंह को आगरा बुलवाया।

बहादुरशाह ने गुरु को एक कीमती सिरोपाव और एक धुकधुकी भेंट की जिसकी कीमत 60 हजार रुपए थी। सिरोपाव में एक कीमती चोगा होता था तथा धुकधुकी गर्दन में पहनने का मर्दाना गहना होता था।

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इस बात की प्रबल संभावना थी कि बहादुरशाह तथा गुरु गोविंदसिंह के बीच कोई स्थाई समझौता हो जाएगा। अभी बात चल ही रही थी कि बहादुरशाह को अपने भाई कामबख्श के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए दक्षिण भारत की तरफ जाना पड़ा। बहादुरशाह ने गुरु गोविंदसिंह से अनुरोध किया कि वे भी उसके साथ चलें। बादशाह के निमंत्रण पर गुरु गोबिंदसिंह एक बार फिर दक्षिण भारत के लिए रवाना हो गए।

जब सरहिंद के सूबेदार को ज्ञात हुआ कि गुरु गोबिंदसिंह बहादुरशाह के साथ दक्षिण भारत को जा रहे हैं तो उसने गुरु की हत्या करवाने की योजना बनाई। उसने जमशेद खाँ तथा वसील बेग नामक दो अफगानों को गुरु गोविंदसिंह की हत्या के लिए नियुक्त किया। जब गुरु गोविंदसिंह का शिविर गोदावरी नदी के तट पर नांदेड़ नामक स्थान पर लगा हुआ था, तब इन अफगानियों ने धोखे से गुरु के शिविर में प्रवेश करके उन पर घातक प्रहार किया जिससे गुरु बुरी तरह घायल हो गए।

गुरु की छाती पर हृदय से ठीक नीचे गहरा घाव लगा किंतु गुरु ने अपनी कटार निकालकर उसी समय हमलावर का काम तमाम कर दिया। हमलावर के साथी ने भागने का प्रयास किया किंतु उसे गुरु के अंगरक्षकों ने मार डाला।

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जब गुरु रोगशैय्या पर थे, तब माधवदास नामक एक अड़तीस वर्षीय बैरागी, गुरु के दर्शनों के लिए आया। वह काश्मीर के पंुछ जिले का रहने वाला डोगरा राजपूत था तथा उसके बचपन का नाम लक्ष्मण देव था किंतु वह वैराग्य धारण करके माधवदास बैरागी बन गया था और नांदेड़ में ही एक आश्रम बनाकर रहता था। जब उसे ज्ञात हुआ कि कुछ अफगानी मुसलमानों ने गुरु गोविंदसिंह को छुरा मारकर घायल कर दिया है तो वह गुरु से मिलने के लिए उनके शिविर में आया।

माधवदास बैरागी ने गुरु गोविंदसिंह के सामने प्रतिज्ञा ली कि वह मुगलों द्वारा की गई गुरुपुत्रों की हत्या का बदला लेगा। गुरु गोविंदसिंह ने उस युवक के भीतर चमक रहे तेज को पहचाना तथा उसे अपना शिष्य बना लिया और उसका नाम गुरुबख्शसिंह रखा। गुरु गोविंदसिंह ने उससे कहा कि वह सिक्खों के राजनीतिक संघर्ष को जारी रखे। माधवदास बैरागी, गुरु गोविंदसिंह की बातों से इतना अधिक प्रभावित हुआ कि उसने स्वयं को गुरु का बन्दा कहना आरम्भ कर दिया। तब से उसका नाम बन्दा बहादुर पड़ गया। इतिहास की पुस्तकों में उसे बंदासिंह बैरागी भी लिखा गया है।

गुरु ने बन्दा बहादुर को सिक्खों की सुरक्षा का दायित्व सौंपा तथा अपने पाँच मुख्य अनुयायी एवं कुछ अन्य अनुयाइयों के साथ पंजाब जाने का आदेश दिया। बन्दा जब दिल्ली पहुँचा तब उसे समाचार मिला कि 7 अक्टूबर 1708 को गुरु गोविंदसिंह का नांदेड़ में निधन हो गया।

गुरु गोविन्दसिंह की मृत्यु के साथ भारतीय संस्कृति के एक महत्वपूर्ण अध्याय की समाप्ति हो जाती है। भारत भूमि गुरु गोविंदसिंह की सेवाओं के प्रति युगों तक कृतज्ञ रहेगी। उन्होंने चण्डी शतक लिखकर अपनी भगवत्भक्ति का परिचय दिया तथा गुरुग्रंथ साहिब को नए सिरे से संकलित करवाकर भारत के महत्वपूर्ण भक्त-कवियों की रचनाओं को मानव मात्र के लिए सुलभ करवाया।

गुरु गोबिंदसिंह ने पिछले गुरुओं के समय से चली आ रही सिक्ख परम्पराओं में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। उन्होंने सिक्खों में गुरु बनाने की प्रथा को समाप्त कर दिया और कहा कि जहाँ भी पाँच सिक्ख एकत्रित होंगे, वहाँ मैं उपस्थित रहूँगा। इस प्रकार, उन्होंने सिक्ख सम्प्रदाय के हितों के बारे में निर्णय करने का अधिकार सिक्ख पंचायत को सौंप दिया। गुरु गोविंदसिंह ने कहा- ‘सब सिक्खन को हुकुम है, गुरु मानियो ग्रंथ!’ कुछ लोग इसे इस प्रकार भी कहते हैं– ‘गुरु मानो ग्रंथ, प्रगट गुरु दी देह!’

