Monday, July 22, 2024
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सवाई जयसिंह

आम्बेर का राजा सवाई जयसिंह भारत के इतिहास में एक अद्भुत राजा हुआ है। उसने कम से कम पांच मुगल शासकों के काल में मुगलों की सेवा की तथा उनकी नाक के नीचे हिन्दू धर्म का उत्थान किया। जब भी लाल किला उजड़ता हुआ दिखाई दिया, तब ही सवाई जयसिंह ने लाल किले को संरक्षण प्रदान किया।

ई.1713 में जब फर्रूखसियर मुगलों का तख्त हथियाने में सफल हुआ, तब आम्बेर का राजा सवाई जयसिंह और जोधपुर का राजा अजीतसिंह उदयपुर के महाराणा अमरसिंह (द्वितीय) के साथ लाल किले के विरुद्ध एक संघ का निर्माण करने में सफल हुए थे।

इन दोनों राजाओं ने महाराणा को वचन दिया था कि वे भविष्य में मुगलों की नौकरी नहीं करेंगे तथा मुगलों को बेटी नहीं देंगे किंतु जब फर्रूखसियर के आदेश पर सैयद हुसैन अली खाँ ने अजमेर में राठौड़ों को पराजित किया तो अजीतसिंह को अपनी पुत्री इंद्रकुंवरी का विवाह बादशाह फर्रूखसियर से करना पड़ा।

इसी प्रकार जब फर्रूखसियर ने आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह को सात हजारी मनसब देकर उसे मालवा का सूबेदार बना दिया तो सवाई जयसिंह भी अपनी कसम भूलकर मुगलों की चाकरी करने लगा। उस समय मालवा में एक तरफ तो अफगान सरदार इनायत खाँ और दिलेर खाँ ने बगावत का झण्डा उठा रखा था तो दूसरी तरफ मराठे नर्मदा नदी को पार करके उत्तर भारत की ओर बढ़ने का प्रयास कर रहे थे।

फर्रूखसियर ने सवाई जयसिंह को सात हजार का मनसब दिया तो जयसिंह की बांछें लिख गईं। फर्रूखसियर के बाबा औरंगजेब ने अपने जीवन काल में सवाई जयसिंह को कभी डेढ़-दो हजार से अधिक का मनसब नहीं दिया था। यहाँ तक कि जयसिंह को नगाड़ा रखने की अनुमति भी नहीं थी।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

औरंगजेब ने एक पत्र के माध्यम से जयसिंह को आदेश दिया था कि- ‘वह धरती पर केवल सूजनी अर्थात् पतली दरी बिछाकर बैठा करे।’ उसी जयसिंह पर मुगल बादशाह फर्रूखसियर सात हजार का मनसब न्यौछावर कर रहा था, इससे स्पष्ट है कि औरंगजेब द्वारा छोड़ा गया मुगल राज्य केवल 6 वर्ष की अल्पावधि में ही धराशायी होने को आतुर था। जयसिंह भी समझ गया था कि अब समय पलट रहा है।

सवाई जयसिंह ने बुंदेलखण्ड के शासक छत्रसाल बुन्देला तथा बूंदी के राजा बुद्धसिंह हाड़ा के सहयोग से अफगान विद्रोहियों को दबाना आरम्भ किया। राजा जयसिंह ने इनायत खाँ और दिलेर खाँ को स्थान-स्थान पर पराजित करके उनकी शक्ति को कुचल दिया। उन्हीं दिनों इस क्षेत्र के कुछ हिन्दू राजाओं ने भी विद्रोह किए जिनमें राजगढ़ का राजा मोहनसिंह, नरवर का राजा गजसिंह तथा पूरनमल अहीर मुख्य थे। जयसिंह ने इन सभी विद्रोहों को कुचल दिया।

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उस काल में सवाई जयसिंह के पास 10 हजार सैनिक थे जिनमें बंदूकधारी सैनिक भी अच्छी संख्या में थे। इस सेना के पास गोला-बारूद भी पर्याप्त मात्रा में था। इस कारण सवाई जयसिंह ने घामुनी नामक स्थान पर दिलेर अफगान के 12 हजार सैनिकों को परास्त करके उसके 2 हजार सैनिक तलवार के घाट उतार दिये। जयसिंह के भी पांच सौ सैनिक काम आये।

अप्रेल 1715 में मराठों की दो बड़ी सेनाएं मालवा में घुस आईं। कान्होजी भोंसले तीस हजार और खाण्डेराव दाभाड़े बारह हजार सैनिक लेकर आया था। मराठों ने कम्पिल परगने से 3 साल की चौथ मांगी। इस कारण सरकारी अमला, मराठों से घबराकर उज्जैन भाग आया। मराठों ने काम्पिल लूट लिया। जयसिंह उस समय भेलसा में था। वह तत्काल उज्जैन के लिये रवाना हुआ। 8 मई 1715 को जयसिंह कम्पिल पहुंचा। वहाँ उसे ज्ञात हुआ कि मराठे लूट का माल लेकर पिलसुद के निकट नर्मदा पार करने की तैयारी में हैं।

इस पर जयसिंह उसी समय पिलसुद के लिये चल पड़ा और मार्ग में कहीं भी रुके बिना, 10 मई की संध्या होने से कुछ समय पहले पिलसुद पहुंच गया। मराठों के पास, जयसिंह की तुलना में कई गुना सेना थी इसलिये वे उत्साह में भरकर जयसिंह से लड़ने के लिये आये। चार घण्टे तक दोनों पक्षों में भयानक युद्ध हुआ।

