Wednesday, February 21, 2024
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100. कच्छवाहों, राठौड़ों और सिसोदियों ने लाल किले के विरुद्ध संघ बना लिया!

दिसम्बर 1608 में बहादुरशाह ने अपने छोटे भाई कामबख्श को समाप्त करने के लिए हैदराबाद पर अभियान किया था। जिस समय वह दिल्ली से हैदराबाद जा रहा था, तब वह मार्ग में कच्छवाहों की राजधानी आम्बेर में रुका। आम्बेर रियासत के सम्बन्ध में वह मन ही मन बड़ा निर्णय करके आया था जिसे अब वह कार्यान्वित करना चाहता था। इस घटना पर चर्चा करने से पहले मुगलों और कच्छवाहों की दोस्ती का संक्षिप्त इतिहास जानना आवश्यक है।

आम्बेर नरेश भारमल ने 6 फरवरी 1562 को बहादुरशाह के बाबा के बाबा शहंशाह अकबर से अपनी पुत्री हीराकंवर का विवाह करके मुगलों और कच्छवाहों की मैत्री की शुरुआत की थी। तब से लेकर बहादुरशाह के बादशाह बनने तक राजा भारमल की सात पीढ़ियां मुगल बादशाहों की सेवा करती आई थीं।

भारत के मुगलों की जमीनी सच्चाई यह थी कि उनकी सल्तनत का विस्तार आम्बेर के कच्छवाहों के कंधों पर बैठ कर ही किया गया था। ई.1658 में जब औरंगजेब बादशाह हुआ तो उसमें भी आम्बेर के मिर्जाराजा जयसिंह की सबसे बड़ी भूमिका थी किंतु कृतघ्न औरंगजेब ने अपने निष्ठावान मित्र मिर्जाराजा जयसिंह को ई.1667 में जहर देकर मरवाया था। उसके बाद रामसिंह और रामसिंह के बाद बिशनसिंह आम्बेर के राजा हुए।

ई.1700 में राजा बिशनसिंह की मृत्यु हो गई। राजा बिशनसिंह के दो पुत्र थे। इनमें से बड़े पुत्र का नाम विजयसिंह और छोटे पुत्र का नाम जयसिंह था, जयसिंह को चीमाजी भी कहते थे। जब 10 वर्ष की आयु में विजयसिंह पहली बार औरंगजेब के समक्ष ले जाया गया तो उसे देखते ही औरंगजेब को उसके बाबा मिर्जाराजा जयसिंह की याद आई। इसलिए औरंगजेब ने विजयसिंह का नाम जयसिंह रख दिया और उसके छोटे भाई चीमाजी उर्फ जयसिंह का नाम बदलकर विजयसिंह कर दिया।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

औरंगजेब ने 12 वर्ष के अल्पायु सवाई राजा जयसिंह को दक्खिन के मोर्चे पर बुला लिया। तब से लेकर औरंगजेब की मृत्यु होने तक यही जयसिंह आम्बेर का राजा था। जयसिंह ने औरंगजेब के लिए कई लड़ाइयां जीतीं जिनके कारण औरंगजेब ने जयसिंह को सवाई की उपाधि दी। इस कारण यह राजा इतिहास में सवाई जयसिंह तथा जयसिंह (द्वितीय) के नाम से जाना गया।

जब औरंगजेब के पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध हुआ तो सवाई जयसिंह का छोटा भाई चीमाजी अर्थात् विजयसिंह मुअज्जमशाह के साथ था। इसलिए चीमाजी ने इस युद्ध में बहादुरशाह का पक्ष लिया।

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जिस समय औरंगजेब की मृत्यु हुई उस समय आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह आजमशाह के पुत्र बेदारबख्त के साथ गुजरात में नियुक्त था। जब आजमशाह का पुत्र बेदारबख्त जजाऊ की लड़ाई लड़ने गया तो वह कच्छवाहा राजा सवाई जयसिंह को भी अपने साथ ले गया। इस कारण जजाऊ के युद्ध में जयसिंह को आजमशाह की तरफ से युद्ध लड़ना पड़ा था।

जजाऊ के युद्ध में आजमशाह तथा बेदारबख्त की मृत्यु हो गई तथा सवाई जयसिंह के भी बहुत से राजपूत सिपाही मारे गए। इस कारण सवाई जयसिंह के पास केवल 1000 सिपाही ही बचे। सवाई जयसिंह इन सिपाहियों को लेकर आम्बेर चला आया।

इस प्रकार बहादुरशाह की दृष्टि में सवाई जयसिंह ने दो अपराध किए थे। उसका पहला अपराध यह था कि वह जजाऊ के मैदान में आजमशाह की तरफ से तथा बहादुरशाह के खिलाफ लड़ने के लिए आया था तथा उसका दूसरा अपराध यह था कि सवाई जयसिंह युद्ध समाप्त होने के बाद बहादुरशाह के समक्ष उपस्थित होने के स्थान पर आम्बेर भाग आया था। इसलिए ई.1708 में बहादुरशाह दिल्ली से हैदराबाद जाते समय कच्छवाहों की राजधानी आम्बेर आया ताकि सवाई राजा जयसिंह को दण्डित किया जा सके। सवाई जयसिंह ने बहादुरशाह का स्वागत किया तथा उसे अपने महलों में रहने के लिए आमंत्रित किया।