गुरु गोविन्दसिंह ने सिक्खों को पूर्णतः सैनिक समुदाय बनाया और खालसा पंथ तथा खालसा सेना की स्थापना की। उन्होंने जीवन भर मुगलों से संघर्ष किया। बंदा बैरागी ने गुरु गोविंदसिंह का आदेश मानकर सिक्खों को नेतृत्व प्रदान किया। उसने सिक्खों को गुरु का संदेश पहुँचाया और मुगलों के अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने का आह्नान किया। उसने सोनीपत से मुगल अधिकारियों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष आरम्भ किया तथा वहाँ के मुगल फौजदार को युद्ध में परास्त कर दिया।

इसके बाद बंदा बैरागी ने कैथल, समाना, शाहबाद, अम्बाला, मुस्तफाबाद, क्यूरी तथा सधौरा पर अधिकार कर लिया। अब बंदा बैरागी ने पंजाब क्षेत्र के प्रमुख सूबे सरहिन्द पर आक्रमण किया जहाँ के फौजदार वजीर खाँ ने गुरु के दो पुत्रों को जीवित ही दीवार में चिनवाया था। इस युद्ध में वजीर खाँ मारा गया। उसकी अपार सम्पत्ति बन्दा बैरागी के हाथ लगी। बन्दा बैरागी ने सरहिन्द के 28 परगने अपने अधीन कर लिये। बन्दा बैरागी की इन सफलताओं ने उसे अत्यन्त लोकप्रिय बना दिया।

मई 1710 में बंदा बैरागी के नेतृत्व में सिक्खों ने लाहौर एवं दिल्ली के बीच सतलुज नदी के दक्षिण में स्थित पंजाब का विशाल क्षेत्र जीत लिया। बंदा बैरागी ने गुरु गोबिन्द सिंह द्वारा संकल्पित खालसा राज्य की स्थापना की जिसकी राजधानी लोहगढ़ थी। बंदा बैरागी ने गुरु नानक देव और गुरु गोबिन्द सिंह के नाम के सिक्के ढलवाए।

सिक्खों द्वारा सरहिंद के सूबेदार वजीर खाँ को मार दिए जाने से बहादुरशाह के कान खड़े हुए। उसने अपने प्रमुख अमीरों को सिक्खों का दमन करने के लिए पंजाब की तरफ रवाना किया तथा वह स्वयं भी विशाल सेना लेकर पंजाब की तरफ चल पड़ा। दिसम्बर 1710 में मुगलों ने बन्दा बैरागी के मुख्य केन्द्र लौहगढ़ पर अधिकार कर लिया परन्तु बन्दा बैरागी वहाँ से भाग निकला। इससे पहले कि सिक्ख विद्रोह पूर्ण रूप से कुचल दिया जाता, फरवरी 1712 में बहादुरशाह की मृत्यु हो गई।

इसके बाद बन्दा बैरागी ने बिना कोई समय खोए, फिर से अपने राज्य के एक बड़े भाग पर अधिकार कर लिया और इसे उत्तर-पूर्व तथा पहाड़ी क्षेत्रों की ओर लाहौर और अमृतसर की सीमा तक विस्तृत कर लिया। बन्दा बैरागी ने सरहिन्द क्षेत्र से मुगल अधिकारियों को हटाकर सिक्ख अधिकारियों को नियुक्त किया। इस प्रकार उसने प्रथम सिक्ख राज्य की स्थापना की किंतु बन्दा बहादुर ने स्वयं न तो कोई पदवी धारण की और न कभी दरबार लगाया। उसने सभी कार्य गुरु के नाम से किये।

बहादुरशाह के बाद मुगलों की गद्दी पर बैठे अल्पकालिक मुगल बादशाह सत्ता के लिए हो रहे खूनी संघर्षों, दक्षिण भारत के विद्रोहों तथा राजपूतों के हमलों से निबटने में लगे रहे और वे सिक्खों की तरफ ध्यान नहीं दे सके। बंदा बहादुर ने मुगलों की कमजोरी का लाभ उठाते हुए पंजाब से बाहर निकलकर गंगा-यमुना दोआब में सहारनपुर और उसके निकट के क्षेत्रों तक आक्रमण किये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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