जयसिंह के साथ बूंदी के राजा बुद्धसिंह हाड़ा, छत्रसाल बुंदेला तथा धीरजसिंह खींची ने इस युद्ध में अद्भुत वीरता दिखाई। मराठे अपने हथियार छोड़कर भाग खड़े हुए। जब युद्ध बंद हुआ तो पूरी तरह रात हो चुकी थी। कुछ ही देर बाद जयसिंह ने अपने भूखे-प्यासे और थके हुए सैनिकों को फिर से उठाया और मराठों पर हमला बोलने के आदेश दिये।

 जैसे ही जंगलों में पड़े हुए मराठों ने देखा कि राजपूत चढ़े चले आ रहे हैं तो वे सिर पर पैर धरकर भाग छूटे। वे अपने घायल सिपाहियों, जानवरों और लूट के सामान को छोड़कर रात में ही नर्मदा के पार उतर गये। जयसिंह ने अपने सैनिकों को जीते हुए माल में से बहुत बड़ा हिस्सा दिया ताकि वे सालों तक आराम से जीवन यापन कर सकें तथा जीवन भर जयसिंह के प्रति वफादार रहें।

मराठों को राजपूताने में इससे पहले इतना कठिन पाठ किसी ने नहीं पढ़ाया था। इस विजय से सम्पूर्ण भारत में सवाई जयसिंह के नाम की धूम मच गई। फर्रूखसियर ने महाराजा सवाई जयसिंह को प्रशंसा पत्र भिजवाया।

इधर सवाई जयसिंह मालवा में मुगल सल्तनत की स्थिति मजबूत करता जा रहा था और उधर दिल्ली में राजनैतिक स्थितियां तेजी से बदल रही थीं। एक तरफ तो फर्रूखसियर और सैयद बन्धुओं के बीच कटुता बढ़ती जा रही थी तो दूसरी तरफ दिल्ली और आगरा के बीच यमुना के दक्षिणी प्रदेश में चूड़ामन के नेतृत्व में जाटों के उपद्रव बढ़ते जा रहे थे।

इस कारण फर्रूखसियर ने सवाई जयसिंह को मालवा से दिल्ली बुलाया। मई 1716 में जयसिंह दिल्ली पहुंचा। बादशाह ने उसे जाटों का दमन करने को कहा। जयसिंह ने सहर्ष इस काम को स्वीकार कर लिया क्योंकि आमेर के कच्छवाहे अपने राज्य की सीमा पर जाटों की बढ़ती हुई शक्ति को कुचलना चाहते थे और इस क्षेत्र के कुछ परगनों को अपने राज्य में मिलाने की लालसा रखते थे।

सवाई जयसिंह ने रूपाराम धायभाई को मालवा का नायब सूबेदार बनाकर भेज दिया और स्वयं जयपुर, कोटा, बूंदी तथा नरवर के राजाओं और उनकी सेनाओं को लेकर चूड़ामन जाट के विरुद्ध चल पड़ा। चूड़ामन बीस वर्ष की खाद्य सामग्री तथा गोला बारूद एकत्र करके थूण के दुर्ग में बंद हो गया। चूड़ामन का पुत्र अपने जाट सैनिकों के साथ थूण दुर्ग से बाहर निकल गया ताकि वह जयसिंह की सेनाओं पर पीछे से धावे मारकर तथा उनकी रसद रोककर क्षति पहुंचा सके।

सवाई जयसिंह तथा उसके अधीन राजाओं की सेनाएं सात माह तक थूण का दुर्ग घेरे रहीं किंतु चूड़ामन को किले से बाहर नहीं निकाल सकीं। इस पर जयसिंह ने थूण के चारों ओर का जंगल काटकर साफ करवा दिया और थूण से आगरा तक के मार्ग पर राजपूतों की चौकियां स्थापित कर दीं। इस प्रकार दो वर्ष बीत गये और इस अभियान पर मुगल बादशाह के दो करोड़ रुपये खर्च हो गये। जनवरी 1717 में फर्रूखसियर ने एक बड़ी तोप भिजवाई किंतु वह घेरे की खंदकें पार करके, थूण दुर्ग की दीवारों के पास नहीं पहुंच सकी।

10 फरवरी को महाराजा सवाई जयसिंह, बूंदी के महाराजा बुद्धसिंह को शिविर में छोड़कर, कोटा के महाराजा भीमसिंह के साथ मथुरा से दक्षिण-पश्चिम में 10 मील दूर सोंख की गढ़ी पर चौकी स्थापित करने गया। रात में लौटते समय जब सेना असावधान और अव्यवस्थित थी, थूण के पास घात में बैठे जाटों ने उस पर गोलियां चलाईं।

कुछ गोलियां उन हाथियों तक भी पहुंचीं जिन पर मुगल अधिकारी सवार थे। इस पर फर्रूखसियर ने जयसिंह को नाराजगी भरा पत्र लिखकर अपने गुप्तचरों को दण्डित करने को कहा जो जाटों के उस नाले को नहीं खोज सके जहाँ वे घात लगाकर बैठे थे।

फर्रूखसियर ने खानजहाँ बहादुर सैयद मुजफ्फर खाँ के नेतृत्व में एक और सेना भिजवाई। सैयद मुजफ्फर खाँ, फर्रूखसियर के वजीर सैयद अब्दुल्ला का आदमी था और जयसिंह को पसंद नहीं करता था। सैयद मुजफ्फर खाँ ने चूड़ामन से समझौता कर लिया। इस समझौते से राजा जयसिंह को जानबूझ कर दूर रखा गया।

जब 10 अप्रेल 1718 को चूड़ामन तथा रूपा को बादशाह के समक्ष प्रस्तुत किया गया तो खानजहाँ बहादुर सैयद मुजफ्फर खाँ ने जीत का समस्त श्रेय स्वयं बटोर लिया और सवाई जयसिंह हाथ मलता ही रह गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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