बहादुरशाह ने कुछ दिनों तक आम्बेर के महलों में निवास किया तथा अपने पूर्वज शहंशाह अकबर द्वारा बनाई गई मस्जिद में बैठकर नमाज पढ़ी। इसके बाद बहादुरशाह ने जयसिंह का राज्य छीनकर आम्बेर का नाम मोमिनाबाद रख दिया तथा सवाई जयसिंह की जगह उसके छोटे भाई चीमाजी अर्थात् विजयसिंह को मोमिनाबाद का शासक बना दिया।

बहादुरशाह द्वारा की गई इस कार्यवाही के कारण सवाई जयसिंह मुगलों का मनसबदार बनकर रह गया। उसके पास अपना कोई राज्य नहीं था। सवाई जयसिंह की लगभग पूरी सेना जजाऊ के मैदान में समाप्त हो चुकी थी इसलिए वह बहादुरशाह का प्रतिरोध नहीं कर सका।

आम्बेर के राजा को सफलतापूर्वक हटा देने के बाद बहादुरशाह ने जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह के साथ भी एक गहरी चाल चली। उसने अजीतसिंह को मेड़ता नामक स्थान पर मिलने के लिए बुलवाया तथा वहाँ एक आम दरबार का आयोजन करके अजीतसिंह को साढ़े तीन हजार जात और तीन हजार सवारों का मनसब प्रदान करके उसे अपना मनसबदार बना लिया किंतु साथ ही साथ बहादुरशाह ने कपट का सहारा लेते हुए उसी समय जोधपुर में अपनी सेना भेजकर जोधपुर पर कब्जा कर लिया। इस प्रकार महाराजा अजीतसिंह भी बिना राज्य का हो गया किंतु महाराजा अजीतसिंह के पास भी इतनी सेना नहीं थी कि वह बहादुरशाह पर सीधा आक्रमण कर सके, इसलिए वह भी चुप रहा।

आम्बेर और मारवाड़ से निबटकर बहादुरशाह ने कामबख्श को समाप्त करने के लिए दक्खिन की ओर प्रस्थान किया तथा महाराजा जयसिंह और महाराजा अजीतसिंह को भी अपने साथ दक्खिन के मोर्चे पर चलने के निर्देश दिए। दोनों महाराजा अपना राज्य और कोष खो चुके थे इसलिए मन मारकर अपनी-अपनी सेनाओं को लेकर बहादुरशाह के साथ रवाना हुए किंतु मार्ग में जैसे ही बहादुरशाह ने नर्मदा नदी पार की, ये दोनों महाराजा, वीर दुर्गादास के साथ वापस राजपूताने को लौट आए तथा उदयपुर के महाराणा अमरसिंह के पास पहुंचे।

महाराणा अमरसिंह ने इन दोनों राजाओं का कई कोस आगे आकर स्वागत किया तथा उनकी हर तरह से सहायता करने का आश्वासन दिया। इसके बदले में अजीतसिंह तथा जयसिंह ने मेवाड़ के महाराणा को वचन दिया कि वे मुगलों से अपने सम्बन्ध तोड़ लेंगे तथा आज के बाद मुगलों की चाकरी नहीं करेंगे।

इस अवसर पर महाराणा अमरसिंह ने अपनी एक राजकुमारी का विवाह इस शर्त पर आम्बेर नरेश जयसिंह से कर दिया कि आम्बेर की राजकुमारी की कोख से उत्पन्न होने वाली लड़की का विवाह मुगल शहजादों से नहीं किया जाएगा तथा यदि मेवाड़ की राजकुमारी के गर्भ से पुत्र उत्पन्न हुआ तो वह आम्बेर का भावी राजा होगा।

मेवाड़ के महाराणा से नए सिरे से मित्रता स्थापित करने के बाद महाराजा अजीतसिंह तथा सवाई जयसिंह जोधपुर आए तथा उन्होंने जोधपुर पर आक्रमण करके जोधपुर के किलेदार मेहराब खाँ को भगा दिया और जोधपुर राज्य पर फिर से अधिकार कर लिया। इस सफलता के बाद दोनों मित्रों ने आम्बेर पर आक्रमण किया और चीमाजी को गद्दी से उतारकर सवाई जयसिंह को फिर से आम्बेर की गद्दी पर बिठा दिया। बयाना का मुगल सूबेदार हुसैन खान बारहा आम्बेर पर चढ़कर आया किंतु उसे भी मार दिया गया।

इस पूरी कार्यवाही के दौरान बहादुरशाह दक्खिन के अभियान में व्यस्त रहा अतः वह महाराजा अजीतसिंह तथा सवाई जयसिंह के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर सका। हालांकि कुछ समय बाद जब अजीतसिंह ने अजमेर पर अधिकार किया तो अजीतसिंह और जयसिंह की मित्रता भंग हो गई क्योंकि जयसिंह स्वयं अजमेर पर अधिकार करना चाहता था। इन दोनों राजाओं की दुश्मनी यहाँ तक बढ़ी कि आगे चलकर सवाई जयसिंह ने महाराजा अजीतसिंह की हत्या करवाई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohan Lal Gupta is a renowned historian from India. He has written more than 100 books on various subjects.